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अहमदाबाद में एअर इंडिया के ड्रीमलाइनर क्रैश ने बताया, एयरोस्पेस में आत्मनिर्भरता भारत के लिए क्यों जरूरी: तकनीक में पीछे होने का बहाना अब नहीं करेगा काम

अहमदाबाद हादसा हो सकता है कि पायलट की ही गलती से हुआ हो, लेकिन भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री को मजबूत करने का तर्क यहाँ भी कमजोर नहीं पड़ता। विदेशी विमानन कंपनियों पर निर्भरता के चलते हमें पहले भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। 

गुजरात के अहमदाबाद में 12 जून,2025 को हुए विमान हादसे ने 250 से अधिक जिंदगियाँ छीन लीं। विमान में बैठने वालों के साथ ही जमीन पर मौजूद 20 से अधिक लोग काल के गाल में समा गए। दुर्घटना का शिकार होने वाला विमान अमेरिकी कंपनी बोइंग का बनाया हुआ 787 ड्रीमलाइनर था। 

विमान टेक ऑफ के एक मिनट के भीतर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। अभी दुर्घटना के कारण स्पष्ट नहीं हुए हैं। कहीं दावा है कि चिड़िया टकराई तो कहीं कहा गया कि विमान के दोनों इंजन फेल हो गए और वह उड़ने में अक्षम रहा। 

विमान का डाटा रिकॉर्ड करने वाला उपकरण ब्लैक बॉक्स घटनास्थल से बरामद हुआ है। कई और ऐसे उपकरण बरामद हुए हैं, जिनका उपयोग दुर्घटना के कारण के परीक्षण में होगा। इसके बाद ही कारण स्पष्ट हो सकेगा। 

संभव है कि इसमें कुछ महीने या एक साल तक लग जाए। इस बीच उंगलियाँ बोइंग कंपनी पर भी उठी हैं। बोइंग का हालिया वर्षों में सुरक्षा पर ट्रैक रिकॉर्ड खराब रहा है। उसके 737 मैक्स विमान लगातार दुर्घटना का शिकार हुए हैं। 

जो विमान हादसे का शिकार हुए, उनके साथ भी तकनीकी समस्याओं की बात सामने आई। यह बातें बोइंग के पूर्व कर्मचारी ने कहीं थीं। उसका दावा था कि गड़बड़ तरीके से बनाए हुए ड्रीमलाइनर विमान एअर इंडिया को दिए गए थे। 

आगे क्या होगा, यह समय बता पाएगा। लेकिन, इस विमान हादसे ने दोबारा से भारत में एयरोस्पेस इंडस्ट्री को मजबूत किए जाने की माँग को बल दिया है। 

यह विमान भारत में नहीं बना था। भारत में उड़ने वाले 90% से अधिक नागरिक विमान भारत में नहीं बने होते। ऐसा नहीं है कि भारत में अगर कोई विमान बनाया जाए तो वह कभी दुर्घटना का शिकार नहीं होगा। 

लेकिन बात यह है कि हमारे स्वयं के बनाए विमान पर हमारा नियंत्रण होगा। उसके निर्माण, उसके प्रमाणन और उपयोग की जाने वाली तकनीकों पर हम नजर रख सकेंगे। 

जैसा कि बोइंग के मामले में सामने आया कि वहाँ लापरवाही का दौर चल रहा है, संभव है कि भारत में हमें यह नहीं देखना पड़ता। वैसे तो हमें साजिश की थ्योरी में ज्यादा विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन बोइंग जैसी कम्पनियाँ मुनाफे पर चलती है। 

यह सिद्ध हो जाए कि हादसा बोइंग की तकनीकी गड़बड़ी की वजह से हुआ, तो उन्हें अरबों डॉलर का नुकसान होगा। वहीं अगर यह सिद्ध हो जाए कि हादसा पायलट की किसी गलती से हुआ, तो बोइंग साफ बच सकती है। 

ऐसा होगा, यह जरूरी नहीं है लेकिन बड़ी अमेरिकी कंपनियां पहले भी जाँच प्रभावित करते पकड़ी गई हैं। भारतीय पायलट विश्व में पेशेवरों में गिने जाते हैं, उनके माथे यह दोष मढ़ा जाना एक और समस्या होगा।

अहमदाबाद हादसा हो सकता है कि पायलट की ही गलती से हुआ हो, लेकिन भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री को मजबूत करने का तर्क यहाँ भी कमजोर नहीं पड़ता। विदेशी विमानन कंपनियों पर निर्भरता के चलते हमें पहले भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। 

वर्ष 2023 में भारत की स्थानीय एयरलाइन गो फर्स्ट इसी के चलते बंद हो गई। उसके एयरबस से खरीदे विमानों में प्रैट एंड व्हिटनी के इंजन लगे थे। यह इंजन गड़बड़ हुए जिसके चलते गो फर्स्ट के दर्जनों विमान जमीन पर खड़े हो गए। इंजन कंपनी ने कई बार कहने के बाद भी सुनवाई नहीं की, और एक भारतीय एयरलाइन बिना किसी गलती के बंद हो गई। 

यह कहानी सिर्फ गो फर्स्ट की नहीं है। NITI आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि अलग अलग समस्याओं की वजह से वर्तमान में लगभग 130 से अधिक विमान जमीन पर खड़े हैं और इससे एयरलाइंस को रोज करोड़ों का घाटा सहना पड़ रहा है। 

भारत में वर्तमान में लगभग 800 यात्री विमान सेवाएं देते हैं, ऐसे में समझिए कि बाजार पर यह खड़े विमान क्या फर्क डाल रहे हैं। किसी बाजार की 16% कैपेसिटी अगर कम हो जाए तो उसका सीधा नुकसान ग्राहक उठाता है। 

इन जमीन पर खड़े अधिकांश विमानों के पीछे तकनीकी कारण है जिसकी कुंजी विदेशी कंपनियों के पास है। यदि ऐसे ही विमान हम भारत में बना रहे होते तो संभवतः यह स्थिति आने से पहले सचेत होते और कम से कम आने के बाद तो दूसरों का मुंह ना ताक रहे होते। 

भारतीय एयरलाइंस ने वर्तमान में लगभग 1500 विमानों का ऑर्डर दे रखा है। यह सारे ऑर्डर या तो बोइंग या एयरबस को मिले हैं। इसके चलते लाखों करोड़ का फायदा अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस था जर्मनी जैसे देशों को हुआ है। स्थानीय स्तर पर विमान का निर्माण यह पैसा भी बच सकता है। 

समस्याएँ सिर्फ यात्री विमानों में हो, ऐसा नहीं है। वायु सेना या थल सेना के लिए खरीदे जाने वाले विमानों में तो और भी दिक्कतें हैं। भारतीय वायु सेना कार्गो यानी सैन्य साजोसामान को ढोने वाले रूसी IL 76 विमान उपयोग करती है। 

इन विमानों के साथ भी समस्याएं रही हैं। रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि इन विमानों का उड़ान के लिए पूरे समय तैयार ना होना एक बड़ा मुद्दा है। रूस इन तकनीकी समस्याओं को हल नहीं कर पाया है। इसी तरह भारत निर्मित तेजस विमान अमेरिकी इंजन के भरोसे हैं। 

अमरीकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक इसके लिए इंजन देती है। इस इंजन की सप्लाई में एक वर्ष की देरी हुई है, इसके चलते तेजस विमानों का निर्माण अधर में अटका हुआ है। वायुसेना इसको लेकर चिंता जता चुकी है। जनरल इलेक्ट्रिक को 100 से अधिक इंजन सप्लाई करने हैं, जिनमें से वह अभी 10 भी नहीं कर सकी है। 

यह सूची और लंबी होती चली जाती है। इन सब के मूल में एक ही बात है और वो है आत्मनिर्भरता। यह बात सही है कि हम अभी तकनीकी तौर पर सक्षम नहीं हैं कि ड्रीमलाइनर जैसे विमान या जनरल इलेक्ट्रिक के इंजन जैसे इंजन बना पाएँ। लेकिन यह तर्क सदैव नहीं दिया जा सकता। 

हमें कहीं ना कहीं से शुरू करना ही होगा। यदि सदैव हम यही सोच कर बैठे रहे, तो विदेशों पर ही निर्भर रहेंगे। यह भी नहीं है कि हमने कभी ऐसा कुछ किया ना हो। ब्रह्मोस जैसी मिसाइल बनाना हो या फिर तेजस का निर्माण है, हमने जब प्रयास किए हैं, तब सफल रहे हैं। 

अब भी ऐसे ही कदम की जरूरत है, अहमदाबाद विमान हादसा दुखद है, लेकिन इसके साथ ही सीख भी है कि आत्मनिर्भरता का कोई विकल्प नहीं। 

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