Thursday, September 24, 2020
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जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है नई अधिवास नीति, आतंकी सोच पर चोट के लिए नियम हो और सरल

क्या जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के दूसरे शहरों में जमीन-जायदाद नहीं खरीदते? क्या देश के किसी भी कोने में उनके बसने, काम करने पर पाबंदी या प्रतिबन्ध है? अगर नहीं तो 1957 से 2020 के पहले तक 'अभागे' दलित समुदाय की सुधि किसी ने क्यों नहीं ली। वो दलित जिन्हें सिर्फ यहाँ साफ-सफाई के लिए लाया गया, बिना नागरिक माने!

भारतवासियों और भारत की केंद्र सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर आजादी के बाद से ही चर्चा और चिंता का विषय रहा है। आजादी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलयन के समय कुछ ‘अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधान’ संविधान में किए गए थे। इन प्रावधानों को अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए के नाम से जाना जाता रहा है।

इन विशेष प्रावधानों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों की तुलना में ‘अस्थायी रूप से कुछ अधिक स्वायत्तता’ प्रदान की गई थी। जम्मू-कश्मीर राज्य विदेश, रक्षा और दूरसंचार जैसे तीन विषयों के सन्दर्भ में भारत पर निर्भर होने के अतिरिक्त अपना नीति-नियामक स्वयं था। यहाँ तक कि उसका दंड विधान भी भारतीय दंड विधान से पृथक ‘रणवीर पीनल कोड’ के नाम से जाना जाता था।

वहाँ की विधानसभा का कार्यकाल भी अन्य राज्य विधानसभाओं से अलग 6 वर्ष का था। जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले और सबसे जोरदार ढंग से जम्मू-कश्मीर को अलगाने वाले इन विशेष प्रावधानों का संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक विरोध किया।

जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण-विलयन और राष्ट्रीय एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया उनका नारा – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!” बहुचर्चित है। ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के एकीकरण और जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण-विलयन की लड़ाई लड़ते हुए ही जून 23, 1953 को श्रीनगर के निकट निशात बाग़ में नज़रबंदी के दौरान उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु हुई।

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डॉ मुखर्जी के बलिदान के बाद से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाने का मुद्दा लगातार जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारात्मक और भावनात्मक रहा है। इसी वैचारिक प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप अगस्त 05, 2019 को भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इन दोनों अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में पूर्ण विलय कर दिया।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 को संसद के दोनों सदनों में पारित करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेश – जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बना दिए गए। लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की मूल वजह वहाँ के निवासियों की ऐसी माँग थी, जिसका आधार जम्मू-कश्मीर राज्य के शासन-प्रशासन द्वारा लम्बे समय तक लद्दाखवासियों के साथ किया गया भेदभाव और उपेक्षा थी। हालाँकि, आजादी से लेकर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन तक इस भेदभाव और उपेक्षा के शिकार जम्मू संभाग के लोग भी रहे हैं।

मार्च 31, 2020 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य विधि का अनुकूलन) आदेश-2020 अधिसूचित किया था। इस आदेश के तहत राज्य में पूर्व-प्रचलित 129 कानूनों में आंशिक संशोधन किया है और 29 कानूनों को पूर्ण रूपेण निरस्त किया गया है। इसी आदेश में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (विकेंद्रीकरण और भर्ती) अधिनियम-2010 के खंड 2 में आंशिक बदलाव करते हुए ‘स्थायी निवासी’ शब्द के स्थान पर ‘अधिवासी’ शब्द जोड़ा गया है।

इसी संशोधित अधिनियम के खंड 3 ए के अंतर्गत ‘अधिवासी’ शब्द का स्पष्टीकरण करते हुए उसे परिभाषित किया गया है। इस परिभाषा के अनुसार कम-से-कम 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में रहने वाले व्यक्ति ‘अधिवासी’ माने जाएँगे। इसके अलावा, केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों से अपनी 10 वीं/12 वीं की पढ़ाई को मिलाकर कम-से-कम 7 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राएँ भी अधिवासी माने जाएँगे।

कम-से-कम 10 वर्ष तक जम्मू-कश्मीर में सेवा देने वाले केन्द्रीय सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों/अन्य उपक्रमों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केन्द्रीय स्वायत्तशासी निकायों आदि के कर्मचारी/अधिकारी और उनके बच्चे भी अधिवासी माने जाएँगे।

इसके साथ ही, जम्मू-कश्मीर के राहत एवं पुनर्वास आयुक्त कार्यालय में पंजीकृत विस्थापित भी अधिवासी माने जाएँगे। इस अधिवासन नीति का परिणाम यह होगा कि उपरोक्त श्रेणियों के सभी व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया को पूरा करके अपना अधिवास प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकेंगे। तहसीलदार कार्यालय द्वारा आवेदन के 15 दिन के अंदर अधिवास प्रमाण-पत्र जारी करना अनिवार्य है।

आवेदन को नामंजूर करने की स्थिति में भी 15 दिन में कारण बताने की बाध्यता होगी। ये सभी अधिवासी जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिकों के लिए निर्धारित सभी सुविधाओं के पात्र होंगे। वे जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों में प्रवेश, सभी प्रकार की सेवाओं/नौकरियों में भागीदारी कर सकेंगे और घर, जमीन–जायदाद खरीद सकेंगे।

हालिया लागू की गई इस नई अधिवासन नीति से लम्बे समय से वंचित/उपेक्षित बहुत से तबकों को लाभ होगा। इन तबकों में वाल्मीकी समुदाय के ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें सन 1957 में पंजाब से लाकर जम्मू-कश्मीर में बसाया गया था। तत्कालीन सरकार द्वारा यहाँ के सफाईकर्मियों की लम्बे समय से जारी हड़ताल को तुड़वाने के लिए ऐसा किया गया था। लेकिन सन 1957 से मार्च 31, 2020 तक किसी ने अपना घर–द्वार छोड़कर आए इस अभागे दलित समुदाय की सुधि नहीं ली।

इसी प्रकार इस नई नीति से पश्चिमी पाकिस्तान से खदेड़े गए शरणार्थियों को भी उनके मानव अधिकार और नागरिक अधिकार मिल सकेंगे। यह नीति सन 1990 में कश्मीर घाटी से भगाए गए कश्मीरी पंडितों के जख्मों पर भी कुछ मरहम लगा सकेगी।

कश्मीरी पंडितों का उनके घर में किया गया कत्लेआम और फिर क्रूर विस्थापन स्वातंत्र्योत्तर भारत का अपराधबोध है। इस पाप का परिमार्जन अतिआवश्यक है। यह नीति इसका अवसर देती है। इसी प्रकार यह नीति जम्मू-कश्मीर से बाहर विवाह करने वाली लड़कियों और उनके बच्चों के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित करती है। इससे पहले उन्हें उनके  नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा।   

जम्मू-कश्मीर केन्द्रित राजनीति करने वाले कई राजनीतिक दलों, मसलन- नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और पैंथर्स पार्टी आदि ने केंद्र सरकार की नई अधिवास नीति का विरोध किया है। वास्तव में, ये दल तो अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाए जाने का भी विरोध कर रहे हैं।

परन्तु यह विरोध वैधानिक और सत्य प्रेरित न होकर राजनीतिक और स्वार्थ प्रेरित है। वे साधनों, संसाधनों और शासन-प्रशासन में अपना विशेषाधिकार और वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। उनका तर्क यह है कि इस नीति से जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी बदल जाएगी, बाहर के लोग यहाँ आकर बस जाएँगे और यहाँ के साधनों-संसाधनों को हड़प लेंगे और बाहरी लोगों के आने और बसने से न सिर्फ जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संस्कृति और जीवन-शैली संकट ग्रस्त हो जाएगी बल्कि अपराध भी बढ़ जाएँगे।

वस्तुतः उपरोक्त सभी तर्क खाली और खोखले हैं। भारत में संघीय व्यवस्था है। एक राज्य के नागरिकों को कहीं भी बसने, जमीन-जायदाद खरीदने, नौकरी-व्यवसाय करने की आज़ादी और अधिकार संविधान-प्रदत्त हैं। अपने ही देश के नागरिक ‘बाहरी’ कैसे हो जाते हैं, किनके लिए और क्यों हो जाते हैं, यह विचारणीय प्रश्न है।

उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार 1957 में वाल्मीकी समुदाय ने पंजाब से आकर जम्मू-कश्मीर की सेवा की थी, उसी प्रकार आज भारत के कोने-कोने से आकर लोग जम्मू-कश्मीर की सेवा कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में घरेलू कामगारों, ढाँचागत निर्माण मजदूरों और कृषि मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि के प्रवासियों की है। बल्कि, बहुत से उद्योग और निर्माण कार्य पूरी तरह उनके ऊपर ही निर्भर हैं।

कोरोना काल के आँकड़े निकालकर देखे जाने जरूरी हैं कि जम्मू-कश्मीर में/से भी कितने प्रवासियों की आवाजाही हुई है। जो अपने जीवन का सर्वोत्तम जहाँ लगा रहे हैं, अगर वे वहाँ अपने अधिकार नहीं माँगेंगे तो और कहाँ माँगेंगे? क्या जम्मू-कश्मीर के नागरिक दिल्ली, बम्बई, बंगलौर में नौकरी और व्यवसाय नहीं करते?

क्या वे भारत के अन्यान्य शहरों में जमीन-जायदाद नहीं खरीदते? क्या देश के किसी भी कोने में उनके बसने, काम करने पर पाबंदी या प्रतिबन्ध है? यदि अन्य राज्य भी अपनी-अपनी सीमाओं पर अपनी-अपनी लौह-दीवारें खड़ी कर दें, तो फिर एक राष्ट्र और राष्ट्रीयता का क्या अर्थ रह जाएगा? एक राष्ट्र में छोटे-छोटे स्वार्थों और सहूलियतों संबंधी किलेबंदी की नीति और राजनीति अब अतीत का अध्याय है।

युवा पीढ़ी अवसर चाहती है, प्रतिस्पर्धा चाहती है, शिक्षा और रोजगार के लिए पूँजी निवेश चाहती है और नई संभावनाएँ चाहती है। इन चाहतों को पूरा करने के लिए हमें ‘बाहरियों’ का स्वागत करने की मनोभूमि बनानी पड़ेगी।

जम्मू-कश्मीर की नई अधिवासन नीति वस्तुतः जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है। यह नीति जम्मू-कश्मीर की महत्वाकाँक्षी निर्माण परियोजना में अपना श्रम, कौशल, प्रतिभा और पूँजी लगाने वाले भारतीयों का स्वागत-द्वार है। आज राज्य को सुविधाओं और विशेषाधिकारों की सुरक्षित चहारदीवारियों से घेरकर न राज्य के नागरिकों का भला किया जा सकता है और न ही देशहित किया जा सकता।

संभवतः, वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और स्थायीभाव बन चुके तुष्टिकरण के दबाव में ही केंद्र सरकार ने अधिवासन की पात्रता के इतने कठिन नियम बनाए हैं। अन्यथा, उसे अन्य राज्यों जैसे ही अधिवासन के सरल नियम बनाकर जम्मू-कश्मीर के विलयन की प्रक्रिया पर पूर्ण-विराम लगाना चाहिए था।

इस अधिवासन नीति में कम-से-कम कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की दिशा में भी साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता थी। यह कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी ही थी, जिसने जनवरी 1990 में 3000 से अधिक निर्दोष कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया और लाखों को घर-द्वार और जड़-जमीन से बेदख़ल और विस्थापित किया।

कश्मीर घाटी में न सिर्फ कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की कोई ज़मीनी योजना बनाई जाए, बल्कि जम्मू-कश्मीर में एक दिन भी सेवा करने वाले भारतीय सेना और अर्ध सैन्य बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों और सैनिकों को कश्मीर घाटी में बसने पर तत्काल अधिवासन अधिकार दिए जाएँ, ताकि आतंकवाद और आतंकी मानसिकता की जनसांख्यिकी को संतुलित किया जा सके।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

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