Homeविविध विषयअन्यओवैसी, मदनी, इकरा, राशिद… जिन्ना के कितने मुन्ना, जिनके लिए वंदे मातरम शिर्क

ओवैसी, मदनी, इकरा, राशिद… जिन्ना के कितने मुन्ना, जिनके लिए वंदे मातरम शिर्क

वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर संसद से सड़क तक इसके पक्तियों को काटे जाने का बहसबाजी हो रही है। इसके गायन को मुस्लिम पहचान के खिलाफ बता कर कई पार्टियों के मुस्लिम सांसदों ने इसका विरोध किया। दरअसल देशभक्ति के आड़े धर्म को लाने की कोशिश की जा रही है।

संसद में वंदे मातरम के 150 वर्ष पर चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर के भाषण की चर्चा है। अनुराग ठाकुर ने कहा कि अंग्रेजों को वंदे मातरम से दिक्कत थी, फिर जिन्ना को इससे आपत्ति और अब जिन्ना के मुन्ना को भी इससे दिक्कत है।

बीजेपी सांसद का यह बयान संसद में इसी चर्चा के दौरान सही साबित होता दिखा जब एक के बाद कई मुस्लिम सांसदों ने सदन के भीतर ही वंदे मातरम का विरोध किया। जो काम जिन्ना ने दशकों पहले किया था, जो विचार जिन्ना के थे, वो विचार आज भी सदन में मौजूद दिखे। मजहब के नाम पर वंदे मातरम का खूब विरोध हुआ।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की यह कविता, जिसे 1882 में उनके बंगाली उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया था, बाद में 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध कर पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया।

धीरे-धीरे यह गीत देशभर में गूंजने लगा। श्री अरबिंदो ने इसे राष्ट्रवाद का मंत्र कहा, लाला लाजपत राय ने इसके नाम से उर्दू साप्ताहिक निकाला और मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में ‘वंदे मातरम’ लिखे झंडे को फहराकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बुलंद की। लेकिन इसी समय 1908 में मुस्लिम लीग ने इस गीत का विरोध शुरू कर दिया।

इस विरोधियों में मोहम्मद अली जिन्ना का नाम भी शामिल था। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा कि जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1937 को वंदे मातरम के खिलाफ नारा बुलंद किया। इसके बाद कॉन्ग्रेस पार्टी जिन्ना के दबाव में झुक गई थी और वंदे मातरम को तोड़ दिया। जिन्ना का यही विचार आगे चलकर देश के बँटवारे की नींव भी बना और आज दशकों बाद भी वही विचार जिंदा है और संसद तक में इस वंदे मातरम विरोधी विचार को बोला जा रहा है।

जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने वंदे मातरम् का विरोध करते हुए यहाँ तक कह दिया कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। जो समुदाय इसके दबाव में झुक जाए, वह ‘मुर्दा कौम’ कहलाएगा।

उन्होंने कहा, ‘मुसलमानों को मर जाना स्वीकार है, लेकिन शिर्क नहीं। वतन से मोहब्बत अलग, उसकी पूजा अलग है। हर एक मुसलमान देश से मोहब्बत करता है, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की करेगा। हम जिएंगे तो इस्लाम पर, मरेंगे तो इस्लाम पर।’

एक तरफ जिहाद की परिभाषा, दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायपालिका पर उंगली उठाना और राष्ट्रगीत को ‘धर्म बनाम पहचान’ की बहस में खड़ा करना एक बड़ा संदेश देता है। संदेश साफ है कि मदनी अपने बयान के जरिए केवल व्यवस्था को लेकर नाराजगी नहीं जता रहे बल्कि मुस्लिम समाज में गुस्सा और असुरक्षा की भावना को उकसाने का भी प्रयास कर रहे हैं।

जमीअत के पोस्ट में लिखा है, “हमारे बुजुर्गों ने जेलों को आबाद किया, फांसी के फंदों को चूमा और कौम के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं। अगर उन्होंने जुल्म के सामने सर नहीं झुकाया, तो हम कैसे उस तसल्सुल को छोड़ दें? डरेंगे नहीं – कभी नहीं। चाहे हालात जैसे भी हों, मुकाबला करेंगे – इंशाअल्लाह।”

संसद में ओवैसी से लेकर इकरा तक का रवैया

संसद के अंदर एआईएमआईएम नेता ओवैसी ने मुसलमान के वंदे मातरम नहीं गाने की वजह बताई कि हम अपनी माँ की इबादत नहीं करते, कुरान की इबादत नहीं करते और इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं करते, तो वंदे मातरम् भी नहीं कह सकते। लेकिन राष्ट्र और धर्म को अलग रखने की संविधान की आत्मा को ये नेता भूल गए। राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना हर भारतीय का धर्म है। वंदे मातरम् न सिर्फ एक गान है बल्कि आजादी की अलख जगाने में इसकी अहम भूमिका रही। ऐसे में इसके टुकड़े कर कॉन्ग्रेस ने तो इसका अपमान किया ही है, ओवैसी जैसे नेता इसको हवा दे रहे हैं। धर्म की आड़ में राष्ट्रीय गीत का अपमान कर रहे हैं।

संसद में जेकेएनसी सांसद आगहा सैयद रुहुल्लाह ने सरकार पर ‘मुस्लिम पहचान’ को कंट्रोल करने का आरोप लगाया। इस दौरान सरकार के अवैध तरीके से बनाए गये इमारतों को तोड़ने पर भी सवाल खड़े करते हुए इसे राजनीतिक रणनीति कहा।

‘मुस्लिम पहचान’ की बात करने वाले नेता ये भूल जाते हैं कि पहले देश की पहचान जरूरी है। कोई भी देश अपनी पहचान को भूला कर विकसित नहीं कहला सकता। अपनी पहचान बचाने के लिए इजरायल जैसे देश आसपास के मुस्लिम देशों के साथ सालों से संघर्ष कर रहा है। ये देश की पहचान ही है, जिसकी वजह से वह बचा भी हुआ है।

कैराना की एसपी सांसद इकरा हसन ने वंदे मातरम् का मतलब समझाते हुए कहा कि ‘हम मुसलमान भारतीय हैं, चांस से नहीं बल्कि चॉइस से हैं।’ इकरा जी देश का विभाजन विशुद्ध धर्म के आधार पर हुआ था। मुस्लिम लीग के बैनर तले सिर्फ जिन्ना ही नहीं थे जिन्होंने अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग की थी। उनके हजारों मुस्लिम समर्थकों ने भी अलग देश की माँग का समर्थन किया था।

धर्म के आधार पर देश के बाँटे जाने के बाद अगर भारत में रहकर मुस्लिम पहचान को राष्ट्र से ऊपर रखा जाता है, तो ये भारत में मौजूद उन सभी लोगों का अपमान है, जिन्होंने बंटवारे का दंश झेला। सालों तक सिर्फ धर्म के नाम पर हुए बंटवारे की वजह से अपना घर-बार छोड़ कर भारत आने पर विवश हुए। हजारों जानें गईं और लाखों लोग बेघर हुए। आखिर इस बंटवारे की वजह धर्म नहीं था तो क्या था, ये बता दें इकरा हसन?

जहाँ तक बुलडोजर के इस्तेमाल की बात है, तो ये अवैध तरीके से बनाए गए इमारतों पर चली है। चाहे वह मस्जिद, मजार हो या मंदिर। कई जगहों पर अवैध रूप से बने मंदिर भी तोड़े गए हैं। देश की धर्मनिरपेक्षता मुस्लिम तुष्टिकरण में नहीं, बल्कि सबको एक बराबर दर्जा देने में है। ये नहीं हो सकता कि ईद पर इफ्तार पार्टी का आयोजन राष्ट्रपति भवन में किया जाए, लेकिन हिन्दू त्यौहारों पर कुछ न हो।

बारामूला के सांसद इंजीनियर रशीद ने वंदे मातरम पर चर्चा के दौरान कहा कि देश ने कभी हमें अपना नहीं माना। कश्मीर को धारा 370 हटा कर देश की मुख्य धारा में शामिल करने की कवायद जो पीएम मोदी ने की। वह अपना मानने के लिए किया गया। सांसद रशीद ने कहा कि 5 अगस्त को उनकी मातृभूमि छीन ली गई। मातृभूमि पूरा देश होता है और जम्मू कश्मीर को देश के अन्य राज्यों की तरह व्यवहार करना, मातृभूमि छीनना नहीं है।

वंदे मातरम् को विभाजत कर देश का किया बंटवारा

पीएम मोदी ने संसद में कहा कि ‘1937 में वंदे मातरम’ को तोड़ दिया गया था। उसके टुकडे किए गए थे। वंदे मातरम के इस विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिए थे। राष्ट्र-निर्माण के इस महामंत्र के साथ यह अन्याय क्यों हुआ? यह आज की पीढ़ी को जानना जरूरी है, क्योंकि वही विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।”

अब सवाल ये उठता है कि कॉन्ग्रेस ने ऐसा क्यों किया। दरअसल मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से वंदे मातरम् के चार अंतरे हटाए थे। जवाहरलाल नेहरू के कहने पर इसे हटाया गया था। जिस वंदे मातरम ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया, उसके हिस्से को काटकर ‘पूरी आत्मा’ निकाल दी गई थी।

मुस्लिम सोच पर संविधान निर्माता आंबेडकर ने किया था वार

संविधान निर्माता बीआर आंबेडकर ने इस्लाम को लेकर क्या कहा था, ये जानना जरूरी है। आंबेडकर ने इस बात से नाराजगी जताई थी कि लोग हिन्दू धर्म को विभाजन करने वाला मानते हैं और इस्लाम को एक साथ बाँध कर रखने वाला। आंबेडकर के अनुसार, यह एक अर्ध-सत्य है। उन्होंने कहा था कि इस्लाम जैसे बाँधता है, वह लोगों को उतनी ही कठोरता से विभाजित भी करता है। आंबेडकर मानते थे कि इस्लाम मुस्लिमों और अन्य धर्म के लोगों बीच के अंतर को वास्तविक मानता है और अलग तरीके से प्रदर्शित करता है।

इस्लाम में अक्सर भाईचारे की बात की जाती है। अमन-चैन और सभी कौमों के एक साथ रहने की बात की जाती है। इस बारे में बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम जिस भाईचारे को बढ़ावा देता है, वह एक वैश्विक या सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है। बाबासाहब के इस कथन से झलकता है कि वह इस्लाम में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसी किसी भी धारणा होने की बात को सिरे से खारिज कर देते हैं।

बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने जो बातें कही हैं, वो सोचने लायक है और आज भी प्रासंगिक है। बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम कभी भी किसी भी अपने अनुयायी को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि भारत उसकी मातृभमि है। बाबासाहब के अनुसार, इस्लाम कभी भी अपने अनुयायियों को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि हिन्दू उनके स्वजन हैं, उनके साथी हैं। पाकिस्तान और विभाजन पर अपनी राय रखते हुए बाबासाहब ने ये बातें कही थीं। आंबेडकर की इन बातों पर आज ख़ुद को उनका अनुयायी मानने वाले भी चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये उनके राजनीतिक हितों को साधने का काम नहीं करेगा।

बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे कि कोई भी मुस्लिम उसी क्षेत्र को अपना देश मानेगा, जहाँ इस्लाम का राज चलता हो। इस्लाम में जातिवाद और दासता की बात करते हुए उन्होंने कहा कि सभी लोगों का मानना था कि ये चीजें गलत हैं और कानूनन दासता को गलत माना गया, लेकिन जब ये कुरीति अस्तित्व में थीं, तब इसे सबसे ज्यादा समर्थन इस्लामिक मुल्कों से ही मिला।

उन्होंने माना था कि दास प्रथा भले ही चली गई हो लेकिन मुस्लिमों में जातिवाद अभी भी है। आंबेडकर का ये बयान उन लोगों को काफी नागवार गुजर सकता है, जो कहते हैं कि हिन्दू समाज में कुरीतियाँ हैं, जबकि मुस्लिम समाज इन सबसे अलग है। आंबेडकर का साफ़-साफ़ मानना था कि जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हिन्दू धर्म में हैं, मुस्लिम उनसे अछूते नहीं हैं। ये चीजें उनमें भी हैं।

बाबासाहब आंबेडकर आगे कहते हैं कि हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर को लेकर पूछा था कि ये अनिवार्य क्यों है? दरअसल उनका इशारा बुर्का और हिजाब को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं। आंबेडकर में इतनी हिम्मत थी कि वो खुलेआम ऐसी चीजों को ललकार सकें। उनका मानना था कि दलितों को धर्मांतरण कर के मुस्लिम मजहब नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम प्रभुत्व का खतरा पैदा हो जाएगा।

स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रप्रेम से सीखिए

राष्ट्रप्रेम पर स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि संन्यासी को भी अपने देश से प्रेम होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि “जो व्यक्ति अपनी ही माँ को प्रेम तथा सेवा नहीं दे सकता, वह भला दूसरे की माँ को सहानुभूति कैसे दे सकेगा ?” अर्थात पहले देशभक्ति और उसके बाद विश्वप्रेम!

स्वामी विवेकानंद के भारत प्रेम को लेकर उनकी सहयोगी अमेरिकी महिला जोसेफिन मैक्लाउड ने कहा है कि जब उनसे उन्होंने पूछा कि कि मैं आपकी सहायता कैसे कर सकती हूँ, तो उन्होंने कहा था कि भारत से प्रेम करो। उनका भारत-प्रेम इतना गहन था कि आखिरकार वे भारत की साकार प्रतिमूर्ति ही बन गए थे।

उनकी राष्ट्रप्रेम पर उनकी रिश्तेदार निवेदिता कहती हैं कि भारत ही स्वामी जी का महानतम भाव था। भारत ही उनके हृदय में धड़कता था, भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका दिवा-स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी। इतना ही नहीं वे स्वयं ही भारत बन गए थे। वे भारत की सजीव प्रतिमूर्ति थे। वे स्वयं ही – साक्षात भारत, उसकी आध्यात्मिकता, उसकी पवित्रता, उसकी मेधा, उसकी शक्ति, उसकी अन्तर्दृष्टि तथा उसकी नियति के प्रतीक बन गए थे।”

राष्ट्र के प्रति उनका ये गहरा प्रेम उस वक्त भी उतना ही प्रासांगिक था और आज भी उनका ही प्रासांगिक है। राष्ट्र की भक्ति सभी धर्मों से ऊपर है। देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले आजादी के मतवाले हों या देश की सीमा पर खड़ा जवान, दोनों के दिलों में देशभक्ति की ज्वाला ही धधकती है, जो अपना सर्वस्व देश पर न्यौछावर कर देते हैं।

गाँधी जी ने कहा था शुद्धतम आत्मा से निकला हुआ गान

‘वन्दे मातरम्’ को महात्मा गाँधी ने ‘शुद्धतम आत्मा से निकला हुआ गान’ कहा था। ऐसे में उसी गीत को कॉन्ग्रेस ने दो हिस्सों में बाँट दिया। वंदे मातरम् ने एक ऐसे राष्ट्र को जागरूक किया जो अपनी दिव्य शक्ति को भुला चुका था। राष्ट्र की आत्मा को जागरूक करने का काम वंदे मातरम् ने किया था इसलिए महर्षि अरविंद ने कहा वंदे मातरम् भारत के पुनर्जन्म का मंत्र है।

वंदे मातरम् के गान ने देश की युवाशक्ति को राष्ट्र सर्वोपरि है, इसकी प्रेरणा देती है। इसके महत्व को जेन जी को समझाना जरूरी है, जो राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार बनेगा। न कि वंदे मातरम के 100 साल पूरा होने पर आपातकाल लगा कर और वंदे मातरम बोलने वालों को जेल भेज कर राष्ट्र का उद्धार होगा।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

कॉन्ग्रेस ने अडानी पर किया वार, चीन को पहुँचा सीधा फायदा: केन्या सरकार ने नैरोबी एयरपोर्ट का टेंडर बदला, चीनी कंपनी को 50% महंगे...

केन्या के नैरोबी एयरपोर्ट विस्तार प्रोजेक्ट में अडानी की जगह चीनी कंपनी को ठेका मिलने से आर्थिक और राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। इन सबमें चीन का नाम क्यों आ रहा है... आइए जानें

एक दीपक जलाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचा दिया बवाल… केरल के निलाविलक्कु विवाद से क्या समझे आप? क्या सेक्युलर होने का ठेका सिर्फ...

फातिमा तहिलिया विवाद के बाद फिर उठे सवाल- जब दूसरे समुदाय अपनी धार्मिक सीमाएँ तय करते हैं, तो समायोजन की उम्मीद सिर्फ हिंदुओं से क्यों?
- विज्ञापन -