‘फिक्सर और बिचौलिए’ सुप्रीम कोर्ट में भी? राहुल और राफेल की अलग-अलग तारीखों पर बौखलाए CJI

राफेल जैसे अहम मामले की तारीखों में हेरफेर और कोर्ट के आदेश का पालन न होने पर संदेह प्रत्यक्ष रूप से 'फिक्सर और बिचौलियों' पर जा रहा है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने...

राफेल मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ दो मामलों की तारीखें एक साथ न देखकर हैरान रह गई। यह हुआ सोमवार को यानी मई 6, 2019 को। सुप्रीम कोर्ट की पीठ के मुताबिक उन्होंने राहुल गाँधी अवमानना मामले और राफेल पर एक ही तारीख को सुनवाई करने का फैसला किया था। लेकिन सुनवाई के दौरान जब पीठ को पता चला कि दोनों मामलों से जुड़ी तिथियाँ अलग-अलग हैं तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्हें यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि आखिर यह हुआ कैसे!

पीठ ने कहा कि यह हैरानी वाली बात है कि उनके आदेश के बाद भी राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ दायर अवमानना याचिका को राफेल की सुनवाई के साथ सूचीबद्ध नहीं किया गया। अपनी इस बात के साथ ही कोर्ट ने मामले की सुनवाई को 10 मई तक के लिए टाल दिया। अब 10 मई को अवमानना मामले की सुनवाई और राफेल को लेकर दायर पुनर्विचार याचिका पर एक साथ सुनवाई होगी।

गौरतलब है कि प्रशांत भूषण की ओर से राफेल मामले में दायर की गई याचिका उस मामले से जुड़ी हुई है, जिसमें फ्रेंच एविएशन फर्म दसॉ के साथ 36 राफेल विमान सौदे की मंजूरी से जुड़े फैसले पर फिर से विचार करने की माँग की गई है। वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ मीनाक्षी लेखी ने अवमानना याचिका दर्ज की है।

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दरअसल, राहुल ने एक चुनावी रैली में सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर गलत दावा किया था। उन्होंने कहा था कि शीर्ष अदालत भी इस बात को कह चुका है कि चौकीदार चोर है, जबकि हकीक़त में कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। मीनाक्षी लेखी द्वारा याचिका दर्ज कराने के बाद राहुल गाँधी ने इस पर हलफनामा दर्ज कर अपनी गलती को माना है और अपने इस बयान पर खेद जताया है। लेकिन उनके इस हलफनामे पर सर्वोच्च न्यायालय संतुष्ट नहीं है।

न्यायाधीश केएम जोसेफ और जस्टिस एसके कौल की पीठ ने 10 मई को दोपहर 2 बजे सुनवाई के लिए दोनों मामलों को सूचीबद्ध किया है। लेकिन इन दोनों मामलों पर सुनवाई से ज्यादा अब इस बात पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पीठ द्वारा तय तारीखें बदलीं कैसे? तारीखों में हेरफेर और कोर्ट के आदेश का पालन न होने पर संदेह प्रत्यक्ष रूप से ‘फिक्सर और बिचौलियों‘ पर जा रहा है। आपको बता दें कि तारीखों के हेर-फेर में सुप्रीम कोर्ट पहले से ही फिक्सर और बिचौलियों को लेकर जाँच का आदेश दे चुकी है। ऐसे में दो और हाई-प्रोफाइल मामलों से संबंधित तारीखों की हेराफेरी किसी बड़े गैंग या मोडस ऑपरेंडी की ओर इशारा करती है।

सुप्रीम कोर्ट के गलियारे में चल रही तारीखों वाली यह खबर न सिर्फ मीडिया बल्कि सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन चुकी है। लोग तरह-तरह के सवाल कर रहे हैं। कुछ इसे राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस की साजिश बता रहे हैं तो कोई राफेल डील को पटरी से उतारने और सेना के मनोबल को तोड़ने वाला देशद्रोही गैंग की करतूत। नेताओं से परे कुछ लोग इसमें बड़े बिजनेसमैन का हाथ बता रहे हैं। कुछ सवाल को अगले स्तर तक ले जाते हुए यह तक पूछ रहे हैं कि आखिर कितनी बड़ी साजिश है कि खुद चीफ जस्टिस को किसी केस की सुनवाई के दौरान इसके ऊपर बोलना पड़ गया। वो भी तब जब ऐसे फिक्सर और बिचौलियों की जाँच को लेकर आदेश दिया जा चुका है।

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