गुजरात सरकार ने अहमदाबाद के पास खोराज GIDC में विकसित किए जा रहे स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क के लिए कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज (CTF) स्थापित करने की घोषणा की है। इन सुविधाओं के विकास के लिए IN-SPACe की ओर से उपकरणों पर 100 करोड़ रुपए तक का योगदान दिया जाएगा।
वहीं निर्माण और संचालन का अतिरिक्त खर्च राज्य सरकार उठाएगी। यह घोषणा 10वें IN-SPACe इंडस्ट्री कनेक्ट कार्यक्रम के दौरान की गई।
प्रस्तावित कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज में क्लास 100,000 क्लीनरूम, थर्मो-वैक्यूम चैंबर, 12 टन तक पेलोड क्षमता वाली वाइब्रेशन टेस्टिंग सिस्टम, EMI/EMC टेस्टिंग सुविधाएँ, क्लाइमेट टेस्ट चैंबर, मास प्रॉपर्टीज मापन प्रणाली, मैग्नेटिक फील्ड टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थ ऑब्जर्वेशन ऑप्टिक्स के कैलिब्रेशन की सुविधाएँ शामिल होंगी।
राज्य सरकार ने खोराज में 50 एकड़ जमीन आवंटित की है, जिसे भविष्य में 100 एकड़ तक बढ़ाने की व्यवस्था भी रखी गई है। पहली नजर में यह खबर किसी नए औद्योगिक पार्क या सरकारी परियोजना की घोषणा जैसी लग सकती है।
लेकिन अगर इसके पीछे के व्यापक संदर्भ को समझने की कोशिश की जाए तो साफ होता है कि यह केवल एक नई सुविधा का निर्माण नहीं है, बल्कि भारत के तेजी से बढ़ते निजी स्पेस सेक्टर के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का प्रयास है।
वास्तव में इस परियोजना को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली किसी भी चीज को धरती पर किस तरह तैयार किया जाता है।
यह कोई साधारण औद्योगिक पार्क नहीं, जानिए क्यों है खास
जब आम लोग सैटेलाइट के बारे में सोचते हैं तो उनके मन में अक्सर सिर्फ लॉन्चिंग का दृश्य आता है। रॉकेट तेज आवाज के साथ आसमान में उड़ता है और सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुँच जाता है। लेकिन हकीकत में लॉन्चिंग से पहले कई सालों तक तैयारी और परीक्षण की लंबी प्रक्रिया चलती है। अंतरिक्ष पृथ्वी जैसा वातावरण नहीं होता।
वहाँ हवा नहीं होती, दबाव नहीं होता, तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव होता है और लॉन्चिंग के दौरान भारी कंपन का सामना करना पड़ता है। इसलिए किसी भी सैटेलाइट या दूसरे स्पेस हार्डवेयर को अंतरिक्ष में भेजने से पहले उसकी कई तरह की जाँच और टेस्ट किए जाते हैं। क्लीनरूम इसका सबसे आसान उदाहरण है।
सैटेलाइट में लगाए जाने वाले कैमरे, सेंसर और दूसरे बेहद संवेदनशील उपकरणों पर धूल का एक छोटा सा कण भी असर डाल सकता है। इसलिए ऐसे उपकरणों को सामान्य माहौल में नहीं बल्कि बेहद नियंत्रित और साफ वातावरण वाले क्लीनरूम में तैयार और असेंबल किया जाता है। थर्मो-वैक्यूम चैंबर का काम अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियाँ बनाना होता है।
इसमें हवा निकालकर वैक्यूम तैयार किया जाता है और बहुत ज्यादा गर्म और बहुत ज्यादा ठंडी स्थितियाँ बनाकर यह जाँचा जाता है कि सैटेलाइट अंतरिक्ष में सही तरीके से काम कर पाएगा या नहीं। इसी तरह वाइब्रेशन टेस्टिंग भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब रॉकेट लॉन्च होता है तो उससे भारी कंपन और यांत्रिक दबाव पैदा होता है।
अगर सैटेलाइट या उसके अंदर लगे उपकरण इस कंपन को सहन नहीं कर पाए तो पूरा मिशन असफल हो सकता है। इसलिए पृथ्वी पर ही कृत्रिम रूप से ऐसी स्थिति बनाकर उसकी जाँच की जाती है। EMI/EMC टेस्टिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि अलग-अलग इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक-दूसरे को प्रभावित किए बिना सही तरीके से काम कर सकें।
सरल शब्दों में कहें तो खोराज में बनने वाली ये सुविधाएँ ऐसी जगह होंगी जहाँ पृथ्वी पर ही अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियां तैयार करके सैटेलाइट और दूसरी स्पेस सिस्टम्स की जांच और परीक्षण किए जाएँगे।
स्टार्टअप्स के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। रॉकेट तकनीक से लेकर सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, अर्थ ऑब्जर्वेशन, कम्युनिकेशन और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में कई नई कंपनियाँ सामने आई हैं। लेकिन ज्यादातर स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की होती है।
किसी स्टार्टअप के लिए अपनी थर्मो-वैक्यूम चैंबर, क्लीनरूम या वाइब्रेशन टेस्टिंग सिस्टम तैयार करना बहुत महंगा काम होता है। कई मामलों में इसका खर्च करोड़ों रुपए तक पहुँच जाता है। इसी वजह से कंपनियों को ऐसी सुविधाओं के लिए दूसरी संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। अब तक कई निजी कंपनियाँ ISRO की उपलब्ध सुविधाओं का इस्तेमाल करती रही हैं।
2020 के बाद सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए स्पेस सेक्टर खोला, जिसके बाद IN-SPACe के जरिए इस तरह की सुविधाओं तक पहुँच को ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध कराया गया। लेकिन ISRO की सुविधाएँ मूल रूप से उसके अपने मिशनों के लिए बनाई गई हैं। भारत में निजी स्पेस कंपनियों की संख्या बढ़ने के साथ इन सुविधाओं की माँग भी लगातार बढ़ रही है।
ऐसी स्थिति में खोराज में विकसित की जा रही कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज का उद्देश्य यह है कि कई कंपनियाँ एक ही प्लेटफॉर्म पर आधुनिक टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कर सकें। इससे सिर्फ लागत कम नहीं होगी, बल्कि नई कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर में आने की मुश्किलें भी कम होंगी।
हालाँकि सबसे ज्यादा चर्चा कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज की हो रही है, लेकिन खोराज परियोजना को केवल एक टेस्टिंग सेंटर के रूप में देखना सही नहीं होगा। राज्य सरकार और IN-SPACe की योजना एक ऐसा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करने की है, जहाँ कंपनियाँ सिर्फ अपने उत्पादों की जाँच ही नहीं करेंगी, बल्कि सैटेलाइट, पेलोड सिस्टम और दूसरे स्पेस हार्डवेयर की डिजाइन, विकास, असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग भी कर सकेंगी।
यानि CTF पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इस परियोजना का उद्देश्य केवल टेस्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं बड़ा है।
2020 के बाद भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में क्या बदलाव आए?
इस पूरे प्रोजेक्ट को समझने के लिए 2020 के स्पेस रिफॉर्म्स को समझना जरूरी है। लंबे समय तक भारत का स्पेस सेक्टर लगभग पूरी तरह ISRO पर केंद्रित रहा। देश की अंतरिक्ष क्षमताओं का विकास हुआ और मंगलयान व चंद्रयान जैसे ऐतिहासिक मिशन सफल रहे, लेकिन निजी क्षेत्र की भागीदारी बहुत सीमित थी।
2020 में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। इसके साथ ही IN-SPACe का गठन किया गया। IN-SPACe का काम निजी कंपनियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश के लिए जरूरी मंजूरी, मार्गदर्शन और समन्वय देना है।
इसके बाद आज कई भारतीय स्टार्टअप्स रॉकेट, सैटेलाइट और अन्य स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं। निजी क्षेत्र को स्पेस सेक्टर में शामिल करने का मतलब सिर्फ नई कंपनियों को मौका देना नहीं था, बल्कि इसका यह भी मतलब था कि देश को नए तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ेगी।
खोराज में विकसित की जा रही कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज को इसी बड़े बदलाव का एक हिस्सा माना जा सकता है।
गुजरात निभा रहा महत्वपूर्ण भूमिका
खोराज में विकसित किया जा रहा स्पेस पार्क सिर्फ टेस्टिंग की जगह नहीं होगा, बल्कि इसे एक पूरा औद्योगिक क्लस्टर के रूप में तैयार करने की योजना है। यहाँ भविष्य में ऐसी कंपनियाँ आ सकती हैं जो सैटेलाइट के अलग-अलग हिस्से बनाएँगी, पेलोड सिस्टम विकसित करेंगी, स्पेस आधारित एप्लीकेशन पर काम करेंगी और उसी इकोसिस्टम में अपने उत्पादों का परीक्षण भी कर सकेंगी।
यानी डिजाइन से लेकर फ्लाइट के लिए तैयार सिस्टम बनने तक की पूरी प्रक्रिया के लिए जरूरी ढाँचा एक ही क्लस्टर में विकसित करने की कोशिश की जा रही है। खोराज प्रोजेक्ट का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह गुजरात में बन रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण भी हैं। IN-SPACe का मुख्यालय अहमदाबाद में स्थित है।
साथ ही गुजरात का ISRO से भी लंबे समय से जुड़ा हुआ संबंध रहा है। अहमदाबाद में स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाता आया है। पिछले कुछ वर्षों में गुजरात सरकार ने डिफेंस, एयरोस्पेस और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया है। राज्य में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बड़े निवेश भी हो रहे हैं।
स्पेस टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर उद्योग आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि सैटेलाइट और अन्य अंतरिक्ष प्रणालियों के लिए उन्नत इलेक्ट्रॉनिक घटकों की जरूरत होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो खोराज में विकसित किया जा रहा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क कोई अलग-थलग प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि गुजरात में विकसित हो रहे बड़े हाई-टेक इकोसिस्टम का एक हिस्सा है।
क्या हो सकते हैं इसके दीर्घकालिक प्रभाव?
खोराज प्रोजेक्ट का वास्तविक असर आने वाले वर्षों में दिखाई देगा। अगर यहाँ प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर सफलतापूर्वक विकसित हो जाता है और उद्योग इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है, तो यह भारत के स्पेस स्टार्टअप्स के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन बन सकता है।
इससे स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ेगी, सप्लाई चेन और मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलेगी। इस प्रोजेक्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू ISRO से जुड़ा हुआ है। जब निजी क्षेत्र के लिए अलग और समर्पित टेस्टिंग इकोसिस्टम तैयार होगा, तो ISRO की सुविधाओं पर दबाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।
इससे ISRO अपने वैज्ञानिक शोध, अगली पीढ़ी की तकनीक, मानव अंतरिक्ष मिशन और अन्य उन्नत अभियानों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकेगा। यानी यह पहल सिर्फ निजी क्षेत्र की मदद नहीं करेगी, बल्कि पूरे भारतीय स्पेस इकोसिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है। खोराज में बनने वाली कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज को सिर्फ एक नई लैब या सरकारी प्रोजेक्ट के रूप में देखना सही नहीं होगा।
यह भारत के स्पेस सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव का हिस्सा है, जिसमें सरकार, उद्योग, स्टार्टअप्स और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो आने वाले दशकों में भारत को वैश्विक स्पेस अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति दिला सके। इसी वजह से खोराज का यह प्रोजेक्ट सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय स्पेस सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नोट: यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित लेख पर आधारित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


