Wednesday, April 21, 2021
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दक्षिणेश्वर समूह: इतिहास में गुम आज़ादी का एक पन्ना, क्रांति का एक नायक जिसने आज मौत को गले लगाया

जनविद्रोह के डर से बिस्मिल को गोरखपुर, लाहिरी को गोंडा, अशफाकुल्ला खान को फैज़ाबाद और ठाकुर रौशन सिंह को इलाहाबाद जेल भेज दिया गया। फाँसी की तारीख 19 दिसंबर, 1927 तय हुई थी, लेकिन जेल प्रशासन ने लाहिरी को 17 को ही मौत के घाट उतारने का निर्णय लिया।

“कुछ अति-उत्साही नौजवानों ने एक दिन सोचा कि चलो एक क्रांतिकारी दल बना लें और हिंसा के ज़रिए आज़ादी पाने की कोशिश करें। कुछ दिन बाद सोचा पैसा कहाँ से आएगा, क्योंकि क्रांतिकारियों को ‘पूड़ी खाने’ के लिए पैसे की आवश्यकता थी। किसी ने सुझाया कि देशवासियों को लूटने से अच्छा है अंग्रेज़ों पर डाका डालें। फिर क्या? 10-20 लोगों ने रात में एक ट्रेन पर धावा बोला, उसमें रखा सरकारी पैसा लूट लिया और भाग खड़े हुए। लेकिन कुछ दिन बाद वे सब पकड़े गए। 4 को फाँसी हुई, बाकी को 4 साल, 10 साल, उम्रकैद की सज़ा।”

कमोबेश इतना ही होता है हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में काकोरी का इतिहास। कहीं-कहीं 2-4 अतिरिक्त बेतरतीब तथ्य बिना उनका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताए ठूँस दिए जाते हों तो उससे बहुत कुछ नहीं बदल जाता। न ये बताया जाता है कि आखिर एक डकैती के लिए किसी को भी फाँसी क्यों हुई, न ये कि उन्हीं चारों ठाकुर रौशन सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान और राजेंद्र लाहिरी को ही फाँसी क्यों हुई। दक्षिणेश्वर केस, सावरकर की किताब, असहयोग आंदोलन जैसे उस एक रात की पृष्ठभूमि में घटित हुए घटनाक्रमों या दूसरे विश्वयुद्ध के बाद नौसैनिक विद्रोह, सावरकर और ऑरोबिन्दो घोष के ‘मास्टर प्लान’ का (या कम-से-कम उसके पीछे के विचार का) अंत में सही साबित होना जैसे इसके प्रभावों के बारे में तो अगर तथाकथित ‘WhatsApp यूनिवर्सिटी’ न होती तो पता ही न चलता।

पूरा इतिहास हज़ार-पाँच सौ शब्दों में नहीं समेट जा सकता, इसलिए बता दूँ कि आज ही के दिन (17 दिसंबर को) 1927 में राजेंद्र लाहिरी को फाँसी दी गई थी। ऐसे में दक्षिणेश्वर केस और दक्षिणेश्वर समूह (जो आज़ादी के आंदोलन का मूक कर दिया गया एक ‘unsung hero’ है) पर करने का इससे बेहतर दिन और क्या हो सकता है।

क्यों पहुँचे लाहिरी कलकत्ता?

‘ब्राह्मण’ नामक शोषक जाति का, अरबों साल से प्रताड़ना का कुचक्र रचने वाला राजेंद्र लाहिरी का परिवार उनके जन्म के समय वर्तमान बांग्लादेश (उस समय बंगाल प्रेसिडेंसी) के पाबना जिले में रहता था। 1901 में उनका जन्म हुआ और 1905 में हुए बंग-भंग (बंगाल को मज़हब के आधार पर हिन्दू-बहुल पश्चिम बंगाल और मुस्लिम-बहुल पूर्वी बंगाल में बाँट देने का अंग्रज़ी शासकों का निर्णय) के विरोध में उनके पिता क्षितीश मोहन लाहिरी और अग्रज जीतेन्द्र नाथ लाहिरी जेल चले गए। लिहाजा माँ बसंत कुमारी (जिनकी स्मृति में मरने के पहले उन्होंने एक पुस्तकालय बनवाया) ने उन्हें 9 साल की उम्र में ही पढ़ाई के लिए मामा के पास बनारस भेज दिया। यहाँ पर उनकी मुलाक़ात अपने दूर के रिश्तेदार शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई, जिनके साथ वे हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (HRA) नामक उस क्रांतिकारी संगठन के सदस्य बने, जिसने आगे जाकर काकोरी सॉन्डर्स की हत्या जैसे कारनामों को अंजाम दिया।

लाहिरी को वापिस बंगाल, कलकत्ता के दक्षिणेश्वर में सान्याल (या कुछ वृत्तांतों में बिस्मिल) ने ही भेजा था। बम बनाना सीखने के लिए। ऐसा इसलिए ताकि एक तो वे संयुक्त प्रांत की पुलिस से बचे रहें (किसी प्रकार पुलिस को काकोरी में शामिल क्रांतिकारियों के नाम पता चल गए थे और सरगर्मी से तलाश जारी थी), और बम बनाने का तरीका संगठन के सदस्य को पता रहने से अंतिम ध्येय (अंग्रेज़ों के खिलाफ इतना बड़ा सशस्त्र आंदोलन खड़ा करना, जिससे उनके लिए भारत को कब्ज़े में रखना असम्भव हो जाए) में भी सहायता मिलती।

इन्हीं मंशाओं की पूर्ति के लिए लाहिरी को दक्षिणेश्वर संगठन का हिस्सा बनने कलकत्ता भेजा गया था।

इसके पहले वे HRA के प्रमुखतम बौद्धिकों और विचारकों में थे। पठन-पाठन और बांग्ला साहित्य से अपने लगाव के चलते वे न केवल अपनी माँ के नाम पर एक छोटी सी लाइब्रेरी के संस्थापक हुए, बल्कि BHU के बंगाली साहित्य परिषद के भी अध्यक्ष बने। इसके अलावा शचीन्द्रनाथ सान्याल ने उन्हें ‘बंग वाणी’ पत्रिका का सम्पादक भी बना दिया। यही नहीं, लाहिरी ने क्रांतिकारियों से हस्तलिखित खुले पत्र लिखवाकर उन्हें भी प्रकाशित करना शुरू कर दिया, ताकि बनारस इलाके के हर क्रांतिकारी के विशिष्ट विचार और दृष्टिकोण से पूरा आंदोलन, संगठन और वृहत्तर बनारसी समाज परिचित हों। सान्याल ने उन्हें क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा का संयोजक ही नहीं बनाया, बल्कि उसके हथियारों के जख़ीरे का भी जिम्मा सौंप दिया।

दक्षिणेश्वर समूह

वर्तमान 24 परगना जिले में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के नाम पर बने इस संगठन का इतिहास एक तरह से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की प्रतिध्वनि है। हथियारबंद क्रांति में विश्वास करने वाले इसके सदस्य गाँधी के आभामण्डल से प्रभावित होकर अपना रास्ता छोड़ दिए और 1920-22 के अहिंसापूर्ण असहयोग आंदोलन में शरीक हो गए। लेकिन गाँधी के अचानक से अपने चरम पर और अंग्रेजी शासन को चरमरा रहे इस आंदोलन को एक चौरी-चौरा के चलते वापिस खींच लेने से इन्हें ‘सत्याग्रह’ के सत्य का अहसास हो गया था।

1923 में क्रांतिकारी ऑरोबिन्दो घोष के भाई और ‘अग्नियुग’ किताब के लेखक बारीन्द्र घोष इस आंदोलन के ध्वजवाहक बनकर उभरे। इसके बाद ‘जुगान्तर’ नामक संगठन (ऑरोबिन्दो और बारीन्द्र व अन्य द्वारा शुरू किया हुआ दूसरा क्रांतिकारी दल; पहला था ‘अनुशीलन समिति’) ने अंग्रेजी हुकूमत पर दबाव बरकरार रखते हुए डकैतियों से लेकर के कलकत्ता के आततायी कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट की हत्या के दो प्रयासों तक कारनामे किए। टेगार्ट की हत्या के प्रयास में पहचान की गफ़लत में गोपीमोहन साहा ने एर्न्स्ट डे की हत्या कर दी, और एक अन्य ने अंग्रेज अधिकारी मिस्टर ब्रूस को टेगार्ट समझ कर गोली मार दी।

इस दौरान उन्हें टैगोर, बंगाल कॉन्ग्रेस आदि का भी नैतिक समर्थन प्राप्त हुआ। बंगाल प्रदेश कॉन्ग्रेस ने देशबंधु चितरंजन दास की अध्यक्षता के अधिवेशन में गोपीमोहन साहा (जिनमें मार्च, 1924 में फाँसी दे दी गई) के समर्थन में प्रस्ताव पास किया। लेकिन यह प्रस्ताव ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी में पास नहीं हो पाया ‘महात्मा’ गाँधी की वजह से; बल्कि उन्होंने तो इसके खिलाफ बयान को कॉन्ग्रेस का आधिकारिक बयान बनवाया। उसमें चितरंजन दास और बंगाल कॉन्ग्रेस ने एक संशोधन लाने का प्रयास किया, जो एक छोटे अंतर से गाँधी-गुट से हार गया। अपने आग्रह के जीतने के बावजूद गाँधी जीत अंतर छोटा होने से, अपनी कट्टर अहिंसा का सशक्त विरोध होने-भर से भकुर कर बैठ गए और घोषणा कर दी, “यह मेरी जीत नहीं, हार है।

इन सब से घबरा कर बंगाल सरकार ने अपने लिए विशेष दमनकारी शक्तियाँ केंद्रीय ब्रिटिश शासन से ले लीं, और क्रांतिकारियों को ‘आतंकवादी’ कहने का प्रोपेगेंडा तेज़ कर दिया। साथ ही यह भी बरगलाने लगे कि क्रांतिकारी तो महज़ लोगों को ‘हिंसक’ आंदोलन में ‘रिक्रूट’ करने, और गाँधीवाद से मोहभंग करने के लिए असहयोग आंदोलन में शामिल हुए हैं। 25 अक्टूबर, 1924 को पास हुए बंगाल आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश ने अगले 6 महीने तक बिना अपील या ज्यूरी के ‘आतंकवादियों’ पर मुकदमा चलाने की छूट दे दी। इस कदम की ‘सफलता’ से उत्साहित बंगाल के गवर्नर ने 1925 में इसे 6 महीने के लिए और आगे बढ़ा दिया।

इसी दौरान दक्षिणेश्वर के बाचस्पतिपाड़ा स्थित एक घर में इकठ्ठा हुए कुछ उत्साही क्रांतिकारियों ने ‘दक्षिणेश्वर समूह’ बनाया। इसमें हावड़ा, हुगली, नादिया और चिट्टागोंग (चटगाँव) के क्रांतिकारी शामिल थे। इन्हीं के पास राजेंद्र लाहिरी बम बनाना सीखने पहुँचे थे।

इसी दौरान बम बनाने के प्रयोग के दौरान असावधानीवश एक धमाका हुआ और सरगर्मी से क्रांतिकारियों की तलाश कर रही पुलिस ने 10 नवंबर, 1925 की सुबह राजेंद्र लाहिरी समेत 9 क्रांतिकारियों को पिस्तौल, हथियारों आदि के साथ गिरफ़्तार कर लिया। इनके साथी सूर्य सेन (सूर्यो दा या मास्टर दा) किसी तरह उस समय पुलिस के हाथ आने से बचने में कामयाब हुए। आगे जाकर 1930 में चिट्टगॉन्ग में 18 अप्रैल, 1930 को उन्होंने सरकारी हथियारखाने को लूटने का प्रयास किया और इसके लिए 12 जनवरी, 1934 को फाँसी पर चढ़ा दिए गए।

दक्षिणेश्वर के बाद- मौत नहीं, पुनर्जन्म की ओर

दक्षिणेश्वर के लिए भले ही लाहिरी को केवल 10 साल की सजा हुई, लेकिन उनकी मौत का दरवाज़ा उसी धमाके से खुल गया। उन्हें कलकत्ते की अलीपुर जेल से लखनऊ सेंट्रल जेल शिफ़्ट किया गया, जिसमें उन पर काकोरी के अन्य साथियों के साथ काकोरी का मुकदमा चला। हज़रतगंज स्थित वर्तमान जीपीओ भवन में अदालत लगी, और चोटी के 4 क्रांतिकारियों राजेंद्र लाहिरी, ठाकुर रौशन सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान को फाँसी की सजा सुनाई गई।

जनविद्रोह के डर से बिस्मिल को गोरखपुर, लाहिरी को गोंडा, अशफाकुल्ला खान को फैज़ाबाद और ठाकुर रौशन सिंह को इलाहाबाद जेल भेज दिया गया। इनकी फाँसी की तारीख 19 दिसंबर, 1927 तय हुई थी, लेकिन जेल प्रशासन ने लाहिरी को 17 को ही मौत के घाट उतारने का निर्णय लिया। अपनी मौत की सुबह लाहिरी व्यायाम कर रहे थे। जेल के एक अधिकारी ने पूछा कि इसकी क्या ज़रूरत है, क्योंकि कुछ ही घंटे बाद उन्हें फाँसी दी जानी है। लाहिरी ने जवाब दिया- हिन्दू हूँ। पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूँ। अगले जन्म में भारत माँ की सेवा करने के लिए और तंदरुस्त होकर लौटना चाहता हूँ।

उनकी मौत के बाद उनका पार्थिव शरीर भी अंग्रेज सरकार ने उनके परिवार को वापिस नहीं किया। उस समय के वृत्तांतों के अनुसार मरते समय आज ‘साम्प्रदायिक’ माना जाने वाला “वन्दे मातरम” उनके अंतिम शब्द थे

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