Sunday, July 14, 2024
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ओडिशा सरकार ने माता तारा तारिणी मंदिर का कराया जीर्णोद्धार: देश की प्राचीन शक्तिपीठों में से है एक, पुराणों में भी वर्णन

प्राचीन पुराणों के अनुसार, माँ तारा तारिणी की उत्पत्ति सीधे सतयुग में दक्ष प्रजापति के जगन से हुई है। बिमला, तारा-तारिणी, दक्षिण कालिका और कामाक्षी के प्रसिद्ध शाक्त पीठों की उत्पत्ति देवी सती की दिव्य लाश के अंगों से हुई थी।

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (Odisha CM Naveen Patnayak) ने बुधवार (18 मई 2022) को राज्य के गंजम जिले में पुनर्निर्मित माँ तारा तारिणी मंदिर परिसर का उद्घाटन किया और मंदिर में पूजा-अर्चना की। मुख्यमंत्री ने इसके निर्माण में भाग लेने वाले कारीगरों एवं कलाकारों की प्रशंसा की और माँ तारा तारिणी के मंदिर के नए रूप को ‘ओडिशा की कला, वास्तुकला और मूर्तिकला का अनूठा उदाहरण’ बताया।

मुख्यमंत्री ने राज्य में ऋषिकुल नदी के तट पर कुमारी पहाड़ियों पर स्थित सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक माँ तारा तारिणी मंदिर के सौंदर्यीकरण और विकास के लिए 100 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। इससे पहले 17 मई को मुख्य सचिव सुरेश चंद्र महापात्र, सचिव वीके पांडियन और अन्य अधिकारियों ने एक सप्ताह के उत्सव “प्रतिष्ठा महोत्सव” से पहले विकास कार्यों का जायजा लेने के लिए देश के प्राचीन शक्तिपीठों में से एक तारा तारिणी मंदिर का दौरा किया।

इस दिव्य मंदिर की अपनी यात्रा के बाद ओडिशा के सीएम पटनायक ने ट्वीट किया, “#ओडिशा सरकार के निरंतर प्रयासों और #गंजम के लोगों के अटूट समर्थन के साथ #मातारातारिणी मंदिर आधुनिक समय की उत्कृष्ट कृति बन गया है। नए मंदिर की वास्तुकला पवित्रता की भावना देता है और परंपराओं से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है।”

यहाँ यह बताना आवश्यक है कि मंदिर परिसर के डिजाइन में पारंपरिक ओडिया सौंदर्यशास्त्र, मूर्तिकला और कलात्मक परंपराओं को प्रमुखता दी गई है।

नीचे बाईं ओर हमने मंदिर के पुराने स्वरूप को साझा किया है और दाईं ओर अपने वर्तमान पुनर्निर्मित रूप में माँ तारा तारिणी मंदिर का हवाई दृश्य है।

माँ तारा तारिणी मंदिर के पहले और बाद का दृश्य

इस शक्ति पीठ को एक शानदार मंदिर के रूप में बहाल किया गया है, जो ओडिया विरासत का प्रतीक है और ओडिया भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। शक्ति पीठ की परिधि को पूरी तरह से बदल दिया गया है, जिसमें सिंहद्वार प्रवेश द्वार का नवीनीकरण के साथ-साथ तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए पेयजल की सुविधा, व्याख्या केंद्र, मुंडन हॉल, प्रसाद सेवन मंडप, सार्वजनिक शौचालय आदि का विकास शामिल हैं।

पुनर्निर्मित सिंहद्वार प्रवेश द्वार (सिंहद्वार) को प्रसिद्ध मुक्तेश्वर संरचना की तरह डिजाइन किया गया है।

साभारछ pragativadi.com

मंदिर के प्रांगण में की गई रोशनी से मंदिर का आकर्षण और बढ़ जाता है। सोशल मीडिया यूजर्स ने मंदिर परिसर के रात के दृश्य की कुछ चौंकाने वाली तस्वीरें साझा कीं। पुनर्निर्मित मंदिर में अब पारंपरिक ओडिया मूर्तियाँ हैं। इन्हें राज्य के प्राचीन मंदिरों की तरह डिजाइन किया गया है, जो मास्टर शिल्प कौशल से सजाए गए हैं।

साभार: ट्विटर
साभार: ट्विटर

ओडिशा के माँ तारा तारिणी मंदिर का इतिहास

माँ तारा तारिणी मंदिर ओडिशा के गंजम जिले में ब्रह्मपुर शहर के पास ऋषिकुल नदी के तट पर कुमारी पहाड़ियों पर 17वीं शताब्दी में स्थापित एक प्राचीन मंदिर है। यह प्रमुख शक्ति पीठों में से एक है और इसे स्थान तीर्थ (स्थान पीठ) और आदि शक्ति के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचने के लिए 999 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।

माँ तारा तारिणी को कलिंग साम्राज्य के शासकों की प्रमुख देवी कहा जाता था। इस मंदिर में माँ तारा और तारिणी की पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। माता की मूर्तियों को सोने और चाँदी के अलंकरणों के साथ-साथ कीमती पत्थरों से सजाया गया है। दो पीतल के सिर, जिन्हें उनकी चलंती प्रतिमा या जीवित छवि के रूप में जाना जाता है, रखे जाते हैं।

प्राचीन पुराणों के अनुसार, माँ तारा तारिणी की उत्पत्ति सीधे सतयुग में दक्ष प्रजापति के जगन से हुई है। बिमला, तारा-तारिणी, दक्षिण कालिका और कामाक्षी के प्रसिद्ध शाक्त पीठों की उत्पत्ति देवी सती की दिव्य लाश के अंगों से हुई थी। शिव पुराण, कालिका पुराण और देवी भागवत जैसे प्राचीन ग्रंथ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। दक्षिणी ओडिशा के अधिकांश घरों में माता तारा-तारिणी उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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