कॉन्ग्रेस औंधे मुँह गिरने को तत्पर, मोदी को कोसने के सिवा नहीं बचा कोई काम

अपनी धूमिल होती छवि के सदमे में गाँधी परिवार पता नहीं कब पीएम मोदी को गाली-गलौच देने पर उतारू हो जाए, पता नहीं। क्योंकि सत्ता से दूरी कॉन्ग्रेस को हजम नहीं हो पा रही है।

राजनीतिक गलियारे में हड़कंप का माहौल या खींचतान का होना कोई नई और अचंभित कर देने वाली बात नहीं। यह हड़कंप उस समय अपने चरम पर होता है जब देश में चुनाव का माहौल गरमाया हो। चुनावी दौर में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चल निकलता है, फिर भले ही वे आरोप मनगढ़ंत ही क्यों न हों। एक-दूसरे को नीचा और कमतर दिखाने की होड़ लग जाती है। राजनीतिक सभाएँ और रैलियाँ किसी जंग के मैदान से कम नहीं होतीं।

ख़ैर, यह सब तो स्वाभाविक ही है क्योंकि चुनाव में जीत हासिल कर सत्ता पर क़ाबिज़ होना हर कोई चाहता है। इसके लिए सभी अपने-अपने तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं। सत्ता में दो तरह के लोग आना चाहते हैं, एक वो जो सही मायने में देश-हित चाहते हैं और उसके लिए वे अपनी सटीक रणनीति का इस्तेमाल कर देश को विकास की राह पर ले जाना चाहते हैं, और दूसरे वो जो केवल सत्ता की भूख और लालसा को शांत करना चाहते हैं।

सदमे से उबरने में कॉन्ग्रेस अब तक नाक़ामयाब

फ़िलहाल कॉन्ग्रेस पार्टी का यही हाल है। वो सत्ता खो देने के सदमे से अब तक उबर नहीं पाई है। सदमे से न उबर पाने का एक महत्वपूर्ण कारण उसका पुश्तैनी रूप से राजनीति में बने रहना भी है, जिसकी उसे आदत हो गई थी। जिस तरह घर के बड़े-बुज़ुर्ग अपने पीछे विरासत स्वरूप धन-सम्पत्ति छोड़ जाते हैं और अगली पीढ़ी उस पर अपना हक़ जताकर उसे पूर्णत: अपना मान लेती है ठीक उसी प्रकार कॉन्ग्रेस को भी यही लगता है कि भारतीय राजनीति उनके पुरखों द्वारा छोड़ी गई ऐसी ही कोई विरासत है, जिस पर केवल उसी का एकछत्र राज होना चाहिए। कॉन्ग्रेस अपने इसी सपने को वर्षों से जीती आई है, जिसकी उसे ऐसी लत लग गई है कि वो अब राजनीति में बने रहने के लिए कुछ भी कर गुजरने और किसी भी हद को पार करने से पीछे नहीं हटेगी। इसी का जीता जागता प्रमाण उसके वो घोटाले हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करके वो फिर से अपनी वापसी का ख़्वाब संजोए बैठी है, लेकिन इस ख़्वाब के पूरे होने में वो सबसे बड़ा रोड़ा प्रधानमंत्री मोदी को मानती है।

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भारतीय राजनीति को अपनी जेब में रखकर चलने वाली कॉन्ग्रेस को साल 2014 में उस समय तगड़ा झटका लगा, जब केंद्र में मोदी सरकार आई। मोदी लहर कॉन्ग्रेस के उन सभी मनसूबों को बहाकर ले जाने में कामयाब रही, जिसके बीज कॉन्ग्रेस ने अपने शासनकाल के दौरान बोए थे। और तब के मनसूबों पर पानी फिरने की वजह से कॉन्ग्रेस अब तक पीएम मोदी को सिर्फ़ एक दुश्मन की नज़र से देखती है।

कब लगेगा गाँधी-वाड्रा परिवार के घोटालों की फेहरिस्त पर विराम

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद एक-एक करके कॉन्ग्रेस के वो सभी काले चिट्ठे सामने आने लगे जो वर्षों से दबे पड़े थे। घोटालों की एक ऐसी फेहरिस्त बनती चली गई, जिस पर से धीरे-धीरे पर्दा उठता चला गया और कॉन्ग्रेस के ‘राजकुमार’ राहुल गाँधी समेत पूरे परिवार पर जाँच के काले घेरे मँडराने लगे। परिवारवाद की छवि वाली कॉन्ग्रेस पार्टी जो दूध की धुली होने का दावा करती थी, उसके कारनामे जगज़ाहिर होने लगे। इन काले कारनामों में टैक्स चोरी, मनी लॉड्रिंग, अगस्ता-वेस्टलैंड, खाद घोटाले से लेकर बोफ़ोर्स और पनडुब्बियों तक के हर घोटाले में कॉन्ग्रेस का हाथ शामिल था।

साल 2008 में राहुल गाँधी ने ज़मीन ख़रीदी और उसे साल 2012 में अपनी बहन प्रियंका गाँधी को बतौर तोहफ़े में दे दी। गाँधी-वाड्रा परिवार का सीधा संबंध हथियार डीलर संजय भंडारी से भी था। भंडारी ने तोहफे वाली उसी ज़मीन को अधिक क़ीमत देकर फिर से ख़रीद लिया। इसके पीछे राहुल गाँधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा के आपसी भाईचारा और एक गहरा रिश्ता तो उभरकर सामने आता ही है, साथ में दिखती है दलालों से संबंध की एक लंबी और कॉम्पलेक्स जोड़।

राहुल गाँधी का एक बेहद प्रगाढ़ रिश्ता HL पाहवा के साथ भी सामने आया। यह वही भंडारी है जिसके घर ED की छापेमारी के दौरान रक्षा सौदों से संबंधित गोपनीय दस्तावेज़ों की फोटोकॉपी बरामद हुई थी। मतलब साफ है कि यूपीए के शासनकाल में एक बिचौलिए की इतनी पहुँच थी कि वो बेहद संजीदा दस्तावेज़ों की फोटोकॉपी तक अपने पास रखता था। इससे साफ पता चलता है कि गाँधी-वाड्रा का परिवार मिलकर रक्षा सौदों में घालमेल करने की फ़िराक में था।

राहुल गाँधी ने 2008 में हसनपुर, पलवल में महेश कुमार नागर के माध्यम से ज़मीन ख़रीदी और फिर उस ज़मीन की क़ीमत को बढ़ाकर रॉबर्ट वाड्रा को बेच दिया गया। 2008 में मात्र ₹15 लाख में ख़रीदी गई ज़मीन को केवल 3 साल 10 महीने बाद ₹84.15 लाख में बेचा गया। इस तरह के ज़मीनी सौदों में गाँधी-वाड्रा परिवार की धोखाधड़ी का कनेक्शन सीधे तौर पर साफ़ नज़र आता है। ऐसे और भी कई ज़मीनी सौदे हुए, जिनमें गाँधी-वाड्रा परिवार के ज़मीन सौदागरों के साथ प्रगाढ़ रिश्ते उजागर हुए। इनमें एक नाम सीसी थम्पी का भी है, जिसने ज़मीन ख़रीद के लिए संजय भंडारी को धन की आपूर्ति की थी।

आरोपों से घिरी कॉन्ग्रेस को प्रधानमंत्री मोदी की साफ छवि कहाँ भाएगी

राहुल गाँधी जिस राफ़ेल को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के इस्तीफ़े की माँग कर रहे थे, उस वक़्त उन्होंने मौन क्यों धारण कर लिया था जब राफ़ेल की असल क़ीमत पर से पर्दा उठा कि मोदी सरकार के दौरान हुई राफ़ेल डील यूपीए सरकार की तुलना में प्रति विमान ₹59 करोड़ सस्ती है। ऐसे हर आरोप पर राहुल गाँधी को मुँह की खानी पड़ी है, जब उन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ बेवजह के मुद्दों को हवा देने की कोशिश की जबकि वो ख़ुद अपने भ्रष्ट आचरण को किसी से नहीं छिपा पाए। ये राहुल गाँधी का ओवर कॉन्फ़िडेंस ही है, जो ख़ुद तमाम विवादों में घिरे होने के बावजूद मोदी सरकार को घेरने से नहीं चूकते, फिर भले ही वो आरोप बेबुनियाद ही क्यों न हों।

राफ़ेल विवाद में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब वीवीआईपी हेलीकॉप्टर अगस्ता वेस्टलैंड डील में बिचौलिया रहा क्रिश्चिन मिशेल का वो प्रकरण सामने आया, जिसमें ख़ुलासा हुआ कि वो राफ़ेल के ख़िलाफ़ सौदेबाज़ी कर रहा था। 2007 में जब भारत की तरफ से 126 मीडियम मल्टी रोल एयरक्राफ्ट ख़रीदने की बात कही गई थी तो उस समय कई कंपनियों ने बोली लगाई थी। साल 2011 आते-आते तक सिर्फ़ दो ही विमान आमने-सामने थे, एक दसौं की राफ़ेल और दूसरा यूरोफाइटर टाइफून। दलाल मिशेल यूरोफाइटर टाइफून की लॉबियिंग कर रहा था। आपको याद दिला दें कि अगस्ता-वेस्टलैंड सौदे में सोनिया गाँधी का कनेक्शन सामने आया था। इस पर ख़ुद को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने मिशेल को बचाने के लिए अपने वकील को मैदान में उतारा था।

आरोपों से बचने के लिए कॉन्ग्रेस को पीएम मोदी में दिखता है अपना दुश्मन

चुनावी माहौल में अपने कारनामों को छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस किसी न किसी बहाने बचने का रास्ता तलाशती रहती है। अपने इन प्रयासों में वो कभी कंधार प्रकरण में अजीत डोभाल पर आरोप मढ़ती दिखती है, तो कभी प्रधानमंत्री की छवि को ग़लत रूप से प्रचारित करने का दुस्साहस करती दिखती है। कभी चीन का रुख़ करके मोदी को कोसती है कि मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने में वो क्यों नाकामयाब हैं?

अब बात अगर प्रतिबंध की ही की जाए तो ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं है, जब चीन ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जाने से इनकार किया हो या मसूद अज़हर को वैश्विक स्तर पर आतंकवादी घोषित करने से अपने पैर पीछे किए हों। यह बात विश्व-विख्यात है कि चीन और पाकिस्तान के मध्य कई व्यापारिक समझौते हैं, जिसकी वजह से चीन हमेशा पाकिस्तान के साथ अपना दोस्ती का रिश्ता निभाता चला आया है।

भारत के प्रति चीन का दोहरा रवैया तो काफी साल पुराना है। यह तब भी था जब केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी। कॉन्ग्रेस ने उस समय क्यों नहीं चीन को डरा धमका कर मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगवाया लिया? इसका जवाब तो कॉन्ग्रेस के पास तब भी नहीं था, जब वो सत्ता में थी और आज भी नहीं है जब सत्ता में उसकी वापसी का कोई ओर-छोर नहीं दिखता।

जब आतंकवादियों पर उमड़ा राहुल गाँधी का ‘जी’ भरकर प्रेम

हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने की बात करने वाले राहुल गाँधी तो आतंकवादियों को ‘जी’ भर-भर कर इज़्जत परोसते हैं। उनकी पार्टी के दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी आतंकवादियों को ‘ओसामा जी और हाफ़िज सईद साहब’ बोलकर उनके सम्मान में चार चाँद लगाते हैं। भले ही राहुल गाँधी आतंकवादियों से अपनी इस बेइंतहा मोहब्बत पर कुछ न कहें लेकिन आतंकवादियों से उनका यह ‘अपनेपन’ का रिश्ता तो जगज़ाहिर हो ही गया है। राहुल गाँधी का यह प्यार भरा एहसास तो चीन जैसा ही जान पड़ता है, माने ऊपर से कुछ और अंदर से वही दोमुँहापन।

असल बात तो यह है कि सत्ता से दूर होने और वापसी का कोई रास्ता न बन पाने की बौखलाहट में कॉन्ग्रेस अपना आपा पूरी तरह से खो चुकी है। इसीलिए कोई रास्ता न सूझता देख राहुल गाँधी को ले-देकर केवल मोदी ही नज़र आते हैं। इसलिए वो कभी 56 इंच के सीने का जुमला रटते हैं तो कभी जनता को बेवजह भरमाने का काम करते हैं और कहते हैं कि वर्तमान केंद्र सरकार ने अपने शासनकाल में देश-हित में कुछ नहीं किया।

सच पूछें तो इस सवाल का जवाब कॉन्ग्रेस बखूबी जानती है कि मोदी ने जिस कुशलता के साथ अपने कार्यकाल को पूरा किया है, वो कॉन्ग्रेस से 70 सालों में नहीं हो सका। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी का गिरता स्तर पता नहीं कब क्या नया बखेड़ा खड़ा कर दे, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

वो दिन दूर नहीं जब प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करने के लिए राहुल गाँधी उनकी फोटो को पोर्नोग्राफी के लिए भी इस्तेमाल कर लें। अपनी धूमिल होती छवि के सदमे में गाँधी परिवार पता नहीं कब पीएम मोदी को गाली-गलौच देने पर उतारू हो जाए क्योंकि सत्ता से दूरी कॉन्ग्रेस को हजम नहीं हो पा रही है और अपनी वापसी के लिए उसे केवल मोदी को कोसने का ही मार्ग दिख रहा है, जिस पर वो बड़ी तेज़ी से बिना कुछ सोचे-समझे लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन यह तेज़ी कॉन्ग्रेस को बड़ी महँगी साबित होगी क्योंकि हताशा के इस आलम में राहुल और उनकी पार्टी किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुकी है। अब शायद उनकी चेतना लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद ही आने की संभावना है।

2014 के बाद एक आम आदमी के जीवन में जो सुधार आया है, पहले केवल उसकी कल्पना ही की जा सकती थी। देश के भीतर तो मोदी सरकार ने अनेकों लाभकारी योजनाओं से जन-जीवन को सुधारने के अपने लक्ष्य को तो पूरा किया ही, साथ में वैश्विक स्तर पर अन्य देशों से जो संबंध आज भारत के साथ स्थापित हैं, उन्हें सही दिशा और मज़बूती भी प्रदान की।

आज भारत के साथ हर बड़ी शक्ति कंधे से कंधा मिलाकर डटकर खड़ी है फिर चाहे वो व्यापार को लेकर हो या आतंकवाद जैसे मुद्दे को लेकर हो। विश्व में भारत की छवि एक ताक़तवर देश के रूप में बनकर उभरी है। इसका श्रेय निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है क्योंकि यह उनकी सूझबूझ और सटीक रणनीति का ही परिणाम है।

अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस ने उन मतदाताओं को आड़े हाथों लिया, जिन्होंने 2014 में बीजेपी को वोट दिया था। जो राजनीतिक पार्टी अपने ही देश के मतदाताओं को एक दुश्मन की नज़र से देखे, इसे उसका पागलपन न कहा जाए तो और क्या कहा जाए! क्योंकि इस तरह का व्यवहार आज तक किसी देश में किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा नहीं किया गया।

ऐसी स्थिति में कॉन्ग्रेस देश की जनता के समक्ष भला किस मुँह से जाएगी और किस आधार पर जनता से अपने पक्ष में वोट माँगने का साहस जुटा पाएगी, ये देखना बाक़ी है?

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