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युवक के फर्जी साइन करके महिला दे रही थी शादी का प्रमाण, ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ ने बचाई पीड़ित की जान: पढ़िए गुजरात HC ने ‘सप्तपदी’ के आधार पर दिया क्या फैसला

ब्रिटेन में रहने वाले कौशल के धोखे से हस्ताक्षर लेकर महिला ने खुद को उसकी पत्नी बताया। लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने 'सप्तपदी' जैसी अनिवार्य रस्में न होने के आधार पर फैमिली कोर्ट का आदेश पलटते हुए शादी को शुरू से ही शून्य और अमान्य करार दिया।

गुजरात हाई कोर्ट (HC) में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक युवक को यह साबित करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा कि वह किसी महिला का पति है ही नहीं, जबकि उस महिला के पास एक विवाह प्रमाणपत्र मौजूद था। जस्टिस इलेश जे वोरा और जस्टिस आरटी वच्छानी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा फैसला सुनाया जो हिंदू विवाह अधिनियम की मूल भावना को बहुत साफ शब्दों में समझाता है।

पूरा मामला शुरू होता है कौशल प्रमोदभाई सोनार नाम के एक युवक से, जो पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में ब्रिटेन में रहते हैं। उनके सामने एक दिन ऐसी परिस्थिति आई जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। खुशी संजय शाह नाम की महिला, जो अहमदाबाद में रहती है, अचानक कौशल के माता-पति के पास पहुँची और एक विवाद प्रमाणपत्र दिखाकर यह दावा किया कि वह कौशल की कानूनी रूप से पत्नी है। कौशल के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी क्योंकि उन्होंने न तो कभी इस महिला से कोई विवाह किया था, न कोई हिंदू रीति रिवाज या फेरे लिए थे और न ही कभी पति-पत्नी की तरह साथ रहे।

कौशल ने कोर्ट को बताया कि वह पहले खुशी के पिता की कंपनी में नौकरी करते थे और वहीं उनसे उनका हस्ताक्षर धोखे से करवाया गया। कौशल का आरोप था कि उन्हें प्रमोशन का लालच देकर या नौकरी से निकाल देने की धमकी देकर, बिना उनकी मर्जी के, कुछ विवाह से जुड़े कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए। यानी उनकी सहमति के बिना ही उनके हस्ताक्षर लेकर एक ऐसा दस्तावेज तैयार कर लिया गया जो आगे चलकर विवाह प्रमाणपत्र में बदल गया।

कौशल की फैमिली कोर्ट में याचिका हुई खारिज

इसके बाद कौशल ने हिंदू अधिनियम की धारा 5, 7 और 12 के तहत अहमादाबाद के फैमिली कोर्ट में एक याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने यह घोषणा माँगी कि दोनों के बीच की तथाकथित शादी शुरू से ही अवैध और शून्य मानी जाए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि खुद खुशी ने फैमिली कोर्ट में दिए गए अपने लिखित बयान में यह साफ-साफ मान लिया कि दोनों के बीच कोई रीति-रिवाज या रस्में हुई ही नहीं थीं और कोई भी वैध विवाह संपन्न नहीं हुआ था।

उसने यह भी कबूल किया कि दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा कोई संबंध नहीं है। इस स्वीकृति के आधार पर कौशल ने कोर्ट में एक आवेदन दिया की इसी स्वीकृति के आधार पर फैसला सुना दिया जाए, जिससे पूरी सुनवाई की जरूरत ही न पड़े।

लेकिन फैमिली कोर्ट ने 13 नवंबर 2025 के अपने आदेश में यह कहते हुए इस आवेदन को खारिज कर दिया कि पंजीकृत विवाह प्रमाणपत्र होने से एक वैध विवाह की धारणा बनती है और इसीलिए पूरे मामले की विस्तार से सुनवाई जरूरी है। इसी के साथ पूरी याचिका भी खारिज कर दी गई। इस आदेश से निराश होकर कौशल ने हाई कोर्ट का रुख किया।

कौशल ने हाई कोर्ट में ‘केवल प्रमाणपत्र से विवाह वैध नहीं होने’ की दी दलील

कौशल के वकील राहिल पी जैन ने हाई कोर्ट में दलील दी कि जब खुद पत्नी ने ही अपने लिखित बयान में साफतौर से यह मान लिया है कि कोई भी रीति रिवाज हुए ही नहीं और कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ तो फिर लंबी सुनवाई कराने की कोई जरूरत ही नहीं बनती। उनका कहना था कि जब जरूरी रस्में हुई ही न हों और खुद दूसरे पक्ष ने यह बात लिखित रूप में स्वीकार कर ली हो तो केवल विवाह प्रमाणपत्र का होना किसी विवाह को वैध नहीं बना देता।

वहीं खुशी की तरफ से वकील अनुराग आर राठौर ने भी कोर्ट में यह स्वीकार किया कि पंजीकरण के अलावा यह साबित करने के लिए कोई और पु्ख्ता रिकॉर्ड पर नहीं है कि विवाह वास्तव में संपन्न हुआ था। उन्होंने कोर्ट से उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया।

हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के धारा 7 और 8 के हवाले से सुनाया फैसला

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अपना फैसला सुनाया। फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का विस्तार से जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के अनुसार हिंदू विवाह उन प्रथागत रीति रिवाजों के अनुसार संपन्न किया जा सकता है जो किसी भी पक्ष में प्रचलित हों और जहाँ इन रीति रिवाजों में ‘सप्तपदी’ शामिल हो यानी पवित्र अग्नि के सामने वर-वधू का सात फेरे लेना, वहाँ विवाह सातवाँ फेरा पूरा होते ही विवाह संपन्न और कानूनी रूप से वैध माना जाता है।

कोर्ट ने यह भी कहा, “जब तक विवाह आवश्यक प्रधागत रीति-रिवाजों के साथ संपन्न नहीं किया जाता, तब तक इसे अधिनियम के तहत संपन्न विवाह नहीं माना जा सकता।”

इसके साथ ही कोर्ट ने धारा 8 की भी व्याख्या की, जो विवाह के पंजीकरण से जुड़ी है। बेंच ने साफ कहा कि पंजीकरण का उद्देश्य केवल यह होता है कि पहले से वैध रूप से संपन्न हुए विवाह का सबूत आसानी से मिल सके। पंजीकरण अपने आप में किसी विवाह को वैध नहीं बना सकता, अगर धारा 7 के तहत आवश्यक रस्में पहले से पूरी नहीं हुई हों। यानी अगर वास्तव में विवाह हुआ ही नहीं है, तो कोई भी पंजीकरण या प्रमाणपत्र दोनों पक्षों को पति-पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं दे सकता।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि फैमिली कोर्ट ने एक बड़ी चूक की, क्योंकि उसने यह जाँचे बिना ही कि विवाह वास्तव में संपन्न भी हुआ था या नहीं, सीधे यह मान लिया कि पंजीकरण से ऐसी धारणा बन जाती है जिसे केवल पूरी सुनवाई से ही तोड़ा जा सकता है। बेंच ने कहा, “जब उत्तरदाता ने खुद यह स्वीकार कर लिया है कि आवश्यक विवाह रस्में कभी संपन्न नहीं हुईं, तो पक्षों को लंबी और थकाऊ सुनवाई में डालने का कोई औचित्य या उपयोगी उद्देश्य नहीं रह जाता।”

हाई कोर्ट ने फैसले में हिंदू विवाह के महत्व पर डाली नजर

फैसले में हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह के सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व पर भी विस्तार से टिप्पणी की। बेंच ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए सप्तपदी की रस्म का उल्लेख किया, जिसमें सातवाँ फेरा पूरा होने के बाद वर-वधू से कहता है कि सात फेरों के साथ हम मित्र बन गए हैं और यह मित्रता कभी न टूटे।

कोर्ट ने कहा कि हिंदू परंपरा में पत्नी को अर्धांगिनी माना जाता है, यानी पति का आधा हिस्सा, लेकिन साथ ही उसे अपनी अलग पहचान वाली और विवाह में बराबरी की भागीदार भी माना जाता है। हिंदू कानून के अनुसार विवाह एक संस्कार है और यह किसी नए परिवार की नींव रखता है।

बेंच ने अपने फैसले में युवाओं को एक तरह से सीख भी दी। कोर्ट ने कहा, “विवाह केवल गीत संगीत या खान पान का अवसर नहीं है, विवाह कोई व्यापारिक सौदा नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि विवाह एक गंभीर और बुनियादी कायक्रम है जिसके माध्यम से एक पुरुष और महिला भविष्य में परिवार बनाने के उद्देश्य से पति-पत्नी के संबंध में बंधते हैं, और परिवार ही भारतीय समाज की सबसे बुनियादी इकाई है।

कोर्ट ने कहा कि विवाह इसलिए पवित्र माना जाता है क्योंकि यह दो व्यक्तियों के बीच एक जीवनभर चलने वाला, सम्मानजनक, बराबरी वाला और सहमति से बना स्वस्थ संबंध बनाता है और इसे मोक्ष प्राप्ति से जुड़ा हुआ अवसर भी माना जाता है, खासकर जब निर्धारित रीति-रिवाज पूरी विधि से संपन्न किए जाएँ।

लेकिन मौजूदा मामले में जब खुशी ने ही अपने लिखित बयान में मान लिया कि कोई रस्में हुई ही नहीं और कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ, तो कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह को जो आध्यात्मिक, सामाजिक और कानूनी दर्ज मिलता है, वह इस मामले में कभी अस्तित्व में आया ही नहीं। इसलिए दोनों के बीच का संबंध कभी भी पति-पत्नी का कानूनी दर्जा हासिल नहीं कर पाया।

इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए आखिर में हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 13 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कौशल और खुशी के बीच की कथित शादी शुरू से ही ‘शून्य और अमान्य’ घोषित की जाती है, क्योंकि इस तथाकथित विवाह से कोई भी अधिकार या दायित्व उत्पन्न नहीं होता। साथ ही कोर्ट ने कौशल को यह आजादी भी दी कि वह विवाह पंजीकरण और विवाह प्रमाणपत्र को रद्द करवाने के लिए संबंधित प्राधिकरण के समक्ष उचित कदम उठा सकते हैं।

क्या है सप्तपदी? जिसने कौशल की नैया पार लगाई

इस पूरे मामले का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम में शामिल सप्तपदी का जिक्र किया, उसे समझना भी उतना ही जरूरी है क्योंकि यही वह रस्म है जो कौशल के बचाव में आकर उसके हित में फैसला सुनाने को कोर्ट को मजबूर किया। दरअसल सप्तपदी हिंदू विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक मानी जाती है और इसे विवाह के संपन्न होने का आधार माना गया है। यह असल में पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाने की प्रक्रिया है और इन सातों फेरों को सात ऐसे वचनों का प्रतीक माना जाता है जो वर और वधू आपस में एक दूसरे को देते हैं।

इस रस्म में वर और वधू को अग्नि के सामने खड़ा किया जाता है। वर-वधू के दाहिने हाथ को अपने बाएँ हाथ में पकड़ता है और फिर दोनों एक दूसरे के सामने खड़े होकर अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाते हैं। हर एक फेरे के दौरान वर और वधू एक दूसरे को एक वचन देते हैं और सातवें फेरे के बाद दोनों अग्नि के चारों ओर साथ खड़े हो जाते हैं, जिसके साथ ही विवाह पूर्ण माना जाता है।

सप्तपदी के सात वचन

पहला वचन: मैं तुम्हें अपना पति/पत्नी मानता/मानती हूँ।
दूसरा वचन: मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी मानता/मानती हूँ।
तीसरा वचन: मैं तुम्हारी खुशी के लिए जीने का वादा करता/करती हूँ।
चौथा वचन: मैं तुम्हारी इच्छाओं का सम्मान करने का वादा करता/करती हूँ।
पाँचवाँ वचन: मैं तुम्हारी रक्षा करने का वादा करता/करती हूँ।
छठा वचन: मैं तुम्हें अपना जीवन भर प्यार करने का वादा करता/करती हूँ।
सातवाँ वचन: मैं तुम्हारे साथ बुरे और अच्छे समय में रहने का वादा करता/करती हूँ।

निष्कर्ष: कोर्ट ने इसी सप्तपदी के आधार पर सुनाया फैसला

यही वजह है कि सप्तपदी को केवल एक रस्म नहीं बल्कि हिंदू विवाह की आत्मा माना जाता है। यह वह क्षण होता है जब वर और वधू अपने वचनों को दोहराते हुए यह प्रतिबद्धता जताते हैं कि वे अपना पूरा जीवन एक साथ बिताएँगे। कोर्ट ने अपने फैसले में इसी बात पर जोर दिया कि जब तक यह रस्म और इसके जैसी अन्य प्रथागत रीति रिवाज पूरी विधि से संपन्न नहीं होतीं, तब तक हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत विवाह को संपन्न विवाह नहीं माना जा सकता।

यही कारण था कि बेंच ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए यह भी बताया कि सातवाँ फेरा पूरा होने के बाद वर वधू से कहता है कि सात फेरों के साथ हम मित्र बन गए हैं और यह मित्रता कभी न टूटे। कोर्ट ने इसी बुनियाद पर यह स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में जब खुद खुशी ने ही मान लिया कि कोई रस्में हुई ही नहीं, तो सप्तपदी जैसी कोई भी अनिवार्य प्रक्रिया कभी संपन्न ही नहीं हुई, और इसीलिए दोनों के बीच कानूनन कोई वैध विवाह अस्तित्व में आया ही नहीं। यही वह कड़ी थी जिसने आखिरकार कौशल के पक्ष में फैसला जाने का रास्ता साफ किया।

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