‘द वायर’ पर गाय और आतंकी में अंतर नहीं! कश्मीर में आतंकी रहने तक चुनाव न हों!

अंत में लेखक के भीतर का मुसलमान जग गया और तर्क की तिलांजलि देते हुए वो कह बैठे कि 'हिन्दू इंडिया' के विचार को 'मुस्लिम कश्मीर' में बेचना गलत है। कश्मीर क्या, पूरी दुनिया को हिन्दू विचारों से चलना चाहिए फिर न तो क्रूसेड होंगे, न बद्र की लड़ाई, न इस्लामी आतंक और लूट की घटनाएँ, न मतपरिवर्तन के लिए तलवारों और रुपयों का प्रयोग, पूरे जगत में शांति होगी।

प्रोपेगेंडा और झूठों के काले जाल को लाल बैकग्राउंड पर यूएसबी की फोटो के साथ ‘द वायर’ ने अपना न सिर्फ लोगो बनाया है, बल्कि उनका ध्येय भी यही है कि प्रपंच अपनी पूर्णता में, इस पोर्टल पर रिस-रिस कर फैलता रहे। आज जिस व्यक्ति के विचारों को इन्होंने जगह दी है, और जिन बातों को तथाकथित संपादन के बाद भी रहने दिया है, वो बताता है कि ‘द वायर’ की प्रतिबद्धता कम से कम इस देश या पत्रकारिता के लिए तो बिलकुल भी नहीं है।

पीडीपी कश्मीर की एक राजनैतिक पार्टी है जिसकी मुखिया महबूबा मुफ़्ती हैं। महबूबा मुफ़्ती ने आतंकियों को माटी के सपूत कहने से लेकर, भारत से कश्मीर को अलग करने, तिरंगा न फहराने जैसे कई प्रलाप किए हैं। उस पार्टी के प्रवक्ता भी उसी रौ में रहते हैं। वहीद-उर-रहमान पारा नामक पीडीपी प्रवक्ता ने ‘द वायर’ से बातचीत की, और ‘द वायर’ ने उनके प्रोपेगेंडा को अपने फर्जीवाड़ों के पोर्टल पर प्रमुखता से जगह दी।

आतंकी के जनाज़े में आई भीड़ की फोटो के साथ ‘द वायर’ का प्रोपेगेंडा

शुरुआत ही इस तरह से हुई है कि ‘द वायर’ और पारा दोनों के लक्ष्य को कोई भी समझदार व्यक्ति आराम से समझ जाएगा। ध्यान रहे कि इन पोर्टलों को सम्पादक बहुत ही सावधानी से, जानबूझकर शब्दों और घटनाओं को चुनते हैं। जब पारा ने लिखा कि उनके गाँव में कोई गाय मरती है तो पूरा गाँव मातम करने आता है, तो फिर लतीफ़ टाइगर (हाल ही में मारा गया आतंकी) तो किसी का बेटा था, उसे तो उन्होंने क्रिकेट खेलते और पढ़ते देखा था। कितना आसान है यह कहना कि हाँ, वो आतंकी था, और हमारी विचारधाराएँ अलग थीं, लेकिन वो क्रिकेट खेलता था।

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आप यह समझिए कि कैसे एक आतंकी को नॉर्मल बताने की कोशिश हो रही है। जैसे वो हेडमास्टर का बेटा था, उसका बेटा तो दसवीं में पास कर गया, फ़लाँ आतंकी तो एक अच्छा पिता था, उसकी माँ आजकल रो रही है। ये सारी बातें आपको एक हार्डकोर आतंकी को मानवीय बताने के लिए इस्तेमाल होती है। वही कार्य ‘द वायर’ पर पीडीपी प्रवक्ता कर रहे हैं। जब आपने उसे क्रिकेट खेलते देखा, तो जब उसने बैट की जगह एके-47 उठा ली, तब क्यों नहीं देखा?

गाय की मौत पर इकट्ठा होने वाला संवेदनशील गाँव उस बच्चे को पहली ही बार बहकने पर, इकट्ठा होकर क्यों नहीं समझाने आया कि बेटा, हथियार मत उठाओ? तब आपके गाँव की संवेदना और नैतिकता कहाँ थी! और आप एक गाय को बीच में ले आते हैं? क्या गाय ने किसी पर ग्रेनेड फेंका था, या किसी परिवार का भरण-पोषण करती थी? किस हिसाब से गाय की मृत्यु और आतंकी की मौत एक समान हो जाती है? ये तो पारा जी वही हिन्दू-मुसलमान और वामपंथी लम्पटों वाला एंगल घुसा रहे हैं जहाँ गाय किसी आतंकी को समकक्ष सहजता से घुसा दी गई है!

आप यह समझिए कि लिखने वाला कितनी शातिरता से कुछ बातें ऐसे लिखता है जैसे वो बिलकुल सामान्य हो, “दस हजार लोग एक साथ आ जाते हैं जनाज़े में, बिना किसी आमंत्रण के।” किसी आतंकी के जनाज़े में आ जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि वो सही कर रहे हैं। आप तो उस ब्रीड के लोग हैं जो आज तक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को, बहुमत के बावजूद, अपनी सरकार नहीं मानते, फिर ये दस हजार के एक जगह इकट्ठा होने से क्या साबित करना चाह रहे हैं? बड़ी संख्या होने से उस विचारधारा को सही मान लिया जाए?

आतंक-विरोधी ऑपरेशन पर सवाल

घाघ आदमी ने तथ्यों को अपने हिसाब से मरोड़ कर आगे लिखा कि लोगों में भावुकता चरम पर है क्योंकि पहली बार सरकार ने चुनावों के आसपास आतंकरोधी ऑपरेशन में रुचि दिखाई है। यहाँ पर पारा ने तो राजनीतिक कारणों से झूठ लिख दिया लेकिन ‘द वायर’ के सम्पादक सो रहे थे कि उन्होंने यह कन्फर्म करना ज़रूरी नहीं समझा कि लतीफ़ टाइगर, बुरहान वनी गैंग का ग्यारहवाँ सदस्य था, जो कि देर से मरा, पर मार दिया गया।

बुरहान वनी का गैंग जिसके सारे सदस्य नर्क पहुँचाए जा चुके हैं

बुरहान वानी के ग्रुप फोटो के सारे 11 आतंकियों को सेना ने चुनावों के परे मारा है। सेना को चुनावों से क्या मतलब? ये ऑपरेशन तो काफी समय से चल रहा था, और आतंकियों को एक के बाद एक, घेर कर, सूचना के मुताबिक़ मारा जा रहा है। इसमें चुनाव कहाँ से आ गया?

लिखने वाले ने अनभिज्ञता में सिर्फ चुनाव को ही नहीं घसीटा बल्कि अमरनाथ यात्रा के दौरान उन इलाकों में ऑपरेशन पर रोक लगने की बात को ले आए। रोक तो रमज़ान में भी लगी थी। अमरनाथ यात्रा पर फिर भी हमला हुआ था। और आतंकियों को सेना ने घेरना शुरु कर दिया था। रमज़ान में तो इस्लामी आतंक हमेशा बाकी महीनों से ज़्यादा ही डैमेज पहुँचाता है।

पुराने इस्लामी युद्धों को अगर भूल भी जाएँ, जिसमें बद्र, मक्का, गुआदालाते, अल ज़ल्लाक़ा, हात्तिन, ऐन जलुत शामिल हैं, तो भी हाल के सालों में लगभग 15 आतंकी हमले हर दिन की औसत से 2006 से 2015 के बीच हुए हैं। 2016 में 400, 2017 में 300 हमले रमज़ान के दौरान हुए हैं। ये सूचना आपको ग्लोबल टेरर डेटाबेस की वेबसाइट से मिल जाएगी। आप कुछ जानकारी इस लिंक पर भी पा सकते हैं

चुनावों के दौर में हिंसा, हिंसा के दौर में चुनाव

फिर किस लिहाज से कश्मीर में सेना ऑपरेशन रोक दे? पारा जी लिखते हैं कि लोग डेमोक्रेसी से दूर होते हैं। सही बात तो यह है कि जिस चुनाव के दौरान सेना को आप संवेदना के नाम पर रुकने की बात कह रहे हैं, क्या वही संवेदना आतंकी भी दिखाएँगे? क्या आपका गाँव इस बात को समझा पाएगा कि चुनाव हो जाने दो, फिर अपने हथियार उठाना? वो तो इन मौक़ों पर इकट्ठा होंगे, अपनी मुहिम को मज़बूती प्रदान करेंगे, संसाधन जुटाएँगे और हमला करेंगे। जब सामने वाला पक्ष आँख मूँद कर मरने को निकल पड़ा हो, तो सेना उससे गोली छोड़ कर और कैसे बात कर पाएगी? वैसे आत्मसमर्पण का रास्ता तो हमेशा खुला हुआ ही है।

आगे ‘द वायर’ और वहीद-उर-रहमान का कवि हृदय दुःखी हो जाता है कि कश्मीर लगातार उठते जनाजों में ही उलझ गया है। वो कहते हैं कि इस मातमी माहौल में हम उनसे यह नहीं कह सकते कि वोट दो। भाई मेरे, जब तुम यह भी नहीं समझा सकते कि एके 47 मत उठाओ, तुम यह भी नहीं समझा सकते कि हिंसा का रास्ता मौत की तरफ ले जाता है, और यह भी नहीं समझा सकते कि चुनावों में मतदान करो और अपने मतलब की सरकार चुनो, तो फिर लोकतंत्र की प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठा रहे हो? बच्चों को स्कूलों में, मदरसों में, मस्जिद की नमाजों के बाद यह बताओ कि कोई पाँच सौ रुपए देकर पत्थर उठाने कहे तो वो ऐसा न करें, बल्कि प्रेम की बात करें, और हर मानव मात्र को प्यार से देखें जैसे कि वो उनका परिवार हो।

चुनावी प्रक्रिया पर सवाल

पारा जी ने यह सवाल उठाए हैं कि तीन चरणों में चुनाव क्यों हो रहे हैं! बंगाल में सात चरणों में हो रहे हैं, बिहार में भी सात चरणों में हो रहे हैं। कारण सीधा सा है कि संवेदनशील जगह है, यहाँ ज्यादा सुरक्षा चाहिए और अलग-अलग चरणों में चुनाव होने से लोग ज्यादा सुरक्षित रहते हैं। ये तो चुनावी प्रक्रिया को बेहतर और सुचारू रूप से चलाने के लिए है। पारा जी ने सुरक्षा वाली बात को पकड़ कर घुमाया और यहाँ तक कह दिया कि जब सब कुछ ठीक हो जाए, हिंसा का सिलसिला थम जाए, तब ही चुनाव कराना चाहिए। लेकिन वो यह नहीं बता पाए कि ऐसा शुभ दिन कब आएगा कश्मीर में।

आगे शब्दों के चुनाव पर फिर से मुझे आपत्ति है लेकिन वहीद साहब के पास ‘द वायर’ के संपादक हैं, तो वो कह सकते हैं कि ‘They are enforcing democracy!’ आप कहिए वॉव! मतलब पूरी दुनिया डेमोक्रेसी से चल रही है, और पारा जी के लिए चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र जबरदस्ती ठूँसने जैसा है। अगर लोकतंत्र एन्फोर्स न किया जाए, तो क्या इस्लाम की ख़िलाफ़त हो कश्मीर में? क्या हम आतंकियों के हवाले कर दें कश्मीर, कि भाई लो चला लो तुम लोग?

आगे उन्होंने फिर से एक बेकार-सा आरोप मढ़ा है कि अगर कम लोग वोट देंगे तो जनादेश के साथ छेड़-छाड़ करना आसान हो जाएगा। ये मेरी समझ में नहीं आया कि 6,000 लोग ही वोट देने आएँगे तो उनके वोटों के साथ मेनिपुलेशन कैसे होगा। क्या ईवीएम पर शक हो रहा है? या, बिना किसी पुख़्ता तर्क के यह कहा जा रहा है?

आतंकियों के लिए सॉफ़्ट कॉर्नर

तर्क तो खैर इस बात के पीछे भी कुछ नहीं है कि जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध के बाद वहाँ एक ख़ालीपन की स्थिति बनी है जिसे पारा साहब भरना चाहते हैं। आखिर वैसी मजहबी संस्था के लिए ऐसा सॉफ़्ट कॉर्नर क्यों है जो आतंकी गतिविधियों में मदद पहुँचाता हो? अगर वहीद साहब के हिसाब से वहाँ के लोग उनके समर्थन में हैं, तो गलती लोगों की है, न कि सरकार की जिसने उन्हें बैन किया है। यहाँ पर भी जनाज़े की भीड़ वाला तर्क मत लगाइए कि ज्यादा लोग हैं तो वो सही हो जाएगा।

लेख के अंतिम हिस्सों में जो लिखा गया है वो बहुत निंदनीय है। कहा गया कि पुलवामा हमले में बलिदान हुए जवानों को जिस तरह से रिपोर्ट किया गया वो राजनैतिक कारणों से ऑप्टिक्स, यानी दिखावे के लिए इस्तेमाल हुआ। मतलब इतने जवानों को आतंकियों ने एक मिनट में उड़ा दिया और उस पर अगर देश में चर्चा हो रही है तो वो दिखावा है? वहीद ने स्वीकारा कि ‘हाँ, पुलवामा में 50-60 आतंकी सक्रिया हैं, और कई हत्याएँ हुई हैं।’ ये बात इतनी सहजता से लेखक ने लिख दी मानो एक इलाके में इतने आतंकियों का होना सामान्य बात है।

इसकी जगह वो कहते हैं कि पुलवामा को हमें वहाँ के केसर, दूध और सेव के लिए याद करना चाहिए जो कि इसकी पहचान है। बिलकुल पहचान है। पुलवामा भारत का हिस्सा है और हमें गर्व है वहाँ के हर घास के तिनके पर भी, लेकिन आतंकी हमले और वहाँ के आतंकी भी उसकी एक पहचान बनने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें दबाना बहुत आवश्यक है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि हम पुलवामा के हर व्यक्ति को आतंकी मानते हैं। बिलकुल नहीं, वो मेरी ही तरह के भारतीय नागरिक हैं, जिन्हें आतंकी कहना सर्वथा अनुचित है। लेकिन हाँ, अगर वो आतंकियों के जनाजों में न जाएँ तो अच्छा ऑप्टिक्स होगा देश के लिए।

अंत में लेखक के भीतर का मुसलमान जग गया और तर्क की तिलांजलि देते हुए वो कह बैठे कि हिन्दू इंडिया के विचार को मुस्लिम कश्मीर में बेचना गलत है। हिन्दू इंडिया क्या, पूरी दुनिया को हिन्दू विचारों से चलना चाहिए फिर न तो क्रूसेड होंगे, न बद्र की लड़ाई, न इस्लामी आतंक और लूट की घटनाएँ, न मतपरिवर्तन के लिए तलवारों और रुपयों का प्रयोग, पूरे जगत में शांति होगी। आप अपना मज़हब न छोड़ें लेकिन सनातन दर्शन के दो-तीन वाक्य भी लोग जीवन में उतार लें, तो सारी समस्या ही निपट जाएगी।

‘मुस्लिम कश्मीर’ क्या होता है? शिव और माँ शारदा की धरती मुस्लिम किस हिसाब से हो गई? मुसलमानों ने वहाँ से हिन्दुओं को खदेड़ दिया तो वो मुस्लिम कश्मीर हो गया? और वहीद-उर-रहमान जैसे पढ़े लिखे लोग इस तरह के वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं, जिसे ‘द वायर’ छाप भी देता है! कश्मीर को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है ‘हिन्दू इंडिया’ के विचारों की। यही वो हीलींग टच है जिससे वहाँ के लोगों का भला हो सकता है। आप बेशक अपना मज़हब रखिए लेकिन सनातन विचारों से चलने से जीवन बेहतर हो जाएगा।

लेखक ने लिखा कि जब आतंकी मरते हैं तो संदेश यह जाता है कि एक मुस्लिम को गैरमुस्लिम ने मार दिया। यह संदेश क्यों जाता है, यह तो पता नहीं लेकिन जनाज़े की भीड़ इस बात पर ज़रूर मुहर लगाती दिखती है कि वो जो कुत्ते की मौत मरा है, उसके अपराध ‘हिन्दू इंडिया’ के ऊपर हुए थे। वो इसी में खुश रहते हैं। ये अजम्पशन मैं बिलकुल उसी आधार पर कर रहा हूँ जिस आधार पर पारा साहब ने कश्मीरी आतंकियों की मौत में आतंकी को सेना द्वारा न्यूट्रलाइज करना न मानकर, मुसलमान की हिन्दू द्वारा हत्या मान लेते हैं।

जबकि सत्य यह है कि अधिकतर बार किसी को पता भी नहीं होता कि आतंकी को मारने वाला जवान किस धर्म या मज़हब का था। मरने वालों में तो कश्मीरी मुसलमान अफसर और सैनिक भी रहे हैं। मरने वाले बलिदानियों में तो कश्मीर पुलिस के भी अफसर रहे हैं। लेकिन पारा जैसे नेताओं को उससे ज़्यादा मतलब कहाँ रहा। उन्हें तो आतंकी की मौत और एक निरीह गाय की मृत्यु में कोई अंतर ही नहीं दिखता।

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