विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल में GLP-1 ड्रग्स जैसे- सेमाग्लूटाइड, लिराग्लूटाइड, टिरजेपाटाइड/Mounjaro आदि को मोटापे के लंबी अवधि के इलाज के लिए एक बड़ा ‘ब्रेकथ्रू’ मानते हुए पहली वैश्विक गाइडलाइन जारी की, लेकिन इसे ‘कंडीशनल’ यानी सावधानी के साथ लागू करने की सिफारिश भी दी है।
ऑस्ट्रेलिया में इन दवाओं की एक तरफ भारी डिमांड और शॉर्टेज है तो दूसरी तरफ रेगुलेटर ने इन दवाओं से मानसिक स्वास्थ्य और सुयसाइडल थॉट्स से जुड़े संभावित जोखिम को लेकर चेतावनी जारी की है। भारत में Mounjaro के अक्टूबर में हुए रिकॉर्ड सेल के बीच यही मुद्दे भविष्य की बड़ी पॉलिसी और पब्लिक-हेल्थ बहस को जन्म दे रहे हैं।
WHO ने गाइडलाइंस में किन बातों को किया शामिल
WHO की पहली GLP-1 गाइडलाइन में कहा गया है कि इन्हें वयस्कों में मोटापे के लंबे इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हालाँकि गर्भवती महिलाओं को इससे बाहर रखा गया है और फैसले को ‘कंडीशनल’ रखा गया है, क्योंकि लंबे समय की सुरक्षा, कीमत और हेल्थ सिस्टम की तैयारी पर डेटा सीमित है।
Mounjaro असल में एक इंजेक्शन है। यह एक प्री-फिल्ड इंजेक्शन पेन के रूप में आता है। इसे डॉक्टर की सलाह पर लिया जा सकता है। इसका उपयोग टाइप-2 मधुमेह वाले लोगों में शुगर को नियंत्रित करने और वजन प्रबंधन के लिए किया जाता है। खुराक के लिहाज से इसे हर सप्ताह एक बार इंजेक्शन के रूप में लिया जाता है।
गाइडलाइन यह भी जोर देती है कि ये दवाएँ इकलौती ‘मैजिक शॉट’ नहीं हैं, बल्कि इनके साथ इंटेंसिव बिहेवियरल थेरेपी जैसे डाइट, एक्सरसाइज और काउंसिलिंग आदि को अनिवार्य हिस्से के तौर पर जोड़ी जानी चाहिए, ताकि वजन घटने के साथ जीवनशैली में स्थायी बदलाव भी हों।
गाइडलाइंस में WHO ने मोटापे को ‘क्रॉनिक, रिलैप्सिंग डिजीज’ मानते हुए देशों से कहा है कि वे एक पूरा ‘obesity ecosystem’ बनाएँ। इसमें पब्लिक हेल्थ नीतियाँ, प्रिवेंशन, शुरुआती स्क्रीनिंग और जरूरतमंदों के लिए दीर्घकालिक, सस्ते इलाज तक पहुँच शामिल हो।
क्या कहते हैं आधिकारिक आँकड़े?
दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग मोटापे से प्रभावित हैं और 2024 में मोटापे के कारण 37 लाख से अधिक मौतों से जुड़ा माना गया, ऐसे में WHO की नजर में GLP-1 दवाएँ एक बड़े पब्लिक-हेल्थ टूल की तरह हैं, लेकिन इन तक असमान पहुँच से हेल्थ इक्विटी और भी बिगड़ सकती है।
भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती दोहरी है। एक ओर शहरी और मिडिल-क्लास आबादी में तेजी से मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम बढ़ रहा है। दूसरी ओर, पब्लिक हेल्थ बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएँ महँगी इंजेक्टेबल थेरेपी को वैश्विक बनाने में बाधा बनती हैं।
WHO की नीति क्या कहती है
WHO के मुताबिक GLP-1 थेरेपीज को तीन चर्णों वाली व्यापक नीति का हिस्सा होना चाहिए। इसमें पहला, ऐसा वातावरण बनाना जहाँ अस्वस्थ खाद्य विकल्प और सिडेंटरी लाइफस्टाइल को पॉलिसी स्तर पर प्रोत्साहन न दिया जाए।
दूसरा, हाई-रिस्क आबादी की शुरुआती स्क्रीनिंग और टारगेटेड इंटरवेंशन किए जाएँ और तीसरा, जिन लोगों को मोटापा है, उनके लिए लाइफ-लॉन्ग, पर्सन-सेंट्रिक केयर की व्यवस्था की जानी शामिल है।
WHO ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर मूल्य, सप्लाई और हेल्थ सिस्टम की तैयारी पर ध्यान नहीं दिया गया तो GLP-1 ड्रग्स सिर्फ अमीर देशों और अमीर वर्गों के लिए ही उपलब्ध रहेंगे। इससे हेल्थ इक्विटी और ज्यादा खराब हो सकती है।
ऑस्ट्रेलिया में GLP-1 का क्या पड़ा असर?
ऑस्ट्रेलिया में अचानक बढ़ी डिमांड ने Ozempic और दूसरे GLP-1 इंजेक्शनों की सप्लाई चेन को बुरी तरह झकझोर दिया। खासकर तब जब इन्हें डायबिटीज के बजाय वजन घटाने के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाने लगा।
ऑस्ट्रेलिया में Ozempic (सेमाग्लूटाइड) जैसी दवाओं की कमी पिछले कुछ साल से गंभीर मुद्दा रही है। रेगुलेटर TGA ने इसे ग्लोबल डिमांड और मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी की सीमाओं से जुड़ा बताया है, और Mounjaro तथा Trulicity जैसे विकल्पों पर भी आपूर्ति का दबाव ( सप्लाई प्रेशर) बताया है।
वजन घटाने के लिए हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया प्रचार ने डायबिटीज मरीजों के लिए जरूरी डोज की उपलब्धता को प्रभावित किया। इससे डॉक्टरों पर ऑल्टरनेट ड्रग्स प्रिस्क्राइब करने और क्लिनिकल प्रायोरिटी तय करने का दबाव भी बढ़ा।
नवंबर 2025 में TGA ने पूरे GLP-1 RA क्लास (Ozempic, Wegovy, Saxenda, Trulicity, Mounjaro आदि) पर नई सेफ्टी अलर्ट जारी किए। इनमें गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स और पैंक्रीटाइटिस के साथ आत्महत्या के खयाल या बिहेवियर के जोखिम को लेकर चेतावनी को प्रमुख माना गया है ताकि डॉक्टर और मरीज दोनों हाई-रिस्क केस को पहचान कर समय पर दवा रोक सकें।
मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर अब भी खोज जारी
वैज्ञानिकों की ओर से किए गए शोध के अनुसार, कुछ डेटा में GLP-1 लेने वालों में डिप्रेशन या आत्महत्या-संबंधी घटनाओं का जोखिम हल्का बढ़ा दिखता है। हालाँकि यह अब तक साफ नहीं है कि दवा इसका सीधा कारण है या फिर मोटापे, तेजी से वजन घटने, बॉडी-इमेज प्रेशर और पहले से मौजूद मानसिक बीमारियों का मिला-जुला असर है।
इसी के कारण WHO और रेगुलेटर्स दवाओं को बैन करने के बजाय ‘कड़े मॉनिटरिंग मोड’ में रखना चाह रहे हैं। इसका मतलब है कि प्रिस्क्रिप्शन से पहले मानसिक स्वास्थ्य का बेसलाइन असेसमेंट और उपचार के शुरुआती महीनों में मूड, एंग्जायटी और आत्महत्या के खयालों की सक्रिय स्क्रीनिंग की जाए।
क्या पड़ रहा है GLP-1 दवा का मानसिक स्वास्थ्य पर असर
अभी तक की मनोवैज्ञानिक रिसर्च यह बताती है कि GLP-1 ड्रग्स लेने वाले मोटापे से ग्रस्त लोगों में अवसाद या सुसाइड-रिलेटेड इवेंट्स का जोखिम कुछ स्तर पर बढ़ा हुआ दिखा है। हालाँकि इसके कारण और असर (कैजुअलिटी) पर अब तक कोई ठोस बातें सामने नहीं आ सकी हैं।
WHO और रेगुलेटर्स का मानना है कि जैसे-जैसे लाखों लोग ये दवाएँ ले रहे हैं, वैसे वैसे ही दुर्लभ लेकिन गंभीर न्यूरोसाइकेट्रिक साइड इफेक्ट्स की निगरानी भी जरूरी हो गई है। ऐसे में इन दवाओं पर तुरंत बैन लगाने के बजाय लेबल पर वार्निंग्स और फार्माकोविजिलेंस रिपोर्टिंग को मजबूत किया जा रहा है।
क्लिनिकल प्रैक्टिस में विशेषज्ञ दो स्तर पर सावधानी की बात कहते हैं। पहली, प्रिस्क्रिप्शन से पहले मरीज का मानसिक स्वास्थ्य इतिहास जाँचना जिसमें डिप्रेशन, पुरानी सुसाइडल आइडिएशन, सब्स्टेंस यूज के बारे में पूरी जानकारी शामिल हो। दूसरी, थेरेपी के शुरुआती महीनों में मूड, एंजायटी, इरिटेबिलिटी और सेल्फ-हार्म थॉट्स की सक्रिय स्क्रीनिंग की जाए और जरूरत पड़ने पर दवा रोकी जाए।
भारत में Mounjaro की बिक्री और इससे जुड़ी चुनौती
अक्टूबर 2025 में Eli Lilly की GLP-1 दवा Mounjaro (टिरजेपाटाइड) भारत में ‘वैल्यू टर्म्स’ में सबसे ज्यादा बिक्री वाली दवा बन गई। एक महीने में लगभग 1 अरब रुपये की बिक्री हुई और रिपोर्टों के मुताबिक इसकी खपत Wegovy की तुलना में डोज वॉल्यूम में कई गुना अधिक रही।
देश GLP-1 ट्रेंड का एक बड़ा बाजार बन चुका है और मोटापा उपचार का यह मॉडल तेजी से मेनस्ट्रीम हो रहा है। भारतीय GLP-1 बाजार 2025 तक लगभग 27 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़कर 6.06 अरब रुपये के आसपास पहुँच चुका है। 2030 तक ये 34 प्रतिशत से ज्यादा की कंपाउंड ग्रोथ की संभावना जताई जा रही है। इससे पता लगता है कि ये सिर्फ ‘फैड’ नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल ट्रेंड बन चुका है।
Eli Lilly कंपनी ने भारत में करीब 1 अरब डॉलर का निवेश किया। हैदराबाद में मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी हब बनाकर कंपनियाँ सप्लाई शॉर्टेज से सीख लेकर लोकल प्रोडक्शन और कॉस्ट कंट्रोल के जरिए इस माँग को स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं।
हालाँकि इसे लेकर चुनौतियाँ भी हैं। ये चुनौती तीन स्तरों पर है- पहली, इसकी कीमत काफी अधिक है और इंश्योरेंस कवरेज सीमित है। इससे इलाज शहरी और समृद्ध वर्ग तक ही सिमट जाता है।
दूसरी चुनौती, अगर ऑस्ट्रेलिया के जैसा ‘कॉस्मेटिक वेट लॉस’ का ट्रेंड बढ़ा तो डायबिटीज और गंभीर मोटापे वाले मरीजों के लिए भविष्य में आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है।
इसके अलावा तीसरी चुनौती ये है कि मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ेगा। डिप्रेशन, बॉडी-इमेज डिस्ट्रेस और आत्महत्या की सोच से जुड़े केस बढ़े तो पहले से दबाव में चल रही मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए यह बड़ा बोझ बन सकता है।
भारत के रेगुलेटर और नीति नियानकों के लिए सवाल यह नहीं है कि GLP-1 ड्रग्स ‘चमत्कार’ हैं या ‘खतरा’, बल्कि यह है कि इन्हें किस फ्रेमवर्क के तहत अपनाया जाए। कठोर इंडिकेशन, लॉन्ग-टर्म फॉलो-अप, मानसिक स्वास्थ्य मॉनिटरिंग और कीमत-सप्लाई पर स्पष्ट पब्लिक-इंटरेस्ट पॉलिसी के साथ या फिर मार्केटिंग और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के भरोसे जैसे कई बिंदुओं पर फ्रेमवर्क करना पड़ेगा।
मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी
मोटापा कम करने की दवा की भारी माँग के बीच इस बात पर गौर करना जरूरी है कि भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य संसाधन पहले से ही काफी सीमित हैं। ऐसे में अगर GLP-1 के उपयोग के साथ मूड में बदलाव, बॉडी-इमेज डिस्ट्रेस या सुसाइडल आइडिएशन जैसे केस बढ़ते हैं, तो इंटरडिसिप्लिनरी केयर मॉडल यानी एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, साइकियाट्रिस्ट और काउंसलर की संयुक्त टीम की आवश्यकता बढ़ जाएगी।
रिसर्च में ये भी सामने आया है कि कुछ मरीज तेजी से वजन घटने के साथ सोशल प्रेशर, बॉडी-डिस्मॉर्फिक टेंडेंसी और रिबाउंड वेट गेन के डर से भी मानसिक तनाव अनुभव करते हैं। ये असल में बायोलॉजिकल साइड इफेक्ट के बजाय कॉम्प्लेक्स साइकोसोशल डायनेमिक्स की ओर इशारा करते हैं।
WHO की नई गाइडलाइन असल में भारत जैसे देशों को यह संकेत देती है कि अगर मोटापा और उससे जुड़े रोगों को गंभीरता से लेना है तो GLP-1 जैसी दवाएँ जरूरी टूल तो हो सकती हैं, लेकिन असली काम हेल्थ इक्विटी सुनिश्चित करने, हेल्थ सिस्टम को तैयार करने और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा के मजबूत ढाँचे खड़े करने में है।
अगर आत्महत्या के खयाल दिल में तेजी से घर करते हैं या आगे के शोध में इस चेतावनी के व्यापक असर सामने आते हैं तो भारत के लिए दवा की आपूर्ति के साथ ही साइकियाट्रिक साइड-इफेक्ट के मुद्दे से भी दो- चार होना पड़ेगा।


