Tuesday, September 22, 2020
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जब JNU में मार कर खदेड़े गए 2 सैन्य अधिकारी: Pak शायरों के भारत विरोधी बयान पर जताई थी आपत्ति

तब जेएनयू के 10 प्रोफेसरों ने भी इस मामले को लेकर गंभीर सवाल दागे थे। भारतीय मीडिया में यह खबर दबा दी गई थी। लेकिन फेसबुक और ट्विटर के नहीं होने के बावदूज पाकिस्तान में इस खबर को खूब चलाया गया था। लोग मजे ले रहे थे।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का विवादों से पुराना नाता रहा है। सन 1980-81 में यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने कुलपति को अपशब्द कहे थे, जिसके बाद 46 दिनों तक इस पर ताला जड़ दिया गया था। यहाँ ‘महिषासुर दिवस’ मनाने से लेकर ‘भारत के टुकड़े’ जैसे नारों तक, कई बार विवाद छिड़ चुका है। केरल में सबरीमाला मुद्दे पर भीषण विरोध प्रदर्शन झेलने वाले वामपंथी अब जेएनयू के रूप में अपना अंतिम गढ़ बचाने के लिए हिंसा का सहारा ले रहे हैं। दिसंबर 5, 2019 को इसी क्रम में हॉस्टलों में घुस कर एबीवीपी के छात्रों को चुन-चुन कर मारा गया। ये मामला अभी तक गर्म है।

ऐसे में, यहाँ एक घटना का जिक्र करना आवश्यक है, जो ये बताता है कि जेएनयू में एक खास धड़े के छात्रों के भीतर किस कदर अपने ही देश को लेकर विरोधी भावनाएँ भरी हुई हैं। वहीं अगर बात पाकिस्तान की हो तो वो कला और संस्कृति की बातें करते हैं और जम्मू कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख अख्तियार करने से भी नहीं हिचकते। आइए, आपको मई 2, 2000 में संसद में मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूरी के उस सम्बोधन के बारे में बताते हैं, जिसमें उन्होंने एक बड़ी घटना की तरफ़ देश का ध्यान आकृष्ट कराया था। ये घटना जेएनयू में हुई थी।

वो अप्रैल 29, 2000 का दिन था। 1999 में कारगिल युद्ध की यादें लोगों के जेहन में एकदम ताज़ा थीं। जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया था, उससे देश अभी तक उबरा नहीं था। भारत की विजय तो हुई लेकिन 522 जवानों को बलिदान देना पड़ा। ऐसे समय में जेएनयू में एक मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसमें पाकिस्तान वक्ताओं का भरपूर स्वागत किया गया। भारत में ‘कला की कोई सीमा नहीं होती’ और ‘आर्ट तो मजहब से परे है’ जैसी फ़र्ज़ी बातें करने वालों की कमी नहीं रही है, ये बताना नहीं पड़ेगा। कुछ ऐसा ही उस वक़्त भी हुआ।

उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश, जिसे काट कर नवंबर 2000 में उत्तरांचल के रूप में नए राज्य का गठन हुआ) के गढ़वाल से चुन कर लगातार तीसरी बार सांसद बने खंडूरी ने संसद को बताया कि जेएनयू में 29 अप्रैल, 2000 की शाम सेना के दो जवानों की बेरहमी से पिटाई की गई। उन्होंने कहा था कि ये काफ़ी घृणित घटना है और जिस तरह से देश में सेना के जवानों के साथ व्यवहार किया जा रहा है, वो चिंताजनक है। जेएनयू में जिन दो भारतीय सेना के अधिकारियों को पीटा गया, उनका गुनाह बस इतना था कि उन्होंने मंच से भारत को भला-बुरा कह रहे पाकिस्तानी शायरों की बातों से आपत्ति जताई थी।

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ये दोनों सैनिक कारगिल युद्ध में देश के लिए लड़ चुके थे। उस शाम जेएनयू में एक मुशायरे का आयोजन किया गया था। दर्शक दीर्घा में बैठे कलाप्रेमियों में से कुछ को तब गहरा धक्का लगा, जब उन्होंने पाया कि शायरों में अधिकतर पाकिस्तानी हैं। इसके बाद पाकिस्तानियों ने भारत को खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी और कारगिल युद्ध को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की। ऐसे में उस युद्ध में जान हथेली पर रख कर मातृभूमि के लिए लड़ने वाले दो सैन्य अधिकारियों को ये सब बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने अपनी सीट से खड़े होकर आपत्ति जताई।

बकौल बीसी खंडूरी, जैसे ही जेएनयू के लोगों ने देखा कि दोनों सैनिकों ने पाकिस्तानी शायरों की आपत्तिजनक टिप्पणियों का विरोध किया है, वो उनकी पिटाई करने लगे। पीड़ित सैनिकों में से एक ने कहा- “मैं भारतीय सेना का अधिकारी हूँ। किसी भी राजनीतिक दल से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। कृपया मेरे साथ दुर्व्यवहार न करें। मैं किसी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं हूँ।” इतना कहने के बाद अधिकारियों ने अपना आईडी कार्ड दिखाया, जिसके बाद छात्र और भी उग्र हो गए। बता दें कि दोनों अधिकारी उस समय भी सेना में कार्यरत थे और रिटायर नहीं हुए थे।

इतना सुनते ही जेएनयू के लोग और भी उग्र हो गए और उन्होंने उनकी पहचान जानने के बावजूद उनकी ख़ूब पिटाई की। तमाशबीन लोग कारगिल युद्ध में भारत की सेवा करने वाले सैन्य अधिकारियों की पिटाई को देखते रहे। ये घटना रात के 1 बजे हुई। पाकिस्तानी टीवी चैनलों ने उसके अगले दिन सुबह 8 बजे इस ख़बर को चलना शुरू कर दिया। जेएनयू के कारण पाकिस्तान को ख़ुश होने का मौक़ा मिला। खंडूरी का सवाल था कि क्या ये चीजें पूर्व-नियोजित थीं? पाकिस्तान के पास ये सूचना इतनी जल्दी कैसे पहुँची? ग़ौरतलब हो कि दोनों अधिकारियों को पीट-पीट कर धक्का देते हुए मुशायरे से बाहर खदेड़ दिया गया था।

मेजर जनरल (रिटायर्ड) बीसी खंडूरी ने मई 2, 2000 को संसद में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था

ग़ौर करने वाली बात है कि उस वक़्त फेसबुक और ट्विटर का कोई अस्तित्व नहीं था। सोशल मीडिया के दोनों महारथी कम्पनियाँ लॉन्च नहीं हुई थीं। ऐसे में पाकिस्तान तक जेएनयू के एक मुशायरे की ख़बर पहुँचना खंडूरी के संदेह को बल देता है। 5 बार सांसद रह चुके बीसी खंडूरी फिलहाल भाजपा के वयोवृद्ध नेता हैं। वो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। तब उन्होंने संसद में सवाल उठाते हुए कहा था:

“ये ऐसी घटना है, जो अब तक हमारे देश में नहीं हुई थी। जहाँ एक तरफ़ हम कारगिल के वीरों को सम्मान देने की बात करते हैं और राष्ट्रवाद की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उसी कारगिल युद्ध के दो वीरों को जेएनयू में सिर्फ़ इसीलिए पीटा जाता है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तानी शायरों की भारत-विरोधी टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं किया। मैं सरकार से इस मामले की उच्च-स्तरीय जाँच की माँग करता हूँ। जेएनयू के 10 प्रोफेसरों ने गंभीर सवाल दागे हैं। उनका पूछना है कि जब सेमेस्टर की परीक्षाएँ चल रही हैं, ऐसे में इस मुशायरे के आयोजन की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

दरअसल, उस वक़्त जेएनयू के कई प्रोफेसरों ने आवाज़ उठाई थी। उन्होंने पूछा था कि आख़िर इस सेमिनार का आयोजन किसने किया था? बीसी खंडूरी ने जेएनयू के प्रोफेसरों के हवाले से दावा किया था कि इस मुशायरे के आयोजन में 1 लाख रुपए ख़र्च किए गए थे। अगर रुपए के अंतरराष्ट्रीय भाव को देखें तो आज के समय में ये रक़म और भी ज़्यादा हो जाती है। प्रोफेसरों को इन सवालों का कोई जवाब नहीं मिला कि आयोजन के लिए फंड्स कहाँ से आए थे?

सबसे बड़ी बात तो ये कि इतने बड़े मुशायरे में सुरक्षा व्यवस्था का कोई बंदोबस्त नहीं था। अगर वहाँ पुलिस की मौजूदगी होती तो शायद देश के दो सैन्य अधिकारियों को जेएनयू के लोगों द्वारा पिटाई नहीं की जाती। तब दिल्ली के सांसद साहिब सिंह वर्मा ने भी इस घटना पर आपत्ति जताते हुए इसे गंभीर मसला करार दिया था। उत्तर-पूर्व मुंबई के तत्कालीन सांसद किरीट सोमैया ने भी उनके सुर में सुर मिलाया। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस नेता प्रियरंजन दाशमुंशी ने भी पूछा था कि इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री ख़ामोश क्यों हैं? उन्होंने भी इसे गंभीर आरोप बताया था।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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