Saturday, July 31, 2021
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जो खुद पुलिस से भागता-छिपता रहा… आज वो चिदंबरम जनता को बगावत का पाठ पढ़ा रहा: हाय कॉन्ग्रेस, Bye कॉन्ग्रेस

जनता की यादों से वह सीन अभी तक धूमिल नहीं हुआ होगा जब चिदंबरम गिरफ़्तारी से बचने के लिए पुलिस से भाग रहे थे। जनता तो यह भी नहीं भूली होगी कि उनके पुत्र ने कैसे-कैसे कांड किए हैं। फिर 'बगावत वाला नैतिक ज्ञान' कहाँ से?

पिछले एक वर्ष में विपक्ष की कुल भूमिका में दो तिहाई भूमिका कॉन्ग्रेस के नेताओं की रही है। राहुल गाँधी को जब भी संदेश देने की इच्छा हुई, वे किसी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ के साथ चर्चा करते दिखे। देश इतना आलसी कि चर्चा में उनके द्वारा प्रयोग किए गए दर्शन, छायावादी संदेश, मैनेजमेंट स्किल वगैरह को डीकोड करने के कठिन काम से कतराता रहा और दुनिया भर के बड़े-बड़े विशेषज्ञों के साथ की उनकी बातचीत को कॉमडी वीडियो बताकर डिस्कार्ड करता रहा।

उसके बाद और कॉन्ग्रेस नेता मैदान में आए। उन्होंने सरकार को तथाकथित सकारात्मक सलाह देने से लेकर गाली तक देने का काम किया। किसी ने बताया कि PM केयर फंड बनाकर देश के साथ छल किया गया है तो किसी ने बताया कि कोरोना पर काबू पाने को लेकर सरकार गंभीर नहीं है। यह बात अलग है कि इसी PM केयर फंड द्वारा भेजे गए वेंटिलेटर कॉन्ग्रेस शासित पंजाब और झारखंड में वैसे ही रखे रह गए और कभी किसी अस्पताल में लगाए नहीं गए। महाराष्ट्र सरकार कोरोना की पहली लहर को भी काबू में न कर सकी। राजस्थान सरकार की प्राथमिकताएँ बार-बार लोगों को दिखाई दी।

देश में बनने वाले कोरोना के टीके को लेकर बार-बार अफ़वाहें फैलाई गईं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के साथ उनके एक और मंत्री ने टीके को लेकर जनता में भ्रम पैदा करने की कई बार कोशिश की। कॉन्ग्रेस के नेता इस बात पर बार-बार बोले कि राज्यों को अपने नियम बनाने की स्वतंत्रता दी जाए और जब स्वतंत्रता दे दी गई तो इन्हीं नेताओं ने कहना शुरू किया कि केंद्र सरकार ने पल्ला झाड़ लिया। विदेशी वैक्सीन के आयात को लेकर माहौल बनाया गया। केंद्र सरकार ने जब पैंतालीस वर्ष की आयु से ऊपर वालों को पहले टीका लगाना अपनी प्राथमिकता बताया तो कॉन्ग्रेस ने हर नागरिक को टीका देने की बात न केवल कही बल्कि उसका माहौल भी बनाया और जब केंद्र ने टीकाकरण के तृतीय चरण की घोषणा की तो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों ने सबसे पहले यह कहा कि वे इस अभियान को शुरू नहीं कर सकेंगे।

दूसरी लहर इतनी तेज है कि देश भर की स्वास्थ्य व्यवस्था उसकी मार सहन नहीं कर पा रही। लगभग हर राज्य में संक्रमण इतनी तेज़ी से बढ़ा है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था वाले दुनिया के विकसित देश भी ऐसे संक्रमण को रोक पाने में सक्षम न होते। ऐसा नहीं कि सिस्टम की कमी उजागर नहीं हुई है। कोई ऐसा नहीं मानता पर कौन सी स्वास्थ्य व्यवस्था होती जो ऐसे विकट संक्रमण के सामने खड़ी हो पाती? डॉक्टर मनमोहन सिंह ने केंद्र को पत्र लिखकर सुझाव देने के नाम पर क्या किया, वह सबके सामने है।

इन सब के बीच सरकार की कमियों पर उसकी आलोचना अवश्य होनी चाहिए पर गत एक वर्ष से विपक्ष की लगातार नकारात्मक राजनीति ने अब एक नया ही मोड़ ले लिया है। कॉन्ग्रेसी नेताओं की इस नकारात्मक राजनीति की वर्षों पुरानी गौरवशाली परंपरा को तब एक नया आयाम मिला, जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जनता को सुझाव दिया कि वह सरकार के विरुद्ध बग़ावत कर दे। जो नेता कड़ी से कड़ी मेहनत करके देश के सबसे पुराने दल को पाँच सौ पैंतालीस सांसदों की लोकसभा में पचपन सीटें नहीं दिला पाते वे जनता को सुझाव दे रहे हैं कि वह सरकार के विरुद्ध बग़ावत कर दे। हो सकता है इस विश्वास के साथ दे रहे हों कि जनता उनकी बात मान ही लेगी और बग़ावत कर देगी।

किसी सरकार से परेशान होकर बग़ावत करना या न करना तो जनता के हाथ में है पर क्या ऐसे सुझाव देने के लिए पास रहने वाला नैतिक बल हर किसी के पास है? क्या चिदंबरम एक बार आत्मनिरीक्षण करेंगे कि वे कौन हैं? कि उनके और उनके परिवार के ऊपर कैसे-कैसे आरोप और चार्जशीट हैं? जनता की यादों से वह सीन अभी तक धूमिल नहीं हुआ होगा जब चिदंबरम गिरफ़्तारी से बचने के लिए पुलिस से भाग रहे थे। अभी तक जनता नहीं भूली होगी कि उनके पुत्र ने कैसे-कैसे कांड किए हैं। कि महाराष्ट्र से लेकर बंगाल तक कितने स्कैम में उनका या उनके परिवार का नाम है। यूपीए के दिनों के सबसे ताकतवर माने जाने वाले मंत्री की करतूतें किसे याद न होंगी?

यूपीए सरकार के स्कैम किसे याद नहीं हैं? किसे याद नहीं कि पिछले सत्तर वर्षों में लोकतांत्रिक मूल्यों की बात पर कॉन्ग्रेस और कॉन्ग्रेसी बार-बार कहाँ खड़े दिखाई दिए हैं? इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल से लेकर यूपीए तक कॉन्ग्रेस ने लोकतंत्र में अपने अविश्वास को कैसे-कैसे और कितनी बार अपने कर्मों से उजागर नहीं किया है? पर आपातकाल, जो कि एक असामान्य घटना थी, को छोड़ कर कभी किसी विपक्षी नेता ने जानता को बग़ावत के लिए इस तरह से उकसाया है? जब भी ऐसा समय आया है, विपक्ष चुनाव का सहारा लेकर ही राजनीतिक लड़ाई लड़ने के पक्ष में दिखाई दिया।

जिन बातों के आधार पर चिदंबरम जनता को बग़ावत की सलाह दे रहे हैं उन बातों की गंभीरता और उनकी सत्यता को लेकर बहस एक अलग बात है पर बग़ावत के लिए उकसाना क्या किसी भी दृष्टि से एक अच्छे लोकतंत्र की बात हो सकती है? वो भी तब जब देश एक असाधारण महामारी से जूझ रहा है? दुनिया भर के देश इस महामारी से पीड़ित हुए हैं। विकसित अमेरिका से लेकर अति विकसित यूरोप तक, कौन सा देश ऐसा है जो इससे अछूता रहा हो? जहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था ने हाथ खड़े न कर दिए हों? पर क्या वहाँ के विपक्ष ने भी उन देशों की जनता को बग़ावत करने का सुझाव ही दिया होगा?

भारतवर्ष आज कोरोना से पीड़ित है। हो सकता है कल और अधिक पीड़ित हो जाएँ पर ऐसा नहीं हो सकता कि हमेशा पीड़ित ही रहेगा। ऐसा नहीं होगा कि यह संकट देश से जाएगा ही नहीं। अवश्य जाएगा पर चिदंबरम का बग़ावत वाला यह सुझाव जनता को हमेशा याद रह जाएगा। साथ ही यह भी याद रहेगा कि कैसे विपक्ष के एक नेता या एक दल ने संकट की घड़ी में लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रखकर ऐसी बात कही थी जो दीर्घकालिक दृष्टि से देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए न केवल घातक थी बल्कि दुनिया भर में स्वस्थ्य लोकतंत्र की परम्पराओं पर काला धब्बा थी।

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