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नहीं, दक्षिणपंथी यूँ ही नहीं कर रहे Special Ops-2 पर बवाल, सीरीज में भरपूर है प्रोपगेंडा का माल: सुधीर-चड्ढा-सुब्रमण्यम ‘दगाबाज’, फारूक-सुलेमान-रुहानी ‘पक्के देशभक्त’

कुछ लोगों का मानना है कि इस फिल्म को इन कैरेक्टर्स के कारण दक्षिणपंथियों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है जो कि बेवजह है, लेकिन वो ये नहीं मान रहे कि फिल्म में चालाकी से दिखाए जाने वाले नैरेटिव के दिन चले गए हैं। अब दर्शक समझदार हैं। उन्हें मालूम चलता है कि फिल्मों में पंडित ‘ढोंगी’ और मौलवी ‘साहब’ क्यों दिखाए जाते हैं।

देशभक्ति दिखाने के लिए कोई मजहब जरूरी नहीं होता, लेकिन अगर फिल्म में प्रोपगेंडा दिखाना हो तो उसमें मजहब का छौंक एक महत्वपूर्ण इंग्रीडिएंट है। आपने 1980 में आई ‘शान’ फिल्म में एक गाना सुना होगा- ‘नाम अब्दुल है मेरा सबकी खबर रखता हूँ’ अब समय बदला है, दुनिया ‘शान’ से ‘स्पेशल ऑप्स के सीजन 2’ तक पहुँच गई है, तो कैरेक्टर के हिसाब से गाना भी अलग होना चाहिए। 

जैसे-

  • नाम फारूक है मेरा- देश की रक्षा करता हूँ।
  • नाम सुलेमान है मेरा- मैं वतन से प्यार करता हूँ।
  • नाम रुहानी है मेरा- देश की सुरक्षा में हरदम सूटकेस तैयार रखती हूँ।
  • नाम अब्बास है मेरा- वाइन छोड़कर देश के लिए काम करता हूँ।
  • नाम साहिल है मेरा-बेबस बनकर बीवी पर नजर रखता हूँ।

इन नए गानों की लाइन सुन अगर आपके मन में कोई सवाल आए तो आपको जाकर स्पेशल ऑप्स का सीजन-2 देखना चाहिए। ‘साइबर अटैक’ को फोकस में रखकर बनाई गई एक सीरीज- जिसमें लाचार, बेचारा, हारा, बहादुर और सबसे ईमानदार अगर कोई दिखाया गया है तो वो यही कुछ कैरेक्टर हैं।

सीरीज में जितना इन कैरेक्टर्स को ‘देशभक्त’ दिखाया गया है उतना तो मेकर्स ‘विलेन’ को भी विलेन दिखाना भूल गए। कहने को सीरीज ‘साइबर वारफेयर’ और ‘न्यूक्लियर धमाके’ का प्लॉट देकर निर्मित की गई है, मगर तकनीकी समस्याएँ इतनी हैं कि कोई भी समझ जाए असली फोकस कहाँ और क्या प्लॉट सेट करने में था।

सीरीज में साइबर वायरफेयर का खतरा दिखाने का प्रयास हुआ है वो भी फिक्शनल लाइन और आभासी तथ्य पर। शुरू में दिखाया जाता है कि भारत 2014 में एक साइबर अटैक हुआ था लेकिन उस समय भारत ने उसे जैसे-तैसे करके रोक लिया और जब जाँच हुई तो पता चला कि इसके पीछे चीन का हाथ था। आगे कहानी बढ़ती है और पता चलता है कि चीन तो छोटा दुश्मन है, असली लड़ाई तो भारत की एक भारतीय जिसका नाम ‘सुधीर अवस्थी’ है उससे है।

सुधीर अवस्थी अपने आपको ‘ग्लोबल सिटिजन’ बताता है और देश की अर्थवस्वस्था को हिलाने के लिए चीन से सौदा करके बैठा है। उसने देश के महान वैज्ञानिक डॉक्टर पीयूष भार्गव को भी किडनैप कर लिया है और अब देश की आन अगर कोई बचा सकता है तो वो सिर्फ एक अंडर कवर एजेंट फारूक ही है। फारूक- हिम्मत सिंह का सबसे काबिल असेट है और नेपाल में किसी ने उसे पकड़ लिया है।

सीरीज में हिंदू गद्दार

अब फारूक को छुड़ाने के लिए ‘हिम्मत सिंह’ पाकिस्तानी की मदद लेते हैं। (इस सीरीज में इस पाकिस्तानी से एक नहीं बल्कि दो बार मदद लेते हुए दिखाया गया है। एक बार फारूक को छुड़ाने के लिए और दूसरी बार एक लोकेशन की जानकारी लेने के लिए।)

खैर… हिम्मत सिंह के पाकिस्तानी नेटवर्क की मदद से नेपाल में फँसे फारूक को छुड़ाते हैं और इसके बाद फारूक काम पर लगता है।

यहाँ गौर करने वाली बात है- फारूक को बचाना किसे है- डॉक्टर पीयूष को। फारूक को सामना किसका करता है- सुधीर अवस्थी का। फारूक ईमानदार किसके लिए- हिम्मत सिंह के लिए और फारूक लड़ किसके लिए रहा है- भारत के लिए।

अजीब बात ये नहीं है कि भारत को बचाने के लिए ‘फारूक’ ही सबसे बेहतर विकल्प हिम्मत सिंह को दिखता है। अजीब ये है कि उससे बेहतर किसी को सीरीज में दिखने नहीं दिया जाता। सीरीज में एक कैरेक्टर अभय सिंह का है, जो उन ‘विनोद शेखावत’ के बेस्ट हैंड थे जिन्होंने साइबर फ्रॉड रोकने का काम संभाला था। बाद में उन्हें गोली मार दी गई तो अभय सिंह ने दोषियों से बदला लेने की कोशिश की। सीरीज में वहाँ भी यही दिखाया गया कि अभय सिंह की बेवकूफी के कारण फारूक डॉ पीयूष को नहीं बचा पाया। अगर अभय सिंह गलती नहीं करते तो फारूक बस डॉक्टर पीयूष को बचा ही लेता। यहाँ निर्माता चाहते तो अभय के ‘इमोशन्स’ का इस्तेमाल करके उन्हें आगे रखा जा सकता था। मगर नहीं, हाईलाइट तो किसी और को ही करना था।

अब बात अगले कैरेक्टर की। आपने सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप को देखा गया जिसमें सुलेमान को वतन से मोहब्बत पर पैसे भेजने को कहा जाता है और फिर एक गाली होती है। असल में इस एक क्लिप को देख आप जैसा सोच रहे हैं वैसा नहीं है। सीरीज में ‘सुलेमान’ को लेकर असल में ये दिखाया गया है कि वो भले ही धंधा गलत कर रहा है लेकिन देखा जाए तो उसकी वतनपरस्ती उस पीएमओ के अधिकारी नरेश चड्ढा से कहीं ज्यादा है जो सुधीर अवस्थी के हाथों बिक गया है।

आगे बचा रुहानी का कैरेक्टर। रुहानी वही खास एजेंट है जिसे फारूक के साथ जिम्मेदारी दी गई है कि वो देश के महान वैज्ञानिक को बचाए। इस काम के लिए उसे अचानक एक कॉल आती है और दिखाया जाता है कि वो अपने बिस्तर से उठकर अपना सूटकेस उठाकर चल देती है देश की रक्षा में। 

ये सब उसके लिए सहज है नहीं है- इस पर कहीं कोई बात नहीं होती। उलटा इस सीरीज में एक कैरेक्टर को इतना नर्म और मासूम दिखाया गया है कि आपको देखकर लगे कि कोई ‘साहिल’ आपके जीवन में भी हो तो आपके लिए भी चीजें आसान हो जाएँगी।

साहिल है रुहानी का शौहर। सीरीज के सीन में दिखाया जाता है कि रुहानी को जब देश के लिए ऑपरेशन में शामिल होने के लिए कॉल आती है तो रुहानी रातोंरात उठकर निकल जाती है और शौहर से सिर्फ इतना ही कहती है कि वो क्लाइंट से मिलने जा रही है।

सवाल ये है कि आज के समय में जब चीजें इतनी स्पष्ट हैं तो उन्हें इतना हवा-हवाई रखने का क्या अर्थ हो सकता है। क्या किसी सामान्य घर की महिला के लिए खासकर मुस्लिम परिवार की महिला के लिए रातोंरात क्लाइंट से मिलने के लिए निकलना इतना आसान है?

मुस्लिम दंपति को आदर्श दंपति दिखाने में मेकर्स को इतनी तसल्ली नहीं मिली कि उन्होंने आगे सीन में ये भी दिखाया कि साहिल जो है रुहानी का पीछा करते हुए आता है और उसे दूसरे मर्द के साथ देखकर भी मासूमियत से सवाल करता है।

सात समंदर पार से तीन तलाक देने वाली खबरों से जहाँ मीडिया भरा पड़ा है, वहाँ सीरीज में दिखाया जा रहा है कि एक शौहर अपनी बीवी की चिंता में सात हैदराबाद छोड़कर जॉर्जिया आ गया और हकीकत जानने के बाद चुपचाप केवल बर्गर खाता है और एक शब्द नहीं कहता। किसको इस दृश्य में साहिल में सबसे मासूम जीवनसाथी नहीं दिखेगा?

न्यूक्लियर प्लांट पर फर्जीवाड़ा

सीरीज में मुस्लिम कैरेक्टर्स को ऐसे परोसा गया है कि फिल्ममेकर्स भूल गए हैं कि जो फिल्म को साइबर वॉर पर बना रहे हैं उसमें कोई तकनीकी चीजों का ध्यान भी उन्हें रखना था। मेकर्स की सबसे बड़ी गलती ये है कि उन्होंने एक फिक्शनल कहानी को बूम करने के लिए अपनी क्रिएटिव बुद्धि लगाई, मगर वैज्ञानिक सिद्धांतों की पुष्टि करने में कोताही कर दी। अगर न्यूक्लियर प्लांट जैसा एंगल डालनेसे पहले वो थोड़ा सा वैज्ञानिक पक्ष समझते तो उन्हें पता चला कि उन्होंने फिल्म के जरिए कितना गलत विज्ञान परोसने की कोशिश की है।

दरअसल, फिल्म में ये दिखाया जाता है कि अगर डॉक्टर पीयूष ने भारतीयों का डेटा सुधीर को नहीं दिया तो फिर वो न्यूक्लियर की कूलिंग डाउन कर सकता है जिससे विस्फोट होगा और भारत में नरसंहार होगा। ऐसा दिखाया जाता है कि इस नरसंहार से तो बेहतर है भारतीय कंगाल ही हो जाएँ।

सुधीर अवस्थी यही तर्क देकर डॉक्टर पीयूष भार्गव से भारतीयों के बैंक डेटा को माँगता है और डॉक्टर भी नरसंहार की कल्पना करके ये मानने को तैयार हो जाते हैं। अब क्या इतनी रिसर्च करके बनाई गई सीरीज में वैज्ञानिक गलती बताने वाला कोई नहीं था कि कूलिंग डाउन होने से क्या होता है।

ऑपइंडिया अंग्रेजी के अनुराग इस तकनीकी समस्या पर अपने लेख में बात करते हैं। वह बताते हैं कि आखिर कैसे ये पूरा सीन ही एक फॉल्टी सीन है और दर्शकों को भ्रमित करने का प्रयास है।

समझिए अनुराग के लेख से कि जो सीरीज में दिखाया गया उससे ज्यादा से ज्यादा क्या होने की संभावना थी।

जब किसी न्यूक्लियर पावर प्लांट की कूलिंग सिस्टम फेल हो जाती है, तब बम जैसी विस्फोटक स्थिति नहीं, बल्कि मेल्टडाउन का खतरा होता है। रिएक्टर बंद होने के बाद भी फ्यूल रॉड्स 5–6% डिके हीट पैदा करते हैं। बिना ठंडक के यह गर्म होकर हाइड्रोजन और खतरनाक कोरियम बनाते हैं।

Source: Dall-E

चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी घटनाओं में भी परमाणु विस्फोट नहीं हुआ। आज के आधुनिक रिएक्टर्स में पासिव कूलिंग, ऑटोमैटिक शटडाउन और कंटेनमेंट सिस्टम होते हैं, जो बिजली या मानव त्रुटि के बावजूद काम करते हैं। इसलिए, आधुनिक रिएक्टर “चेर्नोबिल-प्रूफ” माने जाते हैं।

आगे बढ़ने से पहले बता दें कि “चेर्नोबिल-प्रूफ” एक अनौपचारिक शब्द है जिसका उपयोग यह बताने के लिए किया जाता है कि आधुनिक परमाणु रिएक्टर इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि वे चेर्नोबिल जैसी दुर्घटना के दोबारा  होने की संभावना को लगभग खत्म कर देते हैं।

Source: MIT

इसकी खासियत होती है:

बेहतर डिज़ाइन: आधुनिक रिएक्टरों में ऐसे डिज़ाइन फीचर्स होते हैं जो फेल-सेफ होते हैं- यानी अगर कोई सिस्टम काम करना बंद कर दे) हो जाए तो भी रिएक्टर सुरक्षित रहता है।
निगेटिव टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट: जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, रिएक्शन धीमी हो जाती है, जिससे फिसन रिएक्शन खुद रुकने लगती है।
कंटेनमेंट डोम: चेर्नोबिल घटना के वक्त RBMK रिएक्टर में यह नहीं था, लेकिन आधुनिक रिएक्टरों में मोटा कंक्रीट का डोम होता है जो रेडियोएक्टिव मटेरियल को बाहर नहीं निकलने देता।
पासिव कूलिंग सिस्टम: बिजली कटने या ऑपरेटर की गलती के बावजूद ये सिस्टम अपने आप काम करते हैं और रिएक्टर को ठंडा रखते हैं।
ऑटोमैटिक शटडाउन: इमरजेंसी में कंट्रोल रॉड्स अपने आप गिर जाती हैं और रिएक्शन को रोक देती हैं।

Source: MIT

अब इस गलती के बारे में जानकर तो लगता है कि सीरीज का पूरा प्लॉट जिस आधार पर सेट किया गया है यानी वो ही फुस्स है। न्यूक्लियर प्लांट में जब ब्लास्ट होने ही वाला नहीं था तब आखिर डॉक्टर पीयूष भार्गव को डरा-सहमा दिखाने का क्या अर्थ। क्या ये भारत के वैज्ञानिकों की बौद्धिक क्षमता पर संदेह उठाने जैसा नहीं है कि कोई भी अपनी बातों में फँसाकर भारतीय वैज्ञानिकों से भारतीयों के डेटा को ले सकता है?

दिलचस्प बात ये है कि इस पूरी सीरीज में एक कहानी साथ-साथ और चल रही है। एक पूर्व अधिकारी सुब्रमणयम की, जिनकी बीवी बीमार थी और वो चाहकर भी बैंक से पैसे नहीं निकाल पा रहे थे क्योंकि कोई दिनेश ढोलकिया नाम का बिजनेसमैन बैंक से धोखा करके बाहर भाग गया था। सीरीज में दिखाया जाता है कि गुजरात का एक बिजनेसमैन इतना बड़ा धोखेबाज है कि वो भारतीयों के पैसे लेकर भाग गया है और सुब्रमण्यम, जिनकी पत्नी का देहांत हो चुका है, वो किसी भी कीमत पर चाहते हैं कि ढोलकिया को पकड़कर लाया जाए। इसके लिए वो हिम्मत सिंह को बोलते हैं और धमकी देते है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो संसद का साउथ ब्लॉक उड़ा देंगे।

इस कहानी… एक अधिकारी पर कितना प्रेशर होता है, उसे कितने केस एक साथ देखने पड़ते हैं, उसे अपने ही धमकी देते हैं, वो किस जद्दोजहद में होता है…. किस कारण से जोड़ी गई है, ये भी शायद मेकर्स ही समझा पाएँगे… क्योंकि एक बिंदु को छोड़कर वो पूरी सीरिज में हर प्वाइंट समझाने में विफल रहे हैं। सीरीज के मुख्य किरदार ‘हिम्मत सिंह’ को अगर दो मिनट भी किनारे कर दिया जाए तो आपको समझ आएगा कि सीरीज आपके दिमाग में ये डाल रही है कि देश से गद्दारी ‘सुधीर अवस्थी, चड्ढा ‘ करते हैं और देश को बचाने का काम ‘फारूक-रुहानी’ करते हैं।

क्यों न हों दक्षिणपंथी नाराज?

कुछ लोगों का मानना है कि इस फिल्म को इन कैरेक्टर्स के कारण दक्षिणपंथियों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है जो कि बेवजह है, लेकिन वो ये नहीं मान रहे कि फिल्म में चालाकी से दिखाए जाने वाले नैरेटिव के दिन चले गए हैं। अब दर्शक समझदार हैं। उन्हें मालूम चलता है कि फिल्मों में पंडित ‘ढोंगी’ और मौलवी ‘साहब’ क्यों दिखाए जाते हैं। कैरेक्टर बैलेंस करने की बात थी तो फिक्शनल कहानियों में तो कुछ भी जोड़ा जा सकता था, फिर इसमें क्यों नहीं।

हमें भी पता है कि देशभक्त होने के लिए किसी का धर्म और मजहब नहीं देखा जाता और न कभी धर्म-मजहब देखकर देशभक्ति को आँकना चाहिए। इसीलिए ये देश कभी भारतीय सेना के जवान औरंगजेब के बलिदान को नहीं भूलता, उनके भाइयों के भारतीय सेना में शामिल होने के जज्बे को सलाम भी करता है और ज्योति मल्होत्रा जैसे जासूसों का समय आने पर खुलकर विरोध भी करता है। लेकिन, पर्दे पर एक नैरेटिव गढ़ने लिए मेकर्स विलेन वाली पंक्ति में किसे खड़ा कर रहे हैं, किसे हीरो बना रहे हैं, दर्शकों के मन पर क्या छाप छोड़ रहे है… ये सब उनकी मंशा पर जरूर सवाल उठाता है। साथ ही आज के उनकी कैरेक्टर बैंलेंसिंग करने की रिवायत से संदेह भी होता है।

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