Thursday, June 4, 2020
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₹575 करोड़ Pak को और पानी भी: गृहमंत्री और कैबिनेट के खिलाफ जाकर जब नेहरू ने लिया था वो फैसला

नेहरू की कमजोर कूटनीति और अदूरदर्शी सोच का ही परिणाम था कि इस जल समझौते का घाव आज तक भारत के सीने पर बना हुआ है। हकीकत यह है कि आज भी पाकिस्तान कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जो भारत के लिए भविष्य में खतरनाक साबित हो सकते हैं।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

नेता किसी भी देश, समाज और समय की रफ्तार और दिशा पर पूरा नियंत्रण रखते हैं और यही वजह है कि जब भी इतिहास लिखा जाता है, अच्छा या बुरा, उसे इन नेताओं की छाया से होकर गुजरना ही होता है। भारत को तोड़कर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क की रूपरेखा रखे जाने और मजहब के नाम पर इस नए देश के सृजन के बहुत किस्से और कहानियाँ हैं। इन्हीं किस्सों में सबसे अहम योगदान तत्कालीन नेताओं का भी देखने को मिलता है। इसमें मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अक्सर चर्चा का विषय रहे हैं।

यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जवाहरलाल नेहरू को एक ओर जहाँ दूरदर्शी और कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा नए भारत का शिल्पकार कहा जाता है, वहीं नेहरू द्वारा की गई अनेकों हिमालयी भूलों को इन्हीं नेहरूवियन सभ्यता के इतिहासकार और दरबारी लेखकों ने नेहरू के भक्ति-गीतों के बीच दफ़्न कर दिया।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र आते ही याद आता है कि भारत में तुष्टिकरण जैसे शब्द का बीजारोपण करने वाले ऐसे भी नेता हुए, जिन्होंने स्वयं की छवि को भारत देश से भी ऊपर रखकर खूब वाहवाही लूटी। इसमें साथ देने के लिए दरबारी इतिहासकार तो कॉन्ग्रेस के साथ आजादी के बाद से हमेशा से ही रहे हैं।

‘नया भारत’ अभी प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस जैसी बर्बर ऐतिहासिक घटना से घायल ही था कि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर जैसी महान समस्या का तौहफा भारत देश को सौंप दिया। यह समस्या इतनी बड़ी थी कि इसके नीचे ही नेहरू को अपनी ‘उदारवादी’ और तुष्टिकरण की छवि को मजबूत करने के लिए और भी कई भूल करने का मौका मिल गया।

सिंधु जल समझौता यानी भारत बनाम नेहरू

साठ साल पहले वियना समझौते का हासिल सिंधु जल समझौता इस देश का एक ऐसा समझौता है, जिस पर आज भारत स्वयं बैकफुट पर नजर आता है। पाकिस्तान द्वारा किसी भी आतंकी हमले के बाद यह चर्चा का विषय बन जाता है कि भारत को इस संधि को तोड़ देना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस समझौते की मजबूरी भारत को सौंपी किसने?

वास्तव में यह विवाद वर्ष 1947 में भारत के बँटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच। वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान के नौकरशाहों ने पाकिस्तान की तरफ़ जाने वाली कुछ प्रमुख नहरों पर ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ पर हस्ताक्षर कर पाकिस्तान के लिए पानी का बंदोबस्त कर दिया। यह समझौता मार्च 31, 1948 तक कायम रहा।

अप्रैल 01, 1948 को भारत ने इन दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया, जिससे पाकिस्तान स्थित पंजाब में करीब 17 लाख एकड़ ज़मीन के बुरे दिन शुरू हो गए। पाकिस्तान के इस क्षेत्र के मरुस्थल में तब्दील होने के हालात बन गए।

तत्कालीन विचारकों ने बताया कि नेहरू की अगुवाई वाली भारत सरकार ऐसा कर के पाकिस्तान पर कश्मीर मुद्दे को लेकर दबाव बना रही थी। लेकिन इसी वक़्त वर्ष 1951 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने पत्राचार के पुराने शौक के चलते विश्व बैंक (तत्कालीन ‘पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक’) प्रमुख और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया।

कश्मीर की तरह ही इस बार भी नेहरू ने अपने देश के अंदरूनी मुद्दों के लिए विदेशी शरण ली और इसे भी भारत के गले की हड्डी बना दिया। नेहरू के इस पत्राचार के बाद दोनों पक्षों के बीच करीब एक दशक तक बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया। आखिरकार 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान की तरफ से फील्ड मार्शल मुहम्मद अयूब खाँ ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संधि का परिणाम यह हुआ कि साझा करने के बजाय नदियों का विभाजन हो गया।

इस समझौते से एक ‘फायदा’ यह भी हुआ कि देश की अवश्यकताओं की जगह जवाहरलाल नेहरू की शांति के कबूतर उड़ाने और कूटनीति की छवि को खूब वाहवाही मिली। नेहरू ने इस संधि द्वारा ऐतिहासिक नारे दिए कि इंजीनियरिंग और अर्थशास्त्र, राष्ट्रवाद और राजनीति से ऊपर रहेंगे। जाहिर सी बात थी कि अंततः इससे नेहरू की कबूतर उड़ाने की (शांति के)अंतरराष्ट्रीय छवि को ही बल मिला।

इस समझौते के अनुसार यह तय हुआ कि पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा और बदले में इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया जाएगा। इसमें भारत को बिजली बनाने और कृषि के लिए सीमित पानी मिला।

हो सकता है कि दूरदर्शी नेता जवाहरलाल नेहरू ने 1960 में यह सोचकर पाकिस्तान के साथ इस संधि पर हस्ताक्षर किए हों कि शायद भारत देश को पानी के बदले आतंकवाद से मुक्ति और शांति मिलेगी। लेकिन, हुआ यह कि इस संधि के लागू होने के महज पाँच साल बाद ही पाकिस्तान ने भारत पर 1965 में हमला कर दिया।

भारत पर संधि के बदले आर्थिक जुर्माना

1960 में ही इस संधि के तहत तय किया गया कि भारत द्वारा पाकिस्तान को £62 मिलियन पाउंड (आज की राशि में 575 करोड़ रुपए) दिया जाएगा, जिससे पाकिस्तान इस संधि में वर्णित नई नहरों और प्रोजेक्ट्स का निर्माण करेगा। इसके अलावा पाकिस्तान को विश्व बैंक द्वारा $1.101 बिलियन की भी आर्थिक मदद उपलब्ध की गई। यानी, इस संधि के अनुसार, दोनों देशों इस बात पर सहमत हुए कि पाकिस्तान में इस पानी से सम्बंधित हर नए निर्माण और योजनाओं का आर्थिक भार भारत देश वहन करेगा। नेहरू के अनुसार यह उनकी बड़ी कूटनीतिक जीत थी क्योंकि अब विज्ञान ने राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ दिया था।

इस सहमति के बाद इस संधि पर दोनों ही देशों राजनीतिक रूप से खूब आलोचना हुई। हालाँकि पाकिस्तान जैसे सैन्य देश में इस आलोचना को काफी हद तक दबा दिया गया। हालाँकि, मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना, जो कि जनरल अयूब खान की बड़ी आलोचक रहीं, ने जनरल अयूब खान पर पानी के अधिकारों से वंचित कर देने का आरोप भी लगाया। समय के साथ पाकिस्तान में इस संधि से असहमति दर्ज करने वाले कई लोग सामने आए। उनके अनुसार यह संधि पाकिस्तान के लिए संतोषजनक सहमति नहीं थी।

भारत में नेहरूवियन विचारकों का तब भी मानना था कि यह आलोचना सिंधु जल समझौते के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं थी। हालाँकि, भारत में लोगों के मन में नेहरू की सरकार के विरुद्ध पाकिस्तान को संधि के बदले पानी के साथ ही आर्थिक मदद देने पर सहमत होने के कारण रोष व्याप्त था। यहाँ के लोगों ने इस संधि को सरकार की ‘तुष्टिकरण और आत्मसमर्पण’ की संधि बताया।

इस विरोध में तत्कालीन सरकार में नियुक्त राजनयिकों से लेकर पदाधिकारी भी शामिल थे। बीके नेहरू (पीएम नेहरू के भाँजे), जो कि उस समय भारतीय राजनयिक और संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत थे, से लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री कृष्ण मैनन इस संधि से नाराज थे और खुलकर इसका विरोध करते रहे।

उस समय इस संधि से असहमति और विरोध का सबसे प्रमुख कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने के लिए राजी होना था। यहाँ तक कि मोरारजी देसाई, जो कि उस समय कैबिनेट मंत्री थे, ने विपक्षी दलों को भी इस संधि के खिलाफ एकसाथ होने की सलाह दी। तत्कालीन गृहमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त भी पाकिस्तान को दी जाने वाली इस आर्थिक सहमति से नाखुश थे। वो चाहते थे कि इस आर्थिक राशि का उस धन के साथ सामन्जस्य बैठाया जाए, जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान में छोड़ कर आ चुके हैं।

1965 के भारत-पाक युद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को संसद में यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि पाकिस्तान, भारत सरकार और विश्व बैंक द्वारा पाकिस्तान को उस संधि के बदले दी गई धनराशि से हथियार नहीं खरीद रहा है।

इस तरह से, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सिर्फ अपनी शांतिप्रिय छवि गढ़ने के लिए ही सिंधु जल समझौते के रूप में कश्मीर जितनी ही भयानक भूल कर चुके थे। यह हर हाल में भारत की कमजोर कूटनीति और अदूरदर्शी सोच का ही परिणाम था कि इस जल समझौते का घाव आज तक भारत के सीने पर बना हुआ है। जम्मू कश्मीर (लेह-लद्दाख) में ही बगलिहार और किशनगंगा जैसे बाँध स्थित हैं और हकीकत यह भी है कि पाकिस्तान अक्साई चीन इलाके में ऐसे कई छोटी-बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जो हर दृष्टि से भारत के लिए भविष्य में खतरनाक साबित हो सकते हैं।

वास्तव में इस संधि के बदले पाकिस्तान को दिया जाने वाला सिंधु नदी के कुल पानी का 80 प्रतिशत पानी नेहरू की ‘अति-उदारवादी’ छवि और ‘दूरदर्शी व्यक्तित्व’ का जुर्माना है, जिसे भारत देश हमेशा भरता ही रहेगा।

इस लेख में शामिल किए गए तथ्य भारत के पूर्व राजनयिक टीसीए राघवन द्वारा लिखित पुस्तक The People Next Door: The Curious History of India-Pakistan Relations पुस्तक से लिए गए हैं।

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