Saturday, September 26, 2020
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ज्योति बसु: सामूहिक हत्याओं का वो वामपंथी प्रतीक जिसे भारत भूल चुका है

वर्ष 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए। यह सब कुछ जो हुआ वह जलियाँवाला बाग नरसंहार के बराबर या उससे अधिक ही जघन्य था। लेकिन इस मामले को कभी मुख्यधारा की खबरों में जगह नहीं मिली। कभी वामपंथी दलों से इस मुद्दे पर प्रश्न नहीं पूछा गया।

पश्चिम बंगाल की एक जगह है जहाँ गंगा की दो धाराएँ हुगली और पद्मा समंदर में जाकर मिलती हैं। यहीं है एक सुनसान सा दलदली द्वीप मरीचझापी। इसी जगह पर तत्कालीन ज्योति बसु की वामपंथी सरकार ने हजारों हिन्दू शरणार्थियों को सिर्फ इसीलिए मार दिया था क्योंकि उन्होंने भारत के विभाजन के खिलाफ मतदान किया था।

1979 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार की पुलिस व सीपीएम काडरों ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के ऊपर जिस निर्ममता से गोलियाँ बरसाईं उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। जान बचाने के लिए दर्जनों लोग समुद्र में कूद गए थे। अब तक इस बात का कहीं कोई ठोस आँकड़ा नहीं मिलता कि उस मरीचझापी नरसंहार में कुल कितने लोगों की मौत हुई थी। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन, सरकारी फाइल में केवल दो मौत दर्ज की गई।

ज्योति बसु वह सामूहिक कातिल है जिसे इतिहास भूल गया है। आज उनका जन्मदिन है। उनका जन्म 8 जुलाई 1914 को कलकत्ता के एक उच्च मध्यम वर्ग बंगाली परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के लोरेटो स्कूल और फिर सेंट जेवियर स्कूल में हुई। इसके बाद वो कानून के उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड रवाना हो गए, जहाँ ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने कदम रखा। 

इसकी कहानी शुरू होती है भारत के विभाजन से। भारत का विभाजन ऐसी दर्दनाक घटना है जिससे मिले घाव कभी भरे नहीं जा सकते। भारत जिसे मातृभूमि माना जाता है उसे टुकड़ों में बाँट दिया गया। तत्कालीन नेताओं और जिहादी मानसिकता के लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए देश का विभाजन करा दिया।

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विभाजन भारत के दोनों ओर हुआ था। पूर्व और पश्चिम। पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। ट्रेन से भरकर लाशें आ रही थी। पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्से में कुछ वक्त में स्थिति कुछ सामान्य हुई लेकिन पूर्वी क्षेत्र जलता रहा।

इसी वजह से विस्थापन की जो प्रक्रिया पश्चिम में थम चुकी थी वह पूर्व में लगातार होती रही। बांग्लादेश से धार्मिक रूप से उत्पीड़न झेलने के बाद बांग्लादेशी हिन्दू भारत में शरण लेने आते गए। यह वही लोग थे जिन्होंने 1946 के मतदान के समय भारत के विभाजन के विरोध में मतदान किया था, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया था।

बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से बाद में आने कारण लोगों को नागरिकता नहीं दी जा रही थी। 1971 के युद्ध के दौरान एक करोड़ से अधिक हिन्दू शरणार्थी भारत आए जिनमें अधिकतर नाम शूद्र अर्थात दलित समुदाय से थे। उन्हें भारत सरकार ने कैम्पों में रखा और नागरिकता नहीं दी। पश्चिम बंगाल के दलदली सुंदरबन डेल्टा में मरीचझापी नामक द्वीप पर बांग्लादेश से भागे करीब 40,000 शरणार्थी एकत्रित हो चुके थे।

बांग्लादेश से आए शरणार्थियों में ज्यादातर बेहद गरीब परिवारों और दलित समुदाय से आते थे। गरीबों, दलितों, वंचितों और मजदूर वर्ग की पार्टी होने का दावा करने वाले वामपंथी दलों ने सत्ता में आने पर शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया।

1977 में सरकार आने के बाद वामपंथी दल ने इस बात को दोहराया भी। इसके बाद छत्तीसगढ़, दंडकारण्य, असम और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले बांग्लादेशी हिंदुओं ने बंगाल की तरफ पलायन किया। लेकिन किसी तरह की सहायता ना होते देख उन्होंने सुनसान दलदली द्वीप मरीचझापी में अपना ठिकाना बनाया।

इसी जगह पर उन्होंने खेती शुरू की, विद्यालय शुरू किए और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था की। लेकिन वामपंथी सरकार को 1947 में भारत विभाजन के विरोध में किए गए मतदान का बदला लेने की सनक ने इन हिन्दू शरणार्थियों के लिए मरीचझापी को “खूनी द्वीप” बना दिया।

100 से अधिक पुलिस जहाज और 2 स्टीमर भेजकर राज्य की कम्युनिस्ट सरकार ने द्वीप की पूरी घेरे बंदी कर दी। वहाँ से आवागमन के सारे रास्ते बंद कर दिए गए। द्वीप चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ था, इसकी वजह से वहाँ पीने के पानी का एकमात्र स्त्रोत था। उसमें भी सरकारी आदेश के बाद जहर मिला दिया गया।

वामपंथी सरकार के केवल इस आर्थिक घेरेबंदी के दौरान ही 2000 से अधिक लोग मारे गए थे। मरने वालों में छोटे छोटे दुधमुँहे बच्चे भी शामिल थे। मजबूरी में हिन्दू शरणार्थी लोगों को द्वीप से निकलना पड़ा।

कुछ लोगों को वहीं मार दिया गया। मार कर लाशों को समुद्र में ही फेंक दिया गया। सुंदरवन के जंगलों में लाशों को छोड़ दिया गया जिसे खाकर वहाँ के बाघ आदमखोर बन गए

यह सब कुछ जो हुआ वह जलियाँवाला बाग नरसंहार के बराबर या उससे अधिक ही जघन्य था। लेकिन इस मामले को कभी मुख्यधारा की खबरों में जगह नहीं मिली। कभी वामपंथी दलों से इस मुद्दे पर प्रश्न नहीं पूछा गया।

अगर कायदे से देखा जाए तो इस भयानक नरसंहार के बाद ज्योति बसु को तुरंत पद छोड़ना देना चाहिए था। शायद उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाना चाहिए था, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत जिस समय ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल के सीएम के रूप में इस्तीफा दिया, उन्होंने भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में इतिहास रचा था। उन्होंने तो इस नरसंहार पर सहानुभूति भी नहीं व्यक्त की।

आज भी वही वामपंथी दल, पत्रकार, बुद्धिजीवी हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देने के खिलाफत कर रहे हैं। आखिर कुछ लोगों के द्वारा लिए गए फैसले की वजह से उनकी जमीन, उनकी मातृभूमि में उनके साथ ही धार्मिक उत्पीड़न होता है तो उसके लिए वो लोग जिम्मेदार कैसे हैं?

यह वामपंथ की पुरानी आदत है कि दलितों, गरीबों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के नाम से खुद को पेश कर गरीबों और दलितों का शोषण किया जाता है। मरीचझापी की घटना सबसे बड़ा उदाहरण है किस तरह वामपंथ भारत में भारतीय मूल के धर्मों से नफरत करता है और उनका नरसंहार चाहता है।

वामपंथियों के देशविरोधी कृत्यों का एक पूरा काला इतिहास है। वामपंथी जब भी मुँह खोलते हैं देशविरोधी भाषा ही बोलते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। साल 1962 के युद्ध के बाद भी ज्योति बसु ने सार्वजनिक रूप से एक रैली में घोषणा की थी कि “चीन आक्रामक नहीं हो सकता है।”

वर्ष 1977 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए लेफ्ट फ्रंट ने हत्या को संगठित तरीके से राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। वैसे, सीपीएम काडरों ने वर्ष 1969 में ही बर्दवान जिले के सेन भाइयों की हत्या कर अपने राजनीतिक नजरिए का परिचय दे दिया था। वह हत्याएँ बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सेनबाड़ी हत्या के तौर पर दर्ज है। वर्ष 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए।

वैसे मशहूर बांग्ला कहावत ‘जेई जाए लंका सेई होए रावण’ यानी जो लंका जाता है वही रावण बन जाता है। इसी तर्ज पर सत्ता संभालने वाले तमाम दलों ने इस दौरान इस हथियार को और धारदार ही बनाया है। 

वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक हिंसा का दौर जारी रहा। दरअसल, लेफ्ट के तमाम काडरों ने धीरे-धीरे तृणमूल का दामन लिया था। यानी दल तो बदले लेकिन चेहरे नहीं। अब धीरे-धीरे बीजेपी के सिर उभारने के बाद एक बार फिर नए सिरे से राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ है।

केरल से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे एपी अब्दुललाकुट्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक रहने के दौरान कम्युनिस्ट सरकार की वर्तमान क्रूरता नहीं बल्कि अतीत में की गई क्रूरता की भी पोल खोल दी थी। एपी अब्दुललाकुट्टी फिलहाल केरल भाजपा के उपाध्यक्ष हैं।

5 मार्च 2008 को कन्नूर जिले में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक के हवाले से उन्होंने अपने आलेख में लिखा है कि जो पिनरायी विजयन अभी केरल की मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री हैं, उस समय सीपीएम के सेक्रेटरी थे। उन्होंने कहा थ कि विजयन ने अपने कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया था कि केरल में पश्चिम बंगाल के मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वहाँ अपने दुश्मनों का एक बिना बूँद खून बहाए जिंदा में दफना दिया जाता है वही फार्मूला केरल में भी लागू किया जाना चाहिए।

विजयन ने स्पष्ट रूप से कहा था कि केरल में भी अपने राजनीतिक दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए उन्हें जिंदा जमीन में गाड़ देना चाहिए। उन्होंने विस्तार से बताते हुए लिखा कि एक गड्ढा बनाने के बाद में उसमें काफी मात्रा नमक रखकर आदमी को वहीं दफना देना चाहिए। क्योंकि इससे पुलिस को कभी कोई सुराग नहीं मिलेगा।

एपी अब्दुललाकुट्टी के इस खुलासे यह तो तय हो गया है कि कम्युनिस्ट कितने क्रूर होते हैं। पश्चिम बंगाल में यदि कम्युनिस्टों ने इतने दिनो तक शासन किया है तो वह लोकप्रियता के आधार पर नहीं बल्कि क्रूरता के आधार पर। इसी के उदाहरण थे भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु।

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