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सुप्रीम कोर्ट में भी ‘जाति जनगणना’ पर बिहार सरकार को झटका, कहा- अभी सर्वे पर लगी रोक नहीं हटाई जाएगी

पटना हाईकोर्ट ने 4 मई 2023 को राज्य सरकार द्वारा की जाने वाली जातिगत जनगणना पर 3 जुलाई 2023 तक रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने कहा कि जातिगत आँकड़े इकट्ठा करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। पीठ ने कहा था कि सर्वेक्षण वास्तव में एक जनगणना है, जिसे केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार (18 मई 2023) को बिहार सरकार द्वारा की जा रही जाति जनगणना पर पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) द्वारा लगाई गई रोक को हटाने से इनकार कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पटना उच्च न्यायालय ने केस की अंतिम सुनवाई के लिए 3 जुलाई 2023 को सूचीबद्ध किया है।

न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की खंडपीठ ने कहा कि पटना हाईकोर्ट 3 जुलाई को इस पर सुनवाई करने वाली है। यदि किसी कारण से उच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिका पर सुनवाई नहीं की जाती है तो सुप्रीम कोर्ट 14 जुलाई 2023 को दलीलों पर विचार करेगी।

जस्टिस ओका ने कहा, “हम इस स्तर पर हस्तक्षेप क्यों करें? उच्च न्यायालय 3 जुलाई को इस पर विचार करेगा… उच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्ट्या निष्कर्ष दर्ज किया है। हम यह नहीं कह रहे हैं कि हम निष्कर्षों की पुष्टि करेंगे या हम हस्तक्षेप करेंगे। हम केवल इतना कह रहे हैं कि आज इस पर विचार मुश्किल है। हम यह नहीं कह रहे हैं कि हम इसे नहीं सुनेंगे।”

सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार ने अपील में कहा कि उच्च न्यायालय ने अंतरिम स्तर पर मामले की योग्यता की गलत जाँच की और राज्य की विधायी क्षमता को छुआ है। इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को भी गलत तरीके से स्वीकार कर लिया कि सर्वेक्षण एक जनगणना है और लोगों की व्यक्तिगत जानकारी विधायकों के साथ साझा की जाएगी।

बिहार सरकार ने तर्क दिया कि अगर इस स्तर पर सर्वेक्षण बंद किया जाता है तो राज्य को भारी वित्तीय लागत को सहन करना पड़ेगा। बिहार सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कोर्ट से जनगणना और सर्वेक्षण के बीच अंतर करने की भी माँग की। उन्होंने कहा कि वर्तमान अभ्यास जनगणना नहीं, बल्कि केवल एक स्वैच्छिक सर्वेक्षण है।

जाति सर्वेक्षण को लेकर अधिवक्ता ने कहा कि जहाँ तक डेटा और उनकी गोपनीयता का सवाल है तो यह डेटा सिर्फ बिहार सरकार के सर्वर में इकट्ठा किया जाएगा, किसी अन्य क्लाउड पर नहीं। यह फुलप्रूफ सिस्टम है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोर्ट कोई सुझाव देता है तो वह उस पर विचार करने के लिए तैयार हैं।

दरअसल, यह मामला बुधवार (17 मई 2023) को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संजय करोल की बेंच के समक्ष आया था, लेकिन जस्टिस करोल से इस केस से खुद को अलग कर लिया। जस्टिस करोल ने कहा कि उन्होंने इस मामले को उच्च न्यायालय में निपटाया था। बता दें कि जस्टिस करोल 6 फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने से पहले पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे।

बता दें कि इस साल जनवरी में न्यायमूर्ति गवई के नेतृत्व वाली शीर्ष अदालत की एक पीठ ने जातिगत जनगणना शुरू करने के राज्य के फैसले को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाओं (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने याचिकाकर्ताओं को पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता दी थी।

इसके बाद यह मामला पटना उच्च न्यायालय में गया। पटना उच्च न्यायालय ने इस पर तुरंत निर्णय लेने से इनकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता फिर से सुप्रीम कोर्ट गए। तब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से अंतरिम राहत आवेदन को शीघ्रता से निपटाने के लिए कहा था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के 6 दिन बाद पटना हाईकोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुना दिया।

पटना हाईकोर्ट ने 4 मई 2023 को राज्य सरकार द्वारा की जाने वाली जातिगत जनगणना पर 3 जुलाई 2023 तक रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने कहा कि जातिगत आँकड़े इकट्ठा करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। अपने आदेश में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद की पीठ ने कहा कि सर्वेक्षण वास्तव में एक जनगणना है, जिसे केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है।

पटना हाईकोर्ट ने बाद में यह भी स्पष्ट किया कि जातिगत सर्वेक्षण पर रोक केवल जनगणना को लेकर नहीं, बल्कि डेटा संग्रह के साथ-साथ इसे राजनीतिक दलों के साथ साझा करने को लेकर भी है। बता दें कि बिहार की नीतीश कुमार की सरकार ने जातिगत सर्वे का काम 7 जनवरी 2023 को शुरू किया था, जिसको लेकर बिहार में राजनीतिक बवाल हो गया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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