Homeविचारराजनैतिक मुद्दे2026: जब भारत के नेतृत्व में पश्चिमी प्रभुत्व की विश्व व्यवस्था दरकने लगेगी

2026: जब भारत के नेतृत्व में पश्चिमी प्रभुत्व की विश्व व्यवस्था दरकने लगेगी

BRICS की अध्यक्षता भारत को केवल मंच नहीं, बल्कि नियम तय करने की शक्ति दे रही है- जहाँ डॉलर, पश्चिमी वर्चस्व और चीन की सीमाएँ एक साथ उजागर होंगी।

जब परिधि में खड़े देश केंद्र की भाषा बोलने लगते हैं, तभी वैश्विक शक्ति संतुलन बदलता है। 2026 वही वर्ष है, क्योंकि 1 जनवरी से भारत ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता सँभालने जा रहा है।

औपचारिक रूप से यह दायित्व एक वर्ष- यानी 31 दिसंबर 2026 तक भारत के पास रहेगा। लेकिन इसे केवल कैलेंडर आधारित जिम्मेदारी समझना भारी भूल होगी। भारत की यह अध्यक्षता कोई रूटीन कूटनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सभ्यतागत और भू-राजनीतिक नेतृत्व परिवर्तन है। यह दायित्व भारत को उस समय मिल रहा है, जब वह वैश्विक शक्ति संतुलन के खेल में मूकदर्शक नहीं, बल्कि नियम लिखने की स्थिति में खड़ा है।

वह समय बीत चुका है जब पश्चिमी मीडिया ‘ढीला-ढाला क्लब’ कहकर ब्रिक्स का उपहास करता था। अब वह केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब, यूएई, ईरान और मिस्र जैसे देशों के प्रवेश ने इसे पेट्रो-डॉलर व्यवस्था के वास्तविक विकल्प के रूप में खड़ा कर दिया है। इस समूह ने 2024 में दुनिया का लगभग 42 प्रतिशत तेल का उत्पादन किया है।

आज वैश्विक GDP में ब्रिक्स का लगभग 40 प्रतिशत योगदान है, जो पश्चिम के कथित एलीट क्लब G-7 से काफी अधिक है। यह समूह दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी का घर है। ऊर्जा, कच्चा माल, मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता बाजार- चार मोर्चों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है। ब्रिक्स देशों के पास दुनिया का 20 प्रतिशत स्वर्ण भंडार है।

भारत: ध्रुवों के बीच की धुरी

इस ऐतिहासिक मोड़ पर ब्रिक्स का नेतृत्व सँभालने जा रहा भारत किसी एक धड़े का प्रतिनिधि नहीं है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। वह रूस का भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। अमेरिका के साथ उसके गहरे आर्थिक और तकनीकी संबंध हैं। वह चीन का प्रतिस्पर्धी भी है और उसे उसकी औकात में रखने की ताकत भी। सबसे बढ़कर भारत आज ग्लोबल साउथ की स्वाभाविक आवाज है।

लंबे समय तक पश्चिम भारत को एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ के रूप में देखता रहा। निर्धन, अव्यवस्थित और वैश्विक सहायता पर निर्भर देश के तौर पर। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते एक दशक में भारत ने इस भ्रम को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया है।

आज का भारत आत्मनिर्भर है। उसके पास विश्व-स्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। वैक्सीन डिप्लोमेसी के जरिए उसने वैश्विक भरोसा अर्जित किया है। G20 में उसने ग्लोबल साउथ को केंद्र में रखा और अब वही दृष्टि BRICS तक पहुँच रही है।

यह वस्तुतः भारतीय राष्ट्रवाद का वैश्विक विस्तार है। अब भारत का राष्ट्रवाद सीमाओं में कैद नहीं। यह सभ्यतागत नेतृत्व का दावा है।

पश्चिमी प्रभुत्व पर सबसे बड़ा प्रहार

यह केवल भारत की कहानी नहीं है। विश्व व्यवस्था के केंद्र से बाहर खड़े देश अब सवाल पूछ रहे हैं- हमारी नीतियाँ वॉशिंगटन क्यों तय करे? हमारी संस्कृति पिछड़ी क्यों कहलाए? हमारी संप्रभुता IMF की फाइलों में क्यों कैद रहे?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत इन प्रश्नों का उत्तर बनकर खड़ा है- बिना झुके, बिना पश्चिमी प्रमाण पत्र माँगे।

पश्चिम यह जानता है कि भारत के बिना ब्रिक्स न तो विस्तार पा सकता है, न विश्वसनीयता। चीन की वैश्विक छवि आक्रामक है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए उस पर कर्ज जाल में कई देशों को फँसाने के आरोप हैं। दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक में उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।

डॉलर की अनिवार्यता टूट रही है

पश्चिम को किसी सेना से सबसे अधिक डर नहीं लगता। उसे डर लगता है डॉलर के विकल्प से। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान तंत्र और ऊर्जा लेन-देन में डॉलर से दूरी- ये सभी उस व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं, जिस पर अमेरिकी शक्ति टिकी है।

याद रखिए, अमेरिका की ताकत उसकी सेना से नहीं, डॉलर की अनिवार्यता से आती है। भारत के नेतृत्व में BRICS उसी अनिवार्यता को खत्म करने की प्रक्रिया को गति देगा। इसी साल अगस्त में भारत ने अमेरिकी डॉलर (USD) के प्रभुत्व को चुनौती देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एक आधिकारिक परिपत्र जारी किया है, जिसके तहत ब्रिक्स देशों को अपना 100% व्यापार भारतीय रुपए में करने की अनुमति दी गई है।

2026: केवल भारत की BRICS अध्यक्षता ही नहीं, दिशा-निर्धारण का भी वर्ष

2026 केवल भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का वर्ष नहीं है। यह वह समय है जब अमेरिका आंतरिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा होगा, यूरोप ऊर्जा और जनसांख्यिकीय संकट में होगा और ग्लोबल साउथ पश्चिमी मॉडल पर निर्णायक प्रश्न खड़े कर चुका होगा।

इस पृष्ठभूमि में यदि भारत ब्रिक्स को विकास, संप्रभुता और बहुध्रुवीयता के साझा मंच के रूप में स्थापित करता है, तो अमेरिका की ‘हम ही नियम बनाएँगे’ वाली मोनोपॉली स्वतः कमजोर होगी। यह अमेरिका-विरोध नहीं, बल्कि अमेरिका-केंद्रित विश्व व्यवस्था के अंत की प्रक्रिया है।

आज भारत न सफाई देता है, न प्रमाण पत्र माँगता है, न उधार के नैरेटिव पर निर्भर है। BRICS की अध्यक्षता भारत को यह अवसर देगी कि वह विकासशील देशों को बताए- आधुनिकता का रास्ता पश्चिम की नकल नहीं, अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना है।

भारत अब उभरती शक्ति नहीं, निर्धारक शक्ति बनने की ओर

2026 में भारत ब्रिक्स का अध्यक्ष होगा, लेकिन असल प्रश्न यह नहीं है कि वह कितने सम्मेलन कराएगा। असल प्रश्न यह है कि- क्या भारत वैश्विक विमर्श को दिशा देगा? क्या वह डॉलर के विकल्पों को वैधता देगा? क्या वह चीन की आक्रामकता और पश्चिम के दंभ- दोनों के बीच संतुलन बना पाएगा?

उत्तर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का वैश्विक उभार देता है। यह बताता है कि अब वह उभरती शक्ति नहीं, निर्धारक शक्ति बनने की ओर है। यही तथ्य दुनिया के पुराने प्रभुओं को असहज कर रहा है।

2026 के बाद सवाल यह नहीं रहेगा कि पश्चिम गिरेगा या नहीं। सवाल यह होगा- वह इस गिरावट को कितनी गरिमा से स्वीकार करता है? क्योंकि भारत इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ राष्ट्रवाद पहली बार मानवता के साथ खड़ा दिखाई देता है। यही भारत का उभार है। यही BRICS का अर्थ है।

वाम-लिबरल विमर्श से गढ़े गए पश्चिमी प्रभुत्व के नैरेटिव को भले यह सत्य असहज लगे, पर 2026 का सत्य यही है।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत झा
अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

बुंदेलखंड की धरती के लिए सूरज की जो किरणें थी अभिशाप, अब वही साबित हो रही वरदान: जानें बंजर जमीन से सोलर एनर्जी कैसे...

बुंदेलखंड में जिस जमीन को कभी खेती के लिए अनुपयोगी माना जाता था, अब उसी जमीन पर 4995 मेगावाट बिजली बनाने की क्षमता के 8 बड़े सोलर पार्क विकसित किए जा रहे हैं।

EC के SIR अभियान पर SC की मुहर: निष्पक्ष चुनाव, नागरिकता जाँच और संवैधानिक पावर पर ‘सुप्रीम’ फैसला, जानें कोर्ट ने क्या कुछ कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया वैध है और इसका उद्देश्य चुनावी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है।
- विज्ञापन -