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‘सौभाग्य’ नहीं, ‘संगठित रणनीति’: 8.2% की शानदार GDP ग्रोथ से भारत की अर्थव्यवस्था ने दुनिया को फिर दिखाया अपना दम

घरेलू माँग, मैन्युफैक्चरिंग और सुधारवादी नीतियों ने मिलकर तय की रफ्तार यह सिर्फ एक तिमाही नहीं बल्कि भारत की उभरती शक्ति का संकेत है

भारत की विकास गाथा एक बार फिर वैश्विक मंच पर ध्वनि-गर्जना कर रही है। जिस समय दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ धीमी पड़ने लगी हैं, उसी समय भारत ने 2025-26 की दूसरी तिमाही (Q2) में 8.2 % की रफ्तार से बढ़कर यह सिद्ध कर दिया है कि उसकी आर्थिक नींव न केवल मजबूत है बल्कि निरंतर व्यापक होती जा रही है। यह सिर्फ एक आर्थिक आँकड़ा नहीं यह आत्मविश्वास, स्थिरता और सुधारवादी नीतियों की सफलता का प्रमाण है।

NSO के नवीनतम आँकड़े विशेषज्ञों की सभी भविष्यवाणियों से ऊपर निकले हैं। 7-7.5% की अपेक्षाओं के बीच 8.2% की यह छलांग बताती है कि भारत की विकास कथा अब ‘सौभाग्य’ नहीं बल्कि ‘संगठित रणनीति’ का परिणाम है। घरेलू खपत, सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती और मैन्युफैक्चरिंग की नई ऊर्जा ने मिलकर अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस ग्रोथ का ईंधन आम भारतीयों का विश्वास है। निजी खपत में 7.9% की वृद्धि दिखाती है कि परिवार, व्यापारी और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर अधिक आश्वस्त हैं। जब नागरिक आश्वस्त होते हैं, तब ही अर्थव्यवस्था गति पकड़ती है।

मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण क्षेत्र की 9% और 7% के आस-पास की ऊँची वृद्धि बताती है कि Make in India और उत्पादक-क्षमता आधारित नीतियाँ अब जमीन पर परिणाम दे रही हैं। यह संयोग नहीं हो सकता कि वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच भी भारत का औद्योगिक उत्पादन मजबूत खड़ा है यह उसी आत्मनिर्भर दृष्टि की पराकाष्ठा है, जिसे पिछले कुछ वर्षों में लगातार दिशा दी गई है।

सेवा-क्षेत्र, जो पहले से ही भारत की ताकत रहा है, इस तिमाही में 10% से अधिक की वृद्धि लेकर आया है। वित्तीय सेवाएँ, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सेवाओं के तेजी से बढ़ने का अर्थ है कि शहरों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में आर्थिक गतिविधियों की तेज लय बनी हुई है।

GST संरचना में हाल के महीनों में किए गए सुधार, खासकर दरों में की गई आवश्यक कटौती ने बाजार को राहत दी है और उपभोग को बढ़ावा दिया है। इन उपायों का व्यापक प्रभाव आगामी तिमाहियों में और स्पष्ट दिखेगा।

जीवन स्तर में सुधार, सरकारी योजनाओं की बेहतर डिलीवरी और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रसार ने भी उत्पादन और उपभोग दोनों को मजबूत किया है। आज भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि सबसे ‘चपल’ और ‘नवाचार-समर्थ’ अर्थव्यवस्थाओं में से एक भी है।

अब यह भी सच है कि राजकोषीय घाटे में बढ़त जैसी कुछ चुनौतियाँ सामने हैं लेकिन सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यह सरकार की सक्रिय पूंजीगत गतिविधियों और कल्याणकारी कार्यक्रमों का भी परिणाम है। यदि विकास की रफ्तार बनी रहती है, तो यह घाटा दीर्घकाल में स्वतः संतुलित होता है।

वैश्विक अनिश्चितताओं जैसे अमेरिका-यूरोप में माँग की गिरावट, भू-राजनीतिक तनाव, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत का यह प्रदर्शन वाकई उल्लेखनीय है। यह बताता है कि हमारी अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के खिलाफ अधिक लचीली (resilient) और संतुलित संरचना की ओर बढ़ रही है।

8.2% का यह आँकड़ा केवल एक तिमाही के उत्सव की वजह नहीं है यह उस भारत की झलक है जो आत्मविश्वास से भरा है, जो दुनिया की उभरती आर्थिक धुरी बनने की तैयारी कर रहा है और जिसकी विकास-यात्रा अब ठोस नींव पर आधारित है।

भारत की क्षमता अब केवल भविष्य की चीज नहीं यह वर्तमान में दिख रही, महसूस की जा सकने वाली वास्तविकता बन चुकी है। इस तिमाही का प्रदर्शन उसी सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक और सशक्त कदम है।

हम अवसरों के मोड़ पर खड़े हैं जहाँ से भारत न सिर्फ नई ऊँचाइयाँ छू सकता है बल्कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।

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Dr. Prosenjit Nath
Dr. Prosenjit Nath
The writer is a technocrat, political analyst, and author. He pens national, geopolitical, and social issues.

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