लगातार तीन लोकसभा चुनावों में हार झेलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी की बेचैनी अब साफ नजर आने लगी है। केंद्र की सत्ता से एक दशक से बाहर रहने के बाद पार्टी के नेताओं के बयानों में आक्रामकता और हताशा दोनों दिख रही हैं।
आरोप लग रहे हैं कि कॉन्ग्रेस अब आत्ममंथन की बजाय सड़क पर असंतोष खड़ा कर राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है। यही वजह है कि नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसा और आगजनी भी कॉन्ग्रेस को गलत नहीं लग रही। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का रुख ही देख लीजिए।
उन्होंने उपद्रवियों की भूमिका पर सवाल उठाने के बजाय सीधे मोदी मॉडल को जिम्मेदार ठहरा दिया। यह तब है जब जाँच एजेंसियाँ साफ संकेत दे रही हैं कि हिंसा में मजदूरों के साथ-साथ बाहरी तत्व भी शामिल हो सकते हैं और बड़ी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा।
सुप्रिया श्रीनेत का सरकार पर हमला
श्रीनेत ने कहा, “क्या यह सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सिर्फ अरबपतियों के लिए है? क्या यही नरेंद्र मोदी का क्रूर अमृत काल है, जहाँ देश को लूटकर कुछ लोगों को अमीर बनाया जा रहा है और जो लोग देश बनाते हैं उन्हें बदहाल छोड़ा जा रहा है?”
नरेंद्र मोदी और BJP यह बताते नहीं थकते कि भारत दुनिया की Fastest growing इकॉनमी है, चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, हम विश्वगुरु हैं, वगैरह वगैरह…
— Congress (@INCIndia) April 15, 2026
इसके साथ ही देश का मीडिया – हर टीवी चैनल, रेडियो, अखबार तुरंत सरकार के सुर में सुर मिलाने लग जाते हैं, लेकिन इसी गाने-बजाने और… pic.twitter.com/WSOui7EQmv
उन्होंने आगे कहा, “मोदी सरकार ने नवंबर 2025 में 4 लेबर कोड बिना किसी चर्चा के लागू कर दिए, जिससे काम के घंटे 12 घंटे तक बढ़ गए। आज उसी आधार पर शोषण हो रहा है। सरकार जब भी कोई नीति लाती है, उसका नुकसान कर्मचारियों और मजदूरों को होता है, जबकि अडानी जैसे लोगों के लिए सब ठीक रहता है।”
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर सरकार समय रहते ध्यान नहीं देगी तो आने वाले दिनों में हालात और खराब होंगे क्योंकि भाषण से पेट नहीं भरता और नारे से घर नहीं चलते।”
हैरानी की बात यह रही कि कॉन्ग्रेस ने इस पूरी घटना को एक सकारात्मक संकेत की तरह पेश किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि “देश कम से कम अब हिलना शुरू हो गया है।”
श्रीनेत ने कहा, “लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है। लोगों का सब्र टूट चुका है और अब वे अपने हक की माँग कर रहे हैं। आप कुछ भी कहिए, लेकिन देश अब हिलना शुरू हो गया है।”
जाँच एजेंसियों का दावा, साजिश की आशंका
दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों का कहना है कि नोएडा हिंसा में बाहरी तत्वों की भूमिका है। मामले में संगठित दुष्प्रचार, अशांति फैलाने की साजिश, यहाँ तक कि पाकिस्तान और नक्सली कनेक्शन तक की जाँच की जा रही है।
लेकिन कॉन्ग्रेस ने इन दावों को खारिज करने की कोशिश की। श्रीनेत ने कहा, “सरकार समाधान ढूँढने की बजाय इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता रही है। वे पाकिस्तान का हाथ बता रहे हैं। मतलब अपने हक के लिए आवाज उठाना भी अब साजिश हो गया है?”
हिंसा को आंदोलन की तरह पेश करने का आरोप
आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस इस तरह की घटनाओं को एक बड़े जनआंदोलन या क्रांति की शुरुआत के रूप में पेश कर रही है। यानी सड़क पर हो रही हिंसा और तोड़फोड़ को एक राजनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
उदाहरण के लिए 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ आंदोलन के दौरान सोनिया गाँधी ने ‘आर या पार की लड़ाई’ का नारा दिया था। उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने और कुर्बानी देने तक की बात कही थी।
शुरुआती शांतिपूर्ण प्रदर्शन जल्द ही चक्का जाम और हिंसा में बदल गए। शरजील इमाम जैसे लोगों ने देश को बांटने और रास्ते जाम करने की बात कही, वहीं उमर खालिद जैसे लोगों पर दंगों के लिए गुप्त बैठकों के जरिए लोगों को भड़काने के आरोप लगे।
बाद में इन प्रदर्शनों ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया था। वही 2025 में वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें कई जगह हिंसा देखने को मिली खासकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में उस समय भी कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार के खिलाफ हमलावर थे।
राहुल गाँधी के चुनावी आरोप
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से लगातार EVM, VVPAT, वोटर लिस्ट और फर्जी वोटरों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाए, लेकिन इन दावों का अब तक कोई ठोस असर नहीं दिखा।
कॉन्ग्रेस ने ‘जितनी आबादी उतना हक’ जैसे नारे के जरिए जाति आधारित राजनीति को भी हवा देने की कोशिश की है। इसमें आरक्षण बढ़ाने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मुद्दे शामिल हैं। अब कॉन्ग्रेस मजदूरों के वेतन और अधिकारों के मुद्दे के साथ-साथ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने यानि डिलिमिटेशन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।
सड़क से सत्ता तक का रास्ता?
कॉन्ग्रेस का मौजूदा रुख यह संकेत देता है कि पार्टी सरकार के खिलाफ जन असंतोष को एक बड़े आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। ‘देश हिलना शुरू हो गया है’ जैसे बयान इसी रणनीति की तरफ इशारा करते हैं, जहाँ सड़क पर हो रही हलचल को राजनीतिक बदलाव के अवसर के रूप में देखा जा रहा है जैसा हुमए नेपाल और बांग्लादेश में देखने को मिला भले ही उसमें हिंसा और अराजकता के तत्व क्यों न शामिल हों।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


