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‘जो ईसाई के तौर पर रजिस्टर्ड हैं केवल उन्हीं को दें क्रिसमस इवेंट्स की इजाजत’: क्यों गुजरात के धरमपुर और कपराड़ा में हिंदुओं ने उठाई माँग- ग्राउंड रिपोर्ट

यह मुद्दा केवल धरमपुर या कपराड़ा के कुछ गाँवों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण गुजरात के पूरे पूर्वी पट्टी में तेजी से डेमोग्राफिक बदलाव देखे गए हैं। इसमें धरमपुर और कपराड़ा के साथ-साथ डांग, तापी और सूरत जिले के सबसे उत्तरी इलाके, जैसे उमरपाड़ा और देडियापाड़ा भी शामिल हैं।

गुजरात के वलसाड जिले के धरमपुर और कपराड़ा तालुक के कई गाँवों में अवैध धर्मांतरण और प्रचार गतिविधियों के बढ़ते मामलों को लेकर स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है। इसी को लेकर पिछले कुछ दिनों में इन गाँवों के हिंदुओं ने मामलतदार कार्यालय में आवेदन दिए हैं। ग्रामीणों की माँग है कि 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जाए जिनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में आधिकारिक रूप से ईसाई धर्म के फॉलोअर के रूप में दर्ज हो।

हिंदू संगठनों ने यह माँग रखते हुए आशंका जताई है कि इस तरह के आयोजनों से अवैध धार्मिक धर्मांतरण को बढ़ावा मिल सकता है। पिछले कुछ दिनों में धरमपुर और कपराड़ा तालुकाओं के दस से अधिक गाँवों के हिंदू नेताओं ने देव बिरसा सेना और आदिवासी संस्कृति बचाओ सेना जैसे संगठनों के माध्यम से मामलतदार कार्यालय में ज्ञापन सौंपे हैं।

इन आवेदनों में कहा गया है कि पिछले कई वर्षों से आदिवासी इलाकों के विभिन्न गाँवों में ईसाई समुदाय से जुड़े लोग बड़े पैमाने पर सभाएँ, शांति उत्सव, सेमिनार और अन्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं जिनका उद्देश्य धार्मिक धर्मांतरण करना बताया गया है। आरोप है कि दिसंबर महीने में मिशनरी और पादरी इन गाँवों में पहुँचते हैं और अलग-अलग स्थानों पर क्रिसमस कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

ज्ञापनों में यह भी दावा किया गया है कि इन क्रिसमस आयोजनों के जरिए आदिवासी समाज को उसकी मूल संस्कृति और परंपराओं से अलग करने की साजिश रची जा रही है, जिससे उनकी स्वदेशी पहचान खत्म होने का खतरा है। संगठनों ने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया है।

साथ ही संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं हैं और सभी धर्मों व संप्रदायों का सम्मान करते हैं। उनका कहना है कि क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जो कानूनी रूप से सरकारी रिकॉर्ड में ईसाई के रूप में दर्ज हैं। हिंदू संगठनों ने माँग की है कि जो भी व्यक्ति या समूह क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगे, उससे पहले उससे ईसाई होने का वैध प्रमाण पत्र माँगा जाए और पूरी जाँच-पड़ताल के बाद ही अनुमति दी जाए।

स्थानीय हिंदू क्या कह रहे हैं?

जब ऑपइंडिया की टीम धरमपुर के कुछ गाँवों में जमीनी हकीकत जानने पहुँची, तो कई अहम बातें सामने आईं। जैसे-जैसे धरमपुर शहर से दूर, अंदरूनी इलाकों की ओर बढ़ते हैं तो वैसे-वैसे चर्चों की संख्या साफ तौर पर बढ़ती दिखती है। कई गाँवों में चर्च बनाए गए हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि इससे पहले इन्हीं इलाकों में सरकारी जमीन पर बिना अनुमति अवैध रूप से चर्च बनाए जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं।

महाराष्ट्र सीमा से महज दो किलोमीटर दूर स्थित गडीना गाँव के हिंदू नेताओं ने भी धरमपुर मामलतदार कार्यालय में आवेदन दिया है। गाँव के नेताओं ने ऑपइंडिया को बताया कि गडीना की आबादी करीब 1,400 है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में एक भी व्यक्ति ईसाई के रूप में दर्ज नहीं है। इसके बावजूद गाँव में एक चर्च बनाया गया है, जहाँ नियमित रूप से कार्यक्रम आयोजित होते हैं और हिंदू ग्रामीणों को भी इनमें शामिल किया जाता है।

धरमपुर के एक सुदूर इलाके में स्थित एक चर्च

स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि शुरुआत में भोले-भाले जनजातीय हिंदुओं को इन कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। बाद में मिशनरी और पादरी उन्हें लालच देते हैं, चमत्कार के जरिए बीमारी ठीक करने का दावा करते हैं, पैसे का वादा करते हैं और ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं। साथ ही उनसे कहा जाता है कि वे और लोगों को भी इन कार्यक्रमों में लाएँ।

गडीना के स्थानीय नेता पीलुभाई चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “ज्यादातर चर्च बिना किसी अनुमति के अवैध रूप से बनाए गए हैं। बाद में यही चर्च धर्मांतरण की गतिविधियों के केंद्र बन जाते हैं। जब स्थानीय हिंदू जनजातीय लोग वहाँ जाने लगते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने, मंदिर और पारंपरिक पूजा स्थलों पर न जाने के लिए कहा जाता है। अंत में व्यक्ति पूरी तरह अपने धर्म और संस्कृति से कट जाता है।”

ऑपइंडिया ने ईसाई समूहों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण रैकेट के बारे में की स्थानीय लोगों से बात

पीलुभाई चौधरी ने आगे कहा कि अगर किसी गाँव में सरकारी रिकॉर्ड में एक भी व्यक्ति ईसाई के रूप में दर्ज नहीं है, तो वहाँ इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं है। अगर अनुमति दी भी जाती है, तो प्रशासन को साफ तौर पर बताना चाहिए कि उस गाँव में कितने ईसाई रहते हैं।

गाँव के नेताओं का यह भी कहना है कि कई जगह लोगों का लालच देकर धर्मांतरण कराया जाता है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम हिंदू ही बना रहता है और वे सरकारी योजनाओं का लाभ भी लेते रहते हैं। उनका कहना है कि यही कारण है कि कई गाँवों में बड़े-बड़े चर्च बन जाने के बावजूद, आधिकारिक रिकॉर्ड में ईसाई आबादी बेहद कम दिखाई देती है।

स्थानीय हिंदुओं को आशंका है कि क्रिसमस कार्यक्रमों के जरिए एक बार फिर धर्म प्रचार और धर्मांतरण की गतिविधियाँ तेज हो सकती हैं। इसी वजह से वे माँग कर रहे हैं कि क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जाए जो सरकारी रिकॉर्ड में पंजीकृत ईसाई हैं।

सिर्फ धरमपुर-कपराड़ा नहीं, पूरे दक्षिण गुजरात के पूर्वी इलाके में असर

यह मुद्दा केवल धरमपुर या कपराड़ा के कुछ गाँवों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण गुजरात के पूरे पूर्वी पट्टी में तेजी से डेमोग्राफिक बदलाव देखे गए हैं। इसमें धरमपुर और कपराड़ा के साथ-साथ डांग, तापी और सूरत जिले के सबसे उत्तरी इलाके, जैसे उमरपाड़ा और देडियापाड़ा भी शामिल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन लोगों का धर्मांतरण कराया जाता है, वे अक्सर कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं करते। इसी कारण सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम हिंदू ही बना रहता है लेकिन उनके जीवन से धीरे-धीरे हिंदू धर्म और संस्कृति गायब हो जाती है।

हाल ही में ऑपइंडिया ने उमरपाड़ा में एक अवैध चर्च के निर्माण को लेकर एक विशेष रिपोर्ट की थी। इस रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि यह समस्या अब दक्षिण गुजरात से बढ़कर धीरे-धीरे मध्य गुजरात की ओर भी फैल रही है।

जनसंख्या में आए इन बदलावों के चलते कई अन्य समस्याएँ भी सामने आई हैं। डांग और तापी के कई गाँवों में हिंदू धर्म के अनुयायी तौर पर अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं। गाँवों से मंदिर गायब हो रहे हैं और जनजातियों के पारंपरिक धार्मिक स्थल या तो नष्ट किए जा रहे हैं या उनका स्वरूप बदला जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2022 में सोंगध के एक गाँव में एक प्राचीन आदिवासी धार्मिक स्थल को तोड़कर वहाँ मदर मैरी के लिए धार्मिक ढाँचा बनाए जाने का मामला सामने आया था।

इन सभी कारणों से स्थानीय हिंदू इस बार क्रिसमस से पहले सतर्क हो गए हैं और अपनी माँगें प्रशासन के सामने रख रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार इस पूरे मामले में क्या फैसला लेते हैं।

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया जानने के लिए ऑपइंडिया ने धरमपुर के मामलतदार से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

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મેઘલસિંહ પરમાર
મેઘલસિંહ પરમાર
ઇતિહાસ-રાજકારણમાં રુચિ ધરાવતો, ઘટનાઓના ઊંડાણમાં જઈને બૃહદ પરિપેક્ષથી જોવામાં-લખવામાં વિશેષ રસ ધરાવતો પત્રકાર. ક્યારેક લેખક, ક્યારેક રિસર્ચર, ક્યારેક ફેક્ટચેકર.

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