Sunday, July 25, 2021
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हैदराबाद में केवल ओवैसी को घेरने गई है BJP या कोई और है निशाना: नड्डा, योगी और शाह के उतरने का कुछ अलग ही है गणित…

कभी 15 मिनट के लिए पुलिस हटाने की बात करने वाले छोटे ओवैसी कभी माता मंदिर के नाम पर वोट माँगते हैं तो कभी 'हम किसी के बाप से भी नहीं डरते' वाला बयान देते हैं, तो क्या ये नहीं लगना चाहिए कि AIMIM का नेतृत्व अपने गढ़ में ही घिर गया है?

मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु ऐसे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशंस हैं, जिन पर सभी राजनीतिक दल कब्ज़ा जमाना चाहते हैं, क्योंकि वित्तीय रूप से ये तीनों कई राज्यों से भी ज्यादा समृद्ध हैं। दक्षिण भारत में चेन्नई और हैदराबाद बड़े महानगर हैं। अब सभी की नजरें हैदराबाद में होने वाले GHMC (ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) चुनाव पर है, जहाँ पिछली बार मात्र 4 सीटें जीतने वाली पार्टी भाजपा ने इस बार अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

आखिर इसके मायने क्या हैं? जब असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं कि एक ‘गली के चुनाव’ लड़ने के लिए इतने बड़े-बड़े नेता आ रहे हैं, तो ये उनकी कौन सी असुरक्षा की भावना दिखाती है? कभी 15 मिनट के लिए पुलिस हटाने की बात करने वाले छोटे ओवैसी कभी माता मंदिर के नाम पर वोट माँगते हैं तो कभी ‘हम किसी के बाप से भी नहीं डरते’ वाला बयान देते हैं, तो क्या ये नहीं लगना चाहिए कि AIMIM का नेतृत्व अपने गढ़ में ही घिर गया है?

GHMC चुनाव: भाजपा के पास खोने को कुछ भी नहीं

हम इसके मायने आगे तलाशेंगे, लेकिन सबसे पहले GHMC के पिछले चुनावों और इस बार जिस तरह से भाजपा बड़ा अभियान चल रही है, उसकी समीक्षा ज़रूरी है। 2009 में हुए GHMC के चुनाव में कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। सोचिए, मात्र एक दशक में ये अंकगणित कितना बदल गया है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस की हालत महाराष्ट्र से भी बदतर हो गई है। महाराष्ट्र में 6 साल पहले सत्ता में रही पार्टी आज चौथे नंबर पर है।

2009 में कॉन्ग्रेस को 105 में से 52 सीटें मिली थीं। उस समय अखंड आंध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस सत्ता में तो थी, लेकिन राजशेखर रेड्डी का असामयिक देहांत हो चुका था। वो राज्य में कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता और मुख्यमंत्री थे। आज उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी कॉन्ग्रेस से बगावत कर अपने दम पर जीत कर आंध्र प्रदेश में सरकार चला रहे हैं। कॉन्ग्रेस के बाद चंद्रबाबू नायडू की TDP को तब 45 सीटें मिली थीं। भाजपा मात्र 4 सीटों के साथ चौथे स्थान पर थी।

तीसरे स्थान पर वो पार्टी थी, जिसका हैदराबाद गढ़ रहा है। जो लगातार हैदराबाद की अधिकतर विधानसभा सीटें जीतती रही हैं। इस बार भी महानगर में पार्टी के पास 7 सीटें हैं। हैदराबाद की लोकसभा सीट पर तो 1984 से ही ओवैसी परिवार का कब्ज़ा रहा है। इस बार AIMIM हैदराबाद से बाहर निकलने की कोशिश में है और महाराष्ट्र में 2 और हालिया बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सीमांचल में 5 सीटें मिलने के बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा भी है।

हम बंगाल को आ रहे हैं” – ऐसा कह के असदुद्दीन ओवैसी ने ममता बनर्जी के दिल की धड़कनें भी बढ़ा दी हैं और उन्हें वहाँ कई मौलानाओं का समर्थन भी मिल रहा है। 2016 में हुए GHMC के चुनाव में भाजपा ने अपनी संख्या बरकरार रखी, लेकिन कॉन्ग्रेस पूरे परिदृश्य से गायब सी होने लगी। जिस पार्टी के पास पिछले चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें थीं, राज्य (अखंड आंध्र) में सत्ता थी, केंद्र में सत्ता थी- उसने 2016 तक तीनों ही गँवा दिया था।

के चंद्रशेखर राव की TRS राज्य के साथ-साथ GHMC में भी बड़ी पार्टी बन कर उभरी और उसने 150 में से 99 सीटें जीत कर अपना दबदबा कायम किया। AIMIM का प्रदर्शन वैसा ही रहा, उसकी 1 सीट बढ़ गई। अब जब 2020 के चुनाव में भाजपा ने जिस तरह से ताकत झोंकी है, स्पष्ट है कि TRS और AIMIM की जो भी सीटें घटेंगी, वो कॉन्ग्रेस के पाले में नहीं, बल्कि भाजपा के खाते में ही आएँगी।

यहाँ एक बात का जिक्र करना आवश्यक है कि आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद तेलंगाना से TDP गायब हो गई। ये होना ही था, क्योंकि विभाजन के लिए हुए आंदोलन में जिस कदर हिंसा हुई थी और जो पागलपन देखने को मिला था, उसके बाद दोनों राज्यों के राजनीतिक दलों का एक-दूसरे के राज्य से सफाया सा हो गया। भाजपा के पास पाने के लिए यहाँ सब कुछ है, खोने के लिए कुछ नहीं। भाजपा का कुछ भी इन दोनों राज्यों में दाँव पर नहीं लगा है।

हैदराबाद चुनाव प्रचार: भाजपा नेताओं ने फेवरिट मुद्दे

अब जरा भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी सीएम और फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ और पार्टी के कर्ताधर्ता व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जिस तरह से वहाँ रैलियाँ की है, उससे अंदाज़ा लग सकता है कि भाजपा के लिए यहाँ मुद्दा क्या है। नड्डा ने बिहार विधानसभा में भाजपा के स्ट्राइक रेट की बात उठाई, जहाँ पार्टी ने 74 सीटें जीत रखी हैं। वहीं योगी आदित्यनाथ ने याद दिलाया कि बिहार में नीतीश कुमार की फिर से सरकार बनी है।

उन्होंने उस हैदराबाद को ओवैसी द्वारा ‘गली का चुनाव’ कहने पर आपत्ति जताई, जहाँ लोकसभा की 5 और विधानसभा की 24 सीटें हैं। भाजपा की यहाँ जोर-आजमाइश का एक बड़ा कारण ये भी है। भाजपा को 2014 में हिंदी बेल्ट में गजब का समर्थन मिला था। पार्टी को पता था कि दूसरी-तीसरी बार में भी हर जगह ऐसा प्रदर्शन दोहराना कठिन है, इसीलिए नई जमीनें ढूँढ़नी पड़ेंगी। पश्चिम बंगाल में 18 और ओडिशा में 8 सीटें जीत कर भाजपा ने ये साबित भी किया।

इस बार पार्टी को पता है कि यही काम दक्षिण भारत कर सकता है। तमिलनाडु में दो द्रविड़ पार्टियों के बीच सारी सियासत दशकों से अटकी पड़ी है। कर्नाटक में भाजपा सत्ता में है ही और उसे येदियुरप्पा के बाद अगली पीढ़ी का नेता तैयार करना है। बेंगलुरु के ही तेजस्वी सूर्या जोर-शोर से हैदराबाद में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। केरल में सबरीमाला मामले में श्रद्धालुओं के साथ खड़े होने के बावजूद पार्टी को 2019 लोकसभा चुनावों में खास समर्थन मिला नहीं।

इसीलिए, अब तेलंगाना के सहारे भाजपा दक्षिण की राजनीति में पैठने के इंतजार में है, क्योंकि यहाँ TRS ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है, जिससे एंटी-इंकम्बेंसी भी आने वाले दिनों में गहरी हो सकती है। साथ ही हैदराबाद में पूरे देश की इस्लामी कट्टरता अपने घर में लेकर बैठे ओवैसी परिवार को उसके गढ़ में घेरा जा सकता है। साथ ही 5 लोकसभा सीटों का गणित भाजपा लगा रही है, पूरे तेलंगाना में तो 17 हैं।

एक और बात गौर कीजिए कि अमित शाह के मंत्रालय में डिप्टी मंत्री (राज्यमंत्री) के रूप में वही दो लोग हैं, जिन्हें अपने-अपने राज्यों में पार्टी का अगली पीढ़ी का चेहरा बनाने की तैयारी है। 60 साल के जी किशन रेड्डी और 54 साल के नित्यानंद राय केंद्रीय गृह मंत्रालय में पूर्व भाजपा अध्यक्ष के अंतर्गत काम कर के अच्छा प्रशासनिक अनुभव लेकर आ रहे हैं, ऐसे में इन दोनों पर सभी की नजरें हैं ही।

जी किशन रेड्डी हैदराबाद के ही जुड़वाँ शहर सिकंदराबाद लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं और वो GHMC चुनाव में भी जम कर प्रचार कर रहे हैं। इसके अलावा तेलंगाना में उस वंशवादी राजनीति का दबदबा है, जिसका विरोध भारतीय जनता पार्टी करती आई है। जेपी नड्डा ने ‘Me, My Family और My Friends’ वाला तंज कस कर इस वंशवाद पर निशाना भी साधा और तेलंगाना में भ्रष्टाचार को लेकर जनता के बीच एक ईमानदार पार्टी को मौका देने का निवेदन किया।

ओवैसी परिवार को राजनीति विरासत में मिली है। केसीआर के बेटे केटीआर को सरकार और संगठन में आगे बढ़ाया जा रहा है। 44 वर्षीय नेता को न सिर्फ मंत्री बनाया गया, बल्कि वो TRS के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। साथ ही उनको दिए गए मंत्रालय पर गौर कीजिए- म्युनिसिपल एडमिनिस्ट्रेशन एंड अर्बन डेवलपमेंट। यानी, उन्हें एकदम मलाईदार मंत्रालय थमाया गया है और म्युनिसिपल प्रशासन का जिम्मा भी सौंपा गया है।

भाजपा ने उन्हें भी अपने हमले का निशाना बना रखा है। केटीआर भले ही बार-बार ये कह कर ‘ऑल इज वेल’ की फीलिंग लेने की कोशिश कर रहे हों कि उनकी लड़ाई AIMIM से है, भाजपा से तो है ही नहीं। लेकिन, जिस तरह वो बार-बार भाजपा पर हमला कर रहे हैं और उसे ‘बेचो इंडिया’ बताते हुए अपनी पार्टी को ‘सोचो इंडिया’ कह रहे हैं, उससे साफ़ है कि उन्हें भी पता है कि असली खतरा किससे होने वाला है।

एक फैक्टर, जिसकी बात सभी कर रहे हैं और जिसने 2019 लोकसभा चुनाव से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक रैलियाँ कर के भाजपा के पक्ष में हवा का रुख मजबूत किया है, वो हैं योगी आदित्यनाथ। वे एक ऐसा चेहरा हैं, जिसने तेलंगाना में रोड शो कर के शहर को भगवामय कर दिया। ‘जय श्री राम’ के नारे गूँजने लगे और उन्होंने हैदराबाद का नाम बदल कर भाग्यनगर करने का वादा किया। साथ ही उदाहरण दिया कि किस तरह फैजाबाद को यूपी में अयोध्या किया गया।

योगी आदित्यनाथ ने अपना मुख्य फोकस इस बात पर रखा कि जिस तरह से हैदराबाद में निजामशाही के खिलाफ आंदोलन हुआ था, उसके बाद यहाँ की जनता के सामने नए ‘निजाम’ पैदा हो गए और वो राजसत्ता की तरह चीजों को चला रहे हैं। हिंदुत्व और उससे जुड़े मुद्दे उनके भाषण का मुद्दा बने ही, साथ ही भाजपा के विकास कार्यों को भी गिनाया। ओवैसी के ध्रुवीकरण का भाजपा ने विकास और हिंदुत्व के माध्यम से जवाब दिया है।

लगभग यही बातें रविवार (नवंबर 29, 2020) को अमित शाह ने भी की, जिन्होंने हैदराबाद को ‘निजाम संस्कृति’ से मुक्ति दिलाने का वादा किया। केंद्रीय गृह मंत्री ने पुराने शहर में स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर में दर्शन किया और जनता से कहा कि भाजपा को GHMC में सीटों की संख्या तो बढ़ानी है ही, साथ ही ये भी सुनिश्चित करना है कि मेयर भी इसी पार्टी का हो। उन्होंने हैदराबाद को आईटी हब बनाने की भी बात की।

आप इस बात पर भी गौर कीजिए कि इन चुनावों के लिए प्रभारी किसे बनाया गया है। ये जिम्मा उसी नेता को दिया गया है, जिसने 2019 लोकसभा चुनाव और 2020 विधानसभा चुनाव में बतौर प्रभारी बिहार में पार्टी के लिए सफल प्रबंधन कर के दिखाया। सांसद भूपेंद्र यादव ही हैदराबाद GHMC चुनाव में भाजपा के प्रभारी हैं। हर मोर्चे पर पार्टी ने एकदम सोच समझ कर चेहरों को आगे किया है, पूरी तैयारी के साथ।

नहीं, केवल ओवैसी के लिए तेलंगाना में नहीं गई है BJP

हैदराबाद में भाजपा केवल असदुद्दीन ओवैसी को घेरने के लिए नहीं गई है। ये लोकसभा 2024 के लिए तैयारी चल रही है। क्योंकि, AIMIM तो मात्र 33% सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। उसने 150 में से मात्र 51 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और इनमें से भी अधिकतर पुराने हैदराबाद में हैं। इसलिए, दूर तक देखने वाले राजनीतिक पंडित ये तो समझते हैं कि यहाँ ताकत लगाने से ये सन्देश जाएगा कि ओवैसी पर भाजपा की बी-टीम होने के लग रहे झूठे आरोपों को निराधार करने के लिए पार्टी ऐसा कर रही है।

लेकिन, उससे भी ज्यादा दूर देखने वालों को पता है कि तैयारी तेलंगाना में सत्ता और 2024 लोकसभा चुनाव में हिंदी बेल्ट में होने वाले थोड़े-बहुत नुकसान की भरपाई के लिए अभी से तैयारी चालू है। ये लड़ाई TRS से है, वास्तविक लड़ाई राज्य की सत्ताधारी पार्टी से है। सभी सीटों पर भाजपा भी लड़ रही है और TRS भी। ओवैसी तो विधानसभा चुनावों में भी पूरी सीटों पर नहीं लड़ते। 2018 में वो 11 पर लड़े थे तो 2014 में मात्र 8 पर।

हाँ, ओवैसी भाजपा का निशाना जरूर हैं, लेकिन वो एक जरिया भी हैं, जिन्हें नेस्तनाबूत कर भाजपा दक्षिण में अपना रथ आगे बढ़ाएगी। उन्हें ‘हैदराबाद का जिन्ना’ से लेकर हैदराबाद में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ तक की बातें ज़रूर कही गईं। लेकिन, रजाकारों के अत्याचार की याद दिला कर और निजाम के पाकिस्तानी झुकाव को फिर से मुद्दा बना कर भाजपा ने आक्रामक तरीके से इस्लामी पार्टी को आड़े हाथों लिया है।

सबसे पहली बात तो ये है कि जिन पार्टियों ने एक सामाजिक आंदोलन के बाद सत्ता प्राप्त किया- आंध्र प्रदेश के विभाजन का। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने सिंगूर और नंदीग्राम हड़ताल के बाद सत्ता प्राप्त की। ऐसे नेताओं को हटाना जरा मुश्किल सा होता है। इसीलिए, भाजपा की लड़ाई देखने में तो ओवैसी से है, लेकिन असली निशाना सत्ताधारी हैं।

2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हैदराबाद और सिकंदराबाद की 14 में से 7 विधानसभा सीटों पर बढ़त प्राप्त की थी, ऐसे में पार्टी को उम्मीदें तभी से दिखने लगी थी। सिकंदराबाद पहले से भी भाजपा का क्षेत्र रहा है और कॉन्ग्रेस व TDP के गायब होने के बाद पैदा हुई जगह को भाजपा भरना चाहती है। अब भाजपा KCR के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। इस चुनाव का परिणाम जो भी हो, फायदा एक ही पार्टी को दिख रहा है, क्योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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