भारत अब ऊर्जा के क्षेत्र में ऐसी तैयारी कर रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में देश की सबसे बड़ी रणनीतिक परियोजनाओं में गिना जा सकता है। मोदी सरकार ने बंगाल की खाड़ी और पूर्वी समुद्री तट के विशाल हिस्सों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज के लिए बड़े स्तर पर समुद्री सर्वे अभियान शुरू करने की तैयारी की है।
इसका मकसद सिर्फ नए तेल और गैस भंडार तलाशना नहीं, बल्कि भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना भी है। जब भी युद्ध के चलते तेल संकट जैसी स्थितियाँ बनती हैं, तो भारत पर भी उसका असर पड़ता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अब भारत इसी निर्भरता को कम करने के मिशन पर निकल चुका है।
आखिर क्या है यह पूरा मिशन और क्यों है इतना अहम?
न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना को तकनीकी तौर पर ‘2D ब्रॉडबैंड मरीन सीस्मिक और ग्रैविटी-मैग्नेटिक डेटा सर्वे’ कहा जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो वैज्ञानिक समुद्र की सतह के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक छिपी चट्टानों और परतों का स्कैन करेंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहाँ तेल और गैस के बड़े भंडार मौजूद हो सकते हैं।
इसके लिए डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स ने बड़े स्तर पर योजना तैयार की है। इस मिशन के तहत बंगाल-पूर्णिया बेसिन, महानदी बेसिन, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, कावेरी बेसिन और अंडमान समुद्री क्षेत्र में सर्वे किया जाएगा। केवल बंगाल-पूर्णिया और महानदी क्षेत्र में ही लगभग 45 हजार लाइन किलोमीटर सर्वे होना है।
अंडमान और कृष्णा-गोदावरी क्षेत्रों में करीब 43-43 हजार लाइन किलोमीटर और कावेरी क्षेत्र में लगभग 30 हजार लाइन किलोमीटर तक समुद्री अध्ययन किया जाएगा। यह पूरा अभियान करीब दो साल तक चल सकता है।
समुद्र के नीचे आखिर कैसे खोजा जाएगा तेल और गैस?
इस मिशन में अत्याधुनिक सर्वे जहाजों का इस्तेमाल किया जाएगा। ये जहाज अपने पीछे लंबे केबलनुमा उपकरण खींचेंगे, जिन्हें ‘स्ट्रीमर’ कहा जाता है। ये उपकरण समुद्र की तह में शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे। जब ये तरंगें नीचे मौजूद चट्टानों से टकराकर वापस लौटेंगी, तो वैज्ञानिक उनके आधार पर समुद्र के नीचे की संरचना का नक्शा तैयार करेंगे।
इसी डेटा से यह समझा जाएगा कि कहाँ ऐसी भूगर्भीय संरचनाएँ मौजूद हैं, जिनमें तेल या प्राकृतिक गैस फंसी हो सकती है। वैज्ञानिक टेक्टॉनिक गतिविधियों, चट्टानी संरचनाओं और करोड़ों साल पुरानी तलछटी परतों का अध्ययन करेंगे। यानी जैसे डॉक्टर शरीर के अंदर देखने के लिए स्कैन करते हैं वैसे ही यहाँ समुद्र की गहराइयों का स्कैन होगा।
किन इलाकों में सबसे ज्यादा उम्मीद और कितना बड़ा हो सकता है खजाना?
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अब भी बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडार छिपे हो सकते हैं। बंगाल ऑफशोर क्षेत्र में 10 किलोमीटर से ज्यादा मोटी तलछटी परतें पाई गई हैं, जिन्हें तेल और गैस के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहाँ मायोसीन और ईओसीन काल की चट्टानों में हाइड्रोकार्बन मिलने की संभावना जताई जा रही है।
कई स्थानों पर गैस के शुरुआती संकेत भी मिले हैं। महानदी बेसिन को भी भविष्य का बड़ा ऊर्जा क्षेत्र माना जा रहा है। यहाँ गहरे समुद्री गैस भंडार और जैविक गैस सिस्टम मिलने की संभावना है। वहीं कृष्णा-गोदावरी बेसिन पहले से भारत के बड़े गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है, लेकिन अब उम्मीद है कि इसके गहरे समुद्री हिस्सों में और भी बड़े भंडार हो सकते हैं।
सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व अंडमान बेसिन को दिया जा रहा है। इसकी भूगर्भीय संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों से काफी मिलती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अंडमान समुद्री क्षेत्र में भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस मौजूद हो सकती है। यहाँ ‘गैस हाइड्रेट्स’ मिलने की भी संभावना है।
यह समुद्र के नीचे जमी हुई मीथेन गैस होती है, जिसे भविष्य का ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है। कावेरी बेसिन में पहले से तेल उत्पादन होता रहा है, लेकिन अब वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसके गहरे समुद्री क्षेत्रों और जुरासिक काल की परतों में बड़े भंडार अब भी मौजूद हो सकते हैं।
बॉम्बे हाई से क्या सीखा भारत और अभी कैसे निकलता है समुद्र से तेल?
भारत पहले से समुद्र से तेल निकालता रहा है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण Bombay High है। यह क्षेत्र मुंबई तट से दूर अरब सागर में स्थित है और 1970 के दशक में यहाँ बड़े तेल भंडार मिलने के बाद भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल गई थी। आज भी भारत के समुद्री तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा बॉम्बे हाई से आता है।
समुद्र से तेल निकालने के लिए बड़े ऑफशोर प्लेटफॉर्म लगाए जाते हैं। समुद्र के नीचे ड्रिलिंग कर पाइपलाइन के जरिए तेल और गैस को सतह तक लाया जाता है। फिर इन्हें जहाजों या पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए रिफाइनरियों तक पहुँचाया जाता है। लेकिन पूर्वी तट के गहरे समुद्री हिस्से अभी पश्चिमी तट की तुलना में कम खोजे गए हैं। इसी वजह से सरकार अब आधुनिक तकनीक के जरिए इन इलाकों की विस्तृत मैपिंग कर रही है।
इस मिशन पर क्यों रहेगी दुनिया की नजर?
यह परियोजना सिर्फ तेल और गैस खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने यह दिखा दिया कि ऊर्जा के लिए विदेशों पर ज्यादा निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है। भारत फिलहाल अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है।
अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो भारत वैश्विक संकटों के असर से काफी हद तक बच सकता है। यही वजह है कि मोदी सरकार इस मिशन को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में सबसे बड़ा कदम मान रही है। बंगाल की खाड़ी और अंडमान के नीचे छिपे संभावित ऊर्जा भंडार अगर उम्मीद के मुताबिक मिले, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद पूरा कर सकेगा, बल्कि एशिया की ऊर्जा राजनीति में भी उसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।


