उन्होंने यह भी कहा कि जब बहस सबूतों से हटकर सीधे जजों पर आरोप लगाने लगे, तो ये गलत है। उन्होंने कहा कि ये व्यवहार लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
जज लोया की मौत की रात को याद करते हुए दिया जवाब
अपने एक साथी जज की शादी में शामिल होने के लिए जज लोया नवंबर 2014 में नागपुर गए थे। वे नागपुर के सरकारी गेस्ट हाउस ‘रवि भवन’ में कुछ अन्य जजों के साथ ठहरे हुए थे।
कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया कि तीन जज एक ही कमरे में कैसे रह सकते हैं? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने जवाब दिया, “हमने सुनवाई के दौरान भी कोर्ट में कहा था कि आपको (वकील को संबोधित करते हुए) न्यायपालिका, देश और समाज के बारे में जानकारी नहीं है। जब हम किसी शादी में जाते हैं, तो कई बार 10-15 या 20-25 जज एक साथ रहते हैं। यह सामान्य बात है।”
उसी रात, करीब सुबह 4 बजे, जस्टिस लोया ने अपने दो साथी जजों को उठाया और कहा कि वे ठीक महसूस नहीं कर रहे हैं। उन दो जजों ने तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला किया। जब सवाल पूछा गया कि उन्हें ऑटो में क्यों ले जाया गया, गाड़ी क्यों नहीं ली गई?
इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “शायद उन्हें नहीं पता था कि गाड़ी कहाँ है। हर जज के पास अपनी गाड़ी और ड्राइवर नहीं होता। जब मैं भी सुप्रीम कोर्ट का जज था, तब भी मेरा ड्राइवर मेरे घर में नहीं रहता था। खासकर जिला न्यायपालिका में तो यह और आम बात है।”
जब जस्टिस लोया को पहली बार अस्पताल ले जाया गया, तो वह एक पास के ऑर्थोपेडिक अस्पताल था। वहाँ डॉक्टरों ने जाँच कर बताया कि यह हृदय से जुड़ी (कार्डियक) समस्या है, इसलिए उन्हें कार्डियक अस्पताल ले जाना होगा। इसके बाद दोनों जज उन्हें तुरंत कार्डियक अस्पताल ले गए। लेकिन तब तक उन्हें भारी हार्ट अटैक आ चुका था और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।
इस पर भी सवाल उठा कि अगर हार्ट की समस्या थी, तो सीधे कार्डियक अस्पताल क्यों नहीं ले गए? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “जब हमारे घर में माता-पिता को कोई समस्या होती है, तो हम तुरंत जो सूझता है, वही करते हैं। उसी तरह इन जजों ने भी जो उन्हें तुरंत समझ आया, वही किया। क्या हम कह सकते हैं कि ये दो जज, जो लोया जी के साथ थे, उन्हें मारना चाहते थे? ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।”
अंत में चंद्रचूड़ ने यह भी कहा, “मैं खुद भी CJI रहते हुए ड्राइवर या निजी गाड़ी लेकर नहीं चलता था। हर परिस्थिति में फैसले पर संदेह करना सही नहीं है। हाल ही में एक और जज की ट्रांजिट के दौरान हार्ट अटैक से मौत हुई, हालाँकि उन्हें तुरंत इलाज मिला। इससे साफ होता है कि मेडिकल इमरजेंसी में कुछ भी हो सकता है, भले ही तुरंत मदद मिले।”
जजों की मंशा पर सवाल उठाना गलत- पूर्व CJI
डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी जज के फैसले पर असहमति जताना बिल्कुल ठीक है, लेकिन जज की नीयत पर शक करना या उन पर गलत इरादे का आरोप लगाना खतरनाक होता है। उन्होंने लोहिया केस का उदाहरण देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को तथ्यों के आधार पर पूरी तरह से जाँचा और सभी सवालों के जवाब दिए। लोग फैसले से सहमत हों, यह उनका अधिकार है, लेकिन जजों की व्यक्तिगत नीयत पर सवाल उठाना सही नहीं है।
चंद्रचूड़ ने यह भी चेतावनी दी कि अगर इस मामले में कोई नई जाँच होती है, तो उससे विवाद खत्म नहीं होगा। अगर जाँच में कुछ नहीं निकलता, तो लोग कहेंगे कि साजिश छिपाई जा रही है और अगर कुछ निकलता है, तो लोग कहेंगे कि पहले छुपाया गया था। उन्होंने कहा कि बार-बार जाँच की माँग करना, सिर्फ एक राजनीतिक कहानी को जिंदा रखने का तरीका बन गया है, जिससे लोगों का संस्थाओं पर भरोसा टूटता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब न्यायपालिका को बार-बार राजनीतिक लड़ाइयों में घसीटा जाता है, तो यह एक खतरनाक चलन बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि फैसलों की आलोचना हो सकती है, लेकिन उस आलोचना को इस हद तक ले जाना कि जजों की ईमानदारी पर सवाल उठाया जाए, यह समाज के न्याय तंत्र में भरोसे को नुकसान पहुँचाता है।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की, “लोगों को कोर्ट की जवाबदेही तय करने का अधिकार है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया को राजनीतिक लड़ाई का मंच नहीं बनाना चाहिए। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जजों को व्यक्तिगत रूप से बदनाम करना सही नहीं। जनता और वकीलों को न्यायपालिका की विश्वसनीयता की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अगर लोगों का भरोसा टूटता है, तो कानून का पूरा ढाँचा खतरे में पड़ जाता है।”
उमर खालिद मामले पर डीवाई चंद्रचूड़
CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने एक इंटरव्यू में उमर खालिद की जमानत पर बड़ा बयान दिया। जब उनसे यह पूछा गया कि उमर खालिद को पाँच साल बाद भी जमानत क्यों नहीं मिली, तो उन्होंने कहा कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की मानसिकता से है।
उन्होंने कहा, “आज हमारे सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनके मामले सिर्फ उन्हीं जजों के सामने सुने जाएँ, जो उनके लिए अनुकूल हों। अगर ऐसा होने लगा तो पूरी न्याय व्यवस्था ढह जाएगी।” उन्होंने इस प्रवृत्ति की तुलना उस सोच से की जिसमें लोग ‘प्रो-इंडस्ट्री’ या ‘प्रो-लेबर’ जजों को चुनने की कोशिश करते हैं, जो काफी खतरनाक है।
फरवरी 2025 में बरखा दत्त को दिए गए एक इंटरव्यू में चंद्रचूड़ ने उमर खालिद की जमानत याचिका और उसमें वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की भूमिका पर भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि केस की मेरिट पर तो कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन बार-बार की गई तारीखों की माँग (adjournments) जमानत में देरी की बड़ी वजह बनी।
कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, खालिद की लीगल टीम (जिसका नेतृत्व सिब्बल कर रहे थे) ने कम से कम सात बार तारीख माँगी और आखिरकार फरवरी 2024 में जमानत याचिका वापस ले ली। तब उनकी ओर से कहा गया था, “जमानत याचिका वापस ले रहे हैं। परिस्थितियाँ बदल गई हैं, अब ट्रायल कोर्ट में कोशिश करेंगे।”
पूर्व CJI ने यह भी कहा कि मीडिया अक्सर इन पहलुओं को नजरअंदाज कर देता है और लोगों को लगता है कि गलती कोर्ट की है, जबकि हकीकत में बार-बार की देरी से बचाव पक्ष (defence) ही प्रक्रिया को कमजोर करता है।


