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राजस्थान के हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री का विरोध, किसान महापंचायत से उभरा नया संकट: राजनीति और पर्यावरण का टकराव

हजारों किसान ट्रैक्टरों पर सवार होकर इकट्ठा हुए, नारे लगाए और अपनी माँगें दोहराईं। इस दौरान 'फैक्ट्री बंद करो, किसान बचाओ' के नारे गूँजते रहे। अच्छी बात ये रही कि महापंचायत शांतिपूर्ण रही लेकिन हवा में तनाव की गंध साफ महसूस हो रही थी।

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में किसानों का आक्रोश सड़कों पर उतर आया है। एशिया की सबसे बड़ी एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ जिले के जंक्शन धान मंडी में बुधवार (17 दिसंबर 2025) को हुई महापंचायत ने पूरे इलाके को हिला दिया। हजारों किसान ट्रैक्टरों पर सवार होकर इकट्ठा हुए, नारे लगाए और अपनी माँगें दोहराईं। इस दौरान ‘फैक्ट्री बंद करो, किसान बचाओ’ के नारे गूंजते रहे।

अच्छी बात ये रही कि महापंचायत शांतिपूर्ण रही, लेकिन हवा में तनाव की गंध साफ महसूस हो रही थी। किसान चिल्ला रहे थे कि ये फैक्ट्री उनकी जमीन, पानी और आने वाली नस्लों को तबाह कर देगी। दूसरी तरफ प्रशासन ने इंटरनेट सेवा चौथे दिन भी बंद रखी, धारा 144 लगा दी और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया।

सवाल ये उठ रहा है कि क्या ये सिर्फ स्थानीय किसानों का दर्द है, या राजनीति और बाहरी ताकतें इसे भड़का रही हैं? खासकर पंजाब से आए किसान जत्थों ने आंदोलन को हवा दी है, जो इसे 2020-21 के बड़े किसान आंदोलन की याद दिला रहा है।

एथेनॉल फैक्ट्री है विवाद की जड़, 2023 की मंजूरी से शुरू हुई जंग

हनुमानगढ़ का टिब्बी इलाका हमेशा से हरा-भरा रहा है।किसान साल भर मेहनत करते हैं, ताकि बाजार में अच्छी कीमत मिले। लेकिन 2023 में जब तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने चंडीगढ़ की ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड को 450 करोड़ रुपये की इस बड़ी प्रोजेक्ट की मंजूरी दी, तो किसानों के चेहरे पर काली परत चढ़ गई।

कंपनी का प्लान था कि राठीखेड़ा गाँव में ये फैक्ट्री बनेगी, जो चावल के भूसे से एथेनॉल बनाएगी। कंपनी वाले कहते थे कि इससे नौकरियाँ मिलेंगी, किसानों को भूसा बेचने का अच्छा दाम मिलेगा और पर्यावरण को भी फायदा होगा – क्योंकि एथेनॉल पेट्रोल का साफ विकल्प है।

लेकिन किसानों को ये सपना झूठा लगा। हनुमानगढ़ पहले से सूखे की मार झेल रहा है। यहाँ का भूजल स्तर 100 फीट से भी नीचे चला गया है। किसान कुओं पर निर्भर हैं, लेकिन बिजली की कटौती और पानी की कमी से पहले ही परेशान हैं। फैक्ट्री को रोज 50-60 लाख लीटर पानी चाहिएगा, जो नहरों और भूजल से ही आएगा। इससे खेत सूख जाएँगे, फसलें मरेंगी। ऊपर से प्रदूषण का डर।

किसान कहते हैं कि फैक्ट्री से निकलने वाली हवा में जहर घुलेगा। मीथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी चीजें, जो साँस की बीमारियाँ और कैंसर का खतरा बढ़ाएँगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तो मंजूरी दे दी, लेकिन किसानों का आरोप है कि पर्यावरण जांच (EIA) में गड़बड़ी हुई। लोकल लोग कहते हैं, “कागजों पर सब साफ था, लेकिन जमीन पर असर देखा नहीं गया।”

विरोध की शुरुआत 10 दिसंबर को हुई। टिब्बी में एक छोटी महापंचायत बुलाई गई। वहाँ से उत्तेजित किसान फैक्ट्री साइट पर पहुँच गए। गुस्से में तोड़फोड़ हुई- मशीनें तोड़ीं, गाड़ियाँ जलाईं। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, 16 किसान घायल हो गए और 40 को गिरफ्तार कर लिया। इलाके में तनाव फैल गया।

हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसान महापंचायत, प्रशासन ने बनाई कमेटी
हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसान महापंचायत, प्रशासन ने बनाई कमेटी, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

हालाँकि किसान संघर्ष समिति ने हार नहीं मानी। 12 दिसंबर को प्रशासन से बात हुई। सहमति बनी कि एक जाँच कमेटी बनेगी, जो किसानों की आपत्तियों को देखेगी। तब तक निर्माण रुकेगा। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने इसे ‘समझौता नहीं, धोखा’ बताया। उन्होंने कहा, “हमारी माँग पूरी तरह फैक्ट्री बंद करना है, आधी-अधूरी जाँच से काम नहीं चलेगा।” इसी गुस्से ने 17 दिसंबर की बड़ी महापंचायत को जन्म दिया था।

महापंचायत का माहौल: शांति से भरा तनाव, हजारों की भीड़

17 दिसंबर का दिन हनुमानगढ़ के लिए यादगार बन गया। जंक्शन धान मंडी में दोपहर 12 बजे महापंचायत शुरू हुई। सुबह से ही ट्रैक्टरों की कतारें लग गईं, लेकिन प्रशासन ने ट्रैक्टर लाने पर रोक लगाकर सख्ती बरती।

माहौल तनावपूर्ण था। इंटरनेट चौथे दिन भी बंद था, ताकि अफवाहें न फैलें। धारा 144 लागू थी, ड्रोन आसमान में घूम रहे थे। पुलिस की फौज तैनात थी, जिला कलेक्टर खुशाल यादव खुद मौजूद थे। लेकिन किसान शांत रहे। कोई हिंसा नहीं हुई।

पूर्व विधायक बलवान पूनिया (कम्युनिस्ट पार्टी) ने मंच से कहा, “सरकार ने एमओयू साइन किया, लेकिन किसानों से पूछा नहीं। हम एमओयू रद्द होने तक पीछे नहीं हटेंगे।” पंजाब से आए एक जत्थे के नेता ने चेतावनी दी, “अगर फैक्ट्री बनी तो पूरे पंजाब के किसान सड़कों पर उतरेंगे। ये राजस्थान का मुद्दा नहीं, देश का है।” लेकिन स्थानीय किसान कहते हैं, “ये बाहरी लोग आग भड़का रहे हैं। हम तो बस अपनी जमीन बचाना चाहते हैं।”

किसानों ने रखी 3 मुख्य माँग

महापंचायत के दौरान प्रशासन के अधिकारी भी वहाँ थे। बातचीत हुई। किसानों ने तीन मुख्य माँगें रखीं – फैक्ट्री का एमओयू रद्द हो, आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएँ और जाँच कमेटी निष्पक्ष बने। प्रशासन ने वादा किया कि राज्य सरकार को पत्र लिखा जाएगा। हालाँकि किसानों ने 20 दिन का समय दिया है और कहा है कि 7 जनवरी को संगरिया में अगली महापंचायत की जाएगी। अगर मांगें पूरी न हुईं, तो आंदोलन और तेज होगा। एक किसान ने बताया, “हम शांतिपूर्ण लड़ेंगे, लेकिन हारेंगे नहीं। सरकार को पता चलना चाहिए कि किसान जिंदा है।”

कॉन्ग्रेस का राजनीतिक खेल दिखा साफ

इस आंदोलन में राजनीति का रंग साफ झलक रहा है। 2023 में जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, तो इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी गई। अब विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस वाले ही सबसे जोर-शोर से विरोध कर रहे हैं। संगरिया के विधायक अभिमन्यु पूनिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “भाजपा सरकार कॉरपोरेट्स के गुलाम बनी हुई है। किसानों पर लाठियाँ चलाना उनकी पुरानी आदत है।”

FIR में भी कॉन्ग्रेस के सांसदों और विधायकों के नाम हैं। बलवान पूनिया ने 10 दिसंबर की तोड़फोड़ को ‘सरकारी साजिश’ बता दिया। विपक्ष का कहना है कि भाजपा बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुँचा रही है, जबकि किसान मर रहे हैं।

बाहरी जत्थे भड़का रहे आंदोलन, 2020 की यादें ताजा

आंदोलन को सबसे ज्यादा हवा पंजाब से आ रही है। पंजाब के किसान जत्थे भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त मोर्चा के लोग बड़े जत्थों में पहुँचे। उन्होंने मंच से चेतावनी दी, “अगर राजस्थान में किसान हार गए, तो पंजाब में भी आग लग जाएगी।” एक पंजाबी किसान नेता ने कहा, “हमारी सीमाएँ जुड़ी हैं, दर्द एक है। फैक्ट्री बंद करो, वरना सीमा पार आंदोलन होगा।”

लेकिन स्थानीय लोग शक में हैं। एक बुजुर्ग ने बताया, “ये पंजाब वाले प्रोफेशनल प्रोटेस्टर्स लगते हैं। 2020-21 के दिल्ली आंदोलन में भी ऐसे ही आए थे। वे आग भड़काते हैं, फिर चले जाते हैं। हमारा नुकसान होता है।”

किसान एकता के नाम पर हनुमानगढ़ में अस्थिरता फैलाने की कोशिश

पंजाब से आने वाले जत्थों ने महापंचायत को रंग दे दिया। वे पुराने नारे दोहरा रहे थे – ‘किसान एकता जिंदाबाद’। राकेश टिकैत जैसे नेता पहुँचे, जिन्होंने कहा, “ये हनुमानगढ़ का मुद्दा नहीं, पूरे देश का किसान संघर्ष है।” लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये बाहरी हस्तक्षेप आंदोलन को राष्ट्रीय बनाने की कोशिश है। पंजाब में पहले से किसान आंदोलन की यादें ताजा हैं। अब हनुमानगढ़ को उसी तरह भड़काने की साजिश लग रही है।

एक स्थानीय नेता ने कहा, “पंजाब वाले अपनी राजनीति चला रहे हैं। हमारी समस्या सुलझाओ, बिना बाहरी आग लगाए।” ये हस्तक्षेप आंदोलन को लंबा खींच सकता है, जिससे जिले की फसलें और बाजार प्रभावित होंगे।

प्रशासन ने बनाई कमेटी, फिलहाल थमा है बवाल

प्रशासन ने महापंचायत से पहले ही कमर कस ली थी। हालाँकि पर्यावरण विभाग ने पाँच सदस्यीय कमेटी बना दी है। इसके अध्यक्ष संभागीय आयुक्त होंगे और जिला कलेक्टर-विशेषज्ञ सदस्य होंगे। ये कमेटी भूजल, प्रदूषण और पानी की जाँच करेगी। रिपोर्ट आने तक काम रुका रहेगा।

हालाँकि एक किसान नेता ने कहा, “कमेटी ठीक है, लेकिन एमओयू रद्द न हुआ तो हम रुकेंगे नहीं। 20 दिन बाद फैसला लेंगे।” फिलहाल 7 जनवरी को संगरिया में अगली महापंचायत की प्लानिंग हो रही है। अगर माँगें पूरी न हुईं, तो आंदोलन तेज होगा। प्रशासन की ये सख्ती किसानों को चुप तो कर सकती है, लेकिन गुस्सा दबा नहीं सकती।

कुल मिलाकर हनुमानगढ़ का ये आंदोलन विकास और किसान के बीच जंग है। सरकार को चाहिए कि किसानों की आवाज सुने। उनकी समस्याओं का हल निकाला जाए। फैक्ट्री को लेकर किसानों की चिंता को दूर किया जाए। बहरहाल, अब सबकी निगाहें कमेटी की रिपोर्ट पर है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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