Wednesday, April 1, 2020
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ग्राउंड रिपोर्ट हौज़ काज़ी: एक तोड़ा गया मंदिर, एक गायब हिन्दू लड़का, एक समुदाय की बिखरी आस्था

एक बच्चे के गायब होने की खबर किसी मीडिया में नहीं है। मीडिया के एक हिस्से ने यह तय कर लिया है कि हिन्दू तो कभी पीड़ित हो ही नहीं सकता और मुसलमान तो वो समुदाय है जो शांतिपूर्ण तरीके से विवाद सुलझाना चाहता है।

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Nupur J Sharma
Editor, OpIndia.com since October 2017

चाँदनी चौक की गलियों से जब मेरा रिक्शा गुजर रहा था, तो मैं सोच रही थी कि दुर्गा मंदिर में तोड़-फोड़ वाली घटना को कहीं ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर तो नहीं पेश किया गया! क्योंकि गलियाँ खामोश नहीं थीं, दुकानें और बिजनेस ऐसे चल रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। जो लोग आवाजाही करते दिख रहे थे, वो अन्य दिन की भाँति ही थे। केवल एक चीज, जिसने यह संकेत दिया कि कुछ दिन पहले यहाँ कुछ न कुछ तो हुआ है, वह थी- सीआरपीएफ और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों की उपस्थिति।

मैंने अपने रिक्शावाले से पूछा कि यहाँ क्या हुआ था। उसने पहली बार में, धीरे से, केवल इतना कहा कि मोहम्मडन और हिंदुओं के बीच कुछ लड़ाई हुई थी। मैंने उससे पूछा कि लड़ाई किस बारे में थी? “मुझे नहीं पता,” उन्होंने कहा। फिर भी “कई अफवाहें हैं कि कैसे हिंदुओं ने एक मुस्लिम व्यक्ति को मार डाला।”

साइकिल रिक्शा हमें वहाँ तक ले गया जहाँ तक बैरिकेड्स लगे थे। इसके बाद, हमें लगभग 1 किलोमीटर तक पैदल चलना था। जब तक कि मैं उस संकरी गली तक नहीं पहुँच गई, जिसे ‘गली दुर्गा मंदिर वाली’ कहा जाता है। मैं ऐसी जगह खड़ी थी जिसे ‘लाल कुआँ’ कहा जाता था। जब मैंने ‘गली दुर्गा मंदिर वाली’ की ओर चलना शुरू किया, तो माहौल बदलता गया। मैं अपनी पीठ के पीछे घूरती निगाहों को महसूस कर सकती थी। गलियाँ मुस्लिम पुरुषों के समूहों से भरी हुई थीं और चारों ओर खड़े लोग आपस में फुसफुसा कर बात कर रहे थे, तनाव कम था।

क्या कहते हैं इलाके के मुसलमान

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इस पूरे घटनाक्रम में मुसलमानों द्वारा बताई गई कहानी हिन्दुओं के बयानों से बिलकुल ही अलग है। मुसलमानों ने एक ‘हिन्दू हलवाई’ को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया है। इनकी कहानी में मुसलमानों ने न तो मंदिर तोड़ा, न मूर्तियाँ और ये पूरी लड़ाई, जो कि एक पार्किंग को लेकर शुरु हुई थी, वो लड़ाई उस हलवाई के कारण बढ़ी जो इलाके में तनाव पैदा करना चाहता था।

इलाके के मुसलमान कहते हैं कि हिन्दुओं ने स्वयं ही दुर्गा मंदिर में तोड़फोड़ मचाई ताकि इलाके के बहुसंख्यक मुसलमानों को फँसाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव नहीं था और ये पूरी घटना जबरदस्ती बनाई गई है। उन्होंने कहा कि मंदिर पर कोई पत्थरबाजी भी नहीं हुई और हिन्दुओं ने मुसलमानों को फँसाने को लिए मंदिर के पास पत्थर रख दिए ताकि लगे कि मुसलमानों ने पत्थर फेंके हैं।

थोड़ी दूर और चलने पर पुलिस द्वारा लगाया गया दूसरा बैरिकेड नजर आता है जिसके पीछे इलाके के हिन्दू विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। दुर्गा मंदिर वाली गली के बाहर ही इलाके के बड़े-बुजुर्ग आगे की योजना पर बात कर रहे थे।

हिन्दुओं का क्या कहना है

उस गली में, जिसमें यह हमला किया गया और मुस्लिम भीड़ द्वारा मंदिर तोड़ा गया, रहने वाले लोगों ने मुस्लिम लोगों द्वारा किए जा रहे दावे को नकारा है। वे एक सीसीटीवी कैमरे की ओर इशारा करते हैं और कहते हैं कि पथराव और मंदिर पर हुए हमले के पर्याप्त वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं।

उनमें से एक ने जले हुए पर्दे और देवताओं के मूर्तियों को दिखाया जो टूटे और बिखड़े पड़े थे। ध्वस्त किए गए पूजा स्थल दिखाते हुए उन्होंने एक गंभीर और चौंकाने वाला खुलासा भी किया। निवासियों ने आरोप लगाया कि पुलिस दुर्गा मंदिर में हुई तोड़फोड़ को दबाने के लिए तोड़ी गई मूर्तियों को नई मूर्तियों से बदलने के लिए प्रयासरत है।

दिल्ली पुलिस द्वारा बदलने के लिए लाई गई नई मूर्तियाँ

निवासियों ने यह भी दावा किया कि मुस्लिम भीड़ ने न केवल दुर्गा मंदिर की मूर्तियों को तोड़ा, बल्कि दुर्गा मंदिर में पेशाब भी किया। उन्होंने बताया कि गली के मुहाने पर कई सौ लोगों की भीड़ जमा थी और अगर वे शटर को नीचे नहीं खींचते तो इलाके के हिंदू जरूर मारे जाते। यहाँ तक कि गली की दोनों तरफ खड़ी इमारतों की छतों से भी पथराव हुआ। साथ ही, भीड़ ने न केवल पथराव किया बल्कि उन पर हमले के लिए तलवारों से भी लैस थे।

लोगों का कहना है कि उस रात तनाव कम नहीं हुआ था। वास्तव में, इसके बाद भी भीड़ गली का चक्कर लगा रही थी और कई बार हमला करने के लिए तैयार थी, लेकिन हिन्दुओं ने अपने बचाव के लिए क्रिकेट बैट और ऐसे ही अन्य साधन लिए ताकि हमले की स्थिति में वो अपना बचाव तलवारों से लैस मुस्लिम भीड़ से कर सकें।

लोगों का कहना है कि पुलिस ने हिन्दुओं को चुप रहने और प्रतिक्रिया ना करने को कहा। दुर्गा मंदिर गली में रहने वाले एक निवासी ने कहा कि यह पहली बार नहीं है, जब मुस्लिमों ने हिन्दुओं पर अटैक किया हो। कुछ महीने पहले भी कुछ मुस्लिम लोगों ने मिलकर हिन्दू लड़कों के साथ हिंसक घटना को अंजाम दिया था, उस समय भी मुस्लिम भीड़ ने उन पर पथराव किया था।

जबकि कई लोग यह दावा भी कर रहे हैं कि बहुत पहले से ही चाँदनी चौक के हिन्दू और मुसलमान शांतिपूर्वक तरीके से रहते आए हैं। हालाँकि, कई अन्य लोगों का कहना है कि आपस में मनमुटाव और रंजिश की घटनाएँ समय के साथ बढ़ी हैं। वे कहते हैं, इसका कारण यह है कि पहले इस इलाके में हिंदू संख्या में अधिक थे और अब, उनकी संख्या घट गई है। एक निवासी ने यह भी दावा किया है कि ‘उनका’ उद्देश्य उस पूरी गली को अपने कब्जे और नियंत्रित में लेना है, जहाँ हिंदू निवास करते हैं।

हमले की रात

हमले की जगह से पुलिस स्टेशन महज चंद मिनटों की दूरी पर है। लेकिन, स्थानीय लोगों के मुताबिक हमले की रात पीसीआर वैन को मौके पर पहुँचने में घंटा भर लग गया। जब कुछ पत्रकार मौके पर जाने की कोशिश कर रहे थे तो उन्हें चाँदनी चौक के कुछ लोगों ने बताया कि वह गली बेवड़ों का अड्डा है और वहाँ किसी तरह का तनाव नहीं है।

घटना के बाद से हिंदू गली से महज कुछ दूर स्थित लाल कुँआ की तरफ लोगों को नहीं जाने दिया जा रहा। वहाँ रह रहे मुसलमानों का आरोप है कि हिंदुओं ने मस्जिद के पास बाइक रैली निकाली और उकसाने के लिए ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। हिंदू इन आरोपों को नकार रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में यह कहा गया है कि मुसलमानों को इकट्ठा करने के लिए ह्वाट्सएप मैसेज फॉरवर्ड किए गए।

हिंदुओं का कहना है कि इस घटना के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उनकी खबर नहीं ली। केवल हर्षवर्धन ही उनका हाल जानने पहुँचे (जब तक यह संवाददाता मौके पर था)। उनका कहना है कि यदि मुस्लिमों की पिटाई हुई होती तो केजरीवाल उनके पास जरूर जाते।

हिंदू युवक गायब

गली के लोगों से बात करने के दौरान मुझे अचानक ही ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘जय श्री राम’ के नारे सुनाई पड़े। हालात को काबू में रखने के लिए दो पुलिसकर्मी तैनात थे।

घटना के बाद से 17 साल के एक हिंदू युवा के गायब होने की बात सामने आने के बाद से फिर से तनाव बढ़ने का अंदेशा है। गायब युवक की माँ मुझे एफआईआर की कॉपी के साथ मिली।

मैंने उनसे बात करने की कोशिश की और उन्हें भरोसा दिलाया की उनकी बात सामने रखूँगी। उन्होंने कहा, ‘हमारी बात कोई नहीं बता रहा।’ मोना ने मुझे बताया उसका 17 साल का बेटा घटना वाले दिन से गायब है। उसने बताया, ‘मुस्लिमों की भीड़ उसे अगवा कर ले गई।’ जब मैं इलाके में पहुँची तो इस घटना के तीन दिन बीत चुके थे और अभी तक इस लड़के का कोई सुराग नहीं मिला था।

FIR की कॉपी

एफआईआर के मुताबिक, दुर्गा मंदिर में तोड़फोड़ और गली में रहने वाले हिंदुओं की पिटाई करने के बाद मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ मोना के घर में घुस गई और उसके बेटे को पीटने लगी। जब मुस्लिमों की भीड़ घर में घुसी और उसके बेटे को अगवा किया तब मोना आराम कर रही थी। केशव सक्सेना नामक इस युवा की बाद में कोई खबर नहीं लगी। इस नाबालिग के माता-पिता मोना और देवेंद्र गुस्से और सदमे में हैं।

‘अल्लाहु अकबर’ के नारों की शोर मंद पड़ने और तनाव घटने के बाद देवेंद्र की चिंताएँ बढ़ने लगी है। वे कहते हैं, “**, मैं अपनी जान दे दूँगा। मेरा बेटा चला गया, अब मैं और मेरी पत्नी जी कर क्या करेंगे।” भीड़ में से एक आदमी कहता है, “तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी के जान देने से तुम्हारे बेटे का क्या भला होगा।” देवेंद्र के साथ खड़े एक अन्य व्यक्ति का कहना है, “आखिर! हम कर भी क्या सकते हैं। हम हिंदू होने की सजा भुगत रहे हैं।” लोग इस कदर नाराज हैं कि उनकी भावनाएँ आसानी से भड़काई जा सकती है।

एक अन्य व्यक्ति ने बताया “कोई हमें दबा नहीं सकता। यदि तुम जान दोगे तो हम भी मरेंगे और उन सब को साथ लेकर भी जाएँगे।”

अचानक गायब युवक की माँ खड़ी होती हैं और उसकी सूनी आँखे शोला उगलने लगती हैं। वह कहती हैं, “कोई मुझे बताएगा मेरा बेटा कहाँ है। उसने कुछ खाया-पीया नहीं और न ही सोया है। मैंने एफआईआर भी दर्ज करवाई है। अब मैं किससे फरियाद करूँ। उन्होंने मंदिर को तोड़ा और मेरे बेटे को अगवा कर ले गए।”

पिता दोबारा दहाड़ते हुए कहते हैं, “मेरे हवाले उन चार लोगों को कर दो जो उस रात गली में आए थे और मैं उनसे सच्चाई उगलवा लूँगा।”

जब माँ ने 2 पुलिस अधिकारियों से, जो कि वहाँ पर मौजूद थे, तो उनमें से एक पुलिसवाले का कहना था, “आपका बेटा सुरक्षित है।”

पुलिसवाले के इस चिंतित माँ ने कहा, “तुम्हें कैसे पता कि वह ठीक है? क्या वो आपके पास है? क्या आप जानते हैं कि वह कहाँ है?” पुलिसवाले ने कहा कि अगर उन्हें पता होता तो वे पहले ही लड़के को बरामद कर लेते। किसी को भी वास्तव में समझ नहीं आया कि पुलिसवाले ने क्यों कहा कि वह ठीक है, या अब तक क्या जाँच की गई है?

हिन्दू, पुलिस के बर्ताव से खुश नहीं थे। वहीं, जब इससे पहले मुसलमानों के पास पहुँचे, तो वो दिल्ली पुलिस की जमकर तारीफ कर रहे थे।

हिन्दू: एक परेशान अल्पसंख्यक

संवाददाताओं के नजर आते ही मुस्लिम भीड़ ने वो तख्तियों लहरानी शुरू कर दीं, जिन पर लिखा था कि मुसलमान शांति और अमन चाहते हैं। हालाँकि, यह वही भीड़ थी, जो बाद में हिंदुओं के साथ ‘अल्लाहू-अकबर’ के नारों से सामना कर रही थी।

इलाके के हिंदुओं से बात करते हुए, उनकी दुर्दशा का वर्णन करते हुए, उन्होंने बार-बार जोर देकर कहा कि इस क्षेत्र में, अधिकांश दुकानें मुसलमानों की थीं और कुछ ही हिंदुओं की थीं। हिंदू बार-बार जोर देकर कहते हैं कि मुसलमान चाहते हैं कि हिंदू इस इलाके को छोड़ दें और यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि छोटी गली में भी मुसलमानों का कब्जा हो। यहाँ तक कि मुसलमान अब उस हलवाई का भी आर्थिक रूप से बहिष्कार कर रहे हैं, जो पार्किंग वाले विवाद में शामिल था।

वह हलवाई जिसका मुस्लिम बहिष्कार कर रहे हैं (तस्वीर -एक वहीं के एक व्यक्ति द्वारा व्हाट्स अप किया गया )

चुप्पी साधे, संवेदनहीन मीडिया

इस तनाव भरे माहौल के बीच, जब मैं वहाँ मौजूद थी, और गायब बच्चे के माता-पिता रो रहे थे, एक टीवी चैनल का पत्रकार भी वहाँ उपस्थित था। यह देखना विचित्र था कि जब माँ-बाप अपने बच्चे के किडनैप होने की बात पर रो रहे थे, वो टीवी रिपोर्टर वहाँ से चलता बना। उसका वहाँ से जाना इस रोते माता-पिता के उन आरोपों की पुष्टि करता है जहाँ वो बताते हैं कि इन सब बातों के बीच उनके बेटे के गायब होने की बात पूरी तरह से उपेक्षित रही।

मीडिया अक्सर अपने चमकीले टावरों के आरामदेह स्टूडियो से रिपोर्टिंग करने में व्यस्त रहता है। उनकी यही अभिजात्यता उन्हें ऐसे मामलों की गंभीरता समझने से रोकती है जहाँ एक रोते माता-पिता के गायब बच्चे की खबर सामने देखकर भी रिपोर्टर अपने कैमरामैन के साथ निकल जाता है। दुखी पिता जिस भाषा और शैली में सच्चाई बोल रहे थे वो शब्द शायद कई टीवी एंकरों को परेशान कर सकते हैं। उस पिता की बातों को सुनने और समझने के लिए इन अभिजात्य पत्रकारों को अपने चमकीले टावरों से कई सौ सीढ़ियाँ उतरनी होंगी, जो शायद संभव नहीं।

शायद यही कारण है हिन्दू खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं। शायद इसीलिए वो कहते हैं कि उनके साथ ऐसे मौकों पर VHP और बजरंग दल के वही कार्यकर्ता खड़े रहे जिन्हें ‘छुटभैया’ कहकर नकार दिया जाता है। शायद यही वो कारण है कि चमकीले टावरों में बैठा पत्रकार ट्विटर पर ही सारा ज्ञान दे देता है कि ये तो बस ‘एक मामूली विवाद’ है। एक मामूली विवाद जहाँ हिन्दुओं का कहना है कि उस हलवाई को पीटा गया और उसके घर की स्त्रियों के साथ बदसलूकी की गई।

खबरों के अनुसार गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर से बात की है और कमिश्नर ने बताया है कि अब स्थिति सामान्य है। उन्होंने बताया कि चार लोग गिरफ्तार किए गए हैं। लेकिन उस 17 साल के लड़के के गायब होने पर कहीं भी, कुछ भी नहीं कहा जा रहा।

इस अनुभव ने मुझे अंदर तक झकझोड़ दिया है। मेरे पास कहने को कुछ बचा नहीं है कि किन विशेषणों से ऐसी घटनाओं की बात करूँ। मीडिया पूरी तरह से नाकाम रहा है। जिन लोगों ने अपना बच्चा खो दिया उन्हीं पर लांछन लगाए जा रहे हैं। जिस हिंसक भीड़ ने मंदिर को तोड़ा वही ऐसे दिखाए जा रहे हैं जैसे वो कितने समझदार हैं जो मामला सुलझाना चाहते हैं। इस बच्चे के गायब होने की खबर किसी मीडिया में नहीं है। मीडिया के एक हिस्से ने यह तय कर लिया है कि हिन्दू तो कभी पीड़ित हो ही नहीं सकता और मुसलमान तो वो समुदाय है जो शांतिपूर्ण तरीके से विवाद सुलझाना चाहता है। सच्चाई अक्सर अनवरत बहते आँसुओं और चिल्लाती हुई उन आवाज़ों में खो जाती है जो टीवी स्टूडियो के ऊँचे टावरों तक कभी पहुँच नहीं पाते।

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Nupur J Sharma
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