Friday, October 22, 2021
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चढ़ता प्रोपेगेंडा, ढलता राजनीतिक आचरण: दिल्ली के असल सवालों को मुँह चिढ़ाती केजरीवाल की पैंतरेबाजी

अरविन्द केजरीवाल इस समय जिस रास्ते पर चल रहे हैं, आने वाले समय में उनकी पहचान एक पढ़े-लिखे पर छिछले राजनेता की होगी और यह पहचान आज के भारत में किसी भी महत्वाकांक्षी राजनेता के लिए सही नहीं है।

अरविन्द केजरीवाल द्वारा केंद्र सरकार से वैक्सीन का फॉर्मूला सार्वजनिक करने की माँग पर आई अधिकतर प्रतिक्रियाएँ बताती हैं कि लोग उन्हें पढ़ा-लिखा जानते हैं, इसलिए यह आशा करते हैं कि वे तर्कपूर्ण बातें करेंगे। ऐसी आशा भारतीय जनमानस के अटूट धैर्य की परिचायक है। मुझे केजरीवाल की माँग से अधिक लोगों की ऐसी प्रतिक्रियाएँ आश्चर्यचकित करती हैं, क्योंकि करीब 7 वर्षों से देखने के बावजूद यदि समाज का एक वर्ग उनसे ऐसी आशा करता है तो वह केजरीवाल के बारे में कम और उस वर्ग के बारे में अधिक बताता है।  

यदि उतना पीछे नहीं जा सकते तो एक वर्ष पीछे ही चले जाएँ और चीनी वायरस से संक्रमण की पहली लहर के समय दिल्ली में रहने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों के साथ केजरीवाल और उनकी सरकार का व्यवहार याद करें। किस तरह की साजिश रचकर उन मजदूरों को उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर पहुँचा दिया गया था। केंद्र विरोधी मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने प्रदेश में रहने वालों प्रवासियों के पलायन की शुरुआत इन्हीं केजरीवाल ने करवाई थी।  

पहली लहर में ही जब दिल्ली के हालात बेकाबू हो गए तब भी टेस्ट की संख्या बढ़ाने का काम केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद ही हो पाया था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जब दिल्ली की खराब परिस्थिति में हस्तक्षेप करके ITBP द्वारा अस्पताल बनवाया तो यही केजरीवाल उस अस्पताल का क्रेडिट लेने पहुँच गए और उद्घाटन भी कर आए थे। चीनी वायरस के संक्रमण की पहली लहर से शुरू हुआ उनका यह सफर अभी तक चल रहा है। बीच में दिल्ली को होर्डिंग से पाट कर कोरोना पर काबू पाने का दावा भी कर लिया गया। 

दूसरी लहर में तो उन्होंने और उनकी पार्टी के लोगों का प्रोपेगेंडा लगातार ऊपर और राजनीतिक आचरण लगातार नीचे जाता रहा। कभी वे टिकरी बॉर्डर पर कोविड प्रोटोकॉल तोड़ रहे किसानों के साथ खड़े होकर उन्हें मजबूत करते दिखाई दिए तो कभी प्रधानमंत्री के साथ हो रही मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में बार-बार जम्हाई लेते हुए। उनकी इन जम्हाई वाली तस्वीरों को उनकी पार्टी के लोगों ने यह कहकर फैलाया कि पढ़ा-लिखा मुख्यमंत्री ऐसा ही करता है। हद तो तब हो गई जब वे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की एक मीटिंग का सीधा प्रसारण करते हुए पाए गए। प्रधानमंत्री के टोकने पर उन्होंने माफी माँगी, लेकिन किसी ने उनसे नहीं पूछा कि केंद्र-राज्य संबंधों में ऐसे राजनीतिक आचरण की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? 

यह प्रश्न न पूछा जाना ही अरविन्द केजरीवाल जैसे नेताओं को एक झूठा आत्मविश्वास देता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं। चीनी वायरस की दूसरी लहर में उनके आचरण और प्रोपेगेंडा का एक ट्रेंड यह रहा है कि जैसे ही उन्हें लगता है कि उनसे उनकी सरकार की कारगुजारियों पर प्रश्न किए जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है, वे तुरंत एक माँग उठा देते हैं। दिल्ली में जो ऑक्सीजन संकट उत्पन्न हुआ उसे लेकर दिल्ली के अस्पतालों से उठने वाली ऑक्सीजन की माँगों पर केजरीवाल का तरीका साफ झलक रहा था।  लगभग हर अस्पताल ने न्यूज़ एजेंसी को वक्तव्य देने शुरू किए कि ‘बस अब एक घंटे या आधे घंटे का ऑक्सीजन ही बचा है’। 

ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी, अस्पताल और दिल्ली सरकार के बीच की बातें अब दिल्ली उच्च न्यायलय में हो रही अनवरत सुनवाई का हिस्सा बन चुके हैं। जैसे-जैसे तथ्य सामने आते गए, केजरीवाल और उनकी सरकार के कारनामे उजागर होते गए, उनकी ओर से नई-नई माँगें उठती रहीं। कभी उन्होंने कहा कि 976 टन ऑक्सीजन की आवश्यकता है तो कभी बताया कि 700 टन ऑक्सीजन की आवश्यकता है। जब ऑक्सीजन ऑडिट की बातें शुरू हुईं तो उन्होंने तुरंत यह मुद्दा छेड़ दिया कि केंद्र सरकार ने वैक्सीन मैत्री के तहत वैक्सीन और देशों को क्यों दिया? 

उनके एक विधायक के घर ऑक्सीजन की जमाखोरी को लेकर उच्च न्यायालय ने नोटिस भेजा तो उनकी सरकार के वकील ने न्यायालय से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार को आदेश देकर रेमडेसिवीर इंजेक्शन के निर्यात पर रोक लगवाए। बिना यह जाने कि उसका निर्यात पहले से ही बंद है। जब इसी वकील से न्यायालय ने पूछा कि ओडिशा के राउरकेला से जब सभी राज्य अपने-अपने ऑक्सीजन का कोटा उठवा रहे थे, तब दिल्ली सरकार की ओर से कोई इंतज़ाम क्यों न हुआ तो एक नई माँग उठा दी गई कि न्यायालय केंद्र सरकार को आदेश देकर ऑक्सीजन के टैंकर की सुरक्षा बढ़वाए। केंद्र से मिले रेमडेसिविर इंजेक्शन की संख्या और राज्य द्वारा बताई गई संख्या में अंतर को लेकर आज तक दिल्ली सरकार से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आया है।  

केजरीवाल ऑक्सीजन ऑडिट का विरोध कर चुके थे। जब सुप्रीम कोर्ट ने ऑक्सीजन ऑडिट की बात की तो उन्होंने दिल्ली के लिए मिलने वाली वैक्सीन की संख्या को लेकर विवाद शुरू कर दिया। जब 18 से 44 वर्ष वर्ग के लोगों के लिए टीकाकरण की शुरआत का समय आया, तब उन्होंने बयान दिया कि हम अपने 12 से 18 साल के बच्चों को लेकर चिंतित हैं क्योंकि तीसरी लहर में वे संक्रमित होनेवाले हैं। ऐसे दर्जनों पैंतरे हैं जिन पर केजरीवाल से प्रश्न नहीं किए गए हैं और यही बात उनसे बार-बार ऐसे पैंतरे करवाती है। इसी का असर है कि ऐसी तमाम माँगों के बाद अब उन्होंने वैक्सीन के फॉर्मूले को सार्वजनिक करने की माँग उठा दी है। इस माँग के पीछे तर्क यह है कि और कम्पनियाँ उत्पादन करेंगी तो वैक्सीन की कमी नहीं होगी।  

जो समस्याएँ मुख्यधारा में किसी को दिखाई न दे रही हों, उन्हें लेकर तूफ़ान खड़ा करना इस समय केजरीवाल का एकमात्र राजनीतिक दर्शन बन चुका है। उद्देश्य चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध हो या उल्टी-सीधी बातें करके यह साबित करना कि वे कुछ कर रहे हैं, अरविन्द केजरीवाल इस समय जिस रास्ते पर चल रहे हैं, आने वाले समय में उनकी पहचान एक पढ़े-लिखे पर छिछले राजनेता की होगी और यह पहचान आज के भारत में किसी भी महत्वाकांक्षी राजनेता के लिए सही नहीं है।

 

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