मौलवी जारी करे फतवा, राजदीप को लगता है ये इस्लाम के खिलाफ मीडिया की है साजिश!

"एक ऐरे-गैरे मौलाना के फालतू कथन के आधार पर बिग डिबेट नहीं चला देना चाहिए। अगर कोई ऐसा करता है तो वह Islamo-phobia फैला रहा है।"

राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया है कि एक “unknown Maulana” के “stupid remark” के आधार पर ‘बिग डिबेट’ नहीं चला देना चाहिए। अगर कोई ऐसा करता है तो वह ‘Islamo-phobia’ फैला रहा है। सही बात है- या शायद सही बात लगती, अगर राजदीप सरदेसाई का रवैया सभी मज़हबों/आस्थाओं के खिलाफ हिंसा या द्वेष न भड़काने को लेकर इतना ही संजीदा होता। लेकिन हिन्दुओं को लेकर उनका नज़रिया इसके उलट ही रहा है।

याद कीजिए पिछले लोक सभा चुनाव को, जिसमें उर्मिला मातोंडकर ने ‘डर का माहौल है’ का हवाला देकर अपने चुनाव लड़ने को तर्कसंगत बताने की कोशिश की थी। उस समय जब यही राजदीप सरदेसाई उनका साक्षात्कार कर रहे थे तो मातोंडकर ने हिन्दू धर्म के बारे में कहा था, “… and the religion that has been known for its tolerance has turned out to be the most violent religion of them all”

समय का अभाव हो तो नीचे के वीडियो में 5:30 से 5:40 तक आप उर्मिला को सुन सकते हैं, जहाँ सीधा-सीधा हमला धर्म पर ही था- किसी विचारधारा पर नहीं, किसी राजनीतिक दर्शन या व्यक्ति या पर नहीं, सीधे धर्म पर। और राजदीप सरदेसाई को उस पर चाय/कॉफ़ी/पानी का घूँट भरते हुए मौन सहमति देते देखा जा सकता है। न कोई सवाल, न टोकना, न कोई स्पष्टीकरण। उनकी मूक सहमति ऐसे थी जैसे हिन्दुओं को “सबसे हिंसक मज़हब/आस्था वाली कौम” कहा जाना सूरज के पूर्व से निकलने जितनी ‘obvious’ बात है- इस पर बहस क्या करना?


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यहाँ उनका मौन, मौन सहमति ही माना जाएगा- इसलिए कि जिस खुद को ‘लिबरल’ कहने वाले पत्रकारिता के समुदाय विशेष से वह आते हैं, वह, और राजदीप सरदेसाई भी, मोदी को इसी ‘चुप्पी’ के आधार पर गुजरात का दोषी मानते हैं। उनके हिसाब से पहले तो मोदी की चुप्पी उनका आँख मार के हिन्दू दंगाईयों को इशारा थी कि तमे जो मरजी आए, तीन दिन तक करी जाओ; हूँ पुलीसानी संभाल लईसा। जब ये ‘थ्योरी’ औंधे मुँह गिर गई, क्योंकि न केवल मोदी के पुलिस का हाथ पकड़ने का एक भी सबूत अदालत को नहीं मिला, और मारे जाने वालों में एक तिहाई हिन्दू निकले, तो राजदीप ने गियर बदल कर मोदी पर ‘नैतिक जिम्मेदारी’ ठेलनी शुरू कर दी- क्योंकि वे चुप रहे, मुसलमानों के पैर में नाक रगड़ कर माफ़ी नहीं माँगी। जिन्हें इस बात पर शक है, इन्टरनेट पर बहुतेरे इंटरव्यू मिल जाएँगे, जिनमें राजदीप बताते हैं कि मोदी न केवल दंगों के लिए ‘नैतिक रूप से जिम्मेदार’ हैं, बल्कि यह भी कि राजदीप ने खुद उन्हें “एक बार माफ़ी माँग के खुद को इस जिम्मेवारी से मुक्त कर लो” की सलाह दी थी।

अतः अगर राजदीप मोदी को उनकी चुप्पी से दंगों में सहभागी मानते हैं, तो उर्मिला मातोंडकर के हिन्दुओं को हिंसक बताने में भी उनकी सहभागिता चुप्पी के चलते मानी जाएगी।

और यह कोई पहली और आखिरी घटना होती तो एक बार अपवाद माना भी जा सकता था। राजदीप सरदेसाई लगातार हिन्दुओं के बारे में वही चीजें अन्यायपूर्ण तरीके से कहते रहते हैं, जो अगर मुस्लिमों के बारे में न्यायोचित, तथ्यपरक तौर पर भी कही गई हो तो भी उन्हें तकलीफ़ होने लगती है। मसलन कुरआन के आधार पर भी इस्लाम की व्याख्या कर उसकी आलोचना करने वाले हिन्दुओं को राजदीप अक्सर बिन-मांगी सलाह देते फिरते हैं कि वे मुस्लिमों पर कोई ‘लेबल’ लगाने का हक़ नहीं रखते। और यही राजदीप लल्लनटॉप के सम्पादक सौरभ द्विवेदी के साथ लगभग हर सप्ताह हिन्दुओं पर ऐसी ही ‘ठप्पागिरी’ करते, किसका “हिंदूइस्म” सही, किसका गलत, इसकी विवेचना करते देखे जा सकते हैं।

“My Hinduism” के नाम पर हिन्दुओं के खिलाफ़ नफ़रत और भ्रम फ़ैलाने और उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत कर उन्हें उकसाने (Hindu baiting) वाले राजदीप एक तरफ़ हिन्दुओं पर ही निशाना साधने के लिए “diversity” का नाटक करते हैं, और दूसरी ओर उसी diversity वाले धर्म के साधुओं पर निशाना इस आधार पर साधते हैं कि उनका साधु होना ‘स्व-घोषित’ है, किसी पवित्र किताब या ‘अथॉरिटी’ से ठप्पा-प्राप्त नहीं।

इस्लामोफोबिया सच में है या नहीं, मैं यह तो नहीं जानता। नहीं जानता, क्योंकि इस शब्द का अर्थ है कि मुसलमानों के व्यवहार और कुरान की आयतों की आलोचना गलत है, जबकि दुनिया भर में हो रहे बम धमाकों से लेकर महज़ ढोल बजा कर नाच लेने, या चूड़ी-बिंदी लगा लेने, पर नुसरत जहाँ के खिलाफ़ मुसलमानों की नाराज़गी से ऐसा लगता तो नहीं है। लेकिन इतना तो पक्का है कि राजदीप जैसे हिन्दूफ़ोबिक इन्सान को तो इस पर बोलने का कोई नैतिक हक़ नहीं है।

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