दलाल, हरामज़ादा, पूतना, दरिंदा, चोर, भड़वा आदि आराम से क्यों बोलने लगे हैं हमारे नेता?

ऐसा भी नहीं है कि गिरिराज सिंह ने जो कहा वो संदर्भ बताने पर सही नहीं है, क्योंकि विपक्ष ने तो मोदी को हिटलर से लेकर ज़हर की खेती करने वाला, चूहा, मास मर्डरर, दरिंदा, भड़वा, मेंढक, दिमाग़ी रूप से दिवालिया, मौत का सौदागर, बर्बादी लाने वाला, रावण, यमराज, और पागल कुत्ता तक कहा है।

हम, आप, बाकी पूरी दुनिया के समझदार लोग कई बात कई बार बोलते हैं जिनमें से ‘मानवता हुई शर्मसार’ सबसे ज्यादा बार इस्तेमाल होता है। मानवता के शर्मसार होने का एक राजनैतिक समकक्ष भी है जो हम आम लोग और राजनेता भी बार बार इस्तेमाल करते हैं: ‘पॉलिटिक्स हैज़ टच्ड अ न्यू लो’ या राजनीति ने नए न्यूनतम स्तर को छू लिया है। 

अगर ये बात बार-बार कही जा रही हो तो इसका मतलब है कि दिनोंदिन राजनीति गिरती ही जा रही है। राजनीति से यहाँ मतलब नेताओं की बयानबाज़ी से है। हमेशा कोई आकर कुछ ऐसा बोल जाता है कि लगता है इससे बुरा कोई क्या बोलेगा आज के दौर में। ताज़ातरीन बयान है गिरिराज सिंह द्वारा ममता बनर्जी को ‘पूतना‘ और ‘किम जोंग उन‘ कहने का। 

अभी एक ख़बर आई कि गिरिराज सिंह ने ममता बनर्जी को ‘पूतना’ और ‘किम जोंग उन’ कहा है। भाजपा समर्थकों और ममता विरोधियों को ऐसे बयान सुनकर बहुत आनंद मिलने लगता है, लेकिन ऐसे बयानों को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। इस तरह के बयान देकर आप कल को मर्यादा और गरिमा नामक शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते।

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ये बयान कम और बेहूदगी ज़्यादा है। इस तरह के कई बयान भाजपा नेताओं ने कई बार दिए हैं। कभी बेकार की बातों पर पाकिस्तान भेजने की बात, तो कभी ‘रामजादा‘ कहना, भाजपा और सहयोगी दलों के कुछ नेता इस तरह के वाहियात बातें कहने के लिए ही ख्याति प्राप्त करने लगे हैं। ऐसे ही राहुल गाँधी ने राफ़ेल जपने, ‘चौकीदार चोर है‘ कहने से पहले, सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति करते हुए मोदी को ‘ख़ून की दलाली‘ करने वाला कहा था। 

बात मोदी या भाजपा, राहुल या काँग्रेस की नहीं है। भाजपा ने भी ऐसे ही विचित्र बयान दिए हैं जिससे शर्मसार राजनीति और भी शर्मसार होती चली गई है। सोनिया गाँधी का ‘ज़हर की खेती‘ वाला बयान भी सामने आता है। फिर याद आता है केजरीवाल का ट्वीट जिसमें उन्होंने मोदी को ‘कायर और विकृत मानसिकता वाला‘ (कावर्ड एण्ड अ साइकोपाथ) कहा था। 

इसी श्रृंखला में देखिए तो मोदी द्वारा लिए गए नए-नए नाम, ‘रोज़ जंगलराज का डर‘ (RJD), ‘जनता का दमन और उत्पीड़न‘ (JDU) याद आता है। फिर नितीश का ‘बड़का झूठा पार्टी‘ (BJP) याद आता है। मोदी का मज़े लेकर ‘शहज़ादे‘, ‘50 करोड़ की गर्लफ़्रेंड’, ‘जीजाजी‘ बोलना भी याद आता है। काँग्रेस का मोदी को अपनी ‘माँ और बीबी को छोड़ने वाला‘ कहना आदि याद आता है। बात पार्टी से नेता और फिर एकदम निजी स्तर तक पहुँच गई।

ये क्यों होता है? आज के दौर में इंटरनेट, और आम जनता जो समाचार देखती-पढ़ती है, दो खेमें में बँट जाती है। सब एक विचारधारा पकड़ लेते हैं। एक आदमी या तो राष्ट्रभक्त है, या राजद्रोही। ये दोनों परिभाषाएँ भी ये खुद तय करते हैं। कोई मोदी भक्त है, कोई आपटार्ड है। कोई राहुल गाँधी को पप्पू कहता है, कोई केजरीवाल को युगपुरूष, कोई मोदी को फेंकू। 

बातचीत का स्तर हर दिन गिरता जा रहा है और इसी को हमारे नेता भुना रहे हैं। जहाँ एक गाली देकर काम चल जाए, वहाँ लंबा भाषण क्यों दें? जहाँ सिर्फ चुटकुलेबाजी से काम चल जाए वहाँ कोई विकास के मुद्दे पर क्यों बोलेगा? जहाँ आदमी हिंदू राष्ट्र माँग रहा है वहाँ नवाजुद्दीन के रामलीला से निकाले जाने पर वो क्यों दुखी होगा?

जहाँ लोगों को प्रधानमंत्री की हर बात झूठी लगती है वो आखिर सेना की नीयत पर सर्जिकल स्ट्राइक के विडियो माँगकर संदेह क्यों नहीं प्रकट करेगा? जहाँ ये बोलकर ही काम चल जाए कि मोदी हमें काम करने नहीं देता वहाँ काम करने की क्या जरूरत है क्योंकि आपकी पार्टी के समर्थक तो इसी में ख़ुश हैं! जहाँ लोग ‘पचास हजार करोड़ चइए कि साठ हजार करोड़?’ पर ही ताली पीट ले रहे हों, वहाँ विकास की बात करके क्या मिलेगा?

एक दौर था जब विपक्ष सत्तारूढ़ की इज़्ज़त करता था और उनसे इज़्ज़त पाता था। एक दौर था जब विपक्ष के नेता सत्ता के नेताओं की बड़ाई करते थे, और उन्हें भी वापस में वही सम्मान मिलता था। आज टीवी और सोशल मीडिया के दौर में बड़ा, शक्तिशाली और समझदार वो है जो सामने वाले को सबसे विचित्र और गिरे हुए संबोधनों से नवाजता है। 

आज समर्थक ‘रामजादा’ और ‘साइकोपाथ‘ दोनों को अपने अपने हिसाब से डिफ़ेंड करते हैं क्योंकि उन्हें सामने वाले का कहा गाली लगती है और अपने नेता वाला सटीक चित्रण। आज ज़हर की खेती, ख़ून की दलाली, सूटबूट की सरकार आदि का प्रयोग वो भी कर रहे हैं जिनके हाथ हर तरह के दंगों और सेना से संबंधित घोटालों से सने हैं।

इस तरह के बयानों को अगर ग़ौर से देखें तो पाएँगे कि ये तब आते हैं जब सामने वाला अपनी हार मान चुका होता है। जब सामने वाले को लगता है कि इस चुनाव में बाकी बातों से हमारे लोग हमें वोट नहीं करेंगे तो ‘रामजादा’ आता है। जब अपनी कमी छुपानी होती है तो ‘साइकोपाथ’ आता है। जब अपनी हार सुनिश्चित दिखती है तो ‘ज़हर की खेती’ याद आती है। 

ये जुमले डेस्पेरेशन की पैदाइश हैं। भले ही आप मुझे ‘संदर्भ’ और बाकी बातें समझाने लगें, लेकिन राजनैतिक मर्यादा की बात करने वाले लोगों को, या उनकी पार्टी से जुड़े केन्द्रीय मंत्रियों के इस तरह से किसी भी नेता के लिए बोलना राजनीति नहीं, एक गलत सोच का नतीजा है।

हजार लोग तालियाँ बजा देंगे, सोशल मीडिया पर शेयर भी हो जाएगा, लेकिन फिर राहुल गाँधी द्वारा अपशब्द कहने, आँख मारने, या ‘चोर’ आदि कहने पर आपको मर्यादा और सीमाओं की बात नहीं करनी चाहिए। पब्लिक में नेता क्या बोलता है, क्या करता है, इससे जनता प्रभावित होती है। हो सकता है कि ऐसी ही बातें करते हुए वोट भी मिलते हों, लेकिन इससे राजनैतिक बयानबाज़ी का स्तर नीचे ही गिरता है, और प्रोत्साहन मिलते रहने से वो सुधरने से तो रहा। 

आज के दौर में जब दुनिया स्त्री अधिकारों को लेकर, उनके शोषण आदि को लेकर सजग हो रही है, और उस पर बातें हो रही हैं, तब ऐसी बयानबाज़ी किसी को मदद नहीं पहुँचा सकती। 

ऐसा भी नहीं है कि गिरिराज सिंह ने जो कहा वो संदर्भ बताने पर सही नहीं है, क्योंकि विपक्ष ने तो मोदी को हिटलर से लेकर ज़हर की खेती करने वाला, चूहा, मास मर्डरर, दरिंदा, भड़वा, मेंढक, दिमाग़ी रूप से दिवालिया, मौत का सौदागर, बर्बादी लाने वाला, रावण, यमराज, और पागल कुत्ता तक कहा है। इसके बावजूद, इस तरह की बातें एक केन्द्रीय मंत्री के मुँह से शोभा नहीं देती। 

ख़ास कर तब, जब आपके पास विपक्ष को घेरने के लिए तमाम आँकड़े हैं, तथ्य हैं, और अपनी पार्टी के किए गए कामों की लम्बी फ़ेहरिस्त है। पार्टी को चाहिए कि इस तरह की बयानबाज़ी करने वाले नेताओं पर रोक लगाए, क्योंकि विपक्ष और वामपंथी मीडिया ऐसे बयानों के लेकर उड़ने के लिए बैठा रहता है। जब नैरेटिव बनाने का समय आए तब ऐसी बेकार की बात करते हुए किसी और को बेलने का मौका देना समझदारी तो बिलकुल नहीं। 

ये स्तर कितना नीचे जाएगा कोई नहीं जानता। हो सकता है किसी दिन माँ-बहन की गालियाँ भी सुनने को मिले क्योंकि अब वही बचा है। किसी दिन संसद में मोदी को राहुल चप्पल मार दें, या मोदी राहुल को, ये भी संभव हो सकता है। अब सारी गणना चुनाव को जीतने नहीं, किसी भी तरह जीतने पर आ गई है। अब आपको चुनावी रणनीतिकार के हिसाब से चलना होता है जो कि हावर्ड में पढ़कर आया है, वो आपसे वो भी करवा लेगा जो आपने सोचा भी नहीं होगा।

वो भी सिर्फ एक सवाल के बल पर: आपको चुनाव जीतना है या नहीं?

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बरखा दत्त
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