Friday, April 23, 2021
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महाराष्ट्र की सियासत में नया मोड़: परमबीर के लेटर बम से शिवसेना-NCP की दोस्ती में दरार, बिहार दोहराए जाने के आसार

जो भी गड़बड़ी चल रही है, उसकी जानकारी अगर उद्धव ठाकरे को हुई भी है तो परमबीर सिंह की ब्रीफिंग या चिट्ठी के जरिए ही हुई है - मतलब, पूरा ठीकरा अनिल देशमुख के सिर फोड़ा जा रहा है। ऐसा होना बाहर से बीजेपी के फायदे में है यानी देवेंद्र फडणवीस के फायदे की बात है और अंदर से उद्धव ठाकरे के फायदे की बात है।

एंटीलिया केस और मनसुख हिरेन मौत के मामले में घिरी महाराष्ट्र सरकार एक बार फिर मुश्किलों के दौर से गुजर रही है। मामले में पूर्व पुलिस कमिश्नर के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर वसूली का आरोप लगाने के बाद से महाविकास अघाड़ी सरकार में अंदरूनी खटपट भी तेज हो गई है। अब यह खटपट शिवसेना के मुखपत्र सामना के पन्नों में भी दिखने लगी है।

महाराष्ट्र में निलंबित पुलिस अधिकारी सचिन वाजे को लेकर राजनीति और गर्म होता जा रहा है। इस मामले को लेकर महाराष्ट्र में लगातार विपक्ष हमला कर रहा है वहीं आज (मार्च 28, 2021) शिवसेना ने सामना में महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर सवाल उठाया है। शिवसेना के सासंद संजय राउत ने सामना में लिखा है कि सचिन वाजे वसूली कर रहा था और राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख को इसकी जानकारी नहीं थी? देशमुख को गृह मंत्री का पद दुर्घटनावश मिल गया।

आखिर एपीआई स्तर के अधिकारी सचिन वाजे को इतने अधिकार किसने दिए? यही जाँच का विषय है। पुलिस आयुक्त, गृहमंत्री, मंत्रिमंडल के प्रमुख लोगों का दुलारा व विश्वासपात्र रहा सचिन वाजे महज एक सहायक पुलिस निरीक्षक था लेकिन उसे सरकार में असीमित अधिकार किसके आदेश पर दिया गया। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री ने वाजे को 100 करोड़ रुपए वसूलने का टारगेट दिया था, ऐसा आरोप मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह लगा रहे हैं।

सामना में संजय राउत लिखते हैं, “अनिल देशमुख ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से बेवजह पंगा लिया। गृहमंत्री को कम से कम बोलना चाहिए। बेवजह कैमरे के सामने जाना और जाँच का आदेश जारी करना अच्छा नहीं है। सौ सुनार की एक लोहार की ऐसा बर्ताव गृहमंत्री का होना चाहिए। पुलिस विभाग का नेतृत्व सिर्फ सैल्यूट लेने के लिए नहीं होता है। वह प्रखर नेतृत्व देने के लिए होता है। प्रखरता ईमानदारी से तैयार होती है, ये भूलने से कैसे चलेगा?”

इधर अनिल देशमुख ने जानकारी देते हुए बताया कि उन पर लगे भ्रष्टाचार और वसूली से जुड़े आरोप की जाँच अब हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज करेंगे। देशमुख ने कहा, “जो आरोप मुझ पर पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर ने लगाए थे, मैंने उसकी जाँच कराने की माँग की थी। मुख्यमंत्री और राज्य शासन ने मुझ पर लगे आरोपों की जाँच उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज के द्वारा कराने का निर्णय लिया है। जो भी सच है वह सामने आएगा।”

उल्लेखनीय है कि मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के लेटर बम से शिवसेना-एनसीपी की दोस्ती में दरार पड़ती दिखाई दे रही है। इससे न केवल एनसीपी बल्कि शिवसेना की छवि को भी बड़ा झटका लगा है। इस पूरी पिक्चर में कॉन्ग्रेस गायब है। जाहिर है कि शिवसेना अपनी छवि बचाने के लिए इस चक्रव्यूह से निकलना चाहेगी। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि महाराष्ट्र में बिहार पैटर्न दोहराया जा सकता है।

देश के शीर्ष उद्योगपति मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित निवास एंटीलिया के बाहर जिलेटिन की छड़ों से लदी एक कार बरामद होने के बाद क्राइम इंटेलीजेंस यूनिट (CIU) के पूर्व प्रमुख एपीआई सचिन वाजे की गिरफ्तारी से महाराष्ट्र की सियासत में नया नया मोड़ आ गया है।

बता दें कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार ने राजद से नाता तोड़कर भाजपा के साथ वापस सरकार बना ली थी। माना जा रहा है कि शिवसेना एक बार पुन: पूर्व सहयोगी पार्टी भाजपा से हाथ मिला सकती है। ऐसे में कॉन्ग्रेस-राकांपा अलग-थलग पड़ जाएँगे। हालाँकि, होली से एक दिन पहले एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात कर इन अटकलों को और हवा दे दी है।

शिवसेना की बजाए घिर गई एनसीपी

एंटीलिया मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने शुरू की तो वाजे की करतूत सामने आने लगी। इस मामले में पूरी तरह से शिवसेना को निशाना बनाया जाने लगा। सचिन वाजे को कोरोना काल के दौरान पिछले जून महीने में बहाल किया गया था। तब से यह माना जा रहा था कि वह शिवसेना का खासमखास है। वहीं, यह भी खबरें चली कि वाजे की बहाली के मुद्दे पर एनसीपी ने विरोध जताया था, लेकिन अब सिंह के पत्र से इससे पूरे प्रकरण में एनसीपी का असली चेहरा सामने आ गया है। 

अनिल देशमुख के मंत्री पद पर ग्रहण, सरकार के अस्तित्व पर सवाल

बहरहाल लेटर बम से महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख के मंत्री पद पर ग्रहण लग चुका है, लेकिन महाविकास आघाड़ी सरकार के अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लग गया है। इस घटनाक्रम के बीच बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र में बिहार पैटर्न दोहराया जा सकता है।

शिवसेना और एनसीपी में बढ़ेगी दूरी

परमबीर सिंह ने अपने पत्र में 100 करोड़ रुपए की वसूली का टारगेट तय करने के मामले में पूरी तरह से एनसीपी को ही निशाना बनाया है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि अनिल देशमुख के इस भ्रष्टाचार के संबंध में शरद पवार और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को भी अवगत कराया था, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 

परमबीर सिंह के तबादले के बाद शिवसेना ने खुलकर उनका बचाव किया। पार्टी के मुखपत्र में दावा किया गया कि परमबीर सिंह दिल्ली की खास लॉबी के शिकार हुए, लेकिन अब सिंह के पत्र के बाद राजनीतिक परिस्थिति पूरी तरह से बदली हुई नजर आ रही है। इसके बाद शिवसेना और एनसीपी के बीच दोषारोपण की शुरुआत भी हो गई है। इससे दोनो दलों के बीच दूरी बढ़ेगी जिसका पूरा फायदा भाजपा उठाएगी।

इससे पहले कॉन्ग्रेस और शिवसेना के बीच नाराजगी भी सामने आ चुकी है। महाराष्ट्र में अलग-अलग विचारधारा वाले तीन दलों की महाविकास अघाड़ी सरकार में कॉन्ग्रेस महत्वपूर्ण घटक है। प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने शिवसेना को इसकी याद दिलाई थी। पटोले ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के चेयरमैन पद के लिए एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की लॉबिंग कर रहे शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत को एक तरह से आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि शिवसेना को यह नहीं भूलना चाहिए कि महा विकास अघाड़ी सरकार कॉन्ग्रेस के समर्थन से ही बनी है। वे शरद पवार की वकालत न करें।

शनिवार (मार्च 27, 2021) को मुंबई से सटे भिवंडी में कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए नाना पटोले ने संजय राउत को फिर से नसीहत दी कि वे पार्टी के नेताओं पर टिप्पणी करने से बाज आएँ। अगर वे ऐसा ही करते रहे तो हमें भी कुछ सोचना पड़ेगा। पटोले ने एक तरह से साफ शब्दों में संकेत दिया कि यदि टीका-टिप्पणी बंद नहीं हुई तो कॉन्ग्रेस महाविकास आघाड़ी से अपना हाथ खींच सकती है। साथ ही, पटोले ने निकाय चुनाव अपने दम पर लड़ने का ऐलान किया। 

अब अगर उन बातों को ध्यान से समझने की कोशिश करें जो परमबीर सिंह की अर्जी में शामिल हैं तो ये भी आसानी से समझ आ जाएगा कि परमबीर सिंह का एक्टिविज्म अगर जाती दुश्मनी भर ही नहीं सिमटा है तो उससे किसे फायदा मिल रहा है – या कहें कि वो किसे फायदा पहुँचाने के लिए सक्रिय हो सकते हैं या फिर वो भी किसी बड़ी राजनीतिक रणनीति का अंदर ही अंदर हिस्सा बने हुए हैं – ये सवाल तो उठेंगे ही। वैसे भी ऐसे सवालों को हवा भी वही दे रहे हैं।

  • परमबीर सिंह की अदालती अर्जी में बताया गया कि 20 मार्च को उद्धव ठाकरे को चिट्ठी लिखने से पहले वो मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम के साथ साथ कई नेताओं से ब्रीफिंग में बता चुके थे कि अनिल देशमुख की अगुवाई में गृह मंत्रालय में क्या क्या चल रहा है।
  • जैसा कि परमबीर सिंह ने चिट्ठी में लिखा था, अदालती अर्जी में भी आरोप लगाया कि ट्रांसफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार के साथ-साथ सचिन वाजे के जरिए हर महीने 100 करोड़ का टारगेट तय किया गया था।
  • चिट्ठी की ही तरह परमबीर सिंह ने अर्जी में लिखा कि सांसद मोहन डेलकर की आत्महत्या की जाँच में भी अनिल देशमुख अलग से दिलचस्पी ले रहे थे और बीजेपी के कुछ नेताओं की भूमिका की जाँच करने और उनको फँसाने के लिए पुलिस अफसरों पर दबाव डाल रहे थे।

ये तीनों ही बातें कई चीजें साफ कर दे रही हैं। जो भी गड़बड़ी चल रही है, उसकी जानकारी अगर उद्धव ठाकरे को हुई भी है तो परमबीर सिंह की ब्रीफिंग या चिट्ठी के जरिए ही हुई है – मतलब, पूरा ठीकरा अनिल देशमुख के सिर फोड़ा जा रहा है। ऐसा होना बाहर से बीजेपी के फायदे में है यानी देवेंद्र फडणवीस के फायदे की बात है और अंदर से उद्धव ठाकरे के फायदे की बात है। एनसीपी का बचाव की स्थिति में होना गठबंधन में उद्धव ठाकरे का प्रभाव बढ़ाएगा। अगर प्रभाव नहीं भी बढ़े तो सरकार को लेकर जिस रिमोट कंट्रोल की चर्चा रहती है, उसकी पकड़ और असर तो कम होगा ही।

ये सारी चीजें साफ-साफ बता और जता रही हैं कि अकेले परमबीर सिंह का एक ही तीर, एक ही साथ मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है – कहीं ये भविष्य के किसी राजनीतिक समीकरण की एडवांस ‘पावरी’ तो नहीं हो रही है?

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