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भारत में होते लाहौर और सियालकोट, कॉन्ग्रेस की दब्बू नीतियों ने सब बिगाड़ा: जानिए- 60 साल पहले हुए ताशकंद समझौते को, जिसकी कीमत अब तक भुगत रहा है हिंदुस्तान

शास्त्री जी एक मजबूत नेता थे, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी और उसकी ब्यूरोक्रेसी की कमजोर कूटनीति ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। पार्टी के नेता और सलाहकार दबाव में झुक गए, क्योंकि कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ही थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुककर शांति कायम की जाए।

भारत के इतिहास में 10 जनवरी 1966 का दिन एक ऐसा काला अध्याय है जो आज भी हमें चुभता है। इसी दिन ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसे ताशकंद समझौता कहा जाता है। इस समझौते के तहत हमारे बहादुर सैनिकों ने 1965 के युद्ध में अपनी जान की बाजी लगाकर और दुश्मनों का खून बहाकर जो इलाके जीते थे, उन्हें बातचीत की मेज पर बस यूँ ही लौटा दिया गया।

सोचिए अगर ताशकंद समझौता न होता तो आज लाहौर शहर पाकिस्तान का नहीं, बल्कि भारत का हिस्सा होता। हमारा नक्शा कितना अलग और मजबूत दिखता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका और इसके लिए जिम्मेदार थी उस समय की कॉन्ग्रेस सरकार की कमजोर और दबाव में झुक जाने वाली विदेश नीति। इस एक फैसले ने देश को सदियों का नुकसान पहुँचाया, जिसकी कीमत हम आज भी चुकाते हैं।

कश्मीर में घुसपैठ, आतंकवाद की घटनाएँ, पुलवामा जैसे हमले… ये सब उस भूल की देन हैं। इस रिपोर्ट में हम उस दौर की पूरी कहानी को विस्तार से समझेंगे, ताकि इतिहास से सबक लिया जा सके और ऐसी गलतियाँ दोबारा न हों।

1965 में भारत से बुरी तरह हारा था पाकिस्तान

साल 1965 का भारत-पाक युद्ध मुख्य रूप से कश्मीर मुद्दे पर शुरू हुआ था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी, जिसे ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ नाम दिया गया। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान ने हजारों घुसपैठिए और फौजियों को जम्मू-कश्मीर में भेजा, ताकि स्थानीय लोगों को भड़काकर विद्रोह कराया जा सके और कश्मीर पर कब्जा कर लिया जाए। अयूब खान इतने घमंड में थे कि उन्होंने कहा था कि वह दिल्ली पर कब्जा करके ‘दिल्ली में डिनर’ करेंगे। लेकिन भारतीय सेना ने उनके इस सपने को चकनाचूर कर दिया।

हमारे सैनिकों ने न सिर्फ घुसपैठियों को पकड़ा, बल्कि पाकिस्तान पर पलटवार किया। उस समय भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे, जो एक सादगी भरे लेकिन मजबूत इरादों वाले नेता थे। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा था, “कल का नाश्ता हम लाहौर में करेंगे।”

यह बात सिर्फ एक नारा नहीं थी, बल्कि भारतीय सेना की हिम्मत का प्रतीक थी। और सच में युद्ध के दौरान यह काफी हद तक सच साबित होने वाला था, क्योंकि हमारे जवान लाहौर की सीमाओं तक पहुँच गए थे। इस युद्ध ने दिखाया कि भारत की सेना कितनी तैयार और बहादुर थी, लेकिन राजनीतिक फैसलों ने सब कुछ बदल दिया।

कश्मीर से लेकर कच्छ तक भारी पड़े भारतीय सैनिक, लाहौर सेक्टर में भी घुसे

युद्ध कई मोर्चों पर लड़ा गया और हर जगह भारतीय सेना का दबदबा रहा। लाहौर सेक्टर में तो भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी रक्षा लाइनों को ध्वस्त कर दिया। हम इच्छोगिल नहर तक पहुँच गए थे, जो लाहौर शहर की आखिरी रक्षा लाइन मानी जाती थी। अगर थोड़ा और आगे बढ़ते तो लाहौर पर कब्जा हो जाता। इसी तरह कश्मीर में हाजी पीर दर्रा जैसे रणनीतिक महत्व के इलाके पर भारत का कब्जा हो गया, जो पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका था। क्योंकि यह दर्रा घुसपैठ के रास्ते को नियंत्रित करता था।

पाकिस्तानी सेना बुरी तरह हार रही थी। उनके हजारों सैनिक मारे गए, उनके सबसे आधुनिक पैटन टैंक तबाह हो गए और हवाई जहाज गिरा दिए गए। भारत ने स्पष्ट रूप से बढ़त बना ली थी। युद्ध के दौरान पाकिस्तान को इतना नुकसान हुआ कि उनके पास लड़ने की ताकत ही कम हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को विजेता माना जा रहा था, क्योंकि हमने न सिर्फ अपनी रक्षा की, बल्कि दुश्मन की जमीन पर कदम रखा। लेकिन अफसोस यह जीत अधर में लटक गई।

भारतीय जवानों की बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं और वे हमें गर्व से भर देते हैं। मिसाल के तौर पर असल उत्तर की लड़ाई को याद कीजिए। वहाँ पाकिस्तान के सबसे उन्नत पैटन टैंकों को भारतीय सेना ने नेस्तनाबूद कर दिया। हमारे शेरमन टैंकों ने उन पर भारी पड़कर दिखाया कि हिम्मत हथियारों से बड़ी होती है।

इस लड़ाई में मेजर भूपिंदर सिंह जैसे अधिकारी बलिदान हुए, लेकिन उन्होंने दुश्मन को पीछे धकेल दिया। इसी तरह चंब सेक्टर में हमारे जवानों ने पाकिस्तानी हमलों को रोका और कब्जा कर लिया। पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ, उसके करीब 4,000 से ज्यादा फौजी मारे गए, जबकि भारत के लगभग 3,000 जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

पाकिस्तान के 200 से ज्यादा टैंक तबाह हुए, जबकि हमारे सिर्फ 80। हवाई युद्ध में भी भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई एफ-86 सेबर जेट गिराए। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी भारत की जीत की बात कर रहा था। लेकिन यहीं से कहानी बदल गई, क्योंकि राजनीतिक हस्तक्षेप हो गया और युद्ध का फैसला मैदान से निकलकर मेज पर आ गया।

शीत युद्ध के दौर में बंटी हुई थी दुनिया, सोवियत संघ के बुलावे पर बातचीत

शीत युद्ध का दौर था, जब दुनिया दो खेमों में बँटी हुई थी, एक तरफ अमेरिका था तो दूसरी तरफ सोवियत संघ। दोनों ही महाशक्तियाँ भारत-पाक युद्ध को रोकना चाहती थीं, क्योंकि इससे एशिया में अस्थिरता फैल रही थी। अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार दिए थे, लेकिन युद्ध शुरू होने पर दोनों देशों पर हथियार सप्लाई रोक दी। सोवियत संघ ने मध्यस्थता की पहल की। सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने भारत और पाकिस्तान को ताशकंद बुलाया।

हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने न्योता स्वीकार किया और ताशकंद गए। पाकिस्तान की ओर से अयूब खान थे। बातचीत शुरू हुई और दबाव का दौर चल पड़ा। सोवियत संघ शांति चाहता था, क्योंकि वह भारत को अपना सहयोगी मानता था, लेकिन पाकिस्तान को भी नहीं खोना चाहता था। अमेरिका भी पीछे से दबाव डाल रहा था। शास्त्री जी पर यह दबाव इतना बढ़ गया कि वे मजबूत होने के बावजूद झुकने को मजबूर हो गए।

अंतर्राष्ट्रीय दबाव में झुड़ी सरकार, नेहरू ने ही की थी शुरुआत

कॉन्ग्रेस सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव में आ गई और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। अमेरिका ने हथियारों पर एम्बार्गो लगा दिया था, जिससे पाकिस्तान को तो ज्यादा नुकसान पहुँच रहा था, क्योंकि वे अमेरिकी हथियारों पर निर्भर थे, लेकिन भारत भी कुछ हद तक प्रभावित था। सोवियत संघ शांति चाहता था और उसने शास्त्री जी को समझाया कि युद्ध जारी रखना दोनों देशों के लिए घातक होगा।

शास्त्री जी एक मजबूत नेता थे, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी और उसकी ब्यूरोक्रेसी की कमजोर कूटनीति ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। पार्टी के नेता और सलाहकार दबाव में झुक गए, क्योंकि कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ही थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुककर शांति कायम की जाए। नेहरू जी के समय से यह सिलसिला चला आ रहा था, जब उन्होंने 1948 के युद्ध में भी जीत के करीब पहुँचकर संयुक्त राष्ट्र में मामला ले जाकर पाकिस्तान को फायदा दे दिया था। शास्त्री जी पर इतना दबाव पड़ा कि वे समझौते के लिए राजी हो गए, जबकि मैदान में जीत हमारी थी।

हमने दुश्मन को सौंप दिए अपनी जीत के इलाके

10 जनवरी 1966 को ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए और यह दिन भारत के लिए एक दुखद मोड़ साबित हुआ। समझौते के मुख्य बिंदु थे कि दोनों देश युद्ध के दौरान कब्जाए गए सभी क्षेत्रों को खाली करेंगे और 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति को बहाल करेंगे। इसके अलावा दोनों देश शांतिपूर्ण तरीके से अपने विवाद सुलझाएँगे और बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे। राजनयिक संबंध सामान्य किए जाएँगे, व्यापार और संचार के रास्ते खोले जाएंगे। एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होगा और युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाएगा।

यह सब सुनने में तो अच्छा लगता है, जैसे शांति का एक बड़ा कदम हो, लेकिन हकीकत में भारत ने अपनी जीती हुई रणनीतिक बढ़त को पूरी तरह गँवा दिया। हमने लाहौर सेक्टर, सियालकोट और कश्मीर के महत्वपूर्ण इलाकों को लौटा दिया, जबकि पाकिस्तान ने कुछ नहीं दिया। यह समझौता एकतरफा था, जो भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

हाजी पीर दर्रा वापस करना भारत की सबसे बड़ी गलती

हाजी पीर दर्रा वापस करना सबसे बड़ी गलती थी और यह फैसला आज तक हमें सताता है। यह दर्रा कश्मीर में घुसपैठ रोकने के लिए बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह पाकिस्तान से भारत में आने वाले रास्तों को नियंत्रित करता था। युद्ध में हमारे सैनिकों ने इसे जीता था, लेकिन समझौते में लौटा दिया गया। नतीजा क्या हुआ?

पाकिस्तान ने बाद में इसी रास्ते से आतंकवादियों को भेजना शुरू कर दिया। 1980 और 1990 के दशक में कश्मीर में जो आतंकवाद फैला, उसके पीछे हाजी पीर जैसे क्षेत्रों का वापस होना एक बड़ा कारण था। इसी तरह, लाहौर सेक्टर में जीते क्षेत्र भी लौटा दिए गए। अगर हम इन्हें रखते, तो पाकिस्तान की रक्षा लाइनें कमजोर हो जातीं और कश्मीर पर उसका दावा और भी कमजोर पड़ जाता। लाहौर शहर की सुरक्षा पर असर पड़ता और पाकिस्तान कभी इतना आक्रामक नहीं होता। लेकिन कॉन्ग्रेस की कमजोर नीति ने यह सब लौटा दिया, जिससे पाकिस्तान को नई ताकत मिली।

विदेश नीति में भारत की कमजोरी का फायदा पाकिस्तान ने उठाया

कॉन्ग्रेस की यह दब्बू नीति नेहरू जी के समय से चली आ रही थी और यह भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। नेहरू जी ने 1947-48 के कश्मीर युद्ध में भी जीत के करीब पहुंचकर युद्ध रोक दिया और मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गए, जिससे पाकिस्तान को फायदा हुआ और कश्मीर समस्या आज तक लटकी हुई है। 1962 के चीन युद्ध में भी कॉन्ग्रेस की कमजोर तैयारी और नीति का नतीजा भुगता। 1965 में भी यही हुआ, जीत के मुहाने पर खड़े होकर कॉन्ग्रेस ने सब लौटा दिया। यह राजनीतिक कमजोरी थी, क्योंकि पार्टी अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुक जाती थी।

नेहरू जी की ‘अहिंसा’ और ‘शांति’ की नीति अच्छी थी, लेकिन दुश्मन के सामने इतनी कमजोर साबित हुई कि देश को नुकसान हुआ। शास्त्री जी जैसे मजबूत नेता भी इस नीति के शिकार हो गए। अगर कॉन्ग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया होता, तो इतिहास अलग होता।

हार कर भी हीरो बन गया अयूब खान

युद्ध में भारत ने कम नुकसान उठाया था और यह साबित करता है कि हमारी जीत कितनी स्पष्ट थी। पाकिस्तान के 4,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए, जबकि भारत के करीब 3,000। पाकिस्तान के 200 से ज्यादा टैंक तबाह हुए, उनके एफ-86 सेबर जेट गिराए गए। हमारे सैनिकों ने सियालकोट, लाहौर और कच्छ के रण में दुश्मन को पीछे धकेला। लेकिन ताशकंद समझौते से सब बराबर हो गया। पाकिस्तान को नई जिंदगी मिल गई, जबकि वे हार चुके थे। अयूब खान घर लौटकर हीरो बन गए, क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं खोया। भारत ने अपनी जीती जमीन लौटाकर खुद को कमजोर साबित किया। यह फैसला कॉन्ग्रेस की कमजोर नेतृत्व का नतीजा था।

आज भी होती है शास्त्री की मौत की जाँच की माँग

समझौते के अगले दिन 11 जनवरी को शास्त्री जी की रहस्यमय मौत हो गई, जो आज तक एक पहेली बनी हुई है। आधिकारिक रूप से इसे हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन कई सवाल उठे। उनका शरीर नीला पड़ गया था, जो जहर के असर जैसा लगता था। पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, जो संदेह बढ़ाता है। परिवार ने जहर देने की आशंका जताई और कहा कि शास्त्री जी समझौते से खुश नहीं थे। कुछ लोग सोवियत संघ या पाकिस्तानी साजिश कहते हैं, क्योंकि सोवियत को समझौता चाहिए था और पाकिस्तान को शास्त्री जी की मौत से फायदा हुआ। यह मौत समझौते से जुड़ी कई थ्योरी पैदा करती है और आज भी जाँच की माँग होती है। शास्त्री जी की मौत ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया।

शास्त्री जी मजबूत नेता थे और उनका ‘जय जवान जय किसान’ नारा आज भी गूँजता है। उन्होंने देश को खाद्यान्न संकट से उबारा और युद्ध में सेना का मनोबल बढ़ाया। लेकिन कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ने उन्हें दबाव में डाल दिया। अगर वे और समय माँगते या कड़ा रुख अपनाते, तो शायद नतीजा अलग होता। उनकी मौत ने देश को शोक में डुबो दिया और समझौते की आलोचना बढ़ गई। लोग कहते हैं कि शास्त्री जी समझौते से दुखी थे और इसी तनाव से उनकी मौत हुई।

भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में आलोचना

भारत में ताशकंद समझौते की कड़ी आलोचना हुई और यह स्वाभाविक था। लोग सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन हुए। सेना में भी निराशा फैल गई, क्योंकि जवानों ने खून बहाकर जीती जमीन लौटाना किसी को स्वीकार नहीं था। विपक्षी दलों ने कॉन्ग्रेस पर कमजोरी का आरोप लगाया और कहा कि यह देशद्रोह जैसा है। यह साबित करता है कि कॉन्ग्रेस की विदेश नीति हमेशा दबाव में झुकने वाली रही और राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर पाई।

पाकिस्तान में भी समझौते की आलोचना हुई, क्योंकि कश्मीर पर कुछ हासिल नहीं हुआ। लेकिन उन्हें भारत की जीती जमीन मिल गई, जो उनके लिए बड़ी राहत थी। ताशकंद ने पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने का मौका दिया। हाजी पीर वापस देने से घुसपैठ आसान हो गई और कश्मीर में दशकों तक अशांति रही।

आज तक कॉन्ग्रेस की गलतियों की सजा भुगत रहा है भारत

आज जब पुलवामा, उरी जैसे हमले होते हैं, तो ताशकंद की याद आती है। अगर वो क्षेत्र भारत के पास होते, तो पाकिस्तान इतना मजबूत नहीं होता और आतंकवाद की जड़ें इतनी गहरी न होतीं। कॉन्ग्रेस की यह गलती देश आज तक भुगत रहा है और हजारों जानें गई हैं। वर्तमान सरकार ने नीति बदली है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट जैसे ऑपरेशन दिखाते हैं कि अब दबाव में नहीं झुकते। दुश्मन को जवाब दिया जाता है। यह बदलाव जरूरी था। ताशकंद जैसी भूल दोबारा न हो, इसके लिए मजबूत कूटनीति चाहिए।

ताशकंद समझौता न होता तो हिंदुस्तान के होते लाहौर-सियालकोट

अगर ताशकंद समझौता न होता, तो नक्शा अलग होता। लाहौर, सियालकोट जैसे शहर भारत के होते और पाकिस्तान इतना बड़ा खतरा न बनता।

आज 60 साल बाद भी यह सबक है कि युद्ध जीतकर भी सतर्क रहना चाहिए। बातचीत अच्छी है, लेकिन राष्ट्रीय हित पर समझौता नहीं। कॉन्ग्रेस की पुरानी नीतियों से सीख लेकर आज मजबूत भारत बन रहा है और दुश्मन को मुँहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। यह इतिहास की वो घटना है जो दर्द देती है। हमारे जवानों का बलिदान सम्मान चाहिए, लौटाना नहीं। ताशकंद समझौता इसकी याद दिलाता है और हमें बताता है कि कमजोरी की कीमत कितनी भारी होती है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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