Tuesday, September 28, 2021
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ममता से मिले राजदीप तो आया मौसम रसगुल्ला का, राजनीति में अब लड्डू का हाल भी राहुल गाँधी जैसा

पिछले लगभग डेढ़ दशक में निष्पक्ष पत्रकारिता पद्मश्री से रसगुल्ले तक पहुँच गई। यही उसकी युगयात्रा है।

“कठिन सवाल पूछने पर रसगुल्ले नहीं मिलते”

इससे पहले सोशल मीडिया प्रधान इस युग में कुछ अति उत्साहित ट्विटर हैंडल इसे महान दार्शनिक रूमी की सूक्ति बताकर रीट्वीट लूट लें, मैं बता देता हूँ कि यह रूमी की सूक्ति नहीं, बल्कि राजदीप सरदेसाई की स्वीकारोक्ति है। पढ़कर आप भले निराश हों कि सूक्ति टाइप दिखाई देने वाला वाक्य स्वीकारोक्ति निकला, पर मेरा काम है कि जो जैसा है उसे वही बता कर कहीं से अपने लिए भी रसगुल्ले का जुगाड़ कर लूँ। वैसे भी जो जैसा है उसे कुछ और बताया जाए तो नैतिकता का इंडेक्स ऊपर चला जाएगा और निष्पक्ष पत्रकारिता का नीचे।

जब ज़माना अच्छा था तब कठिन सवाल पूछे जाने पर पद्म पुरस्कार मिलते थे। तमाम पत्रकारों ने ‘इंदिरा जी को पूड़ी पसंद थी या पराठा?’ जैसे कठिन सवाल पूछकर पद्मश्री हथिया लिया। कइयों ने राहुल गाँधी का इंटरव्यू लेकर निष्पक्ष पत्रकारिता के गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा कर लिया। अब जमाना खराब है इसलिए कठिन सवाल पूछे जाने पर रसगुल्ला तक न मिलने की संभावना बन जाती है। ऐसे में कौन पत्रकार रसगुल्ले जैसी मिठाई को छोड़ेने का रिस्क लेगा? वैसे भी जिस रसगुल्ला पर दो राज्य भिड़ लेते हैं उसे पाने के लिए अगर कोई पत्रकार कठिन प्रश्न नहीं पूछने जैसी मेहनत कर रहा है तो उसे निष्पक्षता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा।  

पिछले लगभग डेढ़ दशक में निष्पक्ष पत्रकारिता पद्मश्री से रसगुल्ले तक पहुँच गई। यही उसकी युगयात्रा है।

राजदीप ने एक प्रश्न के उत्तर में स्वीकार किया कि अगर वे ममता बनर्जी से उनके राज्य में हो रही हिंसा पर कठिन प्रश्न पूछते तो उन्हें रसगुल्ले नहीं मिलते। यह भी कोई बात है? इतना भी क्या डरना? मैं कहता हूँ रसगुल्ला मुँह में रखकर भी तो कठिन प्रश्न पूछे जा सकते हैं। भाई, रसगुल्ला ऐसी मिठाई है जिसे तोड़कर खाने में वैसा मज़ा नहीं है जैसा उसे साबुत खाने में है। राजदीप को चाहिए था कि पहले रसगुल्ला मुँह में रख लेते और फिर ममता बनर्जी से प्रश्न पूछते। कुछ ऐसी आवाज़ निकलती जिससे पता ही नहीं चलता है कि प्रश्न कठिन है या सरल। मुँह में रसगुल्ला रखने के बाद क्या कहा जा रहा है, इसे डिकोड करने में लोगों की जान निकल जाती। इधर राजदीप बड़े आराम से बता सकते थे कि मैने तो बड़े टफ क्वेशचन पूछे। अगर आपकी समझ में नहीं आया तो मेरी क्या गलती?

वैसे मेरे मन में यह भी आया कि राजदीप या उनके जैसे निष्पक्ष पत्रकार जिन्हें टफ क्वेश्चन कहते हैं, उन्हें क्या ममता बनर्जी से पूछा जा सकता था? जैसे सोनिया गाँधी का इंटरव्यू लेते हुए राजदीप ने कठिन प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी- एक सास के रूप में इंदिरा जी कैसी थीं? क्या आप दोनों के बीच ट्रेडिशनल सास-बहू रिलेशनशिप थी? उन्हें किस तरह का खाना पसंद था? इंदिरा जी ने आपको साड़ियाँ गिफ्ट की थीं? आपको किस रंग की साड़ी पसंद है? राहुल बचपन में भी ऐसे ही थे जैसे आज हैं? 

अब आप जरा सोचिए और खुद से पूछिए कि ऐसे कठिन सवाल क्या ममता बनर्जी से पूछे जा सकते हैं? ममता बनर्जी की सास ही नहीं है। नहीं हैं तो उनका नाम भी नहीं है। अब नाम नहीं है तो राजदीप कैसे पूछ लेते कि फलानी देवी एक सास के रूप में कोमल थी या कठोर? अच्छा ये बताइए कि उन्हें कौन सा पकवान पसंद था? इस तरह के प्रश्न पूछे नहीं जा सकते थे। ऐसे में तमाम कठिन प्रश्नों में से दो कठिन प्रश्न वैसे ही निकल गए। उसके बाद आते हैं कि साड़ी वाले कठिन प्रश्न पर। ममता बनर्जी एक ही रंग की साड़ी पहनती हैं। ऐसे में यह प्रश्न बेमानी हो जाता कि आपको किस रंग की साड़ी पसंद है? इस तरह से एक-एक करके सारे कठिन प्रश्न इंटरव्यू से निकलते रहते। जब ऐसे कठिन प्रश्न निकल ही जाते तो फिर राजदीप नए प्रश्न कहाँ से लाते? 

राजदीप ने यह भी बताया कि ममता बनर्जी से केवल एक रसगुल्ला मिलता है। प्रश्न न पूछने के लिए केवल एक रसगुल्ला! मैं तो कहता हूँ कि पद्मश्री गति प्राप्त निष्पक्ष पत्रकार को कम से कम दो रसगुल्ले तो मिलने ही चाहिए। ये क्या बात हुई कि राष्ट्रीय राजनीति में घुसने की तैयारी कर ली और दिल्ली के पत्रकार को केवल एक रसगुल्ला देकर पल्ला झाड़ ले रही हैं? और राजदीप की तो पत्नी भी पत्रकार हैं। ऐसे में वे डबल रसगुल्ले के हकदार हैं।  

वैसे भी किसी को केवल एक रसगुल्ला देना सही है क्या? दो रहे तो साथ बैठे-बैठे बोर भी नहीं होंगे। जरा सोचिए कि प्लेट में रखा एक रसगुल्ला राजदीप के सामने बैठे-बैठे कितना बोर हो रहा होगा! अकेला रसगुल्ला राजदीप को देखेगा और राजदीप उसे। दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़ना चाहेंगे। पर शिष्टता का तकाज़ा है कि एक निष्पक्ष पत्रकार होने के नाते राजदीप के पास ममता बनर्जी को केवल बधाई ही नहीं देनी है, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर खुद को प्रोजेक्ट करने के रास्ते भी बताने हैं। ऐसी में वे बातें करते जा रहे होंगे और इधर रसगुल्ला बेचारा इंतज़ार में बासी हो रहा होगा। साथ ही मन ही सोच रहा होगा- क्या दुर्गति है बेचारे की। एक अदद मैं मिला हूँ और ये मुझे भी तुरंत मुँह नहीं लगा सकता।

पर जो भी हो, राजदीप ने पत्रकारिता में रसगुल्ले का महत्व उजागर कर दिया है। रसगुल्ला बंगाल से चलकर दिल्ली न केवल पहुँचा है, बल्कि इतनी ताक़त लेकर पहुँचा है कि पत्रकारिता का स्वर्णयुग वापस ला सके। उधर और नेता भी इस नए रहस्योद्घाटन के बाद राजनीति में रसगुल्ले के महत्व पर नए ‘शीरे’ से विचार करते हुए सोच रहे होंगे कि रसगुल्ला इतना ताकतवर है, यह पता ही नहीं था। फालतू में इतने वर्षों तक लड्डू को इज्जत देते रहे। पहले पता चलता तो हम भी दिल्ली यात्रा पर इसे लेकर जाते और पत्रकारों का मुँह रसगुल्ले से भर देते। 

राजदीप सरदेसाई ने रसगुल्ले को भारतीय राजनीति और पत्रकारिता के मध्य में रख दिया है। राजनीति इसे खिलाकर कठिन सवालों को रोकेगी और पत्रकारिता इसे खाकर।

 

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