Action के Reaction से सहमे प्रोपेगेंडाबाज़, होली पर नहीं दे रहे पानी बचाने की सलाह

अधिकतर ने अभी तक होली पर पानी बचाने और रंगों के कथित दुष्प्रभाव को लेकर ट्वीट्स नहीं किए। स्पेन में जाकर सड़े टमाटरों से खेल कर ये होली में रंग न खेलने की सलाह देते हैं। अब इनकी बोलती बंद है क्योंकि...

इसे चुनावी मौसम का प्रभाव कहें या लिबरल्स की थकान का असर, होली आने में ज्यादा दिन नहीं बचे हैं और अभी तक सोशल मीडिया पर पानी बचाने को लेकर पोस्ट नहीं आए हैं। लोगों को याद होगा किस तरह होली से एक महीने पहले ही सूखी होली खेलने और पानी बचाने की सलाह के साथ कई ‘बड़े लोगों’ के पोस्ट वायरल हुआ करते थे। बड़े लोग इसीलिए, क्योंकि उनके पास सोशल मीडिया पर ब्लू टिक हुआ करते हैं। ये लोग दिवाली के समय पटाखे नहीं फोड़ने की सलाह देते हैं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर दही-हांडी की ऊँचाई कम रखने की सलाह देते हैं, होली पर पानी का कथित अपव्यय न करने की सलाह देते हैं और महाशिवरात्रि के समय शिवलिंग पर दूध न चढ़ाने की सलाह देते हैं। इन्हें पहचानना बहुत आसान है। किसी भी हिन्दू त्यौहार में मीन-मेख निकाल लेना इनकी जन्मजात ख़ासियत है। ये एक गिरोह विशेष का भाग हैं, जो हर एक हिन्दू त्यौहार को मानवता के लिए चरम ख़तरे के रूप में देखता है।

ये वही लोग हैं जो होली पर तर्क देते हैं कि राक्षसराज हिरण्यकश्यप और भक्त प्रह्लाद के समय ये आर्टिफीसियल रंग नहीं होते थे। उनका तर्क होता है कि भगवान श्रीराम के समय त्रेतायुग में पटाखे नहीं हुआ करते थे। उन्हें जानना चाहिए कि उस समय युद्धकला और धनुर्विद्या से तो बिजली कड़का दी जाती थी तो क्या आज भी हम भयंकर इलेक्ट्रोस्टेटिक डिस्चार्ज से दिवाली मनाएँ? अगर लिबरल्स के उस गिरोह विशेष को त्रेता युग के तर्कों से ही हमें जवाब देना है तो उन्हें एक कार्य करना चाहिए। उन्हें किसी ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में जाना चाहिए, जहाँ तूफ़ान आ रहा हो या तड़ित झंझा चल रही हो। वहाँ एक-दो ऐसी छोटी-मोटी चीजें होंगी, जिसके बाद उन्हें त्रेता वाले लॉजिक से तौबा हो जाएगी।

उस क्षेत्र के वातावरण में दो इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड क्षेत्र आपस में बड़े अच्छे से टकराएँगे। उन दोनों के एक-दूसरे को इक़्वालाइज़ करते ही एक ऐसी बिजली कड़केगी जिस से लिबरल्स का मिजाज ठंडा हो जाएगा। एकदम त्रेता युग के राम-रावण युद्ध वाली फीलिंग आएगी।

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ऐसे ही होली को लेकर वे बेढंगे तर्क देते हैं कि पहले कृत्रिम रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता था। भगवान श्रीकृष्ण और राधा ने एक-दूसरे के चेहरे पर रंग लगाए थे। ब्रज की होली पूरे देश भर में सबसे प्रसिद्ध है। बेढंगे तर्क देने के लिए उस युग का सहारा लेने वालों को भगवान शिव से प्रेरित होकर पूरे शरीर में भस्म रगड़ कर चलना चाहिए। कितने ऐसे लिबरल्स हैं जो अपने पूरे शरीर में भस्म लगा कर होली खेलने आएँगे? इन ज्ञान बघारुओं से यही अपेक्षा भी है। वे बड़ी चालाकी से भगवद्गीता और रामायण का जिक्र तभी करते हैं जब राष्ट्रवादियों की बात काटने के लिए माओ और मार्क्स के पास इसका कोई जवाब नहीं हो। अंधविरोध में पागल हो गए इन लिबरल्स ने तो बैलून में सीमेन भरे होने की झूठी बात कह कर इसे नारीवादी मुद्दों से जोड़ने की कोशिश कर ख़ूब हंगामा मचाया था।

हाँ, तो हम होली की बात कर रहे थे। होली प्यार का त्यौहार है। राधा-कृष्णा के प्यार का, शिव-पार्वती के प्यार का त्यौहार है। इस रंग में भंग डालने वालों को अब शायद समझ आ गया है कि जनता होशियार हो चुकी है। किसी को बार-बार बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। अगर आपने दिल्ली या मुंबई के किसी बंगले में बैठ कर भारतीय त्योहारों को लेकर बेकार के ज्ञान देने के प्रयास किए तो सुदूर शिलॉन्ग के किसी कॉलेज का विद्यार्थी भी आपको सीधा करने की ताक़त रखता है। आप भले जावेद अख़्तर हों, सागरिका घोस हों या अनुष्का शर्मा हों, अगर आपने हिन्दू त्योहारों को लेकर ऐसी-वैसी बातें की तो आपको तर्कों के साथ काट दिया जाएगा। यह कार्य पुलिस, सरकार, न्यायालय और मीडिया नहीं करेगी। जनता जागरूक है, आपसे ज्यादा जानकार है, अब वह ऐसे लोगों को नहीं बख्शती।

आपको याद होगा कि होली के कई दिनों पहले से कैसा कुटिल अभियान शुरू हो जाया करता था? होली पर पानी की बर्बादी होने की बात कही जाती थी। सबसे बड़ी बात कि ऐसा वही लोग कहते थे जो थूक फेंकने के बाद भी बाथरूम के फ्लश से 25 लीटर पानी बहा दिया करते हैं। कहा जाता था कि होली के कृत्रिम रंग चेहरे को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे लोगों के लिए अभी-अभी एक ख़बर आई है। एक महिला को कैंसर होने के कारण जॉनसन एन्ड जॉनसन को $29.3 मिलियन का हर्ज़ाना भरना पड़ा। ऐसे 14,000 मामले आए हैं, जहाँ लोगों की शिकायत है कि जॉनसन एन्ड जॉनसन के प्रोडक्ट्स का प्रयोग करने के कारण उन्हें कैंसर हो गया। होली का विरोध करने वाले कितने लिबरल्स ने जे एन्ड जे की निंदा की?

यह एक अमेरिकन मैन्युफैक्चरिंग कम्पनी है, पाश्चात्य है। इसीलिए वह जो भी करे, क्षम्य है। लिबरल्स को फर्क नहीं पड़ता। होली पर चुटकी भर रंग के पैकेट से शायद ही किसी को बुख़ार भी हुआ हो, लेकिन उस पर हंगामा मचाने वाले गिरोह विशेष के लोग उस कम्पनी के प्रोडक्ट्स को लेकर चुप हैं, जिसके कारण कैंसर जैसी बीमारी हुई। इसी को हिपोक्रिसी कहते हैं। इनके पास सबूत नहीं होते, बस ज्ञान होता है। इसके पास असली ख़बरें नहीं होतीं, बस फेक नैरेटिव होते हैं। इसके पास सही तर्क नहीं होते, बस एक घिसी-पिटी धारणा होती है। इसके पास ऐतिहासिक तथ्य नहीं होते, बस झूठी आशंकाएँ होती हैं।

होलिका दहन क्यों? होली क्यों? देश के हर एक भाग में इसके अलग-अलग कारण हैं और कहानियाँ हैं। इन सबके पीछे का ध्येय वही है, माहात्म्य समान है, भले ही किरदार अलग हों। हमने इन त्योहारों से जुड़ी कई प्रेरणादायी कहानियाँ पढ़ी हैं, सुनी है, सुनाई हैं। लिबरल गिरोह को इन सबमें कोई रुचि नहीं है। उन्हें लोगों का साथ घुल-मिल कर रंग खेलना खटकता है। और वे सबका ठेका लेने वाले कौन होते हैं? अगर कोई व्यक्ति रंगों के साथ होली खेलना चाहता है तो वह खेलेगा। अगर उसी के परिवार में कोई गुलाल से खेलना चाहता है तो वह भी खेलेगा। अगर कोई रंग-गुलाल-पानी इन सभी से खेलना चाहता है तो वह भी खेलेगा। उसी परिवार में कोई ऐसा भी व्यक्ति होगा, जो होली नहीं खेलेगा। लेकिन, ये चारों एक-दूसरे को अपने तौर-तरीकों को जबरन अपनाने को नहीं कह सकते।

फिर लिबरल के गिरोह विशेष को क्या दिक्कतें हैं? आप रंग से खेलो, गुलाल से खेलो, पानी से खेलो, राख से खेलो या गोबर में नहाओ- दूसरों को तो वैसा करने दो, जैसा वे चाहते हैं। वे देश का नियम-क़ानून नहीं तोड़ रहे न, खुशियाँ ही तो मना रहे। इस होली ऐसे लोगों की बोलती बंद हो गई है। उनमें से अधिकतर ने अभी तक होली पर पानी बचाने और रंगों के कथित दुष्प्रभाव को लेकर ट्वीट्स नहीं किए। स्पेन में जाकर सड़े टमाटरों से खेल कर ये होली में रंग न खेलने की सलाह देते हैं। आइए देखते हैं कि अब इनकी बोलती क्यों बंद है?

अब इन्हें जनता के जागरूक होने का डर सता रहा है। साल दर साल प्रोपेगेंडा परस्ती करते-करते इन्हें अब बदलाव नज़र आ रहा है। अगर ये होली पर ज्ञान बघारने से बच रहे हैं तो राष्ट्रवादियों के लिए यह एक बड़ी सफलता है। सोशल मीडिया का ज़माना है। अब गाँव के खेतों में बैठे बाबाजी और दादी-नानी की कहानियाँ सुन कर बड़ा हुआ कोई बच्चा भी ऐसे फालतू ज्ञान देने वालों को अपने गूढ़ तर्कों से पानी पिला सकता है। ख़ुद को ज्ञान का भण्डार समझने वाले इन पाखंडियों को अब चुनौती मिल रही है, देशवासियों से, देश से। अब ये फूँक-फूँक कर क़दम रखते हैं क्योंकि इन्हें पता है कि उन पर नज़र रखी जा रही है और उनके हर एक्शन का रिएक्शन होगा ही।

एक्शन का रिएक्शन का अर्थ यहाँ हिंसक कतई नहीं है। झूठ फैलाने वालों को सच का आइना दिखाना भी एक्शन का रिएक्शन है। इन तथाकथित मठाधीशों को तो किसी की बात सुनने की आदत ही नहीं थी, वे सबसे बड़े ज्ञानी जो ठहरे। अब सोशल मीडिया के ज़माने में इनकी बात काटी जा रही है, इनके तर्कों को सिलसिलेवार ढंग से गलत साबित किया जा रहा है। ये बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में कइयों ने तो सोशल मीडिया पर ट्रोल का रूप धारण कर लिया है। कई सोशल साइट्स छोड़ कर ही भाग गए। कई अभी भी थेथरई में लगे हैं लेकिन समय-समय पर उनकी पोल खुलती रहती है। रही बात अभी की, तो राष्ट्रवादियों के लिए यह जश्न का समय है क्योंकि लिबरल गैंग होली पर प्रोपेगंडा फैलाने से डर रहा है। क्रिया की प्रतिक्रिया अपना काम कर रही है।

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