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RSS शताब्दी समारोह से आरफा-सुप्रिया को आई मिचली, क्या ‘बॉलीवुड इकोसिस्टम’ ढहने से घबराया इस्लामी-लिबरल गैंग?

सीधी बात है, जो लोग खुद संविधान को अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं, वे दूसरों को 'डरपोक' न कहें। संघ की 100 साल की यात्रा और उसकी सेवा को आज देश पहचान रहा है और यही पहचान इन प्रोपेगेंडा चलाने वालों की सबसे बड़ी तकलीफ है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 साल पूरे होने पर देश के अलग-अलग कोनों में अलग तरह से उत्सव हो रहे हैं। इसी कड़ी में एक कार्यक्रम मुंबई में भी ऐसा हुआ, जहाँ बॉलीवुड की नामी हस्तियों ने शिरकत की और पूरे कार्यक्रम को देखने के बाद वो संघ की तारीफ किए बिना नहीं रह सके। किसी ने संघ के कार्यों को सराहा, कोई संघ प्रमुख के भाषण से अभिभूत होता दिखा।

बॉलीवुड एक्टर रणवीर सिंह ने वीडियो शेयर कर कहा, “RSS को 100 वर्ष पूरे करने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। पिछले 100 सालों से संघ ने देश की सेवा में जो योगदान दिया, उसके लिए दिल से धन्यवाद।”

वहीं, करण जौहर ने कहा कि RSS के शताब्दी समारोह में शामिल होकर उन्हें काफी अच्छा लगा और मोहन भागवत के विचार और आदर्श उन्हें बहुत प्रेरणादायक लगे। करण जौहर ने आगे कहा कि बॉलीवुड की हस्तियों को इतना समय देने के लिए वे मोहन भागवत का दिल से धन्यवाद करते हैं। करण ने ये भी जोड़ा कि मोहन भागवत का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है और बातचीत के दौरान वो खूब हँसे भी।

इसके अलावा, शिल्पा शेट्टी ने भी RSS को 100 वर्ष पूरे होने की शुभकामनाएँ दी और कहा कि वो मोहन भागवत की बहुत बड़ी फैन है और राष्ट्र के लिए उनके समर्पण और सोच की दिल से तारीफ करती हैं। शिल्पा शेट्टी ने बताया कि उनके विचार उन्हें प्रेरित करते हैं और इससे वो देश की सेवा से जुड़े काम और ज्यादा मन लगाकर कर पाएँगी।

दोगलई का ‘आरफा’ मॉडल

जैसे-जैसे ये लोग मीडिया में संघ को लेकर अपने बयान दे रहे थे वैसे-वैसे वामपंथी-कट्टरपंथी और कॉन्ग्रेसियों का एक वर्ग अपनी-अपनी जगहों पर बैठकर भीतर ही भीतर फुँक रहा था। आरफा खानम और सुप्रिया श्रीनेत उन्हीं में से एक हैं।

आरफा खानम का पोस्ट

आरफा ने कार्यक्रम देखने के बाद एक ट्वीट किया और कार्यक्रम में जाने वाली हस्तियों को बॉलीवुड में सबसे बड़ा डरपोक करार दिया। आरफा ने लिखा, “बॉलीवुड के सबसे बड़े डरपोक आरएसएस के कदमों में लोटे हुए हैं। क्यों? क्योंकि वो नैतिक रूप से मर चुके हैं और सत्ता को चुनौती नहीं देना चाहते। एक संस्था जिसने कभी भारतीय संविधान पर विश्वास नहीं किया। कभी मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा भड़काई, कभी महिलाओं का अपमान किया, उसकी पूजा देश के सबसे नामी और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किया जा रहा है। मुझे उल्टी आने जैसा लग रहा है।” इसके अलावा आरफा ने वीडियो भी बनाया है।

आरफा के पोस्ट में दुख, दर्द, पीड़ा सब है। उन्हें एक्टर्स की पर्सनल चॉइस को लेकर ऐसी समस्या है कि उन्हें खुद नहीं पता कि लोग उनकी दोगलई पर भी सवाल खड़ा कर देंगे। अगर आप आरफा का पोस्ट देखेंगे तो ऐसे मामलों से सना पड़ा है जिसके दो पक्ष हैं, लेकिन आरफा उस पक्ष को ही साझा करती हैं जो उनके प्रोपेगेंडा और नैरेटिव पर सेट हो। जैसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा चूँकि उनके नैरेटिव लायक नहीं है इसलिए वो इस पर नहीं बोलतीं, मगर कट्टरपंथियों के साथ अगर एक हिंदू जुड़ा दिख जाए तो ये दिखाने में आरफा जी जान झोंक देती हैं कि वहाँ हिंदू सुरक्षित हैं।

आरफा खानुम की दोगलई का न कोई अंत है और न होता दिख रहा है। अपने आपको पत्रकार कहने वाली ये महिला अपने पत्रकारिता करियर की आड़ में इस्लाम के बचाव में सरेआम हर तथ्यों को गलत बता देती है। उन लोगों को मासूम दिखाने का प्रयास करती है जो खुलेआम कहते हैं कि उनके लिए देश और संविधान से पहले उनका मजहब है… लेकिन अगर एक संगठन जो आपदा के समय में प्रभावित लोगों की मदद में सबसे आगे आकर हाथ बढ़ाता तो वो इसपर सिर्फ इसलिए सवाल उठाती हैं क्योंकि उसका जुड़ाव सनातन से है।

एजेंडा खत्म होने का डर?

आरफा खानम के बयान पर पत्रकार राजन कुमार झा ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने आरफा की ‘छटपटाहट’ की असली वजह बताते हुए लिखा कि बॉलीवुड अब उनके ‘प्रोपेगेंडा’ के चंगुल से आजाद हो रहा है। राजन झा ने आरफा की परेशानी के तीन मुख्य कारण गिनाए।

आतंकियों की पहचान: अब फिल्मों में आतंकियों को ‘भटका हुआ’ नहीं, बल्कि सीधे ‘आतंकी’ दिखाया जाएगा। आस्था का सम्मान: हिंदू प्रतीकों और सनातन का मजाक उड़ाने का खेल अब बंद होगा। इस्लामीकरण पर रोक: फिल्मों के जरिए नैरेटिव सेट कर देश के ‘इस्लामीकरण’ का जरिया खत्म हो जाएगा।

RSS की तारीफ करने के लिए निशाना बना रही- सुप्रिया श्रीनेत

इसी प्रकार कॉन्ग्रेस नेत्री सुप्रिया श्रीनेत ने खुद बताया है कि वैसे तो वो बॉलीवुड सेलेब्रिटीज को निशाना बनाने से परहेज करती हैं, लेकिन चूँकि अब ये लोग आरएसएस की तारीफ कर रहे हैं इसलिए वो इन्हें निशाना बना रही हैं। उन्होंने पूछा है कि आखिर बॉलीवुड वाले लिंचिंग, बलात्कार, हेट स्पीच, किसान हित, मणिपुर मुद्दे, महंगाई, प्रदूषण जैसे मुद्दे पर क्यों बात नहीं कर पाते।

निजी नफरत बनाम राष्ट्र सेवा

सच तो यह है कि संघ आज अपने मूल्यों और सेवा के कारण समाज के हर वर्ग में स्वीकार्य हो रहा है। करण जौहर जैसे फिल्मकार अगर मोहन भागवत के ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ और आदर्शों की बात कर रहे हैं, तो यह उनकी अपनी समझ है। लेकिन वामपंथी ईको-सिस्टम को डर है कि अगर बॉलीवुड ने संघ के राष्ट्रवाद को अपना लिया, तो उनकी बरसों की मेहनत से बनाई गई नफरत की दीवार ढह जाएगी।

सीधी बात है, जो लोग खुद संविधान को अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं, वे दूसरों को ‘डरपोक’ न कहें। संघ की 100 साल की यात्रा और उसकी सेवा को आज देश पहचान रहा है और यही पहचान इन प्रोपेगेंडा चलाने वालों की सबसे बड़ी तकलीफ है।

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