भारत में आवारा कुत्तों की समस्या लागातार बढ़ रही है। हर साल लाखों लोगों को कुत्तों के काटने की घटना झेलनी पड़ती है। ये सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ सुरक्षा के लिहाज से भी एक गंभीर संकट है।
ऑपइंडिया ने देशभर में कुत्तों के काटने से जुड़े आँकड़ों के लिए एक RTI डाली थी। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने जानकारी दी है कि केवल वर्ष 2025 में ही अब तक 26 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने अपने जवाब में बताया कि 31 जुलाई 2025 तक भारत में कुल 26,71,732 कुत्ते काटने के मामले सामने आए हैं।

ऑपइंडिया ने आरटीआई के जरिए 2001 से लेकर 31 जुलाई 2025 तक राज्यवार आँकड़ों की जानकारी जुटाई। 2001 में ही एबीसी (Animal Birth Control) नियम लागू हुए थे।
हालांकि, केंद्र सरकार के राज्यवार केंद्रीकृत आँकड़ों का संकलन 2012 से शुरू हुआ। ये भी एक समस्या ही है क्योंकि भारत में रेबीज के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं। फिर भी 2001 से 2012 तक कोई केंद्रीकृत राज्यवार डेटा उपलब्ध नहीं है और ये तब है जब एबीसी नियम पहले ही लागू हो चुके थे।
आवारा कुत्तों का लगातार बढ़ता संकट
ऑपइंडिया को 2012 से 31 जुलाई 2025 तक के आँकड़े मिले। हालाँकि आरटीआई में कई अन्य सवाल भी शामिल थे, लेकिन अधिकांश का जवाब नहीं दिया गया क्योंकि वे अन्य विभागों के अधिकार क्षेत्र में आते थे।
इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन पहलुओं पर हमने ध्यान केंद्रित किया गया है। वह हैं- प्रतिवर्ष दर्ज किए गए कुत्ते काटने के मामले, राज्यवार कुत्ते काटने का भार और भारत सरकार की ओर से रेबीज से होने वाली मौतों का आधिकारिक डेटा।

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़े इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम- इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IDSP-IHIP) से मिले हैं। इन आँकड़ों में सबसे सोचने वाली बात ये है कि वर्ष 2025 का महीने का औसत 2024 के मासिक औसत से अधिक है। ये दिखाता है कि देश में आवारा कुत्तों की समस्या और भी गंभीर होती जा रही है।
आँकड़ों के अनुसार, 31 जुलाई 2025 तक हर महीने औसतन 3,81,676 कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए गए। यह संख्या 2024 के मासिक औसत 3,09,778 की तुलना में काफी अधिक है। इसका मतलब है कि भारत में 2025 में पिछले वर्ष की तुलना में हर महीने लगभग 80,000 अधिक मामले सामने आ रहे हैं।
ऑपइंडिया की RTI उस जाँच का हिस्सा है जो देशभर में आवारा कुत्तों की परेशानी को सामने ला रही है। इस जाँच ने न केवल समस्या को गंभीरता से सामने रखा है, बल्कि नसबंदी और रेबीज नियंत्रण कार्यक्रमों की विफलता को भी उजागर किया है। जहाँ एक ओर समाजसेवी और एनजीओ इस संकट को जबरन ‘बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया’ मानते हैं, वहीं सरकार के अपने आँकड़े दूसरी सच्चाई ही बता रहे हैं।
RTI क्या कहती है?
RTI के जवाब में सरकार ने वर्ष 2012 से लेकर जुलाई 2025 तक हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के कुत्ते काटने के मामलों के वर्षवार आँकड़े उपलब्ध कराए हैं। 2012 से 2021 तक का डेटा IDSP पोर्टल के में ‘P फॉर्म’ ते तहत दर्ज किया गया था।
हालाँकि, इस रिपोर्टिंग फॉर्मेट में एक बड़ी परेशानी ये ती कि उस समय के रेबीज से मौतों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया। इसका मतलब है कि लगभग एक दशक तक भारत सरकार ने देशभर में रेबीज से होने वाली मौतों का डेटा ही दर्ज नहीं किया।
दिलचस्प बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का दावा है कि भारत में हर साल लगभग 20,000 रेबीज मौतें होती हैं, जो भारत सरकार के कुछ दशक पहले संसद में दिए गए उत्तर पर आधारित है।
हालिया अध्ययनों के अनुसार, भारत में रेबीज के मामलों का आँकड़े 5,000 से अधिक हो सकते हैं। लेकिन, सरकार के आँकड़े 2022 से हर साल 100 से कम मौतें दिखाते हैं।
वर्ष 2022 से सरकार ने IDSP-IHIP पोर्टल पर डेटा दर्ज करना शुरू किया।यहाँ पर जानकारी ‘प्रीजेंप्टिव फॉर्म’ पर दर्ज की जाती है। आसान तौर पर कहा जाए तो ये आँकड़े फील्ड स्तर पर तत्काल निगरानी के आधार पर अस्थायी तौर पर लिए गए हैं। ये बाद में संशोधित हो सकते हैं।
फिर भी, ये आँकड़े पहले से ही लाखों मामलों की पुष्टि करते हैं, जो इस परेशानी की थाह बताते हैं। इसके अलावा 2012 से 2019 के बीच राष्ट्रीय आँकड़ों में भी लगातार बढ़ोतरी देखी गई। 2012 में कुल 42,51,977 मामले दर्ज हुए थे, जो 2019 में बढ़कर 72,69,410 हो गए।

इसके बाद 2020 में कोविड महामारी के कारण कुत्ते काटने के मामलों में काफी गिरावट दर्ज की गई। उस वर्ष यह संख्या घटकर 47,58,041 रह गई।
इसके बाद यह गिरावट जारी रही और 2022 में देशभर में केवल 21,90,056 मामले दर्ज हुए।

हालाँकि उस वर्ष के बाद आंकड़ों में तेज उछाल देखा गया। वर्ष 2023 में कुत्ते काटने के 30,52,324 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 37,17,336 हो गई।
सिर्फ जुलाई 2025 तक ही भारत में 26 लाख से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं। यदि यही प्रवृत्ति बनी रही, तो वर्ष 2025 के अंत तक देश में 45 लाख से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज हो सकते हैं।

आँकड़ों में कुछ खास बातें भी शामिल रहीं। ये भारत में पशु नियंत्रण नीतियों की विविधता को बताती हैं। उदाहरण के तौर पर, लक्षद्वीप ने लगातार ‘जीरो’ कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए हैं। यह कोई आँकड़ों का संयोग नहीं है, बल्कि स्पष्ट नीति का परिणाम है। इस द्वीप क्षेत्र में कुत्तों को रखने की अनुमति ही नहीं है। यहाँ तक कि पर्यटकों को भी अपने पालतू कुत्तों को साथ लाने की अनुमति नहीं दी जाती।
वहीं, इसके उलट, भारत के अन्य राज्यों और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में हर साल लाखों की संख्या में कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए जाते हैं। यह अंतर बताता है कि जहाँ कुछ क्षेत्रों में सख्त और स्पष्ट रोकथाम नीतियाँ अपनाई गई हैं, वहीं अधिकांश हिस्सों में अस्थायी और अप्रभावी उपायों से ही काम चलाया जा रहा है।
वर्ष वार बढ़ता राष्ट्रीय ट्रेंड
ये आँकड़े एक बेहद चिंताजनक राष्ट्रीय रुझान की ओर ध्यान दिलाते हैं। वर्ष 2012 में भारत में 42.5 लाख से अधिक कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए थे। इसके बाद यह संख्या हर साल लगातार बढ़ती गई और 2018 में यह आँकड़ा 75 लाख को पार कर गया। ये अब तक के पूरे डेटा सेट में सबसे अधिक है।
इस बढ़ोतरी ने नसबंदी अभियानों की असफलता के साथ शहरी और ग्रामीण भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को बताता है।

इसके बाद आया कोविड काल, जिसमें कुत्तों के काटने के मामलों में काफी गिरावट दर्ज की। लेकिन, यह गिरावट ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। वर्ष 2023 में देश में फिर से 30 लाख से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए गए।
वर्ष 2020, 2021 और 2022 के आँकड़ों को लेकर कई सवाल हैं। 2020 में अधिकांश महीनों तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू था, फिर भी 47 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए। इसके बाद के दो वर्षों में, जब लॉकडाउन समाप्त हो चुका था तब कुत्ते काटने के मामलों में गिरावट जारी रही। ये बताता है कि जब देश कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा था तब कुत्तों के काटे जाने के मामलों की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं की गई।
रेबीज से मौतों के मामले केवल 2022 (21 मौतें), 2023 (50), 2024 (52) और 2025 (31 जुलाई तक 23) के लिए उपलब्ध हैं।
महामारी के बाद की गिरावट से कुत्तों के काटने की दर कम नहीं हुई
कुछ कुत्ता-प्रेमी यह तर्क दे सकते हैं कि 2020 से 2022 के बीच आवारा कुत्तों की समस्या पर नियंत्रण पा लिया गया। लेकिन वास्तविकता इसे उलट है। ये वह समय था जब कोविड-19 के कारण देश ठप पड़ा था। लोग घरों में बंद थे और लॉकडाउन हटने के बाद भी संक्रमण के डर से बाहर नहीं निकल रहे थे। इशके कारण कुत्तों और इंसानों के बीच संपर्क कम रहा।
इसके साथ ही, अस्पताल कोविड मामलों से जूझ रहे थे और लोग कुत्ते काटने के बाद इलाज के लिए अस्पताल जाने से भी डर रहे थे। इस कारण रिपोर्टिंग भी कम हुई। इसे गिरावट नहीं कहा जा सकता। इन सब के अलावा, सरकारी तंत्र पूरी तरह महामारी से निपटने की कोशिशों में लगा था। इसके कारण डेटा और मॉनिटरिंग भी प्रभावित हुई।
स्वास्थ्य कर्मियों, निगरानी अधिकारियों और नगर निगम प्रशासन के पास कुत्ते काटने की घटनाओं को दर्ज करने या प्रमाणित करने की सीमित क्षमता थी। इसलिए उन वर्षों में जो गिरावट दर्ज हुई, उसे नसबंदी या प्रशासन की सफलता नहीं कहा जा सकता। यह आँकड़ों का ही हेरफेर था जो विशेष परिस्थितियों में दर्ज हुआ।
2022 के बाद के आँकड़ों में ये बात साफ तौर पर सामने आ गई कि परेशानी हल नहीं हुई है। वह केवल कोविड महामारी के चलते कुछ समय के लिए छिप गया था।
राज्यवार स्थिति
राज्य स्तर पर आँकड़ों को गहराई से देखा जाए तो पता चलता है कि यह समस्या पूरे देश में कितनी अंदर तक अपनी जड़ें जमा चुकी है। इस सूची में उत्तर प्रदेश लगातार पहले नंबर पर रहा है।
यूपी के वार्षिक आँकड़ों को देखा जाए तो महामारी से पहले के वर्षों में 10 लाख से अधिक मामले सामने आते थे। कभी-कभी ये मामले 20 लाख से भी अधिक की संख्या में दर्ज होते थे।कोविड के बाद के वर्षों में यह संख्या घटकर हर साल 5 लाख से कम रही है।

बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश उन राज्यों में शामिल हैं जहाँ हर साल कुत्ते काटने के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं। इन राज्यों में हर वर्ष लाखों की संख्या में मामले सामने आते हैं।
महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे राज्यों के आँकड़े अपेक्षाकृत कम हैं। लेकिन फिर भी हर साल आँकड़े 6 अंकों में दर्ज होते हैं। यह बताता है कि भारत का कोई भी हिस्सा इस परेशानी से अछूता नहीं है।
2024 में सबसे अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज करने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश से 1,42,953, उत्तर प्रदेश से 1,64,009, असम से 1,66,232, ओडिशा से 1,66,790, आंध्र प्रदेश से 2,45,166, बिहार से 2,63,925, कर्नाटक से 3,61,306, गुजरात से 3,92,652, तमिलनाडु से 4,80,425 और महाराष्ट्र से 4,85,349 मामले मिले हैं।

यह संकट केवल बड़े राज्यों तक ही सीमित नहीं है। छोटे राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में भी आवारा कुत्तों की समस्या काफी विकट है। उदाहरण के लिए, असम ने वर्ष 2024 में 1,66,000 से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए। वहीं केरल में पिछले एक दशक में हर साल 1,00,000 से अधिक मामले सामने आए हैं। ये बताता है कि यह समस्या किसी क्षेत्र विशेष की सीमाओं से ऊपर है।
इन आँकड़ों के लिहाज से भारत में लक्षद्वीप एकमात्र अपवाद है, जहाँ एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। वहीं, दूसरी ओर देश के अन्य हिस्सों में लाखों मामले हैं। यह बताता है कि सुनियोजित और निर्णायक प्रशासनिक उपाय सार्वजनिक स्वास्थ्य के परिणामों को पूरी तरह बदल सकते हैं।
ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। खबर को इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।


