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Saturday, May 30, 2020
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आतंक की फंडिंग की जाँच मज़हब में दखल कैसे बन गई?

श्रीनगर में 20 मज़हबी जमातों की मीटिंग में प्रस्ताव पारित किया गया कि यह (दहशतगर्दी के समर्थन के आरोप में उमर फ़ारुख को एनआइए की नोटिस) मुसलमानों के मज़हबी मुआमलों में सीधी दखलंदाज़ी है। इस नोटिस की पुरज़ोर मुखालफ़त की जाएगी क्योंकि इससे सूबे की रिआया के जज्बातों को ठेस पहुँचती है।

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अभी 24 घंटे भी नहीं बीते थे ‘कश्मीर समस्या’ की इस्लामिक वर्चस्ववादी गर्भनाल को रेखांकित किए हुए और प्रदेश भर के कठमुल्लों के गिरोह ने इस आकलन को सही साबित कर दिया।

शिया-सुन्नी, सलाफ़ी-सूफी का भेद भुलाकर घाटी भर के इस्लामी नेता, अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ‘नरमपंथी’ धड़े के नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारुख को एनआइए के जाँच समन के खिलाफ़ इकट्ठे हो गए हैं। उनके मुताबिक कश्मीर में दहशतगर्दी और मौत के वीभत्स नाच के लिए पैसा कहाँ से आ रहा है, इसकी जाँच करना और इसी सिलसिले में जनाब उमर फ़ारुख जी से सवालात करने की हिमाकत घाटी के मज़हबी मामलों में दखलंदाज़ी है।

(आतंक के खिलाफ़ कदम उठाना मुसलमानों के नेताओं के लिए उनके मज़हबी मुआमलों में दखल है, पर देहली की सत्ता के लिए आज भी न ही आतंकवादियों का कोई मज़हब है न ही आतंक का कोई रंग)

180 करोड़ या दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी के इस्लामिक ‘उम्माह’ की 500 सबसे ताक़तवर शख्सियतों में शुमार उमर फ़ारुख ने अपनी जान को खतरे का हवाला देते हुए दिल्ली आने से मना कर दिया है और एनआइए से इल्तज़ा की है कि उनसे पूछताछ श्रीनगर में ही की जाए। इससे पहले आयकर विभाग और एनआइए ने उनके और उनकी अलगाववादी कौम के कई लीडरान के अड्डों पर इसी मामले के सिलसिले में छापेमारी की थी

हंगामा है क्यों बरपा

पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने उमर फ़ारुख समेत हिंदुस्तान के खिलाफ़ विष-वमन करने वाले अलगाववादी नेताओं, जिनमें हिंदुस्तान के सेक्युलरिज्म को जम कर निचोड़ने के बाद भी उसे ही कश्मीर और इस्लाम के दुश्मन के रूप में निशाने पर रखने वाले सैयद अली शाह गीलानी शामिल हैं, की हिफ़ाज़त में लगे अपने जवान वापस बुला लिए थे।

उमर फ़ारुख केवल हुर्रियत के एक धड़े के मुखिया ही नहीं बल्कि श्रीनगर की जामा मस्जिद के भी सिरमौर हैं। उनको समर्थन देने के लिए घाटी की गालियों में जुटी भीड़, और उस भीड़ के दिलों में मौजूद नफ़रत, फिर एक बार चीख़-चीख़ कर बता रहीं हैं कि कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं मज़हबी है।

श्रीनगर में 20 मज़हबी जमातों की मीटिंग में प्रस्ताव पारित किया गया कि यह (दहशतगर्दी के समर्थन के आरोप में उमर फ़ारुख को एनआइए की नोटिस) मुसलमानों के मज़हबी मुआमलों में सीधी दखलंदाज़ी है। मीरवाइज़ केवल एक सियासी राहनुमा नहीं बल्कि कश्मीर के लोगों के मज़हबी अगुआ भी हैं। उनके उत्पीड़न की हर कोशिश, जिसमें एनआइए की नोटिस भी शामिल है, की पुरज़ोर मुखालफ़त की जाएगी क्योंकि इससे सूबे की रिआया के जज्बातों को ठेस पहुँचती है।

इस प्रस्ताव को एक बार फ़िर से पढ़िए- और ध्यान से देखिए। मुसलमानों के मज़हबी अगुआ अपने आप पूरी घाटी और पूरे सूबे के मज़हबी लीडर हो गए- किसी ने जम्मू के हिन्दू डोगराओं से, लद्दाख के बौद्धों से, प्रदेश के मुट्ठी भर सिखों से नहीं पूछा कि जिस इस्लाम में उन्हें “काबिल-ए-क़त्ल” और “काफ़िर” कहा जाता है, उसके मज़हबी लीडर उमर फ़ारुख उनके लीडर कैसे हो गए!

दुर्भाग्यपूर्वक इस्लाम की यही सच्चाई है- जहाँ बहुसंख्यक इस्लामी हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों की कोई गिनती ही नहीं है। कश्मीर की यह वही सोच है जो 1947 से पाकिस्तान की रही है- अल्पसंख्यक जब बराबरी के मानवाधिकार तक नहीं रखते तो काहे के राजनीतिक अधिकार?

यही नहीं, प्रस्ताव को पढ़ते हुए कश्मीर के वरिष्ठतम मुफ़्ती (Grand Mufti) नसीर-उल-इस्लाम ने दहशतगर्दी की अनेक घटनाओं में साफ़ तौर पर लिप्त पाए गए संगठन जमात-ए-इस्लामी पर लगे प्रतिबन्ध की निंदा की। निंदा करते हुए इसके सरगनाओं व ज़मीनी दहशतगर्दों (Liberal media की भाषा में “कार्यकर्ताओं/cadres”, और सत्य के शब्दों में foot soldiers) की गिरफ़्तारी को भी मुफ़्ती नसीर-उल-इस्लाम ने इसे भी घाटी के मुसलमानों की मज़हबी गतिविधियों(?) में हस्तक्षेप घोषित किया

इसके पूर्व मंगलवार को घाटी के शांतिप्रिय व्यापारी संगठनों ने भी आतंकवादी नेताओं की गिरफ़्तारी को अपने “नेताओं, संस्थाओं, और संगठनों का बारम्बार उत्पीड़न” मानते हुए इसके खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया।

नफ़रत की आग में पिता को खोकर भी उमर फ़ारुख को नहीं आई सुध

1990 में अपने पिता को इसी ज़हरीली, इस्लामी-वर्चस्ववादी सोच के दहशतगर्दों के हाथों मीरवाइज़ उमर फ़ारुख खो चुके हैं। उनके वालिद, मीरवाइज़-ए-कश्मीर (लिख कर ले लीजिए कि उन्हें पूरे कश्मीर का मीरवाइज़ घोषित करते समय 300 साल पहले भी किसी ने घाटी के बौद्धों-सिखों-हिन्दुओं से नहीं पूछा होगा कि उन्हें इस्लामी मीरवाइज़ अपने पूरे सूबे के मीरवाइज़ के रूप में स्वीकार हैं या नहीं) मौलाना मौलवी मुहम्मद फ़ारुख शाह, को हिजबुल मुजाहिदीन के दहशतगर्द मोहम्मद अयूब डार ने उनके ही घर में गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था।

उस समय भारतीय सुरक्षा एजेंसियों, सेना, और पैरा-मिलिट्री फ़ोर्सेज़ पर उनकी हत्या का आरोप लगा था, पर 2011 में हुर्रियत के ही दूसरे नेता प्रोफ़ेसर अब्दुल गनी बट ने मुहम्मद फ़ारुख के क़त्ल को हुर्रियत की ही आतंरिक खींचातानी का परिणाम बताया था।

12 साल बाद उनके क़त्ल की बरसी पर मातम मानते हुए एक दूसरे अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन को भी पाकिस्तान-परस्त (no surprises here!!) नारे लगा रहे कुछ युवकों ने मौत के घाट उतर दिया था। उस समय लोन के पुत्र सज्जाद गनी लोन ने अपने पिता के क़त्ल की साजिश रचने का इल्ज़ाम आइएसआइ के साथ-साथ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ही कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गीलानी (जो कि बाद में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के बंटवारे पर कट्टरपंथी धड़े के सिरमौर बने) पर लगया था। बाद में सज्जाद ने यह आरोप ‘किसी कारणवश’ वापिस ले लिया।

1931 में तत्कालीन मीरवाइज़-ए-कश्मीर ने काफ़िर हिन्दुओं के डोगरा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले तत्कालीन महाराजा-ए-कश्मीर के खिलाफ़ मज़हबी संघर्ष में महती भूमिका निभाई थी।

महज़ 17 साल की उम्र में अपने वालिद के मीरवाइज़ उत्तराधिकारी बनने वाले उमर फ़ारुख हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ‘उदारवादी’ धड़े के मुखिया माने जाते हैं।

वह ‘उदारवादी’ किस एंगल से हैं, यह समझना मुश्किल है। शायद इसलिए कि वह अपने कट्टरवादी समकक्ष की तरह खुल कर “हिन्दुओं के दमन के लिए चाहिए आज़ादी” नहीं कहते।  

और कितने सबूत चाहिए

चूँकि भारतीय राजसत्ता सबसे अच्छा वाला केश तेल लगाकर सोती है, अतः इस उदहारण से भी राजनीतिक वर्ग पर सवार एकतरफ़ा सेक्युलरिज़्म और सहिष्णुता की तन्द्रा टूटना मुश्किल है। कश्मीरी बहुसंख्यक और उनके नेता चाहे जितना गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाएँ कि उन्हें काफ़िर हिन्दुओं के बराबर में खुद को खड़ा कर देने वाला संविधान मंज़ूर नहीं, सदियों से एक-दूसरे के खून के प्यासे शिया-सुन्नी हिन्दुओं की जिहाद रोकने की हिमाकत का पुरज़ोर जवाब देने एक हो जाएँ, राजनेता “all religions are same” की आलस्यपूर्ण सोच से निकलने से साफ़ मना कर देते हैं।

अभी भी लिख कर ले लीजिए कि वही रील रिवाइंड कर बजाई जाएगी- कट्टरपंथी मज़हबी सोच का राजनीतिक मोल-तोल से band-aid समाधान निकाल कर अपनी पीठ थपथपाई जाएगी, और “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” के तरानों से घाटी की नफ़रत भरी दहाड़ और जम्मू-लद्दाख के दिल में बैठे भय के आर्तनाद को दबा दिया जाएगा।

(महायोगी और प्रखर क्रांतिकारी Sri Aurobindo ने दशकों पहले अपने समकालीन भारतीयों में बौद्धिक आलस्य और खुद को छलने की इस प्रवृत्ति को भाँप कर इसे “loss of thought power (in Indians  of HIS TIME)” कहा था। अफ़सोस यह है भारत को आज़ाद हुए 75 साल होने वाले हैं, Aurobindo हमें लगभग 70 साल पहले छोड़ कर जा चुके हैं, और हम एक इंच भी आगे बढ़ने की बजाय 4 मील और पीछे आ गए हैं)

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