Thursday, October 1, 2020
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जब चीनी मीडिया नेहरू को ‘साम्राज्यवाद का दौड़ता कुत्ता’ कहती थी, तब नेहरू लोकसभा में अक्साई चीन को लेकर झूठ बोल रहे थे

नेहरू द्वारा तब तक इस तथ्य को छुपाने के इस दावे की पुष्टि कुछ ही वर्ष पहले सीआईए (CIA) द्वारा सार्वजानिक किए गए एक डॉक्यूमेंट में भी होती है। सीआईए द्वारा जारी किए गए इन डॉक्यूमेंट्स में इस बात का खुलासा किया गया था कि अक्साई चिन तक आने वाली सड़क को बहुत पहले ही बना लिया गया था और भारत के लोगों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलने दिया गया।

चीन द्वारा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के कुछ कटु अनुभवों का नतीजा है। भ्रमजीवी मीडिया लाख प्रयास करें फिर भी वह ये सत्य नहीं छुपा सकते कि लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में हो रही सैनिकों की रक्तरंजित झड़प युगद्रष्टा जवाहरलाल नेहरू के मन में पलने वाली कम्युनिस्ट राज्य के ‘माओ-चाऊ व्हाट्सएप ग्रुप’ का सदस्य बनने की इच्छा का ही परिणाम है।

हालाँकि, बावजूद इन सभी तथ्यों के, नेहरू के नमक में डूबे ‘नेहरूवादी दल’ तत्परता से अपने उस भूलों के पर्याय ‘महानायक’ के लिए फील्डिंग करते देखे जा सकते हैं, जिसकी छत्रछाया में वो आज किसी की फील्डिंग करने लायक बन सके हैं।

चीन की सेना द्वारा पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में किए जा रहे उपद्रव के बाद सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल्स तक में प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए बयानवीर यह कहते सुने जा रहे हैं कि मोदी ने चीन के सामने समर्पण कर दिया है। राहुल गाँधी तो पीएम मोदी को ‘सरेंडर मोदी’ तक कह चुके हैं।

लेकिन क्या पूर्वी लद्दाख की सीमा पर चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत ने पहली बार अपने जवान खोए हैं? क्या वास्तव में चीन को लेकर भारत की स्थिति आज नेहरू के समय से कमजोर है? लेकिन प्रमाण तो यह बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने यही बात स्वीकार करने में कई वर्ष गँवा दिए कि लद्दाख में कुछ हो रहा है, जो ‘चिंताजनक’ है।

इस समयावधि में भारत ने लद्दाख में अपनी सीमा के एक बड़े भू-भाग को ही नहीं, बल्कि कई जवानों तक को खो दिया था, लेकिन उस दौरान साम्राज्यवादी कम्युनिस्टों के देश में ‘चाऊ-माओ’ (चाऊ एन-लाइ और माओत्से तुंग) के बीच अपने लिए वैश्विक छवि तलाश रहे नेहरू को कभी इतनी फुर्सत नहीं हो सकी कि वह इस बात की सार्वजानिक घोषणा करते या कम से कम इसे स्वीकार करते।

आज बात-बात में ’56 इंच’ की डिबेट करने के लिए उत्सुक भारतीय मीडिया शायद ही यह तथ्य जानता हो या स्वीकार करने की हिम्मत रखता हो कि जवाहरलाल नेहरू जब चाइनीज कम्युनिस्ट कॉकटेल का हिस्सा बनने और उनकी वाहवाही के लिए मरे जाते थे, तब चाइनीज आधिकारिक मीडिया नेहरू के लिए जो विशेषण इस्तेमाल करता था वो कुछ इस तरह थे – ‘ब्रिटिश साम्राज्यवादी और दौड़ता कुत्ता’ (Running dog of imperialism), ‘राष्ट्रवाद का नाटक करने वाला नेहरू’, ‘च्यांग-काई-शेक का दूसरा नाम’।

मीडिया के एक हिस्से के भ्रमजीवियों की मानें तो 1962 में नेहरू द्वारा संसद में पहली बार जब अक्साई चीन का नाम लिया गया था, तब तक भारत के गश्ती दलों ने चीन के साथ झड़प में जान नहीं गँवाई थी? जबकि सवाल यह बनता है कि क्या तब तक जवानों के बलिदान और चीन की घुसपैठ को तत्कालीन सरकार ने स्वीकार किया था?

यह सब उस दौर की बात है जब भारत में सूचना और संचार के माध्यम आज के चीन जितने ही उपलब्ध हुआ करते थे। यह दौर तथ्यों के व्हाइटवाश का ‘स्वर्णिम युग’ था। दोहरे संवाद की तो गुंजाईश तक नहीं थी, जो जनता तत्कालीन प्रधानमंत्री को ट्विटर पर टैग कर उनसे ‘लद्दाख में क्या चल रहा है?’ जैसे सवाल करती।

एक तरह से देखा जाए तो मीडिया की जो स्थिति आज चीन की है, वह उस दौरान भारत की हुआ करती थी। हालाँकि, भारत की मजबूरी तब संशाधन-विहीनता थी। संसद ही उस समय आम लोगों और राजनेताओं की सूचना का प्रमुख जरिया हुआ करता था।

आख़िरकार जब सीमा पर हो रही हलचल की बातें खुलने लगीं तो नेहरू द्वारा दबाई गई सभी जानकारियों का ठीकरा नेहरू की कमजोर याददाश्त पर थोप दिया गया। यह तब की बात है जब चीनी आक्रमणकारियों ने तिब्बत को अपने नियन्त्रण में ले लिया था और कम्युनिस्टों को महत्व देने वाले नेहरू ने तिब्बत की बजाए चीन के पक्ष में अपना झुकाव रखा।

तिब्बत की धार्मिक पृष्ठभूमि पर चायनीज कम्युनिस्ट सत्ता के इस बलात अतिक्रमण पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी क्योंकि उस समय चीन में भारत के राजदूत माधव पणिक्कर ने नेहरू को ‘एशिया में शांति का सूत्र’ देते हुए सलाह दी थी कि यदि इस समय चीन का साथ दिया जाए और उनसे दोस्ताना सम्बन्ध रहे तो आगे वही उनके काम आ सकते हैं।

तिब्बत में चीन ने भारत तक सड़क बनाने का काम 1950 के दशक में ही शुरू कर दिया था। लेकिन नेहरू ने अगस्त 1959 तक भी इस तथ्य को छिपाकर रखा। जब यह समाचार किसी भी प्रकार छुपा पाना नेहरू के लिए गले की हड्डी बन गया तब एक दिन आखिरकार लोकसभा में यह खबर रख दी गई और नेहरू ने कहा कि ‘तिब्बत-सिंकियांग हाइवे’ बना दिया गया है।

नेहरू द्वारा तब तक इस तथ्य को छुपाने के इस दावे की पुष्टि कुछ ही वर्ष पहले सीआईए (CIA) द्वारा सार्वजानिक किए गए एक डॉक्यूमेंट में भी होती है। सीआईए द्वारा जारी किए गए इन डॉक्यूमेंट्स में इस बात का खुलासा किया गया था कि अक्साई चिन तक आने वाली सड़क को बहुत पहले ही बना लिया गया था और भारत के लोगों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलने दिया गया।

सीआईए द्वारा बाहर लाए गए इन टॉप सीक्रेट में जुलाई 15, 1953 में लिखा गया एक नोट भी था जिसमें भारत की उत्तरी सीमाओं को लेकर कुछ जानकारी मौजूद थीं। इसका शीर्षक था- ‘चाइनीज कम्युनिस्ट ट्रूप्स, वेस्ट तिब्बत, रोड कंस्ट्रक्शन, सिंकियांग टू तिब्बत एंड लद्दाख’ (सिंकियांग से तिब्बत और लद्दाख तक सड़क का काम/Chinese Communist Troops, West Tibet, Road Construction, Sinkiang to Tibet and Ladakh)

अक्साई चिन

यह नोट उन सभी दावों की पुष्टि करता था, जिनका अब तक कितने ही भारतीय इतिहासकार सिर्फ अनुमान लगाते रहे थे, यानी चीन ने 1950 के दशक की शुरुआत में ही भारतीय क्षेत्र में एक सड़क का निर्माण शुरू कर दिया था।

यह खुलासा वर्ष 1959 में तब हुआ, जब सीआरपीएफ़ का 70 जवानों का एक गश्ती दल पूर्वी लद्दाख स्थित अक्साई चिन में देश की सीमा रेखा खींचने के लिए पास को क्रॉस कर रहा था, यहाँ उन्हें चीन की PLA (पीपल्स लिबरेशन पार्टी) के लोगों ने रोक लिया।

अक्टूबर 20, 1959 में चीनी सैनिकों ने 3 भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया और अगले दिन 9 जवान मार दिए गए जबकि 7 को बंधक बना लिया था। यह विषय अब इतना गंभीर हो चुका था कि अब नेहरू के पास इस तथ्य को सार्वजनिक करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प शेष नहीं था कि अक्साई चिन क्षेत्र पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया है।

यानी, तकरीबन एक दशक पहले से जो काम भारत की उत्तरी सीमा पर हो रहा था, दिल्ली को तब इसकी भनक तक नहीं थी या शायद तत्कालीन भारतीय नेतृत्व तब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत को ऐसी ऐतिहासिक विवादादास्पद धरोहरें देने में व्यस्त था और उसे फर्क ना पड़ता हो कि ‘लद्दाख की उस बंजर भूमि’ में कुछ उगता भी है या नहीं!

संसद में नेहरू का झूठ

इतनी लम्बी अवधि तक लोगों को गुमराह करने के बाद बजाए चीनी सेना के अतिक्रमण को स्वीकार करने के, तब नेहरू ने संसद में बिना अक्साई चिन का नाम लिए बयान दिया था- ”हमारे देश की ज़मीन पर कोई दावा नहीं किया गया है।”

अप्रैल 22, 1959 को लोकसभा में चीन द्वारा भारत के हिस्से को अपने नक़्शे में दिखाने को लेकर चल रही बहस के दौरान नेहरू का जवाब था –

“नहीं सर, मैं माननीय सदस्यों को सुझाव दूँगा कि वे कभी-कभी हांगकांग से और कभी-कभी अन्य विषम स्थानों से निकलने वाली खबरों पर ज्यादा ध्यान न दें। हमारे ऊपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है। मेरे लिए उस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। हमने एक या दो छोटे सीमांत विवादों पर चर्चा की है जिसमें क्षेत्र के छोटे पथ शामिल हैं, शायद इस तरह से एक मील या ऊँचे पहाड़ों में, जहाँ कोई भी नहीं रहता है और जो लंबित हैं। हमने उनकी चर्चा की है और वर्तमान में कोई समझौता नहीं हुआ है।”

खुद को अक्साई चिन जैसी किसी चीज से एकदम अनजान बताने का प्रयास करते हुए नेहरू ने कहा- “कुछ चीनी एक मील आगे बढ़े हैं या दो.. शायद, ऊँचे पहाड़ों में। यह सत्य है। हम इसमें पूछताछ कर रहे हैं।” इस सबके बीच नेहरू पंचशील जैसे कागजी भरोसों से चीन के कम्युनिस्ट नेतृत्व को खुश करने में ही तल्लीन नजर आते थे।

नेहरू की मित्रता शायद ही अपनी निजी छवि और गौरव के अलावा किसी अन्य चीज से रह सकी हो। यदि ऐसा न होता तो भारत आज भी अपने पहले प्रधानमंत्री की भूलों के लिए अपने सैनिकों का बलिदान नहीं दे रहा होता और कॉन्ग्रेस इन सैनिकों के बलिदान में अपने सत्ता में लौटने का मार्ग नहीं तलाश रही होती।

ख़ुफ़िया विभागों से मिली जानकारी के बावजूद चुप थे नेहरू

जवाहरलाल नेहरू सरकार के दौरान इंटेलिजेंस चीफ बीएन मलिक ने भी इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा था कि ख़ुफ़िया विभाग को उनके जासूसों ने चाइनीज पीएलए की घुसपैठ की जानकारी देते हुए 1952 में ही बता दिया था कि करीब 2000 चीनी मजदूरों को अक्साई चीन इलाके में खच्चर और घोड़ों की जगह गाड़ी का रास्ता तैयार करने के काम में लगा दिया गया है।

1953 तक भारत सरकार को इस बात की स्पष्ट जानकारी थी कि गाड़ी का रास्ता पश्चिमी तिब्बत के रुडोक तक तैयार किया जा चुका है। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने ख़ुफ़िया विभागों की रिपोर्ट तक को कोई महत्व नहीं दिया था। इस सबके बाद 1962 की वह अपमानजनक हार नेहरू के खाते आई।

नेहरू के ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ के नारों के परिणामस्वरूप कई भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गँवाई और आज एक बार फिर उसकी कीमत चुकाते नजर आ रहे हैं। और नेहरूघाटी सभ्यता के पत्रकार इस विश्लेषण में व्यस्त हैं कि क्या मोदी के नेतृत्व ने चीन के सामने समर्पण कर दिया है?

चीन की मीडिया जहाँ कुछ दिन पहले तक चीनी सैनिकों के साथ हुई इस हिंसक झड़प को ही नकार रही थी, वहीं अब यह कहते नजर आने लगी है कि चीन ने भी अपने अफ़सर गँवाए हैं हालाँकि वह स्पष्ट रूप से आँकड़े सामने नहीं रख रहे।

रही भारत के पड़ोसी देश नेपाल की बात, तो उसका इस्तेमाल विस्तारवादी कम्युनिस्ट चीन हमेशा से ही समय-समय पर विश्व का ध्यान भटकाने के लिए करता आया है। इस समय चीन लगभग हर बड़ी-छोटी आर्थिक महाशक्ति के निशाने पर है।

चीन ने इस बार एक बड़ी भूल करते हुए भारत के वर्तमान नेतृत्व को भी नेहरू जितना ही अकर्मण्य और सेना के हितों के प्रति उदासीन मान लेने की कर डाली है। चीन का मानना शायद यह था कि वर्तमान सरकार को भी नेहरू की तरह ही पंचशील की आड़ में तिब्बत से पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर करने जितना ही आसान काम होगा।

नेहरु ने तिब्बत से पीछे हटने को लेकर 1954 में लोकसभा में बयान दिया था – “सच तो यह है कि अगर हम उन्हें छोड़ने पर राजी नहीं होते तो हमें भी छोड़ना पड़ता।”

यह वही तिब्बत था, जिसे ऋग्वेद में ‘त्रिवष्टप’ नाम से बुलाया गया है, जो भारतभूमि का एक पवित्र हिस्सा था, जो कनिष्क और कुषाण वंश के प्रदेश थे , जिसे नेहरू ने चीन को सौंप दिया था। वर्ष 1949 तक यह तिब्बत स्वतंत्र राष्ट्र था और नेहरू ने विस्तारवादी चीन को इसे हथियाने में अनुचित सहयोग कर एक और विरासत अपनी ‘वैश्विक छवि’ के नाम कर दी।

नेहरू का तिब्बत के पक्ष पर मौन और तिब्बत में चीनी आक्रमणकारियों की सेना के प्रवेश को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के समर्थन की नीति का विरोध तब युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। वाजपेयी ने अगस्त, 1959 में भारतीय संसद में तिब्बत की मदद के बजाए आक्रमणकारियों के साथ खड़े होने वाली तत्कालीन नेहरू सरकार को कोसते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बतियों को उनके ही देश में अल्पसंख्यक बना देने वाले चीन को मान्यता दिलाने के लिए भारत एक हद से आगे जाकर उनके साथ खड़ा है।

और यह सब जवाहरलाल नेहरू की नाक के ठीक नीचे और उनके ‘दूरदर्शी फैसलों’ से ही सम्भव हुआ। नतीजा यह हुआ कि इन फैसलों के कारण नेहरू कभी ‘माओ-चाऊ’ के व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा भी नहीं बन सके और आज जब भी चीन आँख भारत को आँख दिखाने की कोशिश करता है, तो न चाहते हुए भी नेहरू का स्मरण हो आता है।

जो आज कहते हैं कि मोदी ने समर्पण किया है, चीन ने पहली बार भारत के सैनिकों का खून अगर कभी बहाया है तो वह मोदी सरकार के दौरान हुआ है, उन्हें इतिहास के उन पन्नों को जाकर टटोलना चाहिए जहाँ नेहरू के फैसलों की शर्मिदगी के अलावा बाकी कुछ भी नहीं है।

सत्य यही है कि नेहरू ने जवानों का खून भी बहने दिया था, उस बलिदान को स्वीकार तक नहीं किया, तथ्यों की लीपापोती की, सीमा भी चीन को सौंप दी थी, चीनियों की चाटुकारिता के लिए भारतीय सेना को कभी पूरी तरह विश्वास में नहीं लिया।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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