Saturday, April 4, 2020
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जामिया विडियो: वामपंथियों की ऐसे लीजिए कि वो ‘दुखवा मैं का से कहूँ’ मोड में आ जाएँ

इनके हर फेसबुक पोस्ट पर आप सवाल पूछिए, हर ट्वीट के नीचे पूछिए कि 'अबे, वामपंथी लम्पट जमीर कितने में बेचा?', 'दंगा छुपाने का कितना लेते हो', 'तुम्हारा वैचारिक बाप कौन है जो तुम्हें ऐसी बेहूदगी से दंगाइयों और फसादियों को डिफेंड करने की तकनीक सिखाता है'।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

पिछले दो दिनों में कुछ विडियो आए। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से था, मिल्लिया जैसी कोई बात तो दिसंबर के दंगों के बाद दिखी नहीं। दिसंबर में जामिया नगर इलाके में जहाँ यह इस्लामिया यूनिवर्सिटी है, वहाँ मुसलमान कट्टरपंथी संगठन के फसादियों ने न सिर्फ यूनिवर्सिटी इलाके में अपने 150 गुर्गे छोड़ दिए, बल्कि नई जानकारियों के अनुसार इस पूरे प्रकरण में जामिया इस्लामिया के कई छात्रों की संलिप्तता भी बताई जा रही है।

साथ ही, साठ दिनों के बाद क्लिप और क्रॉप किए हुए विडियो का एक-एक कर बाहर आना यही बताता है कि सब कुछ सही तो नहीं ही है। पहले विडियो में, जो कि मात्र 29 सेकेंड का था, पुलिस को लाइब्रेरी में घुसते ही लाठी मारते दिखाया गया; दूसरा 44 सेकेंड का था, जिसमें पुलिस बाहर से फसादियों का पीछा करते हुए घुसती दिखती है, फिर उन्हें पहचानने के बाद लाठी चार्ज करती है। उसके बाद तीसरा विडियो भी आया जो 2 मिनट 20 सेकेंड का था, जिसमें उत्पाती लम्पट फसादी लाइब्रेरी में घुसते, गेट को टेबल आदि से जाम करते, दीवारों से कूदते दिखे।

इसके बाद एक और विडियो आया जिसमें पुलिस इन फसादियों से शांत होने की अपील कर रही है, और यूनिवर्सिटी के भीतर से पत्थरबाजी ऐसे जारी है जैसे इन्होंने बाकायदा ट्रेनिंग ले कर ‘डिप्लोमा इन पत्थरबाजी’ की हुई है। पुलिस आँसू गैस के गोले दाग रही है। एक और विडियो किसी मकतूब मीडिया ने जारी किया जिसमें सिर्फ पुलिस का लाठी चार्ज ही है, और एक जगह पुलिस का जवान सीसीटीवी कैमरे की तरफ लाठी चलाता दिख रहा है।

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सीसीटीवी पर लाठी मारने वाले अमूमन मूर्ख होते हैं क्योंकि कैमरा तोड़ने से पहले की रिकॉर्डिंग डिलीट नहीं हो जाती। खैर, ये सामान्य बात जब जेएनयू जैसी संस्थाओं के बुजुर्ग कामपंथी वामभक्त छात्र-छात्राएँ नहीं समझ पाते, तो पुलिस का जवान तो फिर भी उनसे कम पढ़ा लिखा ही होता है। दूसरी बात, इन वामपंथी लम्पटों से किसी ने सवाल नहीं पूछा कि उन्होंने जनवरी के पहले सप्ताह में जेएनयू के कई जगहों के कैमरे और सर्वर रूम को क्यों तोड़ा, पर हाँ पुलिस ने कैमरा क्यों तोड़ा, यह सवाल बराबर ट्रेंड होगा। लेकिन आप चिंता न करें, इन कामियों के सवालों का जवाब देने की कोई आवश्यकता नहीं, इनसे जेएनयू के दंगाई कामपंथियों और जामिया के फसादियों वाले सवाल पूछते रहिए।

सॉल्टन्यूज और न्यूजलौंडी की करतूत

वामियों के पैगंबर रवीश कुमार की करतूत आप देखिए कि पहले कटा हुआ दिखाया, फिर जब नग्नता पकड़ी गई तो कहने लगे कि सारे फ्लोर के विडियो की जाँच होनी चाहिए। उसके बाद और फुटेज में जब जामिया इस्लामिया के फसादी और दंगाई छात्रों का सच बाहर आने लगा, तो चुप हो कर अशोका होटल की सीढ़ियों के पास रखे गुलाबों की बात करते पाए गए।

इसके बाद कामपंथी तंत्र के गंजे और झबरे ने बाकी का काम ठेके पर उठाया, और बताने लगे कि लम्बे वालों वाला पीएचडी छात्र हाथ में वॉलेट लिए हुए है, जिसे हमने (और कई अन्य मीडिया वालों ने) पत्थर कह कर रिपोर्ट कर दिया था। आपको लगेगा कि इसमें समस्या क्या है, फॉल्ट न्यूज और न्यूजलौंडी तो सत्य बता रहे हैं।

नहीं, वो सत्य बता नहीं रहे हैं बल्कि कामपंथी वामभक्तों की लम्पटई की ट्रेनिंग के प्रयोग से मुद्दे से आपको भटका रहे हैं। लाइब्रेरी पढ़ने की जगह होती है, वहाँ मास्क लगा कर ये दसियों फसादी कैसे घुसे? ये कहाँ से आए थे? जब ऑल्ट न्यूज के गंजे और न्यूजलौंडी के झबरे कि टीम ‘हाय रिजॉल्यूशन’ तस्वीरों की बात करती है, तो वो अब और भी अल्ट्रा एचडी फुटेज ला कर देखे कि इन फसादियों के हाथों पर बाहर की धूल या पत्थर पकड़ने से लगे बालू के कण हैं कि नहीं?

साबित करना है और फोरेंसिक साइंस के एक्सपर्ट बने फिरते हो तो बताओ न कि वो कहाँ से आया था, उसके हाथ में किताब क्यों नहीं है, वो बाकियों को लाइब्रेरी में क्यों घुसा रहा था? क्या लाइब्रेरी किसी के बाप की जागीर है कि कोई भी बाहर दंगे करने के बाद प्राइवेट प्रॉपर्टी समझ कर घुस जाएगा? मैं ये इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि इन दंगाइयों और आतंकियों के हिमायतियों ने पब्लिक फंड से चलने वाले विश्वविद्यालयों को सिनेमा हॉल का पब्लिक ट्वॉयलेट बना दिया है, जहाँ असलम लव्स सलमा की जगह खिलाफत, तेरा मेरा रिश्ता क्या, अफजल तेरे अरमानों को, हिंदुओं कैलाश जाओ से ले कर स्वास्तिक को जलाने की इबारत दीवारों पर है।

‘नहीं, लाइब्रेरी में जो लड़का बाद में किताब खोलता है, उसको हमने आठवें एंगल से जाँचा तो पता चला कि उसके जूते का सोल सफेद है, उसने बाइक में आग नहीं लगाई, आप झूठ बोल रहे हैं।’ जबकि सत्य यह है कि उसने उस बाइक मे आग न लगाई हो, पर उसने किसी और बस या किसी और बाइक मे आग न लगाई हो, वो बाहर से पत्थरबाजी कर के भीतर न आया हो, ये इन न्यूजलौंडियों और सॉल्ट न्यूज के वैज्ञानिक खालू और चचाजान नहीं बता पाएँगे। वो फैक्टचेक दिल्ली पुलिस करेगी।

वामपंथी नैरेटिव फैले इससे पहले इनको तोड़िए

तो आप समझिए कि ये लोग बस डिफ्लेक्ट कर रहे हैं, मुद्दे की जगह कहीं और ले जाना चाह रहे हैं। इनके सवालों का जवाब मत दीजिए, कोई आवश्यकता नहीं। ये बस दुत्कारे जाने योग्य हैं। इनको तो, जहाँ भी दिखें, राह-बेराह थूकिए और निकलिए। वामपंथी विचारधारा और गजवा-ए-हिंद की चाह रखने वालों से इंगेज मत कीजिए, उनकी चर्चा में घुसने की बजाय उनसे हर सवाल पर दस सवाल अपने पूछिए।

ये सवाल मुद्दे से जुड़े भी हो सकते हैं, और मुद्दे से बिल्कुल अलग भी कि माओ ने जो लाखों लोगों को मारा उस पर क्या कहते हो? इनसे धरती पर हुए हर नरसंहार पर रैंडम प्रश्न पूछिए। ये बात जेएनयू की करें तो पूछिए शीतोष्ण कटिबंध पर किस तरह की घास उगती है। ये पूछें कि जामिया में पुलिस ने हिंसा क्यों किया तो आप पूछिए कि भूमध्य रेखा पर रोज बारिश क्यों होती है? उसके बाद जब ये पूछें कि इस चर्चा में ये प्रश्न क्यों आया तो आप कहिए कि उनकी औक़ात नहीं है कि आपसे सवाल पूछ कर जवाब पा जाएँ।

आज रवीश और गिरोह के सदस्य इस पर आख्यान लिखेंगे कि ‘हाथ में पत्थर’ वाली बात मिसलीडिंग है, फेक न्यूज है। लेकिन इससे यह बात कहाँ साबित होती है कि पुलिस ने गलत लोगों पर लाठीचार्ज किया। इससे ये सवाल भी उठता है कि साठ दिन बाद कटे हुए विडियो दिखाने के पीछे का प्रयोजन क्या था? शाहीन बाग के चर्चा में गायब होने के बाद ही ये विडियो, एक खास तरह की विचारधारा वालों के घालमेल से ही क्यों बाहर आया?

ये बात कहाँ साबित हो रही है कि लाइब्रेरी में जो गुंडे और मवाली घुसे थे, वो कहीं आग लगा कर या पत्थर फेंक कर नहीं आए थे? मिसलीडिंग तो यह बात भी है कि इन्हें न जानें क्यों ‘छात्र’ कहा जा रहा है! दंगाइयों को छात्र कह कर क्यों संबोधित किया जा रहा है? ताकि नैरेटिव में इन्हें मासूम समझा जाए? ये आपको मासूम लग रहे हैं? ये पुलिस पर बाहर में पत्थर फेंक रहे थे, संभवतः बसों को इन्हीं मे से किसी ने आग लगाई होगी, यह भी संभव है कि इनमें से कई तो यहाँ के छात्र भी नहीं होंगे, PFI के फसादी होंगे, फिर ये मासूम किस एंगल से हैं? अगर ये मासूम हैं तो मैं वामपंथियों की सबसे सशक्त आवाज हूँ!

आपको भटकाया जा रहा है। जैसे कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार को ‘पलायन’ जैसे अतिसामान्य शब्द में समेट कर भुलाया जाता रहा है। जैसे आपको कभी बताया नहीं गया कि पलायन किस आतंक, नरसंहार, हिन्दू घृणा का परिणाम था। उसी तरह अब बात इस पर करने की कोशिश होगी कि मीडिया जिसे ‘हाथ में पत्थर’ वाला कह रही है, वो तो वॉलेट लिए हुए था।

ये तो वही बात हुई कि बस में आग लगाए सुलेमान और हम इस बात पर डिबेट कर रहे हों कि मीडिया ने कहा कि उसकी शर्ट का रंग पीला था, लेकिन गंजे के फैक्टचेक टीम ने पाया कि रंग तो सूगापंखी (यानी पैरट ग्रीन) था जो कि चमकीली धूप में पीला दिख रहा था। बस में अभी भी आग लगी हुई है, लगाने वाला लाइब्रेरी में है, उसके बाद वो शायद नेपाल पहुँच चुका होगा, लेकिन नालायक वामपंथी आपको इसमें उलझाए रखेगा कि शर्ट का रंग पीला है जो कि सॉल्ट न्यूज के गंजे ने जाँच कर साबित किया है।

डिफेंसिव होने का नहीं, आगे बढ़ कर अटैक करने का

इसलिए, आप उनके प्रश्न में मत उलझिए क्योंकि इनके कुकर्मों का पैटर्न ही यही है। इन्होंने दोगलई में सुपर स्पेशियालिटी का कोर्स किया हुआ है, इनके क्लिनिक चलते हैं जहाँ से मीडिया के हर कक्ष में इनके लल्लन और ललनाओं की कैम्पस प्लेसमेंट होती है। इसलिए, ये कहें कि उसके हाथ में तो वॉलेट है, तो आप कहिए कि वॉलेट ले कर क्या खजूर खरीदने गया था लाइब्रेरी में? वॉलेट हो या पत्थर, बिना किताब के, इतनी तेजी से, इतने फसादियों के साथ, लाइब्रेरी में हो क्या रहा था?

ये वहाँ के गेट को रीडिंग टेबल आदि से जाम क्यों कर रहे थे कि पुलिस को तोड़ कर घुसना पड़ा? इनसे पूछिए कि जो अभी बस फूँक कर आया होगा, वो उसी लाइब्रेरी में आग लगा देता तो जिम्मेदारी किसकी होती? क्या ये लोग यह सवाल नहीं करते कि लाइब्रेरी जल रही थी, तो पुलिस ने दंगाइयों को भीतर घुसने पर, पीछा कर के पकड़ा क्यों नहीं? ये पूछते कि क्या पुलिस को यह ट्रेनिंग नहीं दी जाती कि जो गुंडा एक जगह आग लगा रहा है, उसके दूसरे जगह आग लगाने की आशंका बढ़ जाती है? यही वामपंथी बेबी और बाबू जलती लाइब्रेरी को देख कर यह पूछते दंगेबाजों के मनोविज्ञान क्या पुलिस के पाठ्यक्रम में नहीं है? और अंत में कह देते कि पुलिस ने ही मोदी के कहने पर आग लगाई है।

इस पर डिफेंसिव होने की आवश्यकता नहीं है। बाहर से ये दंगाई आए, पुलिस ने पीछा किया, पकड़ा और समुचित कार्रवाई की गई। डिफेंसिव इसलिए मत होइए क्योंकि दंगाइयों की भीड़ में कोई एक-दो वाकई पढ़ने वाले हो सकते हैं, लेकिन वो अनुपात तो पुलिस के लिए भी होता है कि पूरे फोर्स में एक-दो बिना देखे लाठी मारता है, सीसीटीवी कैमरा तोड़ता है। पूरी पुलिस को उसके कारण बदनाम किया जा रहा है। यहाँ अनुपात उल्टा है, तो सबको निर्दोष कैसे मान लें?

पढ़ने वाले थे, होंगे, इससे इनकार नहीं है। लेकिन जिस तरह से एक भीड़ कमरे में घुसती, निकलती, भागती, बाहर से कूदती दिखती है, और बाहर के दंगों का संदर्भ लिया जाता है, तो लाइब्रेरी में पढ़ने वाले नगण्य ही रहे होंगे। विडियो में दिख रहा है कि कितने पहले थे, और कितने बाद में। विडियो तो वह भी याद आता है जिसमें लाइब्रेरी के तोड़-फोड़ का विडियो बनाता छात्र दूसरे से कह रहा है कि ‘यार अपनी ही प्रॉपर्टी क्यों बर्बाद कर रहे हो?’

यहाँ डिफेंड मत कीजिए, सवाल पूछिए और बार-बार पूछिए कि वो कहाँ से आए थे? सवाल पूछिए कि जब उसके हाथ में वॉलेट था तो उसने सारे सोशल मीडिया अकाउंट डीएक्टिवेट क्यों कर लिए? सवाल पूछिए कि पत्थर क्या आसमान से गिरे थे पुलिस पर? पुलिस जब अपील कर रही थी कि ‘बच्चों पत्थर मत फेंको’ तो क्या वो बस माहौल बनाने के लिए था? सवाल पूछिए कि वहाँ जब PFI के 150 फसादी मुसलमान इलाके में छुपे हुए थे तो क्या पुलिस को खबर की गई?

वामपंथियों के सवालों का जवाब मत दीजिए, सवाल पूछिए। एक पर दस पूछिए। ये सपोले जहर से भरे हुए हैं, जो शरजील पर चुप हैं, भारत के कटे नक्शे पर चुप हैं, स्वास्तिक जलाने पर चुप हैं, हिन्दू घृणा के नारों पर चुप हैं, हिन्दू आस्था के प्रतीकों के अपमान पर चुप हैं… इसलिए इन सपोलों के सवालों पर जवाब देने की आवश्यकता बिलकुल भी नहीं है।

आपने कभी बंदर और साँप की लड़ाई देखी है? बंदर साँप को फन से पकड़ता है और उसे घूरने के बाद मिट्टी में रगड़ता है, फिर छोड़ देता है। साँप को लगता है जान बची, वो धरफरा कर भागता है। बंदर फिर उसे पकड़ता है, उसका फन मिट्टी में रगड़ता है, फिर छोड़ देता है। वामपंथी ऐसे ही सपोले हैं जिनके फनों को कुचलते रहना होगा, थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर। मजे ले-ले कर इन्हें मसलते रहना चाहिए। ये हमेशा उल्टे और बेकार सवाल पूछते हैं। ये मूलतः जाहिल प्रजाति है जो किताबों को पढ़ने का दावा तो करती है, लेकिन समझती नहीं।

एक तरफ हमारे चेहरों को घूरता यथार्थ यह है कि जामिया में दंगे हुए, आगजनी हुई, जम कर पत्थरबाजी हुई और उसमें वहाँ के स्थानीय लोगों से ले कर छात्र तक शामिल थे। इन फसादियों को छुपाने की कोशिश हुई। उन्हें किसने पनाह दी? वो लाइब्रेरी ही क्यों गए? वो कहाँ से आए थे? साथ ही, इसी जगह के लोग बाद में जेएनयू में हुई हिंसा में भी हिस्सेदार बताए जाते हैं जिन्होंने ABVP के छात्र-छात्राओं पर क्रूरतापूर्वक, योजनाबद्ध तरीके से हमला किया जिसमें बच्चों की हाथ टूटी, उँगली टूटी, गर्दन पर लोहे के रॉड से मारा गया, लिंच किया गया क्योंकि उन्होंने गरीब बच्चों की पढ़ाई को ले कर बात उठाई थी और वामपंथियों के वाहियात परीक्षाविरोधी आह्वान को नकारा था।

दूसरी तरफ़ वामपंथियों का अजेंडा तंत्र है जो कपड़े का रंग और जूतों के सोल की बात में उलझा कर दंगों को छुपाने की हर संभव कोशिश कर रहा है। यह तंत्र एक साथ काम करता है जिसमें क्विंट, वायर, रबिसबा, गंजे का सॉल्ट न्यूज और झबरा अभिनंदन की न्यूजलौंडी शामिल है जो बसों में आग लगाने की बात को भुलाना चाह रहा है। इनके हर फेसबुक पोस्ट पर आप सवाल पूछिए, हर ट्वीट के नीचे पूछिए कि ‘अबे, वामपंथी लम्पट जमीर कितने में बेचा?’, ‘दंगा छुपाने का कितना लेते हो’, ‘तुम्हारा वैचारिक बाप कौन है जो तुम्हें ऐसी बेहूदगी से दंगाइयों और फसादियों को डिफेंड करने की तकनीक सिखाता है’।

तब ये रोएँगे कि देखो ये तो गाली देता है (जबकि हम गाली नहीं दे रहे, सवाल पूछ रहे हैं); ये कहेंगे कि इनकी भाषा कितनी खराब है, जबकि सत्य यह है कि भाषा किसी की बपौती नहीं है कि वही तय करेंगे कि आपकी प्रतिक्रिया की भाषा और शैली कैसी हो, शब्द विन्यास क्या हो; फिर आप इन्हें कहिए कि खुद को बाथरूम में बंद करके सिसक-सिसक के रोए या फिर बंद कमरे में पीठ पर कोड़े मारे और कहे, अगले जनम मोहे वामपंथी न कीजो!

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