रवीश कुमार इतना ज्ञान क्यों बाँच रहे हैं? एंकर तो आप भी बना दिए गए हैं, मैनेज तो आप भी हो रहे हैं

आपने जो निशान्त चतुर्वेदी को सिर्फ टायटल में चतुर्वेदी होने से जज किया है, और उनकी परवरिश तक पहुँच गए, तो फिर उसी तरीके से कोई आपकी परवरिश तक भी पहुँच सकता है। ब्रजेश पांडे वाली बात किस परवरिश से आती है?

जैसे-जैसे चुनावों के फ़ेज़ निकलते जा रहे हैं, रवीश कुमार जी के ‘मैं ही इकलौता सही पत्रकार हूँ’ होने का घमंड चरम की ओर पहुँचता जा रहा है। आज उन्होंने आज तक के एक एंकर निशान्त चतुर्वेदी को अपनी टाइपिंग स्पीड का शिकार बनाया है। उन्होंने आदतानुसार जो है नहीं, वो भी उसमें घसीट लाए क्योंकि वो रवीश कुमार हैं, और उनके भक्तों की संख्या आज भी लाखों में तो है ही।

हुआ यूँ कि राबड़ी देवी ने कुछ ट्वीट किया तो निशान्त चतुर्वेदी ने लिखा कि राबड़ी देवी तीन बार ट्विटर बोल कर दिखा दें। इस पर राबड़ी देवी ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने उनके जैसे पत्तलकारों से पसीना पोंछवाया है, और वो बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, वो भी लोकतांत्रिक तरीके से, कुल आठ साल।

ये मामला चतुर्वेदी और राबड़ी देवी के बीच का था। फिर रवीश कुमार आए और बताने लगे कि इस तरह की प्रतिक्रिया चतुर्वेदी जी को जाति के सामाजिक अहंकार और गोदी मीडिया के चापलूस होने से आता है। उसके बाद उन्होंने जो ज्ञानधारा बहाई है उससे बस यही लगता है कि रवीश जी को हर उस व्यक्ति का विरोध करना है, शब्दों की मदद से, जो उनके हिसाब की पत्रकारिता नहीं करता, उनके हिसाब की बातें सोशल मीडिया पर नहीं लिखता, उनके बताए आचरण नहीं करता।

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आगे रवीश कुमार ने वही किया जिसमें उनको महारत हासिल है: जिसके परिवार के ऊपर, राबड़ी सहित, बिहार को सुव्यवस्थित तरीके से बर्बाद करने तक का अपराध चिपका हुआ है, उसे जाति, महिला और निचले तबके से होने को लेकर डिफ़ेंड करना जैसे कि विक्टिम पूरा बिहार नहीं, राबड़ी देवी हैं।

पहली बात जो रवीश कुमार को क्लियर कर लेना चाहिए वो यह है कि राबड़ी देवी कोई महिला नेता नहीं हैं। अगर लोकतांत्रिक तरीक़ों की बात हो रही है तो रवीश कुमार मोदी को सुप्रीम लीडर किस हिसाब से कह रहे थे, मुझे यह बता दें। मोदी भी निचली जाति से ऊपर आए, मेहनत की, दर-दर भटके और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ें। लेकिन पानी पीकर मोदी को गरियाते हुए उन्हें ज्ञान नहीं हुआ।

खैर, राबड़ी देवी वंचित और पिछड़ी नहीं, बल्कि एक मुख्यमंत्री की पत्नी भी हैं, स्वयं मुख्यमंत्री भी रही हैं, तो उनके दबे-कुचले होने का तर्क तो वाहियात ही है। दूसरी बात, उस दौर के बिहार को याद करता हूँ तो लोकतंत्र की तस्वीरों में मतपेटियों को लेकर भागते गुंडे और विरोधियों के इलाके के मतपेटियों में इंक डालने से लेकर उन्हें आग के हवाले करने की तस्वीर याद आती है।

या तो रवीश जी की पैदाइश 2005 के बाद की है, या फिर वो कम से कम बीस साल कोमा में रहे होंगे और 2005 में ही जगे तो उन्हें वो दौर याद नहीं। जो नेता पूरा चुनाव मैनेज कर लेता था, लोगों तक विकास पहुँचने ही नहीं देता था, शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद किया कि लोग सोच ही न सकें, उसे मैं दबा-कुचला मान कर चरण पूजूँ?

फिर रवीश मायावती, ममता को भी खींच लाए कि लोगों ने उनके रंग-रूप का भी मजाक उड़ाया है, उन्हे टार्गेट किया है। रंग-रूप का मजाक उड़ाने वाले विक्षिप्त लोग होते हैं। लेकिन मायावती और ममता के सत्ता में होकर कानून और भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण उन्हें टार्गेट किया गया। वही तो काम है न आपका रवीश जी, सत्ता के खिलाफ खड़े रहना। या फिर सत्ता का मतलब बस मोदी है?

आप राबड़ी देवी को डिफ़ेंड कर रहे हैं? जिसमें इतनी हिम्मत है कि वो लिखती है कि उसने पत्रकारों से पसीने पोंछवाए हैं? कोई पूर्व मुख्यमंत्री जब पत्रकारों से पसीना पोंछवाने की बात करती है तो उसके पीछे किस तरह की सोच रही होगी? क्या यह सत्ता का नशा नहीं है? या फिर इसे आप इग्नोर कर देंगे क्योंकि वो उसके नाम से पता चलता है कि इतिहास के किसी मोड़ पर ऐसे नाम वाले लोग वंचित, पिछड़े और सताए हुए लोग थे।

इससे यह साबित नहीं होता कि राबड़ी देवी भी वहीं से थी। सत्ता का यही नशा, इसी तरह के सिस्टम में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या हो जाती है, ऐसी ही दंभ भरती महिला नेत्री के राज्य में एसिड से नहलाकर लोगों को मार दिया जाता है। और आप उसे महिला और निचली जाति का होने का बता कर डिफ़ेंड कर रहे हैं? दो पैसे का शर्म कर लीजिए महाराज!

निशान्त चतुर्वेदी ने न लिखा होता, तो मैं लिखता। मैंने तो विडियो भी बनाया था, जिसमें तेजस्वी अपराधी लालू का पुत्र होने के बावजूद खुद को शेर का बेटा बता कर दंभ भरा था। तो क्या यह मेरी किसी खास जाति से होने का अहंकार है या फिर मुझे अपनी परिस्थितियों को समझ कर बोलना ही नहीं चाहिए? किसी के पूरे परिवार ने अरबों के घोटाले किए, और पूरी स्कूली व्यवस्था बर्बाद कर दी, और कोई उसका उपहास करता है तो ये उसकी जाति से आप जोड़ देते हैं?

फिर से सुनिए, और गौर से सुनिए। राबड़ी देवी उच्च वर्ग से ताल्लुक़ रखती है। वो वंचित नहीं है। अगर वो वंचित है, तो मुझे भी वैसा ही वंचित होना है। राबड़ी देवी को घेरने का हक़, उसका मजाक उड़ाने का हक़ हर उस व्यक्ति का है जिसकी पूरी जिंदगी लालू और उसके परिवार के कारण मजाक बन गई है। बिहारी को गाली किसने बनाया? इसकी ज़िम्मेदारी भी क्या हम ही उठाते चलें?

ये एक बेहयाई है कि राबड़ी देवी को कोई किसी भी बात पर डिफ़ेंड करने के लिए उसे पीड़िता की तरह बता रहा है। राबड़ी देवी ने शोषण किया है, लालू यादव ने शोषण किया है, इन दो मुख्यमंत्रियों ने बिहार को तबाह किया है इसलिए इनको पड़ने वाली गालियाँ और उपहास के शब्द इनके निकम्मेपन और भ्रष्टाचार पर हैं, न कि ये कैसी दिखती हैं, किस जाति से हैं।

इतने अरबों का घोटाला करने के बाद, पूरे पटना और बाहर में संपत्ति बनाने के बाद लालू या राबड़ी का अपनी जाति या उस जाति की वर्तमान स्थिति से कोई ताल्लुक़ नहीं रह जाता। ये लोग भारत के एक प्रतिशत वैसे लोगों में आते हैं जिनके पास भारत की आधी जनसंख्या के बराबर की संपत्ति होगी। इसलिए, राबड़ी देवी चाहे महिला हों, यादव जाति से हों, पिछड़े राज्य से हों, ये सारी बातें एक्सीडेंटल हैं, अब इन बातों का राबड़ी देवी से कोई वास्ता नहीं।

रवीश कुमार का दूसरे पत्रकारों को ज्ञान देना

रवीश जी ने निशान्त चतुर्वेदी के बारे में अपने लेख के अंतिम हिस्से में जो लिखा है उससे ज़्यादा बेकार बातें कोई कर भी नहीं सकता। रवीश जी लिखते हैं कि निशान्त चतुर्वेदी जैसे लोग एंकर बना दिए गए हैं। कमाल की बात यह है रवीश जी कि आपके हाथ में पूरी दुनिया के हर टीवी शो के एंकर बनाने की शक्ति नहीं है। आप ये तय नहीं करेंगे कि कौन क्या बना दिया गया है।

एंकर तो आप भी हैं जो हर रात चालीस मिनट अपने दर्शकों का समय बर्बाद करते हैं। आप को भी तो किसी ने एंकर बना ही दिया है, वरना आपको रिपोर्टिंग करनी थी तो करते रहते। आपके पास तो यह चुनाव करने का विकल्प रहा ही होगा, लेकिन आपने एंकर बनना चुना और विडंबना यह है कि आप रिपोर्टरों की होती कमी पर रोना रोते हैं और लोगों को कहते फिरते हैं टीवी मत देखिए।

आपने जो निशान्त चतुर्वेदी को सिर्फ टायटल में चतुर्वेदी होने से जज किया है, और उनकी परवरिश तक पहुँच गए, तो फिर उसी तरीके से कोई आपकी परवरिश तक भी पहुँच सकता है। ब्रजेश पांडे वाली बात किस परवरिश से आती है? आप तो संदेह छोड़िए, आशंका पर भी प्राइम टाइम कर के लोगों से इस्तीफा माँगते फिरते हैं, फिर नैतिकता का इतना बड़ा टोकरा लेकर घूमने वाले रवीश ने बिहार के सेक्स रैकेट कांड पर कितने मिनट बोला या लिखा?

आप कहते हैं कि एंकर मैनेज किए जा रहे हैं? ये कितनी अजीब बात है कि आपको यह कहना पड़ रहा है। ये बात तो हर व्यक्ति किसी भी संस्था को ज्वाइन करने से पहले जानता है कि उसे संस्था के मुताबिक़ चलना होगा। मैनेज तो आप भी हो रहे हैं वरना प्रणय रॉय की जगह सुभाष चंद्रा पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप होते तो आपके गले की नस फट चुकी होती।

इसलिए, शब्दों का इस्तेमाल गलत कार्य के लिए मत कीजिए। किसी दिन उँगली जवाब दे देगी और गला सूख जाएगा। कई बार ऐसा होता है कि ज्ञान का इस्तेमाल गलत कार्य के लिए हो तो वह ज्ञान गायब हो जाता है। आपको कुंगफू आती है तो उसको सेल्फ़ डिफ़ेंस के लिए रखिए, राह चलते किसी को नानचाकू से मत पीटिए।

ज्ञानी व्यक्ति के शब्द दोधारी तलवार की तरह होते हैं। वो शब्दों के खेल से दोनों तरह की बातें, समय देख कर लिख सकता है। इसी ममता और मायावती को भ्रष्ट साबित करने के लिए आपके मैनेजमेंट से अगर फ़रमान आएगा, तो आपको तुरंत मायावती के पुतले, पार्क, घोटाले याद आने लगेंगे। तब आप तुरंत बताएँगे कि बंगाल के हर जिले में दंगे हो रहे हैं, चिट फ़ंड स्कैम के तार सीधे मुख्यमंत्री तक से जुड़े हुए हैं।

लेकिन, अभी वो समय नहीं है इसलिए आज आपको ये सारे पावरफुल लोग अचानक से सताए हुए, वंचित लोग नजर आने लगे हैं। इनको सब ने स्वीकारा है रवीश जी। इनको अगर कोई नकारात्मक तरीके से देखता है, उपहास करता है तो वो इन लोगों का विक्टिम हैं। पूरा राज्य ऐसे भ्रष्ट नेताओं का विक्टिम है, और अगर वंचित तबके, पिछड़ी जाति और भेदभाव के शिकार लिंग के लोग जनप्रतिनिधि बन कर पूरे राज्य को लूटते हैं, हत्याएँ करवाते हैं, तो फिर उन्हें इन विशेषणों के पीछे छुपने का कोई हक़ नहीं।

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