करीब चार साल की देरी और तीन बार नाम बदलने के बाद हनी त्रेहान की मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म रिलीज हुई। पहले इस फिल्म का नाम घल्लूघारा था, फिर इसे पंजाब ’95 और औखिर में सतलुज नाम दिया गया। दिलजीत दोसांझ इस फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे हैं।
फिल्म को ZEE5 पर भारत और दुनिया के दूसरे देशों में एक साथ रिलीज किया गया। लेकिन रिलीज होने के सिर्फ दो दिन बाद ही इसे भारत में ZEE5 से हटा दिया गया, जबकि दूसरे देशों में यह फिल्म पहले की तरह उपलब्ध रही। ZEE5 ने फिल्म हटाने की वजह बताते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह फैसला ‘मौजूदा परिस्थितियों’ को देखते हुए लिया गया है।
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— ZEE5Official (@ZEE5India) July 5, 2026
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आम धारणा के उलट, यह फिल्म किसी सरकारी बैन या आधिकारिक रोक की वजह से नहीं हटाई गई। इसकी असली वजह भारत के इंटरनेट नियमों का एक कम चर्चित प्रावधान है। इस नियम पर फिलहाल अदालत के आदेशों के कारण पूरी तरह अमल नहीं हो रहा है। ऐसे में जब किसी तरह का कानूनी सवाल उठता है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर सावधानी बरतते हुए कंटेन्ट को हटा देते हैं।
ZEE5 ने साफ कहा कि वह इस फिल्म का समर्थन करता है और इसे दोबारा प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए सभी जरूरी कानूनी और दूसरे विकल्पों पर काम कर रहा है। इससे यह साफ होता है कि यह मामला सीधे तौर पर सेंसरशिप का नहीं, बल्कि डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े कानूनी नियमों की जटिल प्रक्रिया का है।
यानी जिस फिल्म को कई साल इंतजार के बाद आखिरकार दर्शक मिले थे, वह एक बार फिर लोगों की नजरों से ओझ हो गई। लेकिन इसकी वजब किसी सरकार की रोक नहीं, बल्कि अधूरे और उलझे हुए कानूनी नियम बने।
तीन साल और 127 बदलाव
फिल्म की मुश्किलें 2022 के आखिर में ही शुरू हो गई थीं, जब RSVP ने इसे केंद्रीय फिल्म प्रमाण बोर्ड (CBFC) के पास सर्टिफिकेट के लिए भेजा। करीब 6 महीने चली प्रक्रिया के बाद बोर्ड ने 21 बदलाव (कट) औऱ फिल्म का नाम बदलने की शर्त पर इसे मंजूरी दी। बोर्ड का कहना था कि फिल्म के कुछ दृश्य हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं या सिख युवाओं पर गलत असर डाल सकते हैं।
इसके बाद RSVP ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद माँगे गए बदलावों की संख्या बढ़कर 127 तक पहुँच गई। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने बाद में यह जानकारी साझा की।
बोर्ड ने फिल्म के नाम से ‘पंजाब’ शब्द हटाने की भी माँग की, जबकि पूरी कहानी पंजाब में ही दिखाई गई है। इसके अलावा पंजाब पुलिस का जिक्र हटाने और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का नाम न लेने की भी बात कही गई। हनी त्रेहान ने इन माँगों को इतिहास के कुछ हिस्सों को मिटाने की कोशिश बताया।
इसी लंबे विवाद के बीच 2023 में फिल्म का टोरोंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होने वाला वर्ल्ड प्रीमियर भी रद्द हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स में इसके पीछे राजनीतिक कारणों को जिम्मेदार बताया गया।
असल सवाल: IT नियम 2021 का नियम 9 क्या कहता है और यह अब तक लागू क्यों नहीं हो पाया?
सतलुज फिल्म के रिलीज और हटने की कहानी सीधे सेंसरशिप से ज्यादा भारत के डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े नियमों को समझने की कहानी है। भारत में किसी फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने से पहले CBFC से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है। यह नियम सिनेमैटोग्राफ नियम, 1952 के तहत लागू है। लेकिन OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज के लिए CBFC का सर्टिफिकेट जरूरी नहीं है।
दिसंबर 2025 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लोकसभा में भी साफ किया था कि CBFC की जिम्मेदारी केवल सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों तक सीमित है। OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट पर CBFC नियम लागू नहीं होते।
OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 लागू होते हैं। इनमें सबसे अहम नियम 9 है। नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म को तय की गई आचार संहिता का पालन करना होता है। वहीं नियम 9(3) यह बताता है कि इन नियमों का पालन कैसे कराया जाएगा। इसके लिए तीन स्तर की स्व-नियमन (Self-Regulation) व्यवस्था बनाई गई है।
पहला स्तर: OTT प्लेटफॉर्म खुद शिकायतों की सुनवाई करता है। इसके लिए हर प्लेटफॉर्म को अपना शिकायत निवारण अधिकारी (Grievance Officer) नियुक्त करना होता है।
दूसरा स्तर: अगर मामला वहीं नहीं सुलझता, तो उसे उद्योग के स्व-नियामक संगठन (Self-Regulating Body) के पास भेजा जाता है।
तीसरा स्तर: इसके बाद भी जरूरत पड़ने पर मामला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-विभागीय निगरानी समिति के पास जाता है।
यह तीन स्तरीय व्यवस्था तय करती है कि OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट को कैसे जारी करेंगे और जरूरत पड़ने पर उसे हटाने या उस पर कार्रवाई करने का फैसला कैसे लिया जाएगा।
लेकिन सबसे अहम बात यह है कि IT नियम 2021 का नियम 9 लागू होने के कुछ ही दिनों बाद अदालत ने उस पर अंतरिम रोक लगा दी थी। 14 अगस्त 2021 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने नियम 9(1) और 9(3) पर रोक लगा दी। यह मामला पत्रकार निखिल वागले और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लीफलेट’ की ओर से दायर किया गया था। अदालत ने शुरुआती सुनवाई में माना कि इन नियमों में शामिल आचार संहिता संविधान के खिलाफ हो सकती है और केंद्र सरकार को IT कानून के तहत ऐसे नियम बनाने का अधिकार भी नहीं हो सकता।
इसके कुछ हफ्तों बाद मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह की रोक लगाई और कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू माना जाएगा।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में इस नियम से जुड़े सभी मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट भेज दिया। वहाँ नवंबर 2024 से सुनवाई शुरू हुई, लेकिन अब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आया है। यानी नियम 9 को बने हुए लगभग पूरा समय बीत चुका है, लेकिन उस पर लगी अदालत की रोक अभी भी जारी है। इसके बावजूद केंद्र सरकार संसद में अब भी इन्हीं नियमों को भारत में OTT प्लेटफॉर्म के लिए लागू व्यवस्था बताती रही है।
सीधे शब्दों में कहें तो जिस नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट का खुद वर्गीकरण (Self-Certification) करते हैं और शिकायत मिलने पर उसे हटाने जैसी कार्रवाई कर सकते हैं, वही नियम कई वर्षों से अदालत में चुनौती के दायरे में है और उस पर अंतरिम रोक लगी हुई है।
यानी सतलुज जिस कानूनी व्यवस्था के तहत OTT पर रिलीज हुई थी, उसी व्यवस्था के तहत बाद में उसे प्लेटफॉर्म से हटा भी दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया ऐसे नियमों के आधार पर हुई, जिनकी वैधता पर पिछले करीब पाँच साल से अदालतों में सुनवाई चल रही है और जिन पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।
फिल्म हटाने का फैसला ZEE5 का था, सरकार का नहीं
सतलुज के निर्माताओं ने फिल्म का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण पहले ही दिन दुनिया भर में ZEE5 पर रिलीज करने का फैसला किया। उन्होंने फिल्म में और बदलाव करने के बजाए इसे उसी रूप में दर्शकों तक पहुँचाया, जैसा इसे पहले अलग-अलग फिल्म समारोहों में दिखाया गया था।
निर्माताओं का मकसद साफ था। वे चाहते थे कि दुनिया भर के दर्शक फिल्म को बिना किसी बदलाव के देख सकें, इससे पहले कि किसी तरह के नए दबाव के कारण इसमें और कट लगाने पड़ें। यह इसलिए भी अहम था क्योंकि फिल्म के आखिर में जसवंत सिंह खालड़ा की पुलिस हिरासत में हत्या को दिखाया गया है। अगर इस हिस्से में बदलाव किया जाता, तो फिल्म का मुख्य संदेश कमजोर पड़ जाता।
हालाँकि, रिलीज के सिर्फ दो दिन बाद ZEE5 ने फिल्म को भारत में अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। प्लेटफॉर्म ने हटाने की कोई साफ वजह नहीं बताई, लेकिन कहा कि वह तय कानूनी प्रक्रिया के तहत फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है।
अब तक इस मामले में सरकार की ओर से फिल्म हटाने का कोई आधिकारिक आदेश सामने नहीं आया है। यानी फिल्म को हटाने का फैसला ZEE5 ने अपनी आतंरिक शिकायत और स्व-नियमन प्रक्रिया के तहत लिया। यही वह कानूनी व्यवस्था है, जिस पर कई वर्षों से अदालत में सुनवाई चल रही है और जिस पर अभी भी अंतरिम रोक लगी हुई है।
रिकॉर्ड क्या कहते हैं?
फिल्म जिस मुद्दे को उठाती है, उसका सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजाब में लापता हुए लोगों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि इस कहानी के दो पहलू हैं और दोनों को समझना जरूरी है।
जसवंत सिंह खालड़ा, जो अमृतसर में एक बैंक मैनेजर थे, उन्होंने श्मशान घाटों में खरीदी गई लकड़ियों के रिकॉर्ड की जाँच की। इसी आधार पर उन्होंने दावा किया कि कई अज्ञात लोगों के शवों को गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। सितंबर 1995 में पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी। इस मामले में 6 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
CBI की दिसंबर 1996 की रिपोर्ट में भी कहा गया कि केवल अमृतसर जिले में ही 2,097 लोगों का गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। इनमें से 582 लोगों की पहचान हो गई थी, जबकि 278 लोगों की आंशिक पहचान हो सकी थी।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया। अदालत ने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास भेजा। इसके बाद 2006 तक 1245 पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया गया।
लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरी ओर, पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान ऐसे समय चला, जब करीब एक दशक तक खालिस्तानी उग्रवाद ने राज्य में भारी हिंसा फैलाई थी। पुलिस अधिकारी केपीएस गिल के अनुसार, इस हिंसा में करीब 21,469 लोगों की जान गई। इनमें लगभग 11,700 आम नागरिक थे, जिन्हें खालिस्तानी उग्रवादी संगठनों ने मार डाला। मरने वालों में हजारों सिख और करीब 4,500 हिंदू भी शामिल थे।
Human Rights Watch की रिपोर्ट भी इन दोनों पहलुओं का जिक्र करती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक तरफ खालिस्तानी संगठनों ने आम लोगों की हत्याएँ और राजनीतिक नेताओं पर हमले किए। वहीं दूसरी तरफ 1984 से 1995 के बीच सरकारी कार्रवाई के दौरान कई लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया, उनके साथ यातनाएँ हुईं और हजारों लोग लापता हो गए।
यानी अगर कोई फिल्म या लेख सिर्फ एक पक्ष दिखाता है, तो जरूरी नहीं कि वह गलत हो। लेकिन वह पूरी कहानी भी नहीं बता रहा होता। इस पूरे दौर को समझने के लिए दोनों पक्षों को साथ देखकर ही सही तस्वीर सामने आती है।
निष्कर्ष
अगर कोई कहता है कि सतलुज पर सरकार ने बैन लगा दिया, तो पूरी सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। अब तक ऐसे कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि सरकार ने फिल्म पर आधिकारिक रोक लगाई हो। फिल्म पहले IT नियम, 2021 के नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई और बाद में उसी व्यवस्था के तहत उसे हटा भी दिया गया। खास बात यह है कि इसी नियम पर 2021 से अदालतों में सुनवाई चल रही है और इसकी वैधता पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।
फिल्म के निर्माताओं रॉनी स्क्रूवाला की कंपनी RSVP Movies और MacGuffin Pictures ने पहले ही दिन का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण ZEE5 के अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया था। इसलिए भारत में फिल्म हटने के बाद भी दुनिया के कई देशों में दर्शक इसे देख सकते थे।
कुल मिलाकर, पाँच साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद IT नियम 2021 के नियम 9 की कानूनी स्थित अब भी पूरी तरह साफ नहीं है। इसके बावजूद OTT प्लेटफॉर्म और कंटेन्ट बनाने वाले इसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं।


