Homeदेश-समाजअब मुस्लिम महिलाएँ तलाक के बाद शौहर से ले सकेंगी गुजारा भत्ता, सुप्रीम कोर्ट...

अब मुस्लिम महिलाएँ तलाक के बाद शौहर से ले सकेंगी गुजारा भत्ता, सुप्रीम कोर्ट ने खींची नई लकीर: शाहबानो का हक छीन राजीव गाँधी लाए थे जो ‘तुष्टिकरण’ उस पर लगा फुलस्टॉप

हालाँकि, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 द्वारा सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को निरस्त कर दिया गया और 2001 में कानून की वैधता बरकरार रखी गई थी। इस अधिनियम के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की माँग नहीं कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (10 जुलाई 2024) को एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा दायर कर सकती है। इसको लेकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 धर्मनिरपेक्ष कानून पर हावी नहीं होगा।

शीर्ष न्यायालय की न्यायामूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मुस्लिम महिला के अधिकार को बरकरार रखा। इसको लेकर पीठ ने अलग-अलग, लेकिन सहमति वाले फैसले सुनाए। दरअसल, एक मुस्लिम व्यक्ति ने तेलंगाना हाई कोर्ट के उस निर्देश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पूर्व पत्नी को 10,000 रुपए का अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने फैसला सुनाते हुए कहा, “सीआरपीसी की धारा 125 सभी महिलाओं पर लागू होगी, न कि केवल विवाहित महिलाओं पर।” पीठ ने कहा कि यदि धारा 125 के तहत आवेदन लंबित रहने के दौरान संबंधित मुस्लिम महिला तलाक ले लेती है तो वह मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 का सहारा ले सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम सीआरपीसी की धारा 125 के तहत किए गए उपायों के अतिरिक्त उपाय भी प्रदान करता है। बताते चलें कि सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मामले में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है, जो मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है।

हालाँकि, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 द्वारा सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को निरस्त कर दिया गया और 2001 में कानून की वैधता बरकरार रखी गई थी। इस अधिनियम के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की माँग नहीं कर सकती है।

सीआरपीसी की धारा 125 के अनुसार, एक व्यक्ति जिसके पास पर्याप्त साधन हैं वह अपनी पत्नी, बच्चों (वैध या नाजायज) और पिता या माता का भरण-पोषण करने के लिए उत्तरदायी है। इस धारा के अनुसार, ‘पत्नी’ में वह महिला शामिल है, जिसका अपने पति से तलाक हो चुका है और उसने दोबारा विवाह नहीं किया है।

यह मामला तेलंगाना के हैदराबाद के मुस्लिम परिवार का है। मार्च 2019 में एक मुस्लिम महिला ने हैदराबाद की एक पारिवारिक अदालत में एक याचिका दी कि उसका पति अब्दुल समद ने उसे तीन तलाक दिया है। इसलिए उसने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत 50,000 रुपए मासिक भरण-पोषण की माँग की। इसके बाद कोर्ट ने जून 2023 में 20,000 रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।

अब्दुल समद ने पारिवारिक अदालत के आदेश को तेलंगाना हाई कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि उसने साल 2017 में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तलाक लिया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसने अपनी पूर्व पत्नी को ‘इद्दत’ अवधि के दौरान भरण-पोषण के रूप में पहले ही 15,000 रुपए का भुगतान कर दिया है।

इसके बाद हाई कोर्ट ने दिसंबर 2023 में उच्च न्यायालय ने भरण-पोषण की राशि को संशोधित कर 10,000 प्रतिमाह कर दिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय को छह महीने के भीतर इस मामले का निपटारा करने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले से अब्दुल समद संतुष्ट नहीं हुआ। उसने सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता मोहम्मद अब्दुल समद के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बताया कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 के अनुसार, तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत लाभ का दावा करने की हकदार नहीं है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतों से भटकी समाजवादी पार्टी, ‘PDA’ के नाम पर सिर्फ ‘MY’ समीकरण को तरजीह: समझिए कैसे दलितों की अनदेखी कर...

सामाजिक न्याय का दावा करने वाली सपा आज भी अपने पुराने ढर्रे पर चल रही है, जिससे उसका 'PDA' का रैपर महज एक चुनावी चुनावी हथकंडा नजर आता है।

असल बात को छुपाओ, शब्दों का हेर-फेर कर प्रोपेगेंडा फैलाओ: UP को बदनाम करने के लिए ये है NewsLaundry की ट्रिक, जानिए कैसे प्रस्तावित...

हर राज्य में सभी MoU हकीकत में नहीं बदलते। कुछ परियोजनाएँ सफल होती हैं और कुछ निरस्त होती हैं। इससे पूरे निवेश मॉडल को ही फर्जी कह देना गलत है।
- विज्ञापन -