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राम मंदिर न जाने के लिए अखिलेश का राजनीतिक बहाना: असल मकसद है हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई और वोटरों को साधना

अखिलेश का यह कदम बहुसंख्यक समाज में 'हिंदू बनाम हिंदू' की रेखा खींचने और अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण को साधे रखने की सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राम मंदिर, सनातन और तुष्टिकरण का मुद्दा गरमा गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन न करने और उसके बदले अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करने को लेकर सियासी गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में राम मंदिर और अयोध्या हमेशा से धुरी रहे हैं। दरअसल, अखिलेश यादव का राम मंदिर न जाना कोई सामान्य फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। उनका असल मकसद बहुसंख्यक समाज के भीतर ही ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की एक नई राजनीतिक रेखा खींचना और अपने पारंपरिक वोटरों को एकजुट रखना है।

इस राजनीतिक उठापटक के बीच, अखिलेश यादव द्वारा राम मंदिर न जाने के पीछे केदारेश्वर मंदिर के दर्शन को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करने के मामले को अगर देखा जाए, तो यह साफ है कि उन्होंने अयोध्या की भव्यता से ध्यान भटकाने के लिए केदारेश्वर मंदिर जाने का सिर्फ एक तात्कालिक बहाना बनाया।

अखिलेश यादव ने रविवार (28 जून 2026) को कहा कि इटावा में बन रहे केदारेश्वर शिव मंदिर का काम पूरा होने के बाद वह अयोध्या में स्थित राम मंदिर के दर्शन करने के लिए जाएँगे।

हालाँकि बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। इस बहानेबाजी के पीछे सपा का एक लंबा इतिहास, चुनावी मजबूरियाँ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त किए जाने की पूरी कहानी छिपी है, जिसे विस्तार से समझना जरूरी है।

राम मंदिर से दूरी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की नई सियासी जंग

अखिलेश यादव का राम मंदिर से दूरी बनाना और अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करना उनके किसी व्यक्तिगत लगाव की कमी को नहीं, बल्कि उनकी सोची-समझी चुनावी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सपा एक ऐसी पिच तैयार करने की कोशिश कर रही है, जहाँ वह खुद को एक अलग तरह के हिंदू नैरेटिव के साथ पेश कर सके।

अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि आज के दौर में सनातन या राम मंदिर का सीधा विरोध करना उनके लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। इसलिए उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई है, जो है हिंदुओं को ही आपस में लड़ाना।

चढ़ावा चोरी जैसे विवादित बयान देकर वह यह दिखाना चाहते हैं कि वे सनातन के विरोधी नहीं हैं, बल्कि मंदिर व्यवस्था या पुजारियों के एक वर्ग के खिलाफ हैं। इस प्रोपेगेंडा के जरिए वे भाजपा के ‘राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक’ हिंदुत्व के समानांतर एक ऐसा वर्ग खड़ा करना चाहते हैं, जो आपस में ही बंटा रहे। यानी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की यह लड़ाई इसलिए लड़ी जा रही है ताकि बहुसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके और साथ ही सपा का जो अपना पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण है, उसे यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी अभी भी भाजपा के कोर एजेंडे के सामने पूरी तरह नतमस्तक नहीं हुई है। यह राजनीति पूरी तरह से वोट बैंक को साधने और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए बुनी गई है।

सपा का ‘काला इतिहास’: 1990 का वो दौर जब सरयू का जल हुआ था लाल

अखिलेश यादव की आज की राजनीति को समझने के लिए उनकी पार्टी के उस अतीत को देखना होगा, जिसे भारतीय राजनीति का एक बेहद कड़वा और विवादित अध्याय माना जाता है। राम मंदिर निर्माण को लेकर समाजवादी पार्टी का इतिहास हमेशा से विरोधाभासों और विवादों से घिरा रहा है, जो आज भी समय-समय पर उनकी राजनीतिक कलई खोल देता है।

इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।

मुलायम सरकार के सख्त आदेश पर अयोध्या में जमा हुए निहत्थे और शांतिपूर्ण कारसेवकों पर पुलिस ने बेरहमी से गोलियाँ चला दी थीं। इस ऐतिहासिक और कड़वे सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी और कहा जाता है कि सरयू नदी का जल सनातनियों के खून से लाल हो गया था।

मुल्ला-मुलायम की मिली थी उपाधि

अयोध्या में हिंदुओं के नरसंहार की इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का रुख पूरी तरह बदल गया। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बाद में रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर दर्ज मुकदमों को भी वापस ले लिया था। राजनीतिक गलियारों में यह साफ माना गया कि यह कदम एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने और अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए उठाया गया था। इसी दौर में उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक दे दी गई थी।

आज जब अखिलेश यादव खुद को एक नए रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, तो उनकी पार्टी का यही इतिहास उनके दावों के आड़े आ जाता है। जनता के सामने यह विरोधाभास साफ दिखता है कि जिस मंदिर आंदोलन को कभी सपा ने पूरी ताकत से रोकने की कोशिश की, आज उसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और दर्शन को लेकर वे असहज नजर आते हैं।

‘चढ़ावा चोरी’ का प्रोपेगेंडा और सीएम योगी की दो-टूक चुनौती

अखिलेश यादव ने हाल ही में धार्मिक स्थलों और आयोजनों में ‘चढ़ावे और प्रबंधन’ को लेकर सवाल उठाए थे। अखिलेश ने जानबूझकर ‘चढ़ावा चोरी’ का मुद्दा उछाला ताकि इसके जरिए वह हिंदू समाज और संतों के एक वर्ग को मंदिर प्रबंधन या सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकें। यह भी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ के उसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा था, जिसके जरिए वे बहुसंख्यकों के बीच अविश्वास की भावना पैदा करना चाहते थे।

रामपुर में जनसभा को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि जो लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों पर लाठीचार्ज करवाते थे, वे आज राम भक्ति की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाते थे, वे आज भगवान राम के प्रति भक्ति की बातें कर रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी, जिसने 2017 से पहले भगवान राम और भगवान कृष्ण में विश्वास करने से इनकार कर दिया था, आज अयोध्या जाने के लिए उत्सुक है। सीएम योगी ने आगे कहा कि भगवान राम जानते हैं कि कौन सही है और कौन गलत।

सीएम योगी ने हनुमान का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि रामभक्ति हर प्रकार की बाधा को दूर करने का सामर्थ्य देती है। रामभक्ति ऐसे कालनेमियों को निपटाने में पूरी सहायक है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस पहले भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व पर सवाल उठाती थीं, लेकिन आज अयोध्या जाने की होड़ लगी हुई है।

सीएम योगी ने अखिलेश को दी मथुरा की चुनौती

इससे पहले, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार (28 जून 2026) को हाथरस में अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अयोध्या को धार्मिक नगरी बनाने की बात करने वालों को पहले अपना इतिहास देखना चाहिए। जिनकी सरकार में रामभक्तों पर गोलियां चलीं, काँवड़ यात्रा पर रोक लगी और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे धार्मिक आयोजनों तक को दबाने की कोशिश हुई। आज जब राम भक्तों के परिश्रम और पुरुषार्थ से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अयोध्या अब त्रेता युग का स्मरण करा रही है, तो इनके भी मुँह में पानी आने लग गया है। अब तैयारी करिये कि हम कृष्ण कन्हैया के लिए भी कुछ कर सकें।

उन्होंने आगे बोलते हुए कहा कि अखिलेश यादव अब मथुरा की बात करिए, अगर सचमुच अपने को धार्मिक कहलाने का प्रयास कर रहे हो तो मथुरा-वृंदावन, श्रीकृष्णजन्मभूमि पर खुलकर बोल दीजिए। उन्होंने कहा, “बोलिये कि राम जन्मभूमि मुक्ति के आंदोलन की तर्ज पर ही कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति का भी अभियान चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को भी सम्मान मिलना चाहिए। हमारी सरकार वहाँ श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का कार्य कर रही है।”

दरअसल, अखिलेश ने कहा था कि वो अयोध्या को धार्मिक नगरी में बदलेंगे। इसी के बाद सीएम योगी ने उन पर पलटवार किया और कहा, “अखिलेश में हिम्मत नहीं है, क्यों कि मुल्ला और मोलबियों के सामने घुटने टेकने के सिवाय उनके पास कोई ऐसा एजेंडा नहीं जो प्रदेश के विकास के लिए हो। अयोध्या, मथुरा या काशी के उत्थान के लिए हो, उनकी पहचान को पौराणिक पहचान दिलाने के लिए हो।”

तुष्टिकरण बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीतिक छटपटाहट यह साफ करती है कि वे एक तरफ अपने पारंपरिक मुस्लिम मतदाताओं को छिटकने नहीं देना चाहते, और दूसरी तरफ भाजपा के मजबूत हिंदू वोट बैंक में दरार डालना चाहते हैं। लेकिन राम मंदिर जैसे बेहद संवेदनशील और आस्था से जुड़े विषय पर इस तरह की बहानेबाजी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की खाई पैदा करने की कोशिशें जनता की नजरों से छिपी नहीं हैं।

1990 के कारसेवक गोलीकांड का काला इतिहास और हाल के दिनों में तुष्टिकरण की राजनीति के जो सबूत (जैसे गंगा पर इफ्तार पार्टियां) सामने आए हैं, वे समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल खोलते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौतियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मजबूत नैरेटिव के सामने अखिलेश यादव का यह नया राजनीतिक प्रयोग फिलहाल पूरी तरह असफल होता दिखाई दे रहा है।

कुल मिलाकर देखें तो अखिलेश यादव की मौजूदा रणनीति पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। चूँतकि मतदाता अब तुष्टिकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता के खेल को अच्छी तरह समझने लगा है, ऐसे में अखिलेश यादव के लिए ‘हिंदू बनाम हिंदू’ का यह प्रोपेगेंडा उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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