भारत, धर्म और कानून: ‘आधुनिक’ भारतीय मानस की औपनिवेशिक दासता

जैसे केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के मामले में तैयारी और साहस दिखाया, क्या वैसा ही साहस कानूनी शिक्षा और उससे जुड़े अन्य मसलों के मामले में दिखाया जाएगा? क्या भारतीय सभ्यता के सत्य और न्याय की स्थापना, जोकि धर्म के मूल हैं, में योगदान के साथ न्याय होगा?

भारतवर्ष की सभ्यता का उत्तराधिकारी भारतीय गणराज्य जब अपना 73वाँ स्वतन्त्रता दिवस मना रहा था, तब माननीय सुप्रीम कोर्ट श्री राम जन्मभूमि मामले में दैनिक सुनवाई चल रही थी। श्री पद्मनाभस्वामी स्वामी मंदिर मामले और श्री सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर फ़ैसले अभी लंबित हैं।

इसके अलावा श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर भी सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में खड़ा है, और न जाने किस कारण से स्वर्गीय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की रिट पेटीशन पर अभी बहस ही शुरू नहीं हुई है। उन्होंने तमिल नाडु, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मंदिर नियंत्रण कानूनों को चुनौती दी थी। इन कानूनों के ज़रिए ‘सेक्युलर’ राज्य की राज्य सरकारों को केवल और केवल मंदिरों के मामले में निरंकुश शक्तियाँ दी गईं हैं।

इन सबके अलावा The Places of Worship (Special provisions) Act, 1991 [उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991] नामक भेदभावपूर्ण और अनर्गल कानून भी है, जो मध्ययुगीन बर्बरता के शिकार लोगों को अपने उपासना स्थलों, अपनी धरोहरों को पुनः प्राप्त करने से रोकता है।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

ऐसे में दिमाग में यह सवाल उठता है कि एक हज़ार साल तक भारतीय सभ्यता को मिटा देने के अनथक प्रयासों को हरा देने, नाकाम कर देने के बाद भारत ऐसी स्थिति में कैसे पहुँच गया है।

‘आधुनिक’ भारतीयों का औपनिवेशिक मानस

इस सवाल का शायद कोई जवाब नहीं है। पर इतना तो माना ही जा सकता है कि विदेशी लगाम तो हमने गले से 1947 में उतार फेंकी, लेकिन भारतीय जन के मानस से गुलामी की विचारधारा निकलना अभी बाकी है, और औपनिवेशिक मानसिकता से काम कर रहा आधुनिक भारतीय इस दशा के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार है। और यह विश्लेषण एक नहीं, कई भारतीय मूल के ही नहीं, विदेशी मूल और भारतीय मानस वाले विचारकों और विद्वानों का है।

यह ‘औपनिवेशिक मानस’ है क्या, इसे संक्षिप्त में ऐसे समझा जा सकता है कि आम ‘आधुनिक’ भारतीय अभी भी गोरे साहब के पैमानों पर ही शाबाशी तलाशता है। विदेशी पैमाने आम भारतीय चेतना में इतनी गहराई तक पैवस्त है (धँसा हुआ है) कि उसके लिए वही केवल सामान्य नहीं, आदर्श भी बन गया है। और अंग्रेज़ों की इसी मानसिक गुलामी में बँधे रहने के कारण ही आम भारतीय को हर भारतीय मूल और प्रकृति की चीज़ गँवारू और असभ्य, अंधविश्वासी, जातिवादी, नारी-विरोधी, अवैज्ञानिक और ‘एलीटिस्ट’ लगती है। और इस पूर्वाग्रह पर वह किसी भी प्रकार की बहस के लिए तैयार नहीं है।

वैचारिक गुलामी की ज़ंजीरों में बंधा यह भारतीय मानस न तर्क मानता है न ही तथ्य। वैचारिक रूप से गुलाम ‘आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक’ सोच वालों ने खुद ही ‘जाहिल मूलनिवासियों’ को ‘सभ्य’ बनाने का ठेका ले लिया है। और यह ‘आधुनिकीकरण’ केवल भारतीय उद्गम वाली/धार्मिक आस्थाओं का ही होता है, बाकियों में या तो इन्हें इसकी ज़रूरत ही नहीं दिखती, या फिर यह सुविधानुसार बनी ‘सेक्युलरिज़्म’ की परिभाषा के विरुद्ध हो जाता है।

अपने आपको ‘संवैधानिक देशभक्त’ (Constitutional Patriot) दिखाना भी इसी गुलामी की मानसिकता की ही ज़रूरत है। इनके लिए इस देश में संविधान के पहले तो कोई काम की चीज़ रही ही नहीं। उससे पहले की चीज़ों से या तो रिश्ता तोड़ लेने की इनके अनुसार ज़रूरत है, या फिर औपनिवेशिक लेंस से उसकी व्याख्या पुनः किए जाने की ज़रूरत है। अगर ज़रूरी हो तो इतिहास को ‘अविष्कृत’ भी किया जा सकता है। ‘झटका’ के नाम से इनकी नाक सिकुड़ती है, और ‘हलाल-सर्टिफिकेट’ के साथ भारतीय भूतकाल से पीछा छुड़ाने से ज़्यादा आनंद इन्हें किसमें आएगा?

और यह लम्बी-चौड़ी भूमिका बाँध कर आखिर मैं कहना क्या चाहता हूँ, आइए उसपर बात करते हैं।

न्यायिक तंत्र का ‘इन्हें सभ्य बनाओ’ मिशन

भारतीय न्यायिक तंत्र भारतीय विचार, परम्पराओं और संस्थाओं, बल्कि समूची भारतीय जीवन-शैली को ही, उसी औपनिवेशिक लेंस से देखता है, जिसकी हमने ऊपर बात की थी। उनके लिए हम सतत ‘सुधार’ की ज़रूरत में फँसे असभ्य मूलनिवासी हैं। भारतीय जीवन के हर पक्ष, शादी और उत्तराधिकार से लेकर धार्मिक परम्पराओं और त्यौहारों तक हर चीज़ को वे अपने इसी लेंस से गुज़ारकर देखते हैं, भले ही इनके पीछे का भारतीय कारण, भारतीय पक्ष उनकी समझ से बाहर हो। यह बात अलग है कि इतनी बार वही चीज़ करने पर भूले-भटके कभी-कभी वे सही साबित हो जाते हैं, जैसे बंद घड़ी दिन में दो बार सही समय बता जाता है।

कुछ लोगों का मानना है कि इस मानसिकता की जड़ में संविधान है। मैं इस मूल्यांकन से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ; लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि मैं इसे पूरी तरह गलत ही मानता हूँ। मैं इस मामले में सच में एक विचार तय नहीं कर पा रहा हूँ।

लेकिन अगर स्टैंड लेने को कह ही दिया जाए, तो मुझे लगता है कि गलती संविधान की व्याख्या करने और उसे और अन्य कानूनों को लागू करने वालों को मिली ट्रेनिंग की है। और यह मेरी राय भी अनिश्चित है, मैं इसे लेकर खुद भी 100% आश्वस्त नहीं हूँ।

जड़ों में ही ज़हर भर दिया जाता है

कच्ची उम्र में, जब मस्तिष्क और विचार बन ही रहे होते हैं, जब यह सिखाया जाता है कि तर्क, कारण, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी, मूलभूत अधिकार, बराबरी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सत्य, न्याय, लैंगिक समानता, न्याय का शासन आदि विदेश से मँगाए गए हैं, और इन क्षेत्रों में भारत के योगदान की तरफ एक नज़र दौड़ाने की भी कोशिश नहीं होगी, तो ज़ाहिर है कि युवा मन में यह बात बैठ जाएगी कि इन क्षेत्रों में भारत का कोई योगदान रहा ही नहीं।

केवल भारत के योगदानों को नज़रअंदाज़ ही किया जा रहा हो, ऐसा भी नहीं है। स्कूलों-कॉलेजों के इतिहास और राजनीति-शास्त्र के पाठ्यक्रमों में भारतीय जीवन-पद्धति के खिलाफ ज़हर उगला जाता है। इसे उगलने वाले मार्क्सवादी विचारधारा के होते हैं, जो दिखावे के लिए भी वैचारिक विभिन्नता बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हर भारतीय उद्गम का संस्थान कटघरे में खड़ा हो जीवित रहने, अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए गुहार करता, तर्क-वितर्क करने पर मजबूर दिखता है। और उसे अस्तित्व में होना चाहिए या नहीं, यह तय करने की शक्ति रखने वाले यह मानकर चलते हैं कि ‘इंडिक’ (भारतीय उद्गम और प्रकृति वालों) तो स्वभावतः अपराधी है, और यह उस पर है कि साबित करे वह ऐसा नहीं है। किसी एक कानून को हटा देने या बदल दिए जाने से कानूनी शिक्षा के इस गलत ‘एंगल’ से हो रहे नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।

समाधान

इसका समाधान शिक्षा-व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव में ही है। इतिहास, राजनीति शास्त्र और न्यायिक शिक्षा के पूरे ढाँचे में बदलाव करने की ज़रूरत है, चाहे मार्क्सवादी व्यक्तियों और शैक्षिक संस्थानों द्वारा इसका जितना भी विरोध हो। वे इन क्षेत्रों को अपने घर की खेती समझते हैं, जिसमें उनसे विभिन्न विचार रखने वाले का कदम रखना भी मना है।

लेकिन इस मामले में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2019 का ड्राफ़्ट निराश करता है। न्यायिक शिक्षा में सुधार, या उसकी खामियों का ढंग से विश्लेषण, केवल एक अनुच्छेद तक सीमित हैं। यह नाकाफी है। और इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि कानून और सुप्रीम कोर्ट की पहुँच में पूरा देश होता है।

जैसे केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के मामले में तैयारी और साहस दिखाया, क्या वैसा ही साहस कानूनी शिक्षा और उससे जुड़े अन्य मसलों के मामले में दिखाया जाएगा? क्या भारतीय सभ्यता के सत्य और न्याय की स्थापना, जोकि धर्म के मूल हैं, में योगदान के साथ न्याय होगा?

(भगवान अय्यप्पा मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनका पक्ष रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील जे साई दीपक के अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है। )

शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by making a monetary contribution

बड़ी ख़बर

जेएनयू विरोध प्रदर्शन
छात्रों की संख्या लगभग 8,000 है। कुल ख़र्च 556 करोड़ है। कैलकुलेट करने पर पता चलता है कि जेएनयू हर एक छात्र पर सालाना 6.95 लाख रुपए ख़र्च करता है। क्या इसके कुछ सार्थक परिणाम निकल कर आते हैं? ये जानने के लिए रिसर्च और प्लेसमेंट के आँकड़ों पर गौर कीजिए।

सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

114,891फैंसलाइक करें
23,419फॉलोवर्सफॉलो करें
122,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें

Advertisements
शेयर करें, मदद करें: