केरल हाई कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को कहा कि गैर-हिंदुओं के लिए हिंदू मंदिरों में प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ताकि यह संविधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक स्थानों को नियंत्रित करने वाले कानून सामाजिक अशांति या विवाद का साधन नहीं बनना चाहिए।
यह फैसला डिवीजन बेंच ने सुनाया, जिसमें जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के वी जयकुमार शामिल थे। कोर्ट ने उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू त्योहार के दौरान मंदिर में ईसाई पुजारियों के प्रवेश को चुनौती दी गई थी।
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह यह देखे कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप नियम, 1965 के नियम 3(ए) को वर्तमान रूप में बनाए रखना चाहिए या धार्मिक हितधारकों से सलाह लेकर इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।
ऑपइंडिया ने इस फैसले का विश्लेषण किया।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 सितंबर 2023 को अडूर श्री पार्थसारथी मंदिर, पथानमथिट्टा जिले में श्रीकृष्ण जयंती के समारोह के दौरान घटित घटनाओं से उत्पन्न हुआ। मंदिर प्रशासन ने समारोह के हिस्से के रूप में आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम में दो ईसाई पादरियों को आमंत्रित किया।
कार्यक्रम के बाद पादरियों को श्रीकोविल (अंदरूनी पूजा क्षेत्र) के पास ले जाया गया और उन्हें भेंट दी गई। चूँकि पादरी अपने पोशाक में थे, ऐसे में हिंदू भक्तों ने आपत्ति जताई और दावा किया कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (एथोराइजेशन ऑफ एंट्री) एक्ट, 1965 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
मंदिर के भक्त सनील नारायणन नंपूतिथि ने केरल हाई कोर्ट का रुख किया और मंदिर प्रशासन पर आरोप लगाया कि उन्होंने ईसाई पादरियों को प्रवेश की अनुमति देकर कानून का उल्लंघन किया। उन्होंने मंदिर सलाहकार समिति के सदस्यों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई, जिसमें उनके पद से हटाना भी शामिल था, की माँग की। साथ ही उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं के मंदिर परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने और परिसर की पवित्रता बहाल करने के लिए उपचारात्मक अनुष्ठानों के प्रदर्शन का निर्देश देने की भी माँग की।
गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर स्पष्ट प्रतिबंध
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1965 के नियमों का नियम 3(ए) स्पष्ट रूप से गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि ईसाई पादरियों का खासकर पादरी के कपड़ों में प्रवेश कानून का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना था कि चाहे तांत्री द्वारा अनुमति दी गई हो या नहीं, मंदिर प्रशासन के पास कानूनी प्रतिबंध को नजरअंदाज करने का कोई अधिकार नहीं है।
इसके अलावा यह भी कहा गया कि इस प्रकार का प्रवेश स्थापित रीति-रिवाज और धार्मिक प्रथाओं को कमजोर करता है, जिससे मंदिर की पवित्रता कम हो जाती है। याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि मामला आतिथ्य या शिष्टाचार का नहीं है, बल्कि हिंदू पूजा स्थलों को नियंत्रित करने वाले कानूनी और धार्मिक मानकों के कड़ाई से पालन का है।
देवस्वोम बोर्ड और मंदिर अधिकारियों का रुख
अपने जवाबी हलफनामे में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने माना कि मंदिर सलाहकार समिति ने श्री कृष्ण जयंती के मौके पर निकाली गई शोभा यात्रा का उद्घाटन करने के लिए एक ईसाई पादरी को बुलाया था।
कार्यक्रम के बाद पादरी और अन्य लोग मंदिर में प्रवेश करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने पुजारियों से अनुमति माँगी। इसके बाद मंदिर के तांत्रिक ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत दे दी।
बोर्ड का कहना है कि यह प्रवेश केवल औपचारिक था और अनुमति के आधार पर हुआ था, इसे किसी का अधिकार नहीं माना जा सकता। बोर्ड ने यह भी दावा किया कि इससे मंदिर की परंपराओं, रीति-रिवाजों या धार्मिक नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
इसके अलावा, बोर्ड ने कहा कि अगर नियमों का कोई उल्लंघन हुआ भी होता, तो अधिकतम कार्रवाई सिर्फ उस व्यक्ति को मंदिर परिसर से बाहर निकालने तक ही सीमित होती, न कि मंदिर अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कदम उठाने तक।
मंदिर सलाहकार समिति के सदस्यों ने भी बोर्ड की बात का समर्थन किया और कहा कि प्रवेश तांत्रिक की अनुमति से ही हुआ था। समिति ने यह भी बताया कि उस समय किसी भी श्रद्धालु ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। समिति का आरोप है कि यह याचिका कोर्ट की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है और इसका मकसद बेवजह विवाद खड़ा करना है।
कोर्ट की टिप्पणियाँ
केरल हाई कोर्ट ने कहा कि केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिंदुओं के सभी वर्गों और समुदायों को मंदिरों में प्रवेश मिले और जाति के आधार पर भेदभाव खत्म किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि 1965 के नियमों का नियम 3(क) भले ही गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता हो, लेकिन मूल कानून (अधिनियम) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई साफ और स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अधीनस्थ कानून (नियम) ऐसे प्रतिबंध नहीं लगा सकता, जो मूल अधिनियम में मौजूद ही नहीं हैं। कोर्ट ने दोहराया कि प्रत्यायोजित कानून का काम मूल कानून को पूरा करना है, न कि उसे बदलना या उसकी जगह लेना।
कोर्ट के निष्कर्ष और निर्णय
अपने फैसले में कोर्ट ने यह साफ किया कि किसी के अधिकार के रूप में मंदिर में प्रवेश करने और तांत्रिक द्वारा अतिथि या आमंत्रित व्यक्ति के रूप में अनुमति देने में फर्क है। कोर्ट ने माना कि मंदिर की धार्मिक और आध्यात्मिक व्यवस्था में तांत्रिक की महत्वपूर्ण और आधिकारिक भूमिका होती है। इसलिए, तांत्रिक द्वारा दी गई अनुमति को कानूनी उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का मकसद समाज में सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना है। कोर्ट के अनुसार, कानूनों को समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित होना चाहिए।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अधीनस्थ नियमों की सख्त और कठोर व्याख्या से धार्मिक तनाव या असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिए। हालाँकि, कोर्ट ने नियम को रद्द करने से इनकार कर दिया और यह फैसला सरकार पर छोड़ दिया कि देवस्वोम बोर्ड, तांत्रिकों, धार्मिक विद्वानों और अन्य संबंधित पक्षों से सलाह लेने के बाद नियम में बदलाव किया जाए या नहीं।
यह फैसला मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण और हिंदुओं के लिए अन्यायपूर्ण क्यों है?
इस फैसले को संविधानिक सद्भाव की रक्षा के रूप में दिखाया जा रहा है, लेकिन यह एक पुरानी और गंभीर समस्या को उजागर करता है, यानी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू धार्मिक स्थलों में बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप।
भारत और दुनिया के कई हिस्सों में धर्म के आधार पर पूजा स्थलों में प्रवेश की सीमाएँ सामान्य रूप से लागू हैं और इन्हें विवादास्पद नहीं माना जाता। उदाहरण के तौर पर, गैर-मुसलमानों को मक्का और मदीना में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
वेटिकन में भी धार्मिक नियमों के अनुसार सख्त प्रवेश व्यवस्था है। कई चर्च और सिनेगॉग भी बड़े धार्मिक कार्यक्रमों में केवल अपने अनुयायियों को ही प्रवेश देते हैं। इन नियमों को न तो असंवैधानिक कहा जाता है और न ही समाज को बाँटने वाला।
लेकिन जब बात हिंदू मंदिरों की आती है, तो वे अक्सर अदालती जाँच, नए अर्थों और नैतिक दबाव के दायरे में आ जाते हैं। केरल हाई कोर्ट का यह संकेत कि गैर-हिंदुओं पर प्रतिबंध असंवैधानिक हो सकता है, इस बात को नजरअंदाज करता है कि धार्मिक संस्थानों को अपनी आध्यात्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार है। मंदिरों को पर्यटन स्थल नहीं बनाया जा सकता।
यह तर्क कि हिंदू धर्म सिर्फ एक जीवन शैली है और इसलिए सभी के लिए खुला होना चाहिए, बार-बार हिंदू धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
यह भूल जाता है कि हिंदू मंदिर सार्वजनिक पार्क या सांस्कृतिक भवन नहीं हैं, बल्कि पवित्र स्थल हैं, जो आगम, परंपरा और सदियों पुराने धार्मिक नियमों से संचालित होते हैं और भी चिंता की बात यह है कि कोर्ट ने उस नियम पर सवाल उठाया, जो हिंदू मंदिरों की पवित्रता की रक्षा के लिए बनाया गया था, जबकि यह अधिनियम खुद हिंदू धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप का नतीजा है।
हिंदू मंदिर पहले से ही देवस्वोम बोर्डों के जरिए सरकारी नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिद और चर्च अधिक स्वतंत्र हैं। अब अगर हिंदुओं से यह भी छीन लिया जाए कि कौन उनके पवित्र स्थलों में प्रवेश कर सकता है, तो यह धर्मनिरपेक्षता का असमान और पक्षपाती प्रयोग होगा।
धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है कि हिंदू हर चीज और हर किसी को बिना सवाल स्वीकार करें, खासकर जब अन्य धर्म अपनी विशिष्टता और सीमाओं को बिना किसी विवाद के लागू करते हैं। हिंदू अकेले धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नहीं हैं और उनके मंदिर सामाजिक प्रयोगों की प्रयोगशाला नहीं होने चाहिए।
आप यहाँ फैसला पढ़ सकते हैं /
(यह रिपोर्ट मुख्य रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


