Sunday, August 1, 2021
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बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय: प्रेसीडेंसी कालेज से BA करने वाले वह पहले भारतीय, अंग्रेजी नौकरी और उसी के विरोध में ‘वंदे मातरम्’

वंदे मातरम की गूँज ने अंग्रेजों को हमेशा परेशान किया। उनकी इस गीत की वजह से आजादी के लिए पूरा भारत आंदोलित हो उठा था। अपनी इसी क्रांति की वजह से बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को नौकरी तक में प्रमोशन नहीं मिला।

भारत के राष्ट्रगीत वंदेमातरम के रचयिता और बंगाल के लोकप्रिय उपन्यासकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (बंकिम चंद्र चटर्जी भी) की आज पुण्यतिथि है। 27 जून 1838 को कोलकाता में जन्मे चटर्जी का 8 अप्रैल 1894 को कोलकाता में ही निधन हुआ था। कला के जरिए विदेशी शासन के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले चटर्जी को अपनी इसी क्रांति की वजह से नौकरी तक में प्रमोशन नहीं मिला था, लेकिन उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष नहीं रोका।

चटर्जी को वंदे मातरम के जरिए असंख्य देशवासियों में स्वाधीनता की अलख जगाने वाले महान देशभक्त के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने जीवन भर बंगाली भाषा व संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम किया। चटर्जी ने जब नौकरी के समय लेखन किया, तो उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी। अंग्रेज अफसर लगातार काम में बाधा डालने की कोशिश करते रहे।

बंकिम चंद्र चटर्जी सजग अधिकारी थे। वे अंग्रेजों के सामने कभी झुके नहीं। वे निर्भीक थे और देशभक्त भी थे, जिससे अंग्रेज उनसे नाराज रहते थे। कदम-कदम पर उनका अंग्रेजों से संघर्ष होता था। इसका असर यह हुआ कि काफी मेहनत के बावजूद चटर्जी कभी किसी बड़े ओहदे तक नहीं पहुँच पाए।

बताया जाता है कि इसके चलते बंकिम चंद्र 53 साल की उम्र में ही सेवानिवृत्त होना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा होने नहीं दिया। उनकी मंशा कुछ और थी। हालाँकि, किसी तरह बंकिम चंद्र सेवानिवृत्त होने में सफल रहे और लेखन का काम जारी रखा। इसके बाद उनकी मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई और चटर्जी के ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष को एक नई दिशा मिली थी।

वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने दी पहचान

वंदे मातरम गीत बंकिम चन्‍द्र चटर्जी द्वारा संस्‍कृत में रचा गया। यह स्‍वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था। इसका स्‍थान जन गण मन के बराबर है। इसे पहली बार 1896 में भारतीय राष्‍ट्रीय कॉन्ग्रेस के सत्र में गाया गया था। इसके बाद वंदे मातरम की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।

1920 तक सुब्रमण्यम भारती के साथ कई विद्वानों ने इस गीत का अलग-अलग भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी कर दिया था। इसके बाद वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की पहचान मिल गई। यहाँ तक कि लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम भी वंदे मातरम रखा गया था।

नहीं मिल पाया राष्ट्रगान का दर्जा

वंदे मातरम की गूँज ने अंग्रेजों को हमेशा ही परेशान किया। उनकी इस गीत की वजह से आजादी के लिए पूरा भारत आंदोलित हो उठा था। वे किसी तरह इस गान को रोकना चाह रहे थे। अंग्रेजों की शह पर इस गीत पर विवाद खड़ा किया गया। हालाँकि, देश-विदेश में भारत की आजादी की अलख जगाने वाला गीत को राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका।

बंकिम चन्‍द्र चटर्जी बंगला के प्रख्यात उपन्यासकार, कवि, गद्यकार और पत्रकार तो थे ही, दूसरी भाषाओं पर भी उनके लेखन का व्यापक प्रभाव पड़ा। आज भी भारतीय जनमानस के बीच वह राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त ‘वन्दे मातरम्’ के रचयिता के रूप में जाने जाते हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान ‘वन्दे मातरम्’ गीत क्रांतिकारियों की प्रेरणा का स्रोत तो था ही, आज भी राष्ट्रवादी इस पर गर्व करते हैं। दरअसल बंगला समाज, साहित्य और संस्कृति के उत्थान में सामाजिक, शैक्षिक आंदोलन से जुड़े विचारकों राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, प्यारीचाँद मित्र, माइकल मधुसुदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और ठाकुर रवीन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती आदि ने अग्रणी भूमिका निभाई। इसका असर पूरे देश की भाषायी समृद्धि पर पड़ा। यह एक तथ्य है कि बंकिम से पहले बंगला साहित्यकार संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसंद करते थे।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 27 जून, 1838 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा नामक गाँव में एक समृद्ध, पर परंपरागत बंगाली परिवार में हुआ था। मेदिनीपुर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली के मोहसीन कॉलेज में दाखिला लिया। किताबों के प्रति बंकिम चंद्र चटर्जी की रुचि बचपन से ही थी। वह शुरुआत में आंग्ल भाषा की ओर भी आकृष्ट थे, पर कहते हैं कि अंग्रेजी के प्रति उनकी रुचि तब समाप्त हो गई, जब उनके अंग्रेजी अध्यापक ने उन्हें बुरी तरह से डाँटा था। इसी के बाद से उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव उपजा। वह एक मेधावी व मेहनती छात्र थे पर पढ़ाई के साथ-साथ उनकी रुचि खेलकूद में भी थी।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय की शादी महज ग्यारह वर्ष की आयु में ही हो गई थी। अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद, उन्होंने पुनर्विवाह किया। साल 1856 में उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया और 1857 के पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में प्रेसीडेंसी कालेज से बीए की उपाधि लेने वाले वह पहले भारतीय बने। उन्होंने क़ानून की डिग्री भी हासिल की और पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने 1858 में ही डिप्टी मजिस्ट्रेट का पदभार सँभाला और 1891 में सरकारी सेवा से रिटायर हुए।

वह एक सुगढ़ पाठक थे और बंगला और संस्कृत साहित्य में अपनी भरपूर पैठ बनाई। सरकारी नौकरी में रहते हुए उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन, जिसे अंग्रेज गदर कहते थे, पर अंग्रेजों की प्रतिक्रिया और भारतीयों पर उनके दमनचक्र को बहुत नजदीक से देखा था। इस दौर में भारतीय शासन प्रणाली में आकस्मिक परिवर्तन हुआ, और शासन भार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में न रहकर महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया। कहने को तो भारतीय सीधे ‘महान’ ब्रिटिश साम्राज्य की प्रजा बन गए थे, पर उनका जीवन और भी दूभर हो गया था।

सरकारी नौकरी में होने के कारण बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय किसी सार्वजनिक आन्दोलन में प्रत्यक्षतः भाग नहीं ले सकते थे, पर उनका मन कचोटता था। इसलिए उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए जागृति का संकल्प लिया। बंकिम चंद्र चटर्जी कविता और उपन्यास दोनों लिखने लगे और दोनों ही विधाओं में न केवल पारंगत बने, बल्कि एक से बढ़कर एक रचनाओं से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का पहला उपन्यास ‘रायमोहन्स वाईफ’ अंग्रेजी में था। साल 1865 में उनकी प्रथम बांग्ला कृति ‘दुर्गेशनंदिनी’ प्रकाशित हुई। उस समय उनकी उम्र केवल 27 वर्ष थी। फिर उनकी अगली रचनाएँ 1866 में कपालकुंडला, 1869 में मृणालिनी, 1873 में विषवृक्ष, 1877 में चंद्रशेखर, 1877 में रजनी, 1881 में राजसिंह और 1884 में देवी चौधुरानी आईं। उन्होंने ‘सीताराम’, ‘कमला कांतेर दप्तर’, ‘कृष्ण कांतेर विल’, ‘विज्ञान रहस्य’, ‘लोकरहस्य’, ‘धर्मतत्व’ जैसे ग्रंथ भी लिखे।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने साल 1872 में मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ का भी प्रकाशन किया। ‘बंगदर्शन’ ने बंगाली पत्रिका का नया पर्व शुरू किया। रबीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे लेखक ‘बंग दर्शन’ में लिखकर ही साहित्य के क्षेत्र में आए। वे बंकिमचंद्र चटर्जी को अपना गुरु भी मानते थे। उनका कहना था कि, ‘बंकिम बंगला लेखकों के गुरु और बंगला पाठकों के मित्र हैं।’ बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का सबसे चर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में प्रकाशित हुआ, जिससे प्रसिद्ध गीत ‘वंदे मातरम्’ लिया गया है।

आनंदमठ में ईस्ट इंडिया कंपनी के वेतन के लिए लड़ने वाले भारतीय मुसलमानों और संन्यासी ब्राह्मण सेना का वर्णन किया गया है। हालाँकि यह किताब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता का आह्वान करती है, पर वहाँ के हालातों के वर्णन के चलते इस उपन्यास पर काफी विवाद भी रहा। बहरहाल ‘वंदे मातरम्’ गीत की प्रसिद्धि का आलम यह था कि इसे स्वयं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया।

सच कहें तो बंगला साहित्य की मार्फत भारतीय जनमानस तक पैठ बनाने वालों में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय वह पहले साहित्यकार हैं, जिन्हें विश्वव्यापी ख्याति मिली। उनकी रचनाओं के अनुवाद दुनिया की कई भाषाओं में हुए, और कई पर फिल्में भी बनीं। यह एक दुर्लभ गुण था कि सरकारी नौकरी में रहते हुए भी बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने लेखन से देश में राष्ट्रवाद का अलख जगाया। एक ओर विदेशी सरकार की सेवा और दूसरी ओर देश के नवजागरण के लिए उच्च कोटि के साहित्य की रचना करने जैसा दुरूह काम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के लिए ही सम्भव था।

आज भी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की लोकप्रियता का यह आलम है कि पिछले डेढ़ सौ सालों से उनके उपन्यास विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो रहे हैं और कई-कई संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। उनके उपन्यासों में नारी की अन्तर्वेदना व उसकी शक्तिमत्ता बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई है। उनके उपन्यासों में नारी की गरिमा को नई पहचान मिली है और भारतीय इतिहास को समझने की नई दृष्टि। वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे। उन्हें भारत का एलेक्जेंडर ड्यूमा भी कहा गया।

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, “राममोहन ने बंग साहित्य को निमज्जन दशा से उन्नत किया, बंकिम ने उसके ऊपर प्रतिभा प्रवाहित की। बंकिम के कारण ही आज बंगभाषा मात्र प्रौढ़ ही नहीं, उर्वरा और शस्यश्यामला भी हो सकी है।” 8 अप्रैल, 1894 को भारत माता के सपूत, महान साहित्यसेवी, देशसेवी और सच्चे भारतीय की मृत्यु से केवल बंगाल ही नहीं बल्कि पूरा भारत शोक में डूब गया था। 

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