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बाहर से आने लगे मौलवी, उगने लगे मस्जिद-मदरसे: बच्चों का खतना करवाने को कर रहे मजबूर, शवों का दाह संस्कार करने से भी हिंदुओं को रोक रहे

ब्यावर के सराधना गाँव में हिंदू रीति-रिवाजों से दाह संस्कार करने से रोका जाता है। यहाँ इस्लामी कट्टरपंथी शव को दफनाने का दबाव डालते हैं। गाँव के कालू सिंह कहते हैं कि पिता का दाह संस्कार करना चाहा, तो भीड़ ने पथराव किया।

राजस्थान के अजमेर, भीलवाड़ा, ब्यावर, पाली और राजसमंद जैसे जिलों में मेहरात (Mehrat) समुदाय के लोग रहते हैं। इन्हें चीता-मेहरात भी कहा जाता है। मुख्य धारा की मीडिया इन्हें एक ऐसे समुदाय के रूप में पेश करती है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम अपने-अपने रीति-रिवाजों के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहते हैं।

लेकिन अब इस समुदाय के लोगों पर जबरन मजहब थोपा जा रहा है। हिंदुओं को दाह संस्कार से रोका जा रहा है। बच्चों का खतना करवाने को मजबूर किया जा रहा है। होलिका दहन जैसी हिंदू परंपराओं को रोका जा रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इलाके में इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए बाहर से मौलवी आ रहे हैं। वे गाँव में मस्जिद और मदरसे बनवाकर धर्मांतरण की कोशिश कर रहे हैं।

मेहरात समुदाय OBC वर्ग में आता है। गौर करने वाली बात है कि जो मेहरात इस्लाम का अनुकरण करते हैं। उनके पूर्वज भी हिंदू से मुस्लिम बने थे। लेकिन उन्होंने इस्लाम की कुछ ही रिवाजों को अपनाया था। इन इलाकों को मजहबी कट्टरपंथ के प्रभाव से पहले तक ये लोग भी हिंदू परंपराओं का निर्वहन करते थे।

मेहरात समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को छीनने की चल रही साजिश पर राजस्थान पत्रिका ने विस्तार से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस्लामिक कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव के कारण कई गाँवों में शव का दाह संस्कार कराने के लिए लोगों का पुलिस का सहयोग तक लेना पढ़ा।

राजस्थान चीता मेहरात हिंदू मगरा-मेरवाड़ा महासभा के संरक्षक छोटू सिंह चौहान के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है, “अजमेर, ब्यावर, पाली, राजसमंद और भीलवाड़ा में चीता, मेहरात और काठात समुदाय के धर्मांतरण का प्रयास इस्लामी संस्थाएँ कर रही हैं। गाँवों में मस्जिदें और मदरसे बनवा कर मौलवी ओबीसी में आने वाली जातियों के लोगों को मुस्लिम बनाने के प्रयास कर रहे हैं।”

छोटू सिंह के अनुसार करीब 800 साल पहले उनके समाज के कुछ लोगों ने इस्लामी रीतियों को अपना लिया था। बावजूद हिंदू धर्म का प्रभाव बना रहा। समाज के लोग पूजा से लेकर विवाह तक हिंदू परंपराओं का निर्वहन करते रहे हैं। लेकिन बीते दो दशक से क्षेत्र में बाहर के मौलवियों का आना-जाना बढ़ गया है। इसके बाद से दाढ़ी-टोपी रखने, इस्लामी नाम रखने, मस्जिद जाने का चलन बढ़ गया है।

मेहरात जाति बताते ही मुस्लिम समझा

ब्यावर के राजियावास गाँव निवासी सूरज काठात बताते हैं कि वह यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। फॉर्म भरते समय जाति में मेहरात लिखा, लेकिन फिर भी धर्म के कॉलम में हिंदू धर्म के बजाए मुसलमान बना दिया गया। सूरज कहते हैं कि वह हिंदू हैं और उन्हें इसी धर्म से पहचाना जाए।

बच्चों का खतना नहीं करवाया तो गाँव से निकाला

सुहावा गाँव में बच्चों का खतना ना करवाने वाले लोगों को दुश्मन बना लिया जाता है। इस गाँव में 90 के दशक से बाहर से मौलवी आकर इस्लामी तौर-तरीके बताते हैं। जब इनपर रोक लगाई गई तो कट्टरपंथियों ने गाँव के ही मोहन को शम्सुद्दीन बनाकर मस्जिद का मौलवी लगा दिया।

गाँव के सज्जन काठात ने बताया कि उनके बेटे का खतना करवाना चाहते थे, उन्होंने मना किया तो गाँव से निकाल दिया। यहाँ तक की सज्जन को उनके ही खेतों पर जाने से तक रोका गया।

दाह संस्कार के बजाए देह दफनाने का डाला दबाव

ब्यावर के सराधना गाँव में हिंदू रीति-रिवाजों से दाह संस्कार करने से रोका जाता है। यहाँ इस्लामी कट्टरपंथी शव को दफनाने का दबाव डालते हैं। गाँव के कालू सिंह कहते हैं कि पिता का दाह संस्कार करना चाहा, तो भीड़ ने पथराव किया। यहाँ तक लोगों ने उनके बूथ से दूध खरीदने बंद कर दिया। अब वह बूथ को किराए पर देकर टैंकर चलाते हैं।

बाडिया गाँव के रहने वाले प्रेम चीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब उनके पिता का देहांत हुआ और वे दाह संस्कार करवाने पहुँचे तो लोगों ने विरोध किया। बाद में पुलिस की सुरक्षा में दाह संस्कार करवाया गया। वह बताते हैं कि गाँव में पहले शवदाह स्थल भी नहीं था, जिसे उन्होंने ही आवंटित करवाया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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