हिन्दू होने के नाते भारत की राष्ट्रीयता मिल जाने का प्रावधान जब तक लागू नहीं होगा, तब तक…

गौर से सोचा जाए तो शायद एनआरसी की सोच में ही कमी है। सेक्युलर सोच के साथ बने इस नियम के बदले भारत को हिन्दुओं का नैसर्गिक देश मान कर काम शुरू होना चाहिए था।

थोड़े ही दिन पहले सोशल मीडिया की बड़ी बहसों का मुद्दा रहा – ज़ोमैटो। मेट्रो ही नहीं, टायर टू कहे जाने वाले पटना, इंदौर, भोपाल, लखनऊ जैसे शहरों में भी इसके कर्मी सड़कों पर निकलते ही बड़ी आसानी से नजर आ जाते हैं। हाल में इनके बारे में परिवहन विभाग में पूछताछ की तो पता चला कि वैसे तो मोटरसाइकिल के लिए भी कमर्शियल और प्राइवेट के नियम बने हैं, मगर ये कंपनी अपने लिए चलने वाली मोटरसाइकिल को कमर्शियल की लिस्ट में डालती है या नहीं ये आरटीआई के लायक मुद्दा है। इस बारे में कोई भी सीधा बताने को तैयार नहीं हुआ।

मोटे तौर पर खाना पहुँचाने वाली ये कंपनी करती क्या है? इनके खुद के कोई किचन-रेस्तरां हैं क्या? जी नहीं, इनका खुद का खाना बनाने का कोई इंतजाम नहीं होता। इनके पास एक लिस्ट ग्राहकों की होती है और दूसरी शहर भर के रेस्तरां की लिस्ट होती है। उन्हें पता है कि आपके बजट में आपकी पसंद का व्यंजन कहाँ मिलेगा। वो बस आपके लिए आपकी पसंद का व्यंजन आपके घर पहुँचाने के दलाल हैं। बिलकुल ऐसे ही दलाल ओला/उबर या फिर ओयो वाले भी हैं। ओला/उबर वालों के पास अपनी कोई टैक्सी नहीं, ओयो वालों के पास अपना कोई होटल नहीं। ये आपकी जरुरत को आपके बजट में पूरा कर देने की दलाली लेते हैं।

दलालों का ये परिष्कृत और स्वीकार्य रूप जब देख चुके तो सोचिए कि सरकारी दफ्तरों पर क्या होता है? आपको फॉर्म भरना नहीं आता, फॉर्म कहाँ जमा करना है ये नहीं पता। ऐसी दर्जन भर जरुरतें होती हैं जिसकी वजह से पासपोर्ट ऑफिस, ड्राइविंग लाइसेंस बनने की जगह या ऐसे दूसरे सरकारी दफ्तरों के बाहर दलालों की पूरी एक व्यवस्था ही काम करती है। ऐसे ही दलालों ने पिछले दशकों में वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक बनवा डाले होंगे। यानी आप जिसे घुसपैठिया समझ रहे हैं, वो सरकारी दस्तावेजों के हिसाब से एक साधारण नागरिक से ज्यादा नागरिकता रखता है। ऐसे में एनआरसी का क्या होगा?

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बात यहीं ख़त्म हो जाती तो कोई बात नहीं थी। एनआरसी के हालिया समाचार बताते हैं कि करीब-करीब 19 लाख लोगों का आँकड़ा जो उन्होंने निकाला है, उसमें से अधिकांश हिन्दू ही हैं। ये संभवतः वो गरीब मजदूर होंगे, जो एक पीढ़ी पहले वहाँ गए और वहीं के होकर रह गए। दूसरी तरफ बांग्लादेश पहले से ही अड़ा हुआ है कि उसकी सीमा से भारत में कोई अवैध घुसपैठ हुई ही नहीं है! पिछले महीने मंत्री एस जयशंकर कह चुके हैं कि एनआरसी एक आतंरिक प्रक्रिया है और इससे बांग्लादेश को चिंतित होने की जरूरत नहीं। वहीं अमित शाह कहते हैं कि अवैध घुसपैठ बांग्लादेश से जुड़ा मुद्दा ही है!

जिन उन्नीस लाख लोगों को एनआरसी से बाहर किया गया है, उनकी अपील को अगर फोरेनर ट्रिब्यूनल ने ठुकरा दिया तो उन्हें लम्बी कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ेगी। इन सबके बीच याद दिला दें कि एक सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल भी आया था, जिसे भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। करीब पाँच साल का वक्त और 1000 करोड़ से ऊपर की धनराशी खर्च करने के बाद अगर एनआरसी के जरिए भारतीय नौकरशाही कोई फायदा नहीं पहुँचा पाई है, तो उसके निकम्मेपन पर ये एक और मेडल ही होगा। अगर गौर से सोचा जाए तो शायद एनआरसी की सोच में ही कमी है। सेक्युलर सोच के साथ बने इस नियम के बदले भारत को हिन्दुओं का नैसर्गिक देश मान कर काम शुरू होना चाहिए था।

वो बांग्लादेश या पाकिस्तान में जारी शोषण और लड़कियों के जबरन अपहरण, बलात्कार, और फिर विवाह का सामना नहीं कर सकते, ये काफी पहले ही तय हो गया था। जब इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल इस जय भीम के साथ जय मीम को जोड़ने के मुगालते से बाहर आए, तभी वो सब कुछ छोड़ कर 1950 के दौर में भारत लौट आए थे। गुमनामी की मौत मरे जोगेंद्र नाथ मंडल की गलतियों से सीखकर सिर्फ हिन्दू होने के नाते भारत की राष्ट्रीयता मिल जाने का प्रावधान जब तक लागू नहीं होगा, तब तक ऐसी समस्याएँ जारी रहेंगी।

बाकी रहा कागज़ी तौर पर नागरिकता सिद्ध करने का सवाल तो उसके लिए दलाली की अर्थव्यवस्था को तोड़ना होगा। अफसरशाही के शामिल रहते और नागरिकों के दलाली को एक जीवनशैली मानने के दौर में ये दलाली ख़त्म होगी, ये सोचना भी एक सपने जैसा ही है!

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