विश्व कप के इस नवप्रभात ने अपने साथ कई रोचक कथाएँ लेकर आगाज़ किया है। भारतीय समयानुसार रविवार की सुबह तक कुल चार मुकाबले खेले जा चुके हैं और उनमें से एक ने इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अंकित करा लिया।
चार वर्ष पहले अपने ही घर में आयोजित विश्व कप में बिना एक भी अंक अर्जित किए विदा हो जाने वाला कतर इस बार एक बदले हुए आत्मविश्वास के साथ मैदान पर उतरा। ग्रुप बी के अपने प्रथम मुकाबले में उसका सामना यूरोप की सुदृढ़ और अनुशासित टीम स्विट्जरलैंड से था। अधिकांश विशेषज्ञों की दृष्टि में स्विस टीम इस मुकाबले की प्रबल दावेदार थी, किंतु फुटबॉल बार-बार यह स्मरण कराता है कि भविष्यवाणियाँ घास के मैदान पर नहीं, खिलाड़ियों के पैरों से लिखी जाती हैं।
नब्बे मिनट तक चले इस संघर्ष में स्विट्जरलैंड अधिकांश समय बढ़त बनाए रखने में सफल रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कतर के हिस्से एक और निराशाजनक हार लिखी जा चुकी हो। किंतु अंतिम क्षणों में आया वह गोल केवल स्कोरबोर्ड पर अंकित एक संख्या नहीं था; वह कतर के फुटबॉल इतिहास में अंकित होने वाला एक मील का पत्थर था।
स्कोर 1-1 हुआ और उसी के साथ कतर ने फीफा विश्व कप के इतिहास में पहली बार एक अंक अर्जित कर लिया। ह्यूस्टन में उपस्थित दर्शकों की गर्जना ने उस क्षण को और भी स्मरणीय बना दिया।
वैसे भी कतर के मुख्य प्रशिक्षक जुलेन लोपेतेगुई ने मुकाबले से पूर्व स्पष्ट शब्दों में कहा था, “हम यहाँ केवल उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आए हैं।”
ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी टीम ने अपने प्रदर्शन से उस कथन को सार्थक सिद्ध करने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है।
वहीं बोस्टन स्टेडियम में खेले गए ग्रुप सी के मुकाबले में स्कॉटलैंड ने मेक्गीन के गोल के साथ हैती को 1-0 से मात देकर अपने ग्रुप में जरूरी तीन अंक लिए।
वैंकूवर में ग्रुप डी के मुकाबले में वैश्विक रैंकिंग में तीसवें स्थान पर स्थित ऑस्ट्रेलिया ने तेईसवीं रैंक की तुर्की को 2-0 धो डाला। अरदा गुलेर, काल्हानोग्लू, डेमीराल, यिल्दीज़ व यिल्माज़ जैसे सितारा खिलाड़ियों से सजी तुर्की की टीम को ऑस्ट्रेलिया ने सधे हुए खेल से मैच में पाँव जमाने ही नहीं दिए।
वहीं ग्रुप स्टेज के जिस मैच का सभी को इंतजार था वह रविवार सुबह साढ़े पांच बजे न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी स्टेडियम में खेला गया। ब्राजील का मुकाबला मोरक्को से था। ब्राजील ने मैच की शुरुआत मिडफील्ड में कासेमीरो व गुईमराएज़ को रख 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ की। मोरक्को ने हालाँकि मैच के इक्कीसवें मिनट में इस्माइल साईबारी के गोल के साथ ब्राजील समेत संपूर्ण स्टेडियम को झकझोर दिया था। साईबारी के गोल ने मोरक्को के दर्शकों में खुशी की लहर पैदा कर दी थी।
लेकिन मोरक्को की यह खुशी ज्यादा देर बनी न रह सकी। ठीक ग्यारह मिनट पश्चात ही मैच के बत्तीसवें मिनट में ब्राजील के स्टार लेफ्ट विंगर विनीसियस जूनियर लगभग हाफ-लाइन से गेंद को अकेले ही लेकर मोरक्को के गोल पोस्ट की ओर बढ़े। मोरक्को के तीन डिफेंडरों को छका कर उन्होंने गोलपोस्ट की दिशा में एक राइट फुटर किक लिया जिसका गोलकीपर बोनू के पास कोई जवाब नहीं था। स्कोर हो गया था 1-1, जो फाइनल व्हिस्ल बजने तक यही रहा।
विश्व कप का हर संस्करण खेलप्रेमियों को कई खूबसूरत कहानियाँ व कुछ बेहतरीन खिलाड़ी देता है, जो अपने खेल से सभी का दिल जीत लेते हैं। ऐसे ही इस विश्व कप में वो एक खिलाड़ी होंगे मोरक्को के अठारह वर्षीय मिडफील्डर अयूब बोउदादी। सुबह खेले गए इस मुकाबले में अयूब बोउदादी ने सितारों से सजी ब्राजीली मिडफील्ड को चोक कर के रख दिया। उन्होंने विपक्षी टीम के हर हमलों को अपने गोलपोस्ट तक पहुँचने ही न दिया।

कासेमीरो व गुईमराएज़ जैसे अनुभवी मिडफील्डरों की अयूब बोउदादी ने एक न चलने दी। अगर आपने यह मैच नहीं भी देखा तो इस मैच की हाईलाइट जरूर देखिएगा; ब्राजील के खिलाफ अठारह वर्षीय अयूब बोउदादी की मास्टरक्लास के लिए।
अब आगे ग्रुप ई के मुकाबले में ह्यूस्टन स्टेडियम में एक ओर होंगे फुटबॉल जगत के सूरमा जर्मन खिलाड़ी तो वहीं दूसरी ओर होंगे फुटबॉल विश्व कप के इतिहास में जनसंख्या के आधार पर विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने वाले सबसे छोटे देश कुराकाओ के कैरेबियन लड़ाके। जर्मन टीम अपने पिछले पाँचों मैच जीत कर बेहतरीन फॉर्म के साथ टूर्नामेंट में अपने अभियान की शुरुआत करेगी।
वहीं कुराकाओ पिछले पाँच मैचों में तीन हार, एक ड्रॉ व एक जीत के साथ कुछ खास फॉर्म में नहीं है परन्तु विश्व कप में अपने पर्दापण को वो कैरेबियन अंदाज में एक जश्न की भांति ले रहे हैं और हर एक पल का आनंद ले रहे हैं। विश्व कप के इस संस्करण के सबसे युवा कोच जूलियन नागेल्समान की अटैकिंग फिलॉस्फी के साथ खेलते हुए निश्चित तौर पर जर्मन टीम विश्व कप के पिछले दो संस्करणों में अपने बेहद निराशाजनक प्रदर्शन को भुला कर अपने समर्थकों का दिल जीतना चाहेंगे। इस मैच में आपको अटैकिंग फुटबॉल देखने को मिलेगी। इस मैच को आप रविवार रात भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे देख सकेंगे।
और अब दृष्टि टिकती है उस मुकाबले पर जिसकी प्रतीक्षा केवल डच और जापानी समर्थक ही नहीं, बल्कि विश्व फुटबॉल का प्रत्येक रसिक कर रहा है। भारतीय समयानुसार रात ठीक डेढ़ बजे डल्लास के मैदान पर दो ऐसी परंपराएँ आमने-सामने होंगी, जिन्होंने पिछले एक दशक में अपने खेल से दुनिया को बार-बार चकित किया है।
एक ओर होंगे नीदरलैंड्स के ‘ऑरान्जे’, विश्व फुटबॉल का वह महान अपूर्ण अध्याय, जिसने प्रतिभा, सौंदर्य और सामूहिकता से खेल के इतिहास को समृद्ध तो किया, परंतु विश्व कप की स्वर्णिम ट्रॉफी आज तक उसके हाथों की पहुँच से कुछ इंच दूर ही रही। सन् 1994 के बाद से विश्व कप के ग्रुप चरण में पराजय का स्वाद न चखने वाली यह टीम एक ऐसी विरासत की वाहक है, जिसने टोटल फुटबॉल जैसी क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया और पीढ़ियों तक खेल की दिशा बदल दी। किंतु इतिहास का एक निर्मम व्यंग्य भी उनके साथ जुड़ा है, विश्व कप फाइनल तक पहुँचने के बाद सर्वाधिक बार उपविजेता रहने का।
दूसरी ओर होंगे जापान के ‘समुराई ब्लूज़’; एशियाई फुटबॉल के उस अनुशासित और अथक योद्धा दल की संज्ञा, जिसने पिछले कुछ वर्षों में स्वयं को केवल एक प्रतिभागी नहीं, बल्कि एक वास्तविक दावेदार के रूप में स्थापित किया है। विश्व कप क्वालीफाइंग अभियान में चौवन गोल दागना और मात्र तीन गोल स्वीकार करना किसी संयोग का परिणाम नहीं होता। यह उस संरचना, अनुशासन और दीर्घकालिक योजना का प्रतिफल है, जिसे जापान ने वर्षों की साधना से निर्मित किया है।
और यदि किसी को अब भी जापान की क्षमता पर संदेह हो, तो उसे पिछले विश्व कप की स्मृतियों में लौट जाना चाहिए, जहाँ इसी टीम ने समूह चरण में जर्मनी और स्पेन जैसी यूरोपीय महाशक्तियों को पराजित कर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। इसीलिए जापान के विरुद्ध मैदान पर उतरने वाली कोई भी टीम यदि उन्हें हल्के में लेने की भूल करती है, तो उसका मूल्य अक्सर स्कोरबोर्ड पर चुकाना पड़ता है।
हाँ, दोनों दल इस महायुद्ध में अपनी पूर्ण शक्ति के साथ नहीं उतर रहे। अंतिम समय में लगी चोटों ने दोनों शिविरों से कुछ महत्वपूर्ण नाम छीन लिए हैं। आधुनिक फुटबॉल के निरंतर व्यस्त कैलेंडर का दुष्परिणाम इस विश्व कप में भी दिखाई दे रहा है, जहाँ कई टीमें अपने कुछ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बिना अभियान प्रारंभ करने को विवश हैं।
किन्तु विश्व कप का आकर्षण ही यही है। यहाँ केवल ग्यारह खिलाड़ियों की नहीं, विचारधाराओं की टक्कर होती है। एक ओर डच सौंदर्य और रचनात्मकता होगी, तो दूसरी ओर जापानी अनुशासन और अथक परिश्रम। और जब ऐसी दो धाराएँ एक ही मैदान पर मिलती हैं, तब परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है स्वयं वह दृश्य, जिसका साक्षी बनने का अवसर फुटबॉल प्रेमियों को प्राप्त होता है।
आगे सोमवार के दिन आइवरी कोस्ट का मुकाबला इक्वाडोर से, स्वीडन का मुकाबला ट्यूनीशिया से व कलात्मक खेल के लिए जाने जानी वाली स्पेन की टीम काबो वर्दे के खिलाफ अपने अभियान का आगाज़ करेंगे।
आगे भी ऐसी ही कहानियाँ जन्म लेंगी। कहीं कोई दिग्गज अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए संघर्ष करेगा, तो कहीं कोई अनजान चेहरा विश्व फुटबॉल के आकाश में नए नक्षत्र की भाँति उदित होगा। यही तो विश्व कप का आकर्षण है; नब्बे मिनटों में इतिहास बदल जाने का आकर्षण।
फिलहाल निगाहें टिकी हैं रविवार रात होने वाले मुकाबलों पर, जहाँ ‘ऑरान्जे’ का सामना ‘समुराई ब्लूज़’ से होगा और जर्मनी अपने अभियान का शुभारंभ करेगा। तब तक के लिए; फुटबॉल की बातों का यह सिलसिला यहीं विराम लेता है।
वीवा ला फुटबॉल।


