Monday, January 18, 2021
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जब छपरा जेल के 1300 कैदियों ने कर लिया था कारागार पर कब्जा: कहानी लालू-राबड़ी युग के ‘जंगलराज’ की

कुंदन कृष्णन को छपरा की कमान तब दी गई थी, जब वहाँ अपराध चरम पर था और वो ज़माना ऐसा था, जब जेल को ही अपराधी 'सेफ हैवेन' मानते थे और भीतर बैठ कर बड़े-बड़े आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते थे। दिक्कत ये थी कि जेल का फाटक भीतर से बंद था और चाभी कैदियों के पास थी। राजनेताओं के दाँव भी फेल हो गए थे, ऐसे में बलप्रयोग ही अब आखिरी रास्ता बचा हुआ था।

बिहार में लालू-राबड़ी युग के जंगलराज की एक से बढ़ कर एक कहानियाँ हैं। इनमें से एक है छपरा जेल काण्ड। जी हाँ, जेल में रहने वाले कैदियों ने ही जेल पर कब्जा कर लिया था। तब छपरा के एसपी रहे कुंदन कृष्णन आज बिहार के एडीजी हैं। 2002 में हुए छपरा जेल काण्ड के बारे में हम विस्तृत रूप से आगे बात करेंगे लेकिन उससे पहले हमें इस स्थान और यहाँ अपराधियों के बर्चस्व की कहानी को समझना पड़ेगा।

घाघरा और गंगा नदी के मुहाने पर बसा छपरा शहर बिहार के सारण जिले का मुख्यालय है। आज भले ही छपरा विकास के रास्ते पर अग्रसर हो और यहाँ बिहार का पहला डबल-डेकर फ्लाईओवर बन रहा हो लेकिन 2005 से पहले ऐसा नहीं था। ये भोजपुरी सम्राट भिखारी ठाकुर और संगीतकार चित्रगुप्त (जिनके बेटे आनंद-मिलिंद हैं) के बेटे की भूमि है, जिसने बिहार को उसका 10वाँ मुख्यमंत्री दिया – दरोगा प्रसाद राय।

छपरा: राजनीतिक रूप से बहुचर्चित क्षेत्र की कहानी

छपरा के राजनीतिक महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव ने अपना पहला लोकसभा चुनाव इसी सीट से लड़ा था। 1977 में वो यहाँ से जीत कर सांसद बने और इस कारनामे को 1989 और 2004 में दोहराया। 2009 में लालू यादव फिर से यहाँ से जीते (सारण लोक सभा) और संसद पहुँचे। लेकिन, यही वो क्षेत्र है जहाँ से 2014 में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को हार मिली।

छपरा के दरोगा प्रसाद राय बिहार के मुख्यमंत्री बने और उनकी पोती ऐश्वर्या राय की शादी लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप से हुई। हालाँकि, ये रिश्ता नहीं चल पाया और दोनों अलग-अलग हो गए। अब स्थिति ये है कि इसी जिले की किसी विधानसभा सीट से तेज प्रताप भी चुनाव लड़ने वाले हैं और ऐश्वर्या के भी यहीं से लड़ने की ख़बरें उड़ रही हैं। उनके पिता चन्द्रिका राय जदयू में शामिल हो चुके हैं।

जहाँ तक छपरा मंडल कारा की बात है, यहाँ आए दिन होने वाली पुलिस की छापेमारी में कैदियों के पास से कई ऐसी चीजें बरामद होती रहती हैं, जिन्हें जेल में रखने की अनुमति नहीं है। इस जेल में बंदियों द्वारा मोबाइल फोन का प्रयोग करने की सूचनाएँ अक्सर मिलती रहती हैं, ऐसा प्रशासनिक अधिकारी भी मानते हैं। खुद डीएम-एसपी कई बार कमान संभालते हैं और यहाँ तालशी अभियान चलाते हैं।

हाल ही में एक कैदी ने छपरा जेल में भी धूमधाम से अपने जन्मदिन की पार्टी मनाई थी, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी वायरल हुईं। जेल में न सिर्फ जन्मदिन की पार्टी मनाया गया बल्कि पूरी पार्टी का वीडियो इंस्टाग्राम पर भी अपलोड कर दिया गया। मामला सामने आने के बाद एसपी ने जाँच कमिटी बना कर इतिश्री कर ली। इसी से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इस इलाक़े में जब कैदी ऐसे हैं तो अपराधी कितने बेख़ौफ़ होंगे।

छपरा मंडल कारा: जब जेल पर 4 दिनों तक रहा था कैदियों का कब्जा

2002 में छपरा जेल में रहने वाले कैदियों ने ही जेल पर कब्जा कर लिया, जिसकी सुनवाई अब तक चली आ रही है। 2017 के जून में ट्रायल कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पूरी की गई थी। कैदियों ने न सिर्फ पुलिस पर पत्थरबाजी की थी बल्कि जम कर फायरिंग भी की थी। अभियोजन पक्ष की ओर से 50 के क़रीब गवाहों की गवाही हुई। ये घटना 2002 के होली की है, जब कैदी स्थानांतरण और जेल में मुलाकात के नियमों को लेकर आक्रोशित थे।

और जब पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई कर के जेल को कैदियों के चंगुल से छुड़ाया तो इस प्रकरण में 5 कैदी मारे गए। मार्च 30, 2002 को इस जेल को कैदियों के कब्जे से आज़ाद कराया गया। पटना से लगभग 75 किलोमीटर दूर स्थित छपरा में हुए इस जेल कांड की चर्चा तब पूरे देश में हुई थी। जेल को आज़ाद कराने के लिए पुलिस और सीआरपीएफ का सहारा लिया गया। कुल 1200 ऐसे कैदी थे, जिन्होंने जेल पर कब्जा जमा रखा था।

दरअसल, ये सब शुरू हुआ था राबड़ी देवी की सरकार के उस निर्णय से, जिसके हिसाब से छपरा जेल से 5 हार्डकोर अपराधियों को कहीं और स्थानांतरित किया जाना था। इनमें वकील राय, संजय राय और अशोक उपाध्याय नामक कैदियों के भी नाम थे। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में ये तीनों ही कैदी मारे गए। इन दोनों के अलावा शशि सिंह और संजय साह नामक दो अन्य कैदी भी मारे गए। सारण के एसपी कुंदन कृष्णन ने इस ऑपरेशन का नेतृत्व किया था।

कैदी इतने आक्रामक थे कि उन्होंने ईंट-पत्थर चलाना शुरू कर दिया था और इसमें एसपी कृष्णन का हाथ भी फ्रैक्चर हो गया था। ये सब कुछ तब शुरू हुआ, जब अधिकारियों की टीम कैदियों के स्थानांतरण के लिए उन्हें लेने पहुँची। इनमें से तीन कैदियों को बक्सर जेल में ले जाया जाना था और दो कैदियों को भागलपुर जेल में स्थानांतरित करना था। जैसे ही टीम वहाँ पहुँची, कैदियों ने उनका विरोध करना शुरू कर दिया।’

असल में कैदियों को डर था कि स्थानांतरण के समय फेक एनकाउंटर के बहाने उन्हें मार डाला जा सकता है। बिहार में उस वक़्त इस तरह की चीजें आम बात थीं। आक्रोशित कैदियों ने अधिकारियों को बाहर निकाल कर भगा दिया और जेल को भीतर से बंद कर लिया। एक तरह से उन्होंने जेल को ही ‘हाईजैक’ कर लिया था। इसके अगले ही दिन कैदियों ने जेल की छत पर चढ़ कर नारेबाजी शुरू कर दी।

उनकी माँग थी कि या तो बिहार की मुख्यमंत्री उनसे मिलने आए या फिर आईजी (प्रिजन्स) उनसे मुलाकात करें क्योंकि उन्हें जिला स्तर के अधिकारियों पर जरा भी भरोसा नहीं है। इसके बाद उन्होंने जेल के बाहर कैम्प कर रहे पुलिसकर्मियों पर ईंट-पत्थर बरसाए। महराजगंज के सांसद प्रभुनाथ सिंह ने वहाँ पहुँच कर कैदियों से बातचीत का प्रयास किया लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ।

अगले ही दिन कुछ कैदियों के रिश्तेदार खाने-पीने की चीजें लेकर जेल में मिलने पहुँचे लेकिन पुलिस ने उनलोगों को अंदर नहीं जाने दिया। इसके बाद कैदी फिर से उखड़ गए और पत्थरबाजी शुरू कर दी। इसके बाद सीआरपीएफ और बीएमपी के जवानों ने बिहार पुलिस के साथ मिल कर सीढियाँ लगा कर छत पर चढ़ना शुरू किया। 30 मार्च के दिन ही दोपहर 2:30 बजे जेल को कब्जे से छुड़ाने की कार्रवाई शुरू की गई।

मार्च 30, 2002: जब छपरा जेल को कब्जे से छुड़ाया गया

कुंदन कृष्णन को छपरा की कमान तब दी गई थी, जब वहाँ अपराध चरम पर था और वो ज़माना ऐसा था, जब जेल को ही अपराधी ‘सेफ हैवेन’ मानते थे और भीतर बैठ कर बड़े-बड़े आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते थे। दिक्कत ये थी कि जेल का फाटक भीतर से बंद था और चाभी कैदियों के पास थी। राजनेताओं के दाँव भी फेल हो गए थे, ऐसे में बलप्रयोग ही अब आखिरी रास्ता बचा हुआ था।

इस पूरी घटना में 5 कैदियों की मौत हो गई और कई घायल भी हुए, जिनका इलाज छपरा के सदर अस्पताल में हुआ। एसपी कृष्णन ने अपना काम किया और फिर कहा था कि अब जेल प्रशासन के ऊपर है कि वो आगे की कार्रवाई करे। घायलों की स्थिति अच्छी-खासी गंभीर थी। ऑपरेशन ख़त्म होते ही जेल का ताला खोला गया और अधिकारियों ने अंदर जाकर चार्ज लिया। अंत में लाउडस्पीकर से सभी कैदियों को अपने-अपने वार्ड से निकल कर आत्मसमर्पण करने को कहा गया और उन्होंने ऐसा ही किया।

कैदियों ने इस मुठभेड़ के दौरान पुलिस से भी ज्यादा राउंड फायरिंग की थी। ये पूरा मामला इसीलिए भी भड़का क्योंकि राज्य सरकार ने भी काफी लापरवाही की थी। जिस छपरा जेल में मात्र 500 कैदियों की क्षमता थी, उसमें 1300 कैदी ठूँस कर रखे गए थे। साथ ही कैदियों के पास से कई लाठी-डंडे, पिस्तौल और सेलफोन्स जब्त किए गए। ऐसा नहीं है कि छपरा जेल पहली बार चर्चा में आया था।

अक्टूबर 2001 में छपरा जेल में ही दो कैदियों को मार डाला गया था। इस मामले में मृत कैदियों के परिजनों ने जेल के अधिकारियों के खिलाफ ही मामला दर्ज कराया था। इस ऑपरेशन में मारे गए एक कैदी शशि सिंह का दावा था कि वो उन कैदियों की हत्या का गवाह था। इसीलिए, इस मामले में प्रशासनिक अधिकारियों से भी कई सवालों के जवाब लोगों को चाहिए थे, जो अब शायद ही कभी मिल पाएँ।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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