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मलिहाबाद में राजा कंस के किले पर मुस्लिमों का कब्जा, मंदिर गायब कर मस्जिद में पढ़ी जा रही नमाज: जानें- इसका इतिहास और गजेटियर में क्या है दर्ज

वर्तमान में जिसे मस्जिद, मजार या कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक किला है। हिंदू पक्ष इस मामले को कानूनी लड़ाई के रूप में अदालत ले जाने और ज्ञानवापी की तर्ज पर एएसआई (ASI) सर्वे की माँग करने की तैयारी में हैं।

अपने विश्वप्रसिद्ध दशहरी आमों के लिए खास पहचान रखने वाला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का मलिहाबाद क्षेत्र अब एक अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद का मुख्य केंद्र बन चुका है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि, काशी में ज्ञानवापी, मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, संभल की जामा मस्जिद (हरिहर मंदिर दावा), भोजशाला में वाग्देवी मंदिर के बाद अब लखनऊ का ‘कांसमंडी’ (Kasmandi) इलाका देश और प्रदेश की सांस्कृतिक व राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है।

विवाद की जड़ें मलिहाबाद के कांसमंडी क्षेत्र में स्थित एक विशाल, प्राचीन और ऊँचे टीलेनुमा परिसर से जुड़ी हैं। लाखन आर्मी, पासी समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों का दृढ़ दावा है कि वर्तमान समय में जिस परिसर को मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद, मजार या पारंपरिक कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के महान चक्रवर्ती राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक अजेय किला है।

पासी समाज का आरोप है कि इस किले के मूल ऐतिहासिक स्वरूप को ‘जमीन जिहाद’ के माध्यम से नष्ट किया गया है, इसके भीतर स्थित प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर को दबाया गया है और परिसर के भीतर से बाहर नई कब्रें तथा उर्दू के शिलापट लगाकर इस पूरी विरासत का इस्लामीकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरी ओर मुस्लिम समाज और स्थानीय वक्फ प्रबंधन इन दावों को पूरी तरह से काल्पनिक और आधारहीन बताते हुए इसे वक्फ तथा सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में दर्ज सदियों पुरानी मस्जिद और मकबरा घोषित कर रहा है।

उर्दू नाम पट हाल ही में लगाया गया

इस बीच, शुक्रवार (जुमे की नमाज- 22 मई 2025) के दिन पासी समाज द्वारा नमाज रोकने के ऐलान और उसके बाद उत्पन्न हुए भारी सांप्रदायिक तनाव ने स्थानीय प्रशासन के हाथ-पाँव फुला दिए। पूरे कांसमंडी इलाके को छावनी में तब्दील करना पड़ा और पुलिस के कड़े सुरक्षा घेरे में नमाज तो संपन्न हो गई, लेकिन पर्दे के पीछे सुलग रही यह चिंगारी अब एक बड़े कानूनी मुकदमे और देशव्यापी आंदोलन का रूप धारण करने जा रही है।

राजपासी राजा कंस के किले से जुड़ा क्या है ये पूरा विवाद

कांसमंडी में स्थित यह विवादित स्थल भौगोलिक रूप से एक ऊँचे टीले पर निर्मित है, जो दूर से ही किसी प्राचीन गढ़ या किले जैसा प्रतीत होता है। इस परिसर के भीतर वर्तमान में एक मस्जिद, कुछ प्राचीन व आधुनिक मकबरे (कब्रें) और एक कब्रिस्तान स्थित है।

पासी समाज के स्थानीय युवाओं और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का कहना है कि वे इस स्थान को सदियों से अपने पूर्वजों की विरासत के रूप में देखते आए हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में योजनाबद्ध तरीके से इसके स्वरूप को पूरी तरह बदलने का प्रयास किया गया है। उनकी आपत्तियों में ये बाते काफी अहम हैं-

  • प्राचीन किले की दीवारों और बुर्जों के अवशेष: हिंदू पक्ष का दावा है कि इस टीले की नींव और कुछ ढहे हुए हिस्सों को ध्यान से देखने पर साफ पता चलता है कि यह मध्यकालीन या आधुनिक काल की मस्जिद की स्थापत्य कला नहीं है, बल्कि यह 11वीं सदी की भारतीय दुर्ग निर्माण शैली (Fort Architecture) का हिस्सा है, जिसे राजा कंस पासी ने बनवाया था।
  • महादेव (शिव) मंदिर का अस्तित्व: लाखन आर्मी का दावा है कि किले के ठीक मध्य में राजा कंस के आराध्य भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर था। राजा कंस पासी कुल के शासक थे और शिव के परम भक्त थे। उनका आरोप है कि विदेशी आक्रांताओं और बाद के शासकों ने इस मंदिर को खंडित किया और उसी के मलबे या उसी स्थान पर वर्तमान मजहबी ढाँचे को खड़ा कर दिया गया।
  • नई कब्रों का निर्माण और भूमि विस्तार: स्थानीय हिंदू निवासियों का आरोप है कि इस परिसर के आसपास की जमीनों पर लगातार नई कब्रें बनाई जा रही हैं ताकि इसके क्षेत्रफल को बढ़ाया जा सके और इसे एक बड़े कब्रिस्तान के रूप में दिखाकर हिंदुओं के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा सके।
  • उर्दू शिलापटों पर आपत्ति: किले के मुख्य प्रवेश द्वार और बाहरी दीवारों पर बीते कुछ सालों में उर्दू और अरबी भाषा में बड़े-बड़े शिलापट (साइनबोर्ड) लगा दिए गए हैं। पासी समाज के अनुसार, यह इस ऐतिहासिक स्थल की प्राचीन भारतीय और पासी राजाओं की पहचान को मिटाकर इसे विशुद्ध रूप से एक इस्लामी स्थल साबित करने की प्रशासनिक व सामाजिक साजिश है।
  • जुमे की नमाज पर विरोध: पासी समाज का कहना है कि इस स्थल पर पहले स्थानीय स्तर पर बेहद सीमित लोग आते थे, लेकिन अब जानबूझकर बाहर से भारी भीड़ जुटाकर हर शुक्रवार को यहाँ नमाज पढ़ी जाती है, जो कि हमारी आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का अपमान है।

लखनऊ ब्रिटिश गजेटियर में राजा कंस से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य

इस पूरे विवाद में पासी समाज का पक्ष केवल मौखिक लोक-कथाओं या सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर नहीं है। आंदोलनकारियों ने अपने दावों को पुख्ता करने के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के सबसे प्रामाणिक सरकारी दस्तावेजों ‘लखनऊ जिला गजेटियर’ (Lucknow District Gazetteer) और प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखा है। इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन करने पर इस क्षेत्र के विषय में कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ियाँ जुड़ती नजर आती हैं।

कांसमंडी का नामकरण और राजपासी राजवंश

इतिहासकारों और अंग्रेजी गजेटियर के विवरणों के अनुसार, मलिहाबाद का यह विशेष क्षेत्र जिसे आज ‘कांसमंडी’ कहा जाता है, इसका नामकरण ही सीधे तौर पर राजा कंस के नाम से हुआ है। मध्यकालीन भारत की शुरुआत में, विशेषकर 10वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान, अवध (वर्तमान मध्य उत्तर प्रदेश) के एक विशाल भू-भाग पर पासी राजवंशों का शासन था। इन्हें ‘राजपासी’ या ‘नागवंशी पासी’ शासक कहा जाता था। राजा कंस इसी गौरवशाली राजवंश के एक अत्यंत शक्तिशाली और न्यायप्रिय राजा थे, जिन्होंने कांसमंडी को अपने साम्राज्य की राजधानी या एक प्रमुख सैन्य छावनी (गढ़) के रूप में विकसित किया था।

गजेटियर में कासमंडी
गजेटियर में कांसमंडी के बारे में जानकारी

11वीं शताब्दी का अवध और सालार मसूद गाजी का आक्रमण

लखनऊ गजेटियर में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी, मलिहाबाद और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र राजा कंस के मजबूत राजनीतिक और सैन्य प्रभाव में था। यह वह समय था जब भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से विदेशी इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमण गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों की तरफ बढ़ रहे थे।

इसी क्रम में सुल्तान महमूद गजनवी का भांजा सैय्यद सालार मसूद गाजी (जिसे स्थानीय इतिहास में गाजी मियाँ भी कहा जाता है) एक विशाल जेहादी सेना लेकर दिल्ली और कन्नौज को लूटता हुआ अवध के क्षेत्र में दाखिल हुआ। उसका मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र के समृद्ध हिंदू राज्यों को नष्ट करना, मंदिरों को लूटना और जबरन धर्म परिवर्तन कराना था। जब सालार मसूद गाजी की सेना मलिहाबाद और काकोरी की सीमाओं पर पहुँची, तब राजा कंस ने विदेशी दासता स्वीकार करने या आत्मसमर्पण करने के बजाय अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध का बिगुल फूँक दिया।

कांसमंडी का ऐतिहासिक युद्ध और सेनापतियों का वध

गजेटियर के अनुसार, कांसमंडी और काकोरी का यह संपूर्ण क्षेत्र सालार मसूद गाजी की विदेशी आक्रमणकारी सेना और स्थानीय हिंदू पासी राजाओं के बीच हुए अत्यंत भीषण और रक्तरंजित संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र (Battlefield) बन गया। राजा कंस ने छापामार युद्ध नीति और अपने किले की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर सालार मसूद गाजी की सेना को भारी क्षति पहुँचाई।

अंग्रेजी गजेटियर में इस युद्ध की एक ऐतिहासिक घटना का विशेष रूप से उल्लेख है कि युद्ध के दौरान राजपासी राजा कंस और उनके वीर सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सालार मसूद गाजी के दो सबसे प्रमुख और खूंखार सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया था। इन दोनों सेनापतियों की मृत्यु से विदेशी सेना में हड़कंप मच गया था।

स्थानीय लोक परंपराओं, वीर रस के गीतों (आल्हा) और क्षेत्रीय लिखित इतिहास में राजा कंस को अवध की पावन धरती पर विदेशी आक्रांताओं का प्रतिरोध करने वाले एक महान राष्ट्रभक्त योद्धा और धर्मरक्षक के रूप में पूजनीय स्थान प्राप्त है। राजा कंस महाराजा सुहैल देव के समकालीन रहे हैं। उनके बलिदान के बाद ही इस्लामी फौज बहराइच की तरफ बढ़ पाई, हालाँकि उन्होंने और उनके योद्धाओं ने मसूद की आधी फौज खत्म कर दी थी। इसके बाद महाराजा सुहैल देव ने मसूद समेत उसकी पूरी फौज को गाजर-मूली की तरह काट डाला और उसे मिट्टी में मिला दिया था।

गजेटियर में राजा कंस का जिक्र

पासी समाज का तर्क है कि जिन सेनापतियों (हातिम और खातिम) को राजा कंस ने युद्ध में मारकर अपनी धरती को गौरवान्वित किया था, आज उन्हीं की कथित मजारों और कब्रों के नाम पर राजा कंस के अपने ही किले पर कब्जा कर लिया गया है, जो इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है। खास बात ये है कि राजपासी राजा कंस के बाद रहे महाराजा बिजली पासी से जुड़े तमाम तथ्य भी सामने हैं, जिनके कब्जे में उस समय 12 किले रहे थे।

पीछे हटने के मूड में नहीं है हिंदू समाज, आर-पार की लड़ाई का ऐलान

कांसमंडी किले के इस विवाद ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। विभिन्न संगठनों के नेताओं की बयानबाजी से स्पष्ट है कि यह मामला आने वाले समय में कानूनी और राजनैतिक रूप से बेहद पेचीदा होने वाला है।

इस पूरे आंदोलन को जमीन पर उतारने और पासी समाज के युवाओं को एकजुट करने का श्रेय लाखन आर्मी के अध्यक्ष सूरज पासी को जाता है।

सूरज पासी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि मुझे 1 दिन पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया गया और प्रशासनिक देखरेख में नमाज अदा कराई गई। उन्होंने कहा कि मैं बीते 24 घंटों से अपने कार्यालय में ही कैद हूँ। मेरे घर और कार्यालय को किले में तब्दील कर दिया गया। सूरज ने कहा, “अगर मुझे नजरबंद नहीं किया जाता, तो इस बार जुमे की नमाज हमारे मंदिर पर नहीं हो पाती।”

सूरज पासी की नजरबंदी के खिलाफ प्रदर्शन करते हिंदू युवा

उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐतिहासिक साक्ष्यों और गजेटियर की प्रतियों को सार्वजनिक करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक आधिकारिक पत्र भेजा है।

अपने पत्र और बयानों में सूरज पासी ने कहा, “हम किसी भी समुदाय की वैध धार्मिक संपत्ति के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमारे पूर्वज महाराजा कंस पासी की विरासत को मिटाने की किसी भी कोशिश को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। लखनऊ गजेटियर इस बात का चश्मदीद गवाह है कि यह स्थान राजा कंस का किला था और यहाँ उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सेनापतियों को धूल चटाई थी। हमारे आराध्य भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को मुक्त कराना हमारी आस्था और हमारे आत्मसम्मान का विषय है।”

लाखन आर्मी द्वारा सीएम को लिखा गया पत्र

सूरज पासी ने कहा, “हम इस मामले को पूरी कानूनी तैयारी के साथ न्यायालय (Court) में लेकर जा रहे हैं। जिस तरह अयोध्या, काशी, मथुरा और संभल के ऐतिहासिक सत्यों को अदालत के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा रहा है, उसी तरह कांसमंडी के सच को भी उजागर किया जाएगा। इसके लिए हमारी संस्था ‘लाखन आर्मी’ पूरे उत्तर प्रदेश के पासी समाज और समस्त न्यायप्रिय हिंदू जनमानस को जागरूक कर रही है। हम बहुत जल्द एक विशाल शांतिपूर्ण आंदोलन की तारीखों की घोषणा करेंगे।”

अखिल भारत हिंदू महासभा ने इस विवाद में बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए पासी समाज को अपना पूर्ण और खुला समर्थन देने की घोषणा की है।

हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने सीधे तौर पर जिला प्रशासन और राज्य सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा, “लखनऊ के मलिहाबाद में जो कुछ हो रहा है, वह कुछ और नहीं बल्कि शुद्ध रूप से ‘जमीन जिहाद’ (Land Jihad) का एक और घिनौना उदाहरण है। एक महान हिंदू राजा के किले पर, जहाँ कभी हर-हर महादेव के जयघोष गूँजते थे, वहाँ आज चादरें बिछाकर, जबरन नई कब्रें खोदकर और उर्दू के बोर्ड लगाकर उसे पूरी तरह से हड़पने की साजिश की जा रही है।”

अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने कहा, “हिंदू महासभा पासी समाज के भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। हमारी प्रशासन से स्पष्ट माँग है कि इस विवादित परिसर में शुक्रवार को होने वाली बाहरी लोगों की नमाज को तुरंत और स्थाई रूप से रोका जाए।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर प्रशासन ने समय रहते इस अवैध कब्जे को नहीं हटाया और हिंदुओं की आस्था का सम्मान नहीं किया तो हिंदू महासभा के हजारों कार्यकर्ता स्वयं मौके पर कूच करेंगे और अपने हाथों से महाराजा कंस पासी की इस पावन विरासत की रक्षा करेंगे। इसके बाद उत्पन्न होने वाली किसी भी कानून-व्यवस्था की स्थिति की जिम्मेदारी सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन की होगी।”

मुस्लिम पक्ष और स्थानीय वक्फ कमेटी का क्या कहना है?

इस पूरे मामले में मलिहाबाद के स्थानीय मुस्लिम प्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं और वक्फ बोर्ड से जुड़े पदाधिकारियों ने हिंदू संगठनों के इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावे केवल और केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और क्षेत्र के पुराने शांतिपूर्ण माहौल को खराब करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।

मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियों ने अपने संयुक्त बयान में कहा, “यह पूरा परिसर ऐतिहासिक रूप से एक पंजीकृत वक्फ संपत्ति (Waqf Property) है। संभल और अन्य जगहों की घटनाओं के बाद अब मलिहाबाद के भाईचारे को निशाना बनाया जा रहा है। हम मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश पुलिस से माँग करते हैं कि ऐसे अफवाह फैलाने वाले और माहौल बिगाड़ने वाले असमाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई (FIR) की जाए और हमारी इबादतगाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।”

ग्राउंड जीरो की रिपोर्ट: शुक्रवार का तनाव और छावनी में बदला मलिहाबाद

जब लाखन आर्मी और पासी समाज ने शुक्रवार (22 मई 2026) को कांसमंडी किला परिसर में होने वाली जुमे की नमाज का पुरजोर विरोध करने और वहाँ जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने या प्रदर्शन करने का ऐलान किया, तो पूरे लखनऊ जिले के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। संभल में हुई हालिया हिंसक घटनाओं से सबक लेते हुए लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट ने स्थिति को संभालने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाए।

इसके लिए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करते हुए-

  • भारी पुलिस बल की तैनाती: शुक्रवार की सुबह से ही मलिहाबाद, काकोरी और कांसमंडी को जोड़ने वाले सभी मुख्य मार्गों पर भारी संख्या में उत्तर प्रदेश पुलिस के जवान, प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC) की टुकड़ियाँ और त्वरित कार्य बल (RAF) के जवानों को तैनात कर दिया गया।
  • त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग: विवादित टीले (किले) की ओर जाने वाली सभी पतली गलियों और मुख्य सड़कों पर लोहे तथा कंक्रीट की मजबूत त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग की गई। किसी भी बाहरी व्यक्ति या हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं को उस क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई।
  • ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी: पूरे परिसर और उसके आसपास के संवेदनशील रिहायशी इलाकों की निगरानी के लिए आधुनिक ड्रोन कैमरों का उपयोग किया गया। स्थानीय पुलिस की खुफिया इकाई (LIU) के सादे कपड़ों में दर्जनों जवान भीड़ पर नजर रखने के लिए तैनात रहे।
  • सड़क चेकिंग और नाकाबंदी: मलिहाबाद आने वाले वाहनों की सघन चेकिंग की गई ताकि बाहर से कोई भी प्रदर्शनकारी भीड़ का हिस्सा न बन सके।

पासी समाज और हिंदू संगठनों के कड़े आक्रोश और अल्टीमेटम के बीच, जिला मजिस्ट्रेट (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) खुद स्थिति की कमान संभाले रहे। प्रशासन ने मुस्लिम पक्ष के स्थानीय मुतवल्लियों से बात करके यह सुनिश्चित किया कि केवल स्थानीय लोग ही नमाज में शामिल हों और किसी भी प्रकार की भड़काऊ बयानबाजी न हो। इस बीच सूरज पासी को उनके दफ्तर में ही नजरबंद कर दिया गया।

विवादित स्थल की ओर जाने वाले रास्तों की नाकाबंदी

भारी पुलिस बल के कड़े पहरे और साये के बीच शुक्रवार की नमाज शांतिपूर्वक संपन्न हो गई। हालाँकि जमीन पर नमाज भले ही हो गई हो, लेकिन मलिहाबाद के स्थानीय हिंदू और मुस्लिम निवासियों के बीच एक गहरा मानसिक विभाजन और तनाव साफ महसूस किया जा सकता है। बाजारों में आम दिनों जैसी चहल-पहल गायब थी और लोग किसी भी अनहोनी की आशंका से डरे हुए दिखाई दिए।

कानूनी विकल्प और सामाजिक चुनौतियाँ

मलिहाबाद का यह ‘कांसमंडी किला विवाद’ अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति और न्यायपालिका के सामने एक नया बड़ा मामला बनने जा रहा है। पासी समाज के नेताओं द्वारा उठाए जा रहे कदमों से यह स्पष्ट है कि इस विवाद का समाधान अब सड़कों के बजाय अदालत के कमरों में ही तलाशा जाएगा।

  • अदालत में सिविल सूट (Civil Suit): लाखन आर्मी और पासी समाज के कानूनी सलाहकार बहुत जल्द लखनऊ की दीवानी अदालत (Civil Court) में एक याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं। इस याचिका में ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ (Places of Worship Act) की सीमाओं और अपवादों को ध्यान में रखते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि चूँकि यह मूल रूप से एक ऐतिहासिक किला और प्राचीन स्मारक है, इसलिए इसकी वास्तविक स्थिति और स्थापत्य की जाँच होनी चाहिए।
  • ASI सर्वे की माँग: ज्ञानवापी और भोजशाला की तर्ज पर हिंदू पक्ष अदालत से यह माँग कर सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से इस पूरे टीले की रडार (GPR System) और वैज्ञानिक खुदाई/जाँच कराई जाए ताकि यह पता चल सके कि वर्तमान ढाँचे के नीचे 11वीं सदी के किले की दीवारें और मंदिर के अवशेष मौजूद हैं या नहीं।
  • राजस्व रिकॉर्ड की चुनौती: हिंदू पक्ष सरकार से माँग कर रहा है कि इस भूमि के मालिकाना हक से जुड़े उन सभी पुराने रिकॉर्ड्स की दोबारा उच्च स्तरीय जाँच कराई जाए, जिनके आधार पर इस ऐतिहासिक किले को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।

बहरहाल, प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बेहद संवेदनशील मामले की जाँच के दौरान क्षेत्र में अमन-चैन बनाए रखने की है। मलिहाबाद और काकोरी का इलाका ऐतिहासिक रूप से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रहा है, जहाँ दोनों समुदायों के लोग दशकों से मिलकर रहते आए हैं। लेकिन इस विवाद के बाद दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी हो गई है।

मलिहाबाद के कांसमंडी में उपजा यह विवाद इतिहास के उन दबे हुए पन्नों को दोबारा पलटने जैसा है, जहाँ 11वीं शताब्दी के स्थानीय राजाओं का शौर्य, विदेशी आक्रांताओं का क्रूर इतिहास और आज के दौर की धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता आपस में टकरा रही हैं। जहाँ पासी समाज अपने गौरवशाली इतिहास और महाराजा कंस पासी की विरासत को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, वहीं मुस्लिम पक्ष अपने वर्तमान धार्मिक अधिकारों और कानूनी दस्तावेजों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।

अब यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार और देश की न्यायपालिका इस ‘इतिहास बनाम कानून’ के पेचीदा मामले को किस प्रकार सुलझाती है, ताकि इतिहास के सत्यों का सम्मान भी हो सके और समाज का ताना-बाना भी सुरक्षित रहे। आने वाले दिनों में यह देखना भी बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस मामले में भी कोर्ट के आदेश पर एएसआई (ASI) सर्वे जैसी कोई कार्रवाई अमल में लाई जाती है या नहीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चूँकि पासी समाज उत्तर प्रदेश में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ी राजनीतिक ताकत (Voter Base) है, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर खुलकर पासी समाज की माँगों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे गए पत्र के बाद राज्य सरकार के सांस्कृतिक और पुरातत्व विभाग पर भी इस बात का दबाव बढ़ गया है कि वे लखनऊ गजेटियर में दर्ज ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में कांसमंडी की इस धरोहर का आधिकारिक सर्वे कराएँ।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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